सुमन--वेद प्रकाश शर्मा

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Jemsbond
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सुमन--वेद प्रकाश शर्मा

Unread post by Jemsbond » 24 Dec 2014 10:02

सुमन


संध्या का आगमन होते ही सूर्य अपनी समस्त किरणों को समेटकर धरती के आंचल में मुखड़ा छिपाने की तैयारी करने लगा। रजनी अपने आंचल से नग्न वातावरण को ढांपने लगी। ये क्रिया प्रतिदिन होती थी...प्रकृति का यह अनुपम रूप प्रतिदिन सामने आता था...और इसके साथ ही गिरीश के हृदय की पीड़ाएं भयानक रूप धारण करने लगतीं।

उसके सीने में दफन गमों का धुआं मानो आग की लपटें बनकर लपलपाने लगता था। उसके मन में एक टीस-सी उठती...यह एक ठंडी आह भरके रह जाता...। ये नई बात नहीं थी, प्रतिदिन ऐसा ही होता...।

जैसे ही संध्या के आगमन पर सूर्य अपनी किरणें समेटता...जैसे ही किरणें सूर्य में समाती जातीं वैसे ही उसके गम, उसके दुख उसकी आत्मा को धिक्कारने लगते, उसके हाल पर कहकहे लगाने लगते।

प्रतिदिन की भांति आज भी उसने बहुत चाहा...खुद को बहुत रोका किंतु वह नहीं रुक सका...इधर सूर्य अपनी लालिमा लिए धरती के आंचल की ओर बढ़ा, उधर गिरीश के कदम स्वयं ही बंध गए...उसके कदमों में एक ठहराव था मानो वह गिरीश न होकर उसका मृत जिस्म हो।

भावानाओ के मध्य झूलता...गमों के सागर में डूबता...वह सीधा अपने घर की छत पर पहुँचा और फिर मानो उसे शेष संसार का कोई भान न रहा।

उसकी दृष्टि अपनी छत से दूर एक दूसरी छत पर स्थिर होकर रह गई थी। यह छत उसके मकान से दो-तीन छतें छोड़कर थी। उस मकान की एक मुंडेर को बस वह उसी मुंडेर को निहारे जा रहा था...मुंडेर पर लम्बे समय से पुताई न होने के कारण काई-सी जम गई थी।

वह एकटक उसी छत को तकता रहा। इस रिक्त छत पर न जाने वह क्या देख रहा था। छत को निहारते-निहारते उसके नेत्रों से मोती छलकने लगे। फिर भी वह छत को निहारता ही रहा...निहारता ही चला गया।...यहां तक कि सूर्य पूर्णतया धरती के आंचल में समा गया। रात्रि ने अपना आंचल वातावरण को सौंपा...वह छत...वह मुंडेर सभी कुछ अंधकार में विलुप्त-सी हो गई किंतु गिरीश मानो अब भी कुछ देख रहा था, उसे वातावरण का कोई आभास न था।

सहसा वह चौंका...किसी का हाथ उसके कंधे पर आकर टिका...वह घूमा...सामने उसका दोस्त शिव खड़ा था...शिव ने उसकी आंखों से ढुलकते आंसुओं को देखा, धीमे से वह बोला–‘‘अब वहां क्या देख रहे हो? वहां अब कुछ नहीं है दोस्त...वह एक स्वप्न था गिरीश जो प्रातः के साथ छिन्न-छिन्न हो गया...भूल जाओ सब कुछ...कब तक उन गमों को गले लगाए रहोगे?’’

‘‘शिव, मेरे अच्छे दोस्त।’’ गिरीश शिव से लिपट गया–‘‘न जाने क्यों मुझे अमृत के जहर बनने पर भी उसमें से अमृत की खुशबू आती है।’’

‘‘आओ गिरीश मेरे साथ आओ।’’ शिव ने कहा और उसका हाथ पकड़कर छत से नीचे की ओर चल दिया।

शिव गिरीश का एक अच्छा दोस्त था। शायद वह गिरीश की बदनसीबी की कहानी से परिचित था तभी तो उसे गिरीश से सहानुभूति थी, वह गिरीश के गम बांटना चाहता था।

अतः वह उसका दिल बहलाने हेतु उसे पास ही बने एक पार्क में ले गया।

अंधेरा चारों ओर फैल चुका था, पार्क में कहीं-कहीं लैम्प रोशन थे। वे दोनों पार्क के अंधेरे कोने में पहुँचकर भीगी घास पर लेट गए। गिरीश ने सिगरेट सुलगा ली।
धुआं उसके चेहरे के चारों ओर मंडराने लगा। साथ ही वह अतीत की परछाइयों में घिरने लगा।

शिव जानता था कि इस समय उसका चुप रहना ही श्रेयकर है।

‘‘मैं तुमसे प्यार करती हूं भवनेश, सिर्फ तुमसे।’’ एकाएक उनके पास की झाड़ियों के पीछे से एक नारी स्वर उनके कानों के पर्दों से आ टकराया।

‘‘लेकिन मुझे डर है सीमा कि मैं तुम्हें पा न सकूंगा...तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए जिस वर को चुना है वह कोई गरीब कलाकार नहीं बल्कि किसी रियासत का वारिश है।’’ वह पुरुष स्वर था।

‘‘भवनेश!’’ नारी का ऐसा स्वर मानो पुरुष की बात ने उसे तड़पा दिया हो–‘‘ये तुम कैसी बातें करते हो? मैं तुम्हारे लिए सारी दुनिया को ठुकरा दूंगी। मैं तुम्हारी कसम खाती हूं, मेरी शादी तुम्हीं से होगी, मैं वादा करती हूं, मैं तुम्हारी हूं और हमेशा तुम्हारी ही रहूंगी, भवनेश! मैं तुमसे प्यार करती हूं, सत्य प्रेम।’’
झाड़ियों के पीछे छुपे इस प्रेमी जोड़े के वार्तालाप का एक-एक शब्द वे दोनों सुन रहे थे। न जाने क्यों सुनते-सुनते गिरीश के नथुने फूलने लगे, उसकी आँखें खून उगलने लगीं, क्रोध से वह कांपने लगा और उस समय तो शिव भी बुरी तरह उछल पड़ा जब गिरीश किसी जिन्न की भांति सिगरेट फेंककर फुर्ती के साथ झाड़ियों के पीछे लपका। वह प्रेमी जोड़ा चौंककर खड़ा हो गया।

इससे पूर्व कि कोई भी कुछ समझ सके।
चटाक।
एक जोरदार आवाज के साथ गिरीश का हाथ लड़की के गाल से टकराया।

सीमा, भवनेश और शिव तो मानो भौंचक्के ही रह गए।
तभी गिरीश मानो पागल हो गया था। अनगिनत थप्पड़ों से उसने सीमा को थपेड़ दिया और साथ ही पागलों की भांति चीखा।

‘‘कमीनी, कुतिया, तेरे वादे झूठे हैं। तू बेवफा है, तू भवनेश को छल रही है। तू अपना दिल बहलाने के लिए झूठे वादे कर रही है। नारी बेवफाई की पुतली है। भाग जा यहां से और कभी भवनेश से मत मिलना। मिली तो मैं तेरा खून पी जाऊंगा।’’

भौंचक्के-से रह गए सब। सीमा सिसकने लगी।
शिव ने शक्ति के साथ गिरीश को पकड़ा और लगभग घसीटता हुआ वहाँ से दूर ले गया। सिसकती हुई सीमा एक वृक्ष के तने के पीछे विलुप्त हो गई। भवनेश वहीं खड़ा न जाने क्या सोच रहा था।

गिरीश अब भी सीमा को अपशब्द कहे जा रहा था, शिव ने उसे संगमरमर की एक बेंच पर बिठाया और बोला–‘‘गिरीश, यह क्या बदतमीजी है?’’

‘‘शिव, मेरे दोस्त! वह लड़की बेवफा है। भवनेश को उस डायन से बचाओ। वह भवनेश का जीवन बर्बाद कर देगी। उस चुडैल को मार दो।’’

तभी भवनेश नामक वह युवक उनके करीब आया। वह युवक क्रोध में लगता था। गिरीश का गिरेबान पकड़कर वह चीखा–‘‘कौन हो तुम? क्या लगते हो सीमा के?’’

‘‘मैं! मैं उस कमीनी का कुछ नहीं लगता दोस्त लेकिन मुझे तुमसे हमदर्दी है। नारी बेवफा है। तुम उसकी कसमों पर विश्वास करके अपना जीवन बर्बाद कर लोगे। उसके वादों को सच्चा जानकर अपनी जिन्दगी में जहर घोल लोगे। मान लो दोस्त, मेरी बात मान लो।’’

‘‘मि...!’’
अभी युवक कुछ कहना ही चाहता था कि शिव उसे पकड़कर एक ओर ले गया और धीमे-से बोला–‘‘मिस्टर भवनेश, उसके मुंह मत लगो...वह एक पागल है।’’

काफी प्रयासों के बाद शिव भवनेश नामक युवक के दिमाग में यह बात बैठाने में सफल हो गया कि गिरीश पागल है और वास्तव में गिरीश इस समय लग भी पागल जैसा ही रहा था। अंत में बड़ी कठिनाई से शिव ने वह विवाद समाप्त किया और गिरीश को लेकर घर की ओर बढ़ा।

रास्ते में शिव ने पूछा–‘‘गिरीश...क्या तुम उन दोनों में से किसी को जानते हो?’’

‘‘नहीं...मुझे नहीं मालूम वे कौन हैं? लेकिन शिव, जब भी कोई लड़की इस तरह के वादे करती है तो न जाने क्यों मैं पागल-सा हो जाता हूं...न जाने क्या हो जाता है मुझे?’’

‘‘विचित्र आदमी हो यार...आज तो तुमने मरवा ही दिया था।’’ शिव ने कहा और वे घर आ गए।

अंदर प्रवेश करते ही नौकर ने गिरीश के हाथों में तार थमाकर कहा–‘‘साब...ये अभी-अभी आया है।’’

गिरीश ने नौकर के हाथ से तार लिया और खोलकर पढ़ा।
‘गिरीश! ७ अप्रैल को मेरी शादी में नहीं पहुँचे तो शादी नहीं होगी।
–तुम्हारा दोस्त
शेखर।’

पढ़कर स्तब्ध सा रह गया गिरीश।
शेखर...उसका प्यारा मित्र...उसके बचपन का साथी, अभी एक वर्ष पूर्व ही तो वह उससे अलग हुआ है...वह जाएगा...उसकी शादी में अवश्य जाएगा लेकिन पांच तारीख तो आज हो ही गई है...अगर वह अभी चल दे तब कहीं सात की सुबह तक उसके पास पहुंचेगा।

उसने तुरंत टेलीफोन द्वारा अगली ट्रेन का टिकट बुक कराया और फिर अपना सूटकेस ठीक करके स्टेशन की ओर रवाना हो गया।

कुछ समय पश्चात वह ट्रेन में बैठा चला जा रहा था...क्षण-प्रतिक्षण अपने प्रिय दोस्त शेखर के निकट। उसकी उंगलियों के बीच एक सिगरेट थी। सिगरेट के कश लगाता हुआ वह फिर अतीत की यादों में घिरता जा रहा था, उसके मानव-पटल पर कुछ दृश्य उभर आए थे...उसके गमगीन अतीत की कुछ परछाइयां। उसकी आंखों के सामने एक मुखड़ा नाच उठा...चांद जैसा हंसता-मुस्कराता प्यारा-प्यारा मुखड़ा। यह सुमन थी।

उसके अतीत का गम...बेवफाई की पुतली...सुमन। वह मुस्करा रही थी...मानो गिरीश की बेबसी पर अत्यंत प्रसन्न हो।

सुमन हंसती रही...मुस्कराती रही...गिरीश की आंखों के सामने फिर उसका अतीत दृश्यों के रूप में तैरने लगा...हां सुमन इसी तरह मुस्कराती हुई तो मिली थी...सुमन ने उसे भी हंसाया था...किंतु...किंतु...अंत में...अंत में...उफ। क्या यही प्यार है...इसी को प्रेम कहते हैं।

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Re: सुमन--वेद प्रकाश शर्मा

Unread post by Jemsbond » 24 Dec 2014 10:04




पौधे के शीर्ष पर एक पुष्प होता है...हंसता, खिलता, मुस्कराता हुआ।

एक फूल...जो खुशियों का प्रतीक है, प्रसन्नताओं का खजाना है...किंतु फूल के नीचे...जितने नीचे चलते चले जाते हैं वहां कांटों का साम्राज्य होता है। जो अगर चुभ जाएं तो एक सिसकारी निकलती है...दर्द भरी सिसकारी।

जब कोई बच्चा हंसता है, तो बुजर्ग कहते हैं कि अधिक मत हंसाओ वरना उतना ही रोना पड़ेगा। क्या मतलब है इस बात का? ये उनका कैसा अनुभव है?

क्या वास्तव में हंसने के बाद रोना पड़ता है?
ठीक इसी प्रकार बुजुर्गों का अनुभव शायद ठीक ही है...प्रत्येक खुशी गम का संदेश लाती है...प्रत्येक प्रसन्नता के पीछे कष्ट छुपे रहते हैं। कुछ ऐसा ही अनुभव गिरीश का भी था।

उसके जीवन में सुमन आई...हजारों खुशियां समेटकर...इतने सुख लेकर कि गिरीश के संभाले न संभले।

उसने गिरीश को धरती से उठाकर अम्बर तक पहुंचा दिया।

गिरीश जिसे स्वप्न में भी ख्याल न था कि वह किसी देवी के हृदय का देवता भी बन सकता है।

पहली मुलाकात...।
उफ! उन्हें क्या मालूम था कि इतनी साधारण-सी मुलाकात उनके जीवन की प्रत्येक खुशी और गम बन जाएंगे उन्हें इतना निकट ला देगी। वे एक-दूसरे के हृदयों में इस कदर बस जाएंगे? एक-दूसरे से प्यारा उन्हें कोई रहेगा ही नहीं।

अभी तक तो वह बाहर पढ़ता था...इस शहर से बहुत दूर।
वह लगभग बचपन से ही अपने चचा के साथ पढ़ने गुरुकुल चला गया था, जब वह पढ़ाई समाप्त करके घर वापस आया तो पहली बार उसने अपना वास्तविक घर देखा।

जब वह अपने ही घर में आया तो एक अनजान की भांति उसके आने के समाचार से घर में हलचल हो गई। वह अंदर आया, मां ने वर्षों बाद अपने पुत्र को देखा तो गले से लगा लिया, बहन ने एक मिनट में हजार बार भैया...भैया कहकर उसके दिल को खुश कर दिया।

खुशी और प्रसन्नताओं के बाद–
उसकी निगाह एक अन्य लड़की पर पड़ी जो अनुपम रमणी-सी लगती थी...उसने बड़े संकोच और लाज वाले भाव से दोनों हाथ जोड़कर जब नमस्ते की तो न जाने क्यों उसका दिल तेजी से धड़कने लगा...वह उसकी प्यारी आंखों में खो गया था। उसकी नमस्ते का उत्तर भी वह न दे सका। रमणी ने लाज से पलकें झुका लीं।

किंतु गिरीश तो न जाने कौन-सी दुनिया में खो गया था।

यूं तो गिरीश ने एक-से-एक सुंदरी देखी थी लेकिन न जाने क्यों उस समय उसका दिल उनके प्रति क्रोध से भर जाता था जब वह देखता कि वे आधुनिक फैशन के कपड़े पहनकर अपने सौंदर्य की नुमायश करती हुई एक विशेष अंदाज में मटक-मटककर सड़क पर निकलतीं। न जाने क्यों गिरीश को जब उनके सौंदर्य से नफरत-सी हो जाती, मुँह फेर लेता वह घृणा से।

किंतु ये लड़की...सौंदर्य की ये प्रतिमा उसे अपने विचारों की साकार मूर्ति-सी लगी।

उसे लगा जैसे उसकी कल्पना उसके समक्ष खड़ी है।
वह उसे उन सभी लड़कियों से सुंदर लगी जो अपने सौंदर्य की नुमायश सड़कों पर करती फिरती थीं।

वह चरित्र का उपासक था...सौंदर्य का नहीं।
वह जानता था–न जाने कितने नौजवान, युवक-युवतियां एक-दूसरे के सौंदर्य से...कपड़ों से...तथा अन्य ऊपरी चमक-दमक से प्रभावित होकर अपनी जवानी के जोश को प्यार का नाम देने लगते हैं। किंतु जब उन्हें पता लगता है कि इस सौंदर्य के पीछे जिसका एक उपासक था, एक घिनौना चरित्र छुपा है...यह सौंदर्य उसका नहीं बल्कि सभी का है। कोई भी इस सौंदर्य को अपनी बाहों में कस सकता है तो उसके दिल को एक ठेस लगती है...उसका जीवन बर्बाद हो जाता है। तभी तो गिरीश सौंदर्य का उपासक नहीं है, वह उपासक है चरित्र का। उसकी निगाहों में नारी का सर्वोत्तम गहना चरित्र ही है–उसका सौंदर्य नहीं। उसे कितनी बार प्यार मिला किंतु वह जानता था कि वह प्यार के नाम को बदनाम करने वाले सौंदर्य के उपासक हैं। कुछ जवानियां हैं जो अपना बोझ नहीं संभाल पा रही हैं।

किंतु आज...आज उसके सामने एक देवी बैठी थी...हां पहली नजर में वह उसे देवी जैसी ही लगी थी।

उसके जिस्म पर साधारण-सा कुर्ता और पजमियां...वक्ष-स्थल पर ठीक प्रकार से पड़ी हुई एक चुनरी...सबसे अधिक पसंद आई थी उसे उसकी सादगी।

‘‘क्या बात है, भैया...क्या देख रहे हो?’’ उसकी बहन ने उसे चौंकाया।

‘‘अ...अ...क...कुछ नहीं...कुछ नहीं।’’ गिरीश थोड़ा झेंपकर बोला।

‘‘लगता है भैया तुम मेरी सहेली को एक ही मुलाकात में दिल दे बैठे हो। इसका नाम सुमन है।’’

और सुमन...।
सुनकर वह तो एक पल भी वहां न ठहर सकी...तेजी से भाग गई वह।

भागते-भागते उसने गिरीश की ये आवाज अवश्य सुनी–
‘‘क्या बकती हो, अनीता?’’ गिरीश ने झेंप मिटाने के लिए यह कहा तो अवश्य था किंतु वास्तव में उसे लग रहा था जैसे अनीता ठीक ही कहती है।

सुमन...कितना प्यारा नाम है। वास्तव में सुमन जैसी ही कोमल थी वह।

बस...यह थी...उसकी पहली मुलाकात...सिर्फ क्षण-मात्र की।
इस मुलाकात में गिरीश को तो वह अपनी भावनाओं की साकार मूर्ति लगी थी किंतु सुमन न जान सकी थी कि गिरीश की आंखों में झांकते ही उसका मन धक् से क्यों रह गया।

उसके बाद–
वे लगभग प्रतिदिन मिलते...अनेकों बार।

दोनों के कदम एक-दूसरे को देखकर ठिठक जाते...नयन स्थिर हो जाते...दिल धड़कने लगता किंतु फिर शीघ्र ही सुमन उसके सामने से भाग जाती।

क्रम उसी प्रकार चलता रहा...किंतु बोला कोई कुछ नहीं...मानो आंखें ही सब कुछ कह देतीं। वक्त गुजरता रहा...आंखों के टकराव के साथ ही साथ उसके अधर मुस्कराने लगे।

वक्त फिर आगे बढ़ा...मुस्कान हंसी में बदली...बोलता कोई कुछ न था किंतु बातें हो जातीं...प्रेमियों की भाषा तो प्रेमी ही जानें...दोनों ही दिल की बात अधरों पर लाना चाहते किंतु एक दूसरे की प्रतीक्षा थी।

दिन बीतते गए।
सुमन पूरी तरह से उसके मन-मंदिर की देवी बन गई। किंतु अधरों की दीवार अभी बनी हुई थी। कहते हैं सब कुछ वक्त के साथ होता है...एक ही मुलाकात में कोई किसी के मन में तो उतर सकता है किंतु प्रेम का स्थान ग्रहण नहीं कर सकता, प्रेम के लिए समय चाहिए...अवसर चाहिए...ये दोनों ही वस्तुएं सुमन और गिरीश के पास थीं अर्थात पहले लाज का पर्दा हटा...आमने-सामने आकर मुस्कराने लगे...धीरे-धीरे दूर से ही संकेत होने लगे।

देखते-ही-देखते दोनों प्यार करने लगे। किंतु शाब्दिक दीवार अभी तक बनी हुई थी। अंत में इस दीवार को भी गिरीश ने ही तोड़ा। साहस करके उसने एक पत्र में दिल की भावनाएं लिख दीं। उत्तर तुंरत मिला–आग की तपिश दोनों ओर बराबर थी।

फिर क्या था...बांध टूट चुका था...दीवार हट चुकी थी...पत्रों के माध्यम से बातें होने लगीं। एक दूसरे के पत्र का बेबसी से इंतजार करने लगे। पहले जमाने की बातें हुईं...फिर प्यार की बातों से पत्र भरे जाने लगे...धीरे-धीरे मिलन की लालसा जाग्रत हुई।

पत्रों में ही मिलन के प्रोगाम बने–फिर मिलन भी जैसे उनके लिए साधारण बात हो गई। वे मिलते, प्यार की बातें करते, एक-दूसरे की आंखों में खो जाते...और बस...।

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Re: सुमन--वेद प्रकाश शर्मा

Unread post by Jemsbond » 24 Dec 2014 10:04

‘नहीं गिरीश नहीं...मैं किसी और की नहीं हो सकती, मेरी शादी तुम्हीं से होगी, सिर्फ तुमसे।’’ सुमन ने गिरीश के गले में अपनी बांहे डालते हुए कहा।

‘‘ये समाज बहुत धोखों से भरा है सुमन। विश्वास के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता, न जाने कब क्या हो जाए?’’ गिरीश गंभीर स्वर में बोला। इस समय वे अपने घर के निकट वाले पार्क के अंधेरे कोने में बैठे बातें कर रहे थे। वे अक्सर यहीं मिला करते थे।

‘‘तुम तो पागल हो गिरीश...।’’ सुमन बोली–‘‘मैं तो कहती हूं कि तुम्हें लड़की होना चाहिए था और मुझे लड़का...जब मैं तुमसे कह रही हूं कि तुम्हीं से शादी होगी तो तुम क्यों नहीं मेरा साहस बढ़ाते।’’

‘‘सुमन...अगर तुम्हारे घर वाले तैयार नहीं हुए तो?’’

‘‘पहली बात तो ऐसा होगा नहीं और अगर हो भी गया तो देख लेना तुम अपनी सुमन को, वह घर वालों का साथ छोड़कर तुम्हारे साथ होगी।’’

‘‘क्या तुम होने वाली बदनामी को सहन कर सकोगी?’’
‘‘गिरीश...मेरा ख्याल है कि तुम प्यार ही नहीं करते। प्यार करने वाले कभी बदनामी की चिंता नहीं किया करते।’’

‘‘सुमन–यह सब उपन्यास अथवा फिल्मों की बातें हैं–यथार्थ उनसे बहुत अलग होता है।’’

‘‘गिरीश!’’ सुमन के लबों से एक आह टपकी–‘‘यही तो तुम्हारी गलतफहमी है। अन्य साधारण व्यक्तियों की भांति तुमने भी कह दिया कि ये उपन्यास की बातें हैं। क्या तुम नहीं जानते कि लेखक भी समाज का ही एक अंग होता है। उसकी चलती हुई लेखनी वही लिखती है जो वह समाज में देखता है। क्या कभी तुम्हारे साथ ऐसा नहीं हुआ कि कोई उपन्यास पढ़ते-पढ़ते तुम उसके किसी पात्र के रूप में स्वयं को देखने लगे हो। हुआ है गिरीश हुआ है–कभी-कभी कोई पात्र हम जैसा भी होता है–मालूम है वह पात्र कहां से आता है–लेखक की लेखनी उसे हम ही लोगों के बीच से प्रस्तुत करती है। जब लेखक किसी पात्र के माध्यम से इतना साहस प्रस्तुत करता है, जितना तुम में नहीं है तो उसे यथार्थ से हटकर कहने लगते हो–लेखक तुम्हें प्रेरणा देता है कि अगर प्यार करते हो तो सीना तानकर समाज के सामने खड़े हो जाओ। लाख परेशानियों के बाद भी अपने प्रिय को अपनाकर समाज के मुँह पर तमाचा मारो। जिन बातों को तुम सिर्फ उपन्यासों की बात कहकर टाल जाते हो उसकी गंभीरता को देखो–उसकी सच्चाई में झांको।’’ सुमन कहती ही चली गई मानो पागल हो गई हो।

‘‘वाह–वाह देवी जी।’’ गिरीश हंसता हुआ बोला–‘‘लेडीज नेताओं में इंदिरा के बाद तुम्हारा ही नम्बर है–काफी अच्छा भाषण झाड़ लेती हो।’’

‘‘ओफ्फो–बड़े वो हो तुम!’’ सुमन कातर निगाहों से उसे देखकर बोली–‘‘मुझे जोश दिलाकर न जाने क्या-क्या बकवा गए। अब मैं तुमसे बात नहीं करूंगी।’’ कृत्रिम रूठने के साथ उसने मुंह फेर लिया।

‘‘अबे ओ मोटे।’’ जब सुमन रूठ जाती तो गिरीश का संबोधन यही होता था–‘‘रूठता क्यों है हमसे, चल इधर देख–नहीं तो अभी एक पप्पी की सजा दे देंगे।’’

सुमन लजा गई–तभी गिरीश ने उसके कोमल बदन को बाहों में ले लिया और उसके अधरों पर एक चुम्बन अंकित करके बोला–‘‘इससे आगे का बांध...सुहाग रात को तोड़ूँगा देवी जी।’’

उसके इस वाक्य पर तो सुमन पानी-पानी हो गई...लाज से मुंह फेरकर उसने भाग जाना चाहा किंतु गिरीश के घेरे सख्त थे। अतः उसने गिरीश के सीने में ही मुखड़ा छुपा लिया।

इस प्रकार–कुछ प्रेम वार्तालाप के पश्चात अचानक सुमन बोली–‘‘अच्छा...गिरीश, अब मैं चलूं।’’

‘‘क्यों?’’
‘‘सब इंतजार कर रहे होंगे।’’
‘‘कौन सब?’’
‘‘मम्मी, पापा, जीजी, जीजाजी–सभी।’’
‘‘एक बात कहूं...सुमन, बुरा-तो नहीं मानोगी?’’
कुछ साहस करके बोला गिरीश।

‘‘तुम्हारी बात का मैं और बुरा मानूंगी...मुझे तो दुख है कि तुमने ऐसा सोचा भी कैसे?’’ कितना आत्म-विश्वास था सुमन के शब्दों में।

‘‘न जाने क्यों मुझे तुम्हारे संजय जीजाजी अच्छे नहीं लगते।’’

न जाने क्यों गिरीश के मुख से उपरोक्त वाक्य सुनकर सुमन को एक धक्का लगा उसके मुखड़े पर एक विचित्र-सी घबराहट उत्पन्न हो गई। वह घबराहट को छुपाने का प्रयास करती हुई बोली–‘‘क्यों भला? तुमसे तो अच्छे ही हैं...लेकिन बस अच्छे नहीं लगते।’’

‘‘सच...बताऊं तो गिरीश...मुझे भी नफरत है।’’
सुमन कुछ गंभीर होकर बोली।
‘‘क्यों, तुम्हें क्यों...?’’ गिरीश थोड़ा चौंका।

‘‘ये मैं भी नहीं जानती।’’ सुमन बात हमेशा ही इस प्रकार गोल करती थी।

‘‘विचित्र हो तुम भी।’’ गिरीश हंसकर बोला।
‘‘अच्छा अब मैं चलूं गिरीश!’’ सुमन गंभीर स्वर में बोली।

गिरीश महसूस कर रहा था कि जब से उसने सुमन से संजय के विषय में कुछ कहा है तभी से सुमन कुछ गंभीर हो गई है। उसने कई बार प्रयास किया कि सुमन की इस गंभीरता का कारण जाने, किंतु वह सफल न हो सका। उसके लाख प्रयास करने पर भी सुमन एक बार भी नहीं हंसी। न जाने क्या हो गया था उसे?...गिरीश न जान सका।

इसी तरह उदास-उदास-सी वह विदाई लेकर चली गई। किंतु गिरीश स्वयं को ही गाली देने लगा कि क्यों उसने बेकार में संजय की बात छेड़ी? किंतु यह गुत्थी भी एक रहस्य थी कि सुमन संजय के लिए उसके मुख से एक शब्द सुनकर इतनी गभीर क्यों हो गई? क्या गिरीश ने ऐसा कहकर सुमन की निगाहों में भूल की। गिरीश विचित्र-सी गुत्थी में उलझ गया। लेकिन एक लम्बे समय तक यह गुत्थी गुत्थी ही रही।