Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

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The Romantic
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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:33


मैंने मुड़ के देखा। सच में सीढ़ी से छत का दरवाजा बोल्ट था, और छत पे आने का यही रास्ता था। नीचे आँगन से होली के उधम की जोरदार आवाजें आ रही थीं / कालोनी के औरतों लड़कियों की टोली आ गयी थी और आधे घंटे से ज्यादा ही धमाल होना था।

राजीव भी एलवल गए थे, मीता के यहाँ होली खेलने। उन्हें भी एकघंटे तो लगना ही था।

फिर मैंने जान की बालकनी की और देखा, इतना आसान भी नहीं था। देवर ने बड़ी हिम्मत दिखायी थी फगुए का नेग बनता ही था।

मैं मुस्करा दी।

बस इससे बड़ा ग्रीन सिग्नल और क्या हो सकता था।

जान के ताकतवार हाथो का प्रेशर मेरे ब्लाउज से छलकते बूब्स पे दूना हो गया।
और होली चालू हो गयी।

मेरा ब्लाउन वैसे ही बहुत टाइट लो कट था, उपर के दो बटन मैंने खोल रखे थे, मेरी बड़ी बड़ी चूंचियों को उसमे समाने के लिए।

एक बटन रवि से होली खेलने के समय टूट गया और अब सिर्फ नीचे के दो बटनो के सहारे मेरे गद्दर जोबन थोडा बहुत ढंके थे।

और वैसे भी मेरी ब्रा और पेटीकोट दोनों नीचे ननदो से होली खेलते समय ही उतर गए थे।

अब मैंने सिर्फ साडी ब्लाउज में थी और दोनों देह से चिपके रंगो से भीगे।

जान की मरदाना, तगड़ी उंगली मेरे भीगे उरोजो से चिपकी हुयी थी, उसे दबोच रही थी दबा रही थी

और साथ ही उसका मोटा खूंटा, शार्ट फाड़ता, मेरी गीली बड़े बड़े चूतड़ों से चिपकी साडी के बीच गांड की दरार में धक्के मार रहा था।

नीचे मेरी ननदों ने जो भांग पिला दी थी, कुछ उस का असर और कुछ जो सड़क पे हुरियारे गालियां दे रहे थे उनका असर,

मैं भी सीधे गालियों पे उतर आयी।

जान का एक हाथ अब ब्लाउज के अंदर था, वो मेरी चूंची दबा रहा था, मसल रहा था, निपल पिंच कर रहा था।

अपना मोटा लंड मेर्री गांड पे रगड़ते उस ने पूछा, " क्यों भाभी डाल दूँ " और मैं चालु हो गयी।


" अरे साल्ले, हरामी के जने, छिनार के, भोंसड़ी के, होली में भौजाई के वो तो वैसे नहीं डालेगा, तो क्या अपनी, … मेरी सास ननद की बुर में डालेगा, भँड़वे, वो तो वैसे ही रोज शाम को कालीनगंज ( रेड लाइट ऐरिया मेरी ससुराल का ) वहाँ जोबन की दूकान लगा के बैठती हैं "

इसका नतीजा वही हुआ जो मैंने सोचा था, अगले झटके में ब्लाउज के बाकी दोनों बटन खुले और ब्लाउज छत पे था।

और जान के हाथों पे लगा गाढ़ा लाल रंग जोर जोर से मेरी चूंचियो पे

अब तक सुबह से दरजन भर से ज्यादा देवर मेरी चूंची मर्दन कर चुके थे, लेकिन जो जबदस्त रगड़ाई ये कर रहा था, दोनों हाथो से, लग रहा था जैसे कोई चक्की चल रही हो जो मेरे उभारों को कुचल के रख दे,
ताकत के साथ तरीके का का भी अद्भुत मिश्रण था,



होली में मैं मैं क्यों पीछे रहती, और रंग भरे गुब्बारे तो रखे ही थे,

मैंने झुक के एक उठाया, पीछे हाथ कर के जान की शार्ट सरकाई और सीधे लाल रंग का गुब्बारा उसके 'खूंटे ' पे फोड़ दिया।

लाल भभूका, और शार्ट पैरों पे। देवर भाभी की होली हो और देवर का काम दंड कैद रहे यह कोई भाभी कैसे देख सकती है।

लेकिन जान भी तो मेरे देवर था उसने साडी उठा के बस मेरे कमर में छल्ले की तरह फंसा दिया और अब एक हाथ मेरे फेवरट देवर का मेरी चूंची रगड़ रहा था और दूसरा मेरा चूतड़।

असल में मेरे सारे देवर मेरी चूंचियों के साथ मेरे भरे भरे चूतड़ों के भी दीवाने थे और इसे तो मैंने ललचाने, चिढ़ाने के लिए अक्सर इसे दिखा के अपने नितम्ब मटका देती थी।

एक गुब्बारे से तो मेरे देवर का काम चलता नहीं, इसलिए झुकी हुयी मैंने दूसरा बैंगनी रंग का गुब्बारा उठाया और फिर उसके लंड पे सीधे दबा के और अबकी जो रंग बहा तो वो हाथो में पॉट के मैंने देवर के लंड को मुठियाना शुरू कर दिया।

कित्ती मुश्किल से मेरी मुट्ठी में आ पाया वो।

आज होली में जोनाप जोख की थी मैंने, उसमें मेरे इस देवर का साइज २० नहीं बैठता था। बल्कि पूरा २२ था।
रंग लगाते हुए एक झटके में मैंने सुपाड़ा खीच के खोल दिया, मोटा, पहाड़ी आलू ऐसा, एकदम कड़ा।

मैंने छज्जे पे झुकी थी ही, जान ने टाँगे फैलायीं और सीधे सुपाड़ा मेरी चूत के मुंह पे .

सुबह से चूत में आग लगी थी।

एक तो मैंने राजीव को रात में एक बार मुंह से झाड़ दिया था और उसके बाद सुबह से पहले तो रवी के साथ मस्ती, फिर रेहन और देवर नन्द, लेकिन चूत की खुजली बढती ही जा रही थी। कितने देवरों ननदों ने उंगली की लेकिन झड़ने के पहले ही,…

मस्ती से मेरी आँखे बंद थी, चूंचियां पत्थर हो रही थीं, निपल भी एकदम कड़े हो गए थे, … और मैंने अपनी चूत उस के सुपाड़े पे रगड़ना शुरू कर दिया।

जान भी न, बजाय आग बुझाने के और आग भड़काने में लगा था, एक हाथ जोर जोर से चूंची मसल रहे थे, दूसरा क्लिट रगड़ रहा था।

मैंने फिर गालिया बरसानी शुरू कि,

" अरे डालो न क्या मेरी ननदो के लिए बचा रखा है "


और एक झटके में मेरे देवर ने मूसल पेल दिया, पूरा सुपाड़ा अंदर और मैं बड़ी जोर से चिल्लाई

" साल्ले अपनी, .... भोंसड़ा समझ रखा है क्या, जरा आराम से कर न "


जिस तरह से लंड रगड़ता, दरेरता, घिसटता मेरी बुर में घुसा, दर्द से जान निकल गयी लेकिन मजा भी खूब आया।

जान ने सुपाड़े तक लंड निकाला और फिर गदराये चूतड़ों को पकड़ के ऐसा हचक के धक्का मारा की फिर जान निकल गयी।

मेरे निपल्स उमेठते उसने छेड़ा,

" अरे भौजी होली में जब तक भाभी क बुर भोंसड़ा न बन जाय तब तक चुदाई का कौन मजा "

जिस तरह से लंड रगड़ता, दरेरता, घिसटता मेरी बुर में घुसा, दर्द से जान निकल गयी लेकिन मजा भी खूब आया।

जान ने सुपाड़े तक लंड निकाला और फिर गदराये चूतड़ों को पकड़ के ऐसा हचक के धक्का मारा की फिर जान निकल गयी।



मैं छज्जे को खूब जोर से पकड़ के झुकी थी।

मेरी साडी बस एक पतले से छल्ले की तरह मेरे कमर में फँसी, अटकी थी। ब्लाउज तो कब का साथ छोड़ चूका था मेरे दोनों मस्त कड़े कड़े रंगों से रँगे, पुते उरोज भी झुके थे और मेरा पडोसी देवर, एक के बाद एक धक्के पे धक्के मारे जा रहा था। और थोड़ी ही देर में सुपाड़ा सीधे मेरी बच्चेदानी पे ठोकर मार रहा था। हर ठोकर के साथ मैं गिनगिना उठती।

मैं चीख रही थी, सिसक रही थी, सिहर रही थी, अपने देवर के पूरे खानदान को एक से के गालियाँ दे रही थी।

लेकिन उससे और जोश में आके उसके चोदने की रफ्तार दुगुनी हो रही थी।

मेरे दोनों हाथ तो छज्जे को पकडे हुए थे, उसे जोर से भींच रहे थे, लेकिन, मैं, कभी चूतड़ से धक्के का जवाब धक्के से, और कभी कसी संकरी बुर में उसके मोटे मूसल को निचोड़ के, जवाब दे रही थी।
चुदाई की रफ्तार खूब तेज हो गयी थी और तभी, उसने मेरे क्लिट को जोर से पकड़ के रगड़ दिया, और मैं पत्ते की तरह कांपने लगी।

मैं तेजी से झड रही थी। जैसे कोई खूब बड़ी सी पिचकारी में रंग भर के एक झटके में छोड़ दे, …छ्र्र्र्र्र छ्र्र्छ्र्र्र्र,… बस उसी तरह

और उपर से मेरे दुष्ट देवर ने आग में धौंकनी चला दी। झुक के वो मेरे निपल्स जोर ज्जोर से चूसने लगा, हलके से बाइट कर दिया,

मस्ती से मेरी आँखे मुंदी जा रही थी बिना रुके मैं बार बार झड़ रही थी।

धीरे धीरे उसने फिर से धक्के की रफ्तार बढ़ायी, मेरी थकान कम हुयी और मैं फिर पूरे जोश में चुदाई का मजा ले रही थी, उसी तरह छज्जे पे झुके डागी पोज में

तब तक सड़क पे फिर कुछ हुरियारों का शोर सुनायी पड़ा और लंड अंदर घुसेड़े, मुझे उठा के वो छज्जे से दूर छत पे ले गया और मुझे दुहरा कर के फिर चुदाई शुरू कर दी.

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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:48

ससुराल की पहली होली-5

तब तक सड़क पे फिर कुछ हुरियारों का शोर सुनायी पड़ा और लंड अंदर घुसेड़े, मुझे उठा के वो छज्जे से दूर छत पे ले गया और मुझे दुहरा कर के फिर चुदाई शुरू कर दी.
मुझे उसने आलमोस्ट दुहरा कर दिया था और हुमक हुमक कर चोद रहा था।

उसका घोड़े जैसा लंड चूत फाड़ते, चीरते सीधे बच्चेदानी पे धक्का मार रहा था। साथ ही लंड का बेस क्लिट पे रगड़ खा रहा था।

" पह्ले तो मैं सोचती थी सिर्फ मेरी सास ने ही, लेकिन अब लगता है की मेरी ससुराल की सारी औरतों ने गदहों, घोड़ों से घूम घूम के चुदवाया है, तभी तो ये गदहे, घोड़े जैसे लंड वाले लड़के जने । "

देवर की चौड़ी छाती पे अपनी चूंची पे लगा सारा रंग लपेटते, लगाते, जोर से उसकी पीठ पकड़ कर अपनी भींचते हुए मैंने चिढ़ाया।

जवाब जॉन के बित्ते भर के लंड ने दिया। आलमोस्ट निकाल के उसने एक ही धक्के में पूरा पेल दिया।

मेरी जान आलमोस्ट निकल गयी और देवर ने बोला "

अरे भाभी न होता तो आपको होली का मजा कैसे देता "

बात उसकी एकदम सही थी।


मैं भी मस्ती में चूतड़ उठा उठा के चुदा रही थी, बिना इस बात का ख्याल किये की मैं नीले गगन के खुली छत पे चुदा रही हूँ।



साथ में उसने फिर जोर जोर से मेरी चूंची मसलनी शुरू कर दी और एक निपल उसके मुंह में था।

मैं एक बार फिर झड़ने के कगार पे थी।

हाँ देवर जी और जोर से उह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह आह क्या मजा, जॉन प्लीज, …ऱुको मत ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह "

और जैसे ही मैं झड़ने लगी, उसने चुदायी और तेज कर दी। उसकी भी आँखे मुंदी जा रही थी।

और थोड़ी देर में मेरे उछलते गिरते चूतड़ों की थाप पर, सुर ताल पे,

उसकी मोटी लम्बी पिचकारी ने रंग फेकना शुरू कर दिया।

गाढ़ा थक्केदार, रबड़ी, मलायी की तरह सफेद बिना रुके,

और मैं चूतड़ उठा उठा के रोपती रही, लीलती रही, घोंटती रही, … और फिर थक के लेट गयी।

लेकिन तब भी मेरे देवर कि पिचकारी ने रंग फेकना जारी रखा, होली का असली रंग जिसकी प्यास मेरी बुर को सुबह से थी।

और जब उस ने लंड बाहर निकाल तो भी, खूब मोटा कड़ियल,

मैंने साडी ठीक की। छत पर गिरा ब्लाउज उठा के पहना, बटन तो सारे टूट गए थे, लेकिन तभी उसने रोक दिया,

और मेरी खुली चूंचियों पे चेहरे पे अपने सुपाड़े पे लगे वीर्य को रगड़ मसल दिया। क्या मस्त महक थी।

मैंने उसे साफ करने की कोशिश की तो उसने मन कर दिया, नहीं भाभी, होली कि निशानी।

लाल, बैंगनी, नीले, रंगो के ऊपर गाढ़ा सफेद थक्केदार, …

देवर की बात, … मैं कौन होती थी टालने वाली। चून्चियों के ऊपर ब्लाउज बस लपेट लिया।

मैं ने आंगन की और देखा तो वहाँ होली का हंगामा ख़तम हो चूका था। बस दो चार लड़कियां बची थी, वो भी अब जा रही थीं।

मैं चलने को हुयी तो जान ने एक बार फिर पीछे से पकड़ लिया,

" भाभी, आप को पीछे से देखता हूँ तो बस यही मन करता है इस कसर मसर करती गांड को मार लूँ "

मैंने अपनी गांड उसके शार्ट से झांकते, मोटे लंड पे कस के रगड़ दिया और मुस्करा के बोली,

" अरे देवर जी अभी कौन सी होली ख़तम हुयी है। होली कि शाम बाकी है, फिर यहाँ तो होली पांच दिन चलती है। और मैं कौन सा गांड में ताला डाल के
रखूंगी। भौजाई तुम्हारी तो उसकी सब चीज तुम्हारी। "

और उसे दिखा के एक एक बार जोर से गांड मटकाई, और सीढ़ियों से धड़ धडाती हुए नीचे चल दी।
मैं सोच रही थी अभी, थोड़ी देर पहले मेरी एक ननद आयी थी, उसकी शादी भी मेरे साथ ही हुयी थी। उसकी पिछले साल पहली होली ससुराल में मनी।

वो बोल रही थी,

" भाभी, पहली होली में ही मैंने 'हैट ट्रिक ' कर ली। सुबह सबसे पहले मेरे नंदोई ने होली खेलते हुए ही नंबर लगा दिया। फिर इनका एक कजिन देवर, छोकरा सा, इंटर में पढता था, और शाम को इनके एक फ्रेंड ने। रात में तो ये इन्तजार में थे ही "

मैं सोच रही थी चलो मेरा भी ससुराल की पहली होली का खाता तो खुल ही गया।

गनीमत थी नीरा भाभी किचेन में थी और, चमेली एक बार फिर से बाल्टी में रंग घोल रही थी।

मैं चुपके से आँगन में पहुँच गयी।

चमेली भाभी मुझसे कुछ पूछतीं, उसके पहले दरवाजा खुला और रंगे पुते, मेरे 'वो ' राजीव दाखिल हुए, अपनी ममेरी बहन मीता के यहाँ से होली खेल कर।

' क्यों डाल आये मीता की बिल में, मजा आया " नीरा भाभी, मेरी जेठानी ने अपने इकलौते देवर को चिढ़ाया।

वो कुछ जवाब देते उसके पहले उनके कान में मैं फुसफुसाई, " नीरा भाभी और चमेली भाभी को छोड़ियेगा मत। देवर के रहते, होली में भाभी अनचुदी रह जाय बड़ी नाइंसाफी है। और फिर पिछले साल आप ने मेरी भाभी का भी तो अगवाड़ा पिछवाड़ा, कुछ भी नहीं छोड़ा था। "

मुस्करा के उन्होंने नीरा भाभी को पकड़ा और जब तक नीरा भाभी कुछ समझे उनका आन्चल, राजीव के हाथ में था और अगले झटके में पूरी साडी।

कुछ ही देर में चोली और ब्रा का भी वही हश्र हुआ।

लेकिन चमेली भाभी थी न, मेरी जेठानी का साथ देने। उन्होंने पल भर में राजीव के कपडे उतार फेंके।

लेकिन मैं थी न अपने पति का साथ देने वाली।

मैंने चमेली भाभी की साडी खींच दी और अगला झपट्टा ब्लाउज पे मारा। ब्रा उन्होंने पहना ही नहीं था और पेटीकोट ननदो ने न सिर्फ उतारा था बल्कि चिथड़े चिथड़े कर के फ़ेंक दिया था।

और जब मैंने मुड़ के नीरा भाभी की ओर देखा तो वो रंगो के बीच गिरी पड़ी थी और मेरे पति और उनके देवर, अपनी भौजाई के दोनों गदराये, बड़े बड़े खुले उरोजों को रंग से, रंगने में लगे थे।


अगले ही पल मेरी जेठानी की लम्बी गोरी टाँगे उनके कंधे पे, और उनकी फैली दूधिया जांघो के बीच में वो,… .एक धक्के में उनका बित्ते भर का लंड उनकी भाभी की रसीली बुर में, …

और उधर चमेली भाभी अब मेरे पीछे पड़ गयीं। पल भर में मेरी साडी उनके हाथ में थी। पेटीकोट ब्रा तो ननदो ने कब का उतार दिया था, और ब्लाउज के बटन जान ने तोड़ दिए थे। मैं भी अब नीरा भाभी और चमेली भाभी की हालत में आ गयी थी। उन्होंने मुझे ललकारा

" जब तक तेरा साजन नीरा भाभी पे चढ़ाई कर रहा है, मैं तुम्हे मजा चखाती हूँ। "

चमेली भाभी से जितना आसान नहीं था। जल्द ही मैं उनके नीचे थी। उनकी 38 डी डी साइज की बड़ी बड़ी छातियाँ मेरी चूंचियों को रगड़ रही थी और बुर मेरे चूत पे घिस्से मार रही थी। मैं कौन पीछे रहने वाली थी।

कैंची मार के अपनी लम्बी टांगो से मैंने चमेली भाभी की पीठ जोर से दबोच ली और मैं भी नीचे से अपनी चूत उनकी बुर से रगड़ने लगी। और हम लोगों की 'लेस्बियन रेस्लिंग' देख के ' उनका जोश और बढ़ गया।

अपनी भौजाई को आँगन में हुमच हुमच कर चोदते हुए वो बोले,

" भाभी आपका तो पिछले साल का भी उधार चुकाना है " ( पिछले साल की होली में वो मेरे मायके में थे )

और मेरी जेठानी भी कम नहीं थी। उनके हर धक्के का जवाब चूतड़ उठा उठा के दे रही थी जैसे न जाने कितनी बार उनसे चुद चुकी हों।

नीचे से जोर से धक्का लगाते वो बोली,

" अरे देवर जी आपके लिए एक बढ़िया इनाम है ", .


खुश होके उत्सुकता से उन्होंने पूछा
" क्या है भाभी, बताइये न "

" एक मस्त माल है, एकदम कच्ची कली, उठता हुआ अनछुआ जोबन, जांघो के बीच गुलाब की पंखुड़िया "

" नाम तो बताइये न " सोच के ही उनका मन खराब हो रहा था।




" सिर्फ इस शर्त पे नाम बताउंगी, की तुम ना सिर्फ उसकी लोगे बल्की खूब हचक हचक के चोदोगे। " मेरी जेठानी ने और आग लगायी।

" हाँ भाभी हाँ पक्का, नेकी और पूछ पूछ " वो बोले।

" मेरी ननद, तेरी ममेरी बहन और जिल्ला टॉप माल, मीता। एक बार चोद लोगे तो बार बार मांगोगे " हँसते हुए उनके साइन पे अपनी चूंचियों को रगड़ते मेरी जेठानी ने चिढ़ाया।

फिर तो ऐसी धकापेल चुदाई उन्होंने शुरू की…


उसी बीच मैंने चमेली भाभी साथ बाजी पलट दी थी।

अब मैं ऊपर थी और वो नीचे।

और मेरे हाथ में गुलाल भरा एक बड़ा सा कंडोम था जो, जब तक चमेली भाभी सम्हले, घचाक से मैंने उनकी बुर में पेल दिया।

मैंने राजीव ओर देखा और हम दोनों मुस्कराये।

अब हम दोनों जैसे बद कर, एक टेम्पो में हचक हचक चोद रहे थे थे।

वो अपनी भौजाई और मेरी जेठानी, नीरा भाभी को और मैं चमेली भाभी को, गुलाल भरे कंडोम डिल्डो से।

चमेली भाभी भी चूतड़ उछाल उछाल के मजे ले रही थीं और थोड़ी देर में वो तेजी से झड़ने लगी।

और यही हालत बगल में नीरा भाभी की हुयी। उनके झड़ने के साथ ही उनके देवर और मेरे ' वो ' भी तेजी से झड़ने लगे। मेरी जेठानी की बुर गाढ़ी सफेद थक्केदार, मलायी से भर गयी। यही नहीं राजीव का सफेद वीर्य, बुर से निकल कर उनकी दोनों जांघो पर भी बह रहा था।

दोनों निशचल पड़े थे।

मैंने राजीव से कहा,

" अरे मेरी जेठानी की चूत को साफ कौन करेगा ".

राजीव से दूबारा बोलने कि जरूरत नहीं पड़ी। अपनी रसीली भाभी की दोनों जांघो को उन्होंने फैलाया और सेंटर में मुंह लगा के

लप लपालप, लप लपालप वो चाटने लगे। जैसे कोई मस्त रसमलाई चाट रहे हों। वो चाट रहे थे चूस रहे थे और बीच बीच में अपनी भाभी की गीली बुर में जीभ की नोक डाल के जुबान से चोद भी रहे थे।

मस्ती से चूर नीरा भाभी, नीचे से चूतड़ उछाल रही थीं, सिसक रही थी और उनका सर अपनी बुर पे पकड़ जोर जोर से रगड़ रही थीं।

और इस का असर राजीव के मस्त खूंटे पे भी हुआ। वो फिर से अंगड़ाई लेने लगा।उ

सका गोल मटोल, थोडा सोया थोडा जागा, लीची सुपाड़ा देख के मुझसे नहीं रहा गया और मेरे मुंह में भी पानी आने लगा।

उधर चमेली भाभी, वो भी उठ के बैठ गयी थीं। उन्होंने मुझे आँख मारी, अपनी मझली ऊँगली, तर्जनी के ऊपर रखी और अचानक दोनों ऊँगली, राजीव की गांड में पेल दी

मैं चमेली भाभी का तरीका ध्यान से देख रही थी। दोनों ऊँगली एक के ऊपर एक आराम से घुस गयीं, और अब उन्होंने दोनों उँगलियों को अलग किया गोल गोल गांड में घुमाया और फिर कैंची की फाल की तरह फैला दिया और सटासट आगे पीछे करने लगी।


इस का असर सीधे राजीव के लंड पे पड़ा और अब वो पूरी तरह तन के खड़ा हो गया।

मेरे लिए अपने को रोकना अब मुश्किल हो रहा था। मैंने उनके मोटे सुपाड़े को मुंह में भर लिया और लगी चुभलाने, चूसने।

थोड़ी देर तक ऐसे ही चलता रहा।

चमेली भाभी अब तीन उंगली से अपने देवर की गांड मार रही थी। उनके देवर और मेरे वो, अपनी भाभी की बुर चूस चाट रहे थे और मैं उनका लंड चूस रही थी।

चमेली भाभी ने पैंतरा बदला और फिर मेरी बुर पे हमला किया। उँगलियों से उन्होंने मेरी बुर को फैला रखा था और जोर जोर से चूस चाट रही थी। साथ में हलके से क्लिट को भी वो बाइट कर लेतीं।


लेकिन मैं भी, हाईस्कूल से बोर्डिंग में थी और ११वी से लेकर कालेज तक इस खेल में चैम्पियन थी।

थोड़ी देर में हम दोनों फिर 69 कि पोजिशन में थे, मैं ऊपर और वो नीचे.
और अपनी मस्ती में हम लोगो ने ध्यान नही दिया की नीरा भाभी, मेरे उनके चूत चाटने से कब झड गयीं।

वो और राजीव मेरे और चमेली भाभी के बगल में आके बैठ गए। राजीव का लंड एकदम तना, टनटना रहा था।

चमेली भाभी की चूत चाटते, चूसते मैंने दोनों हाथों से चमेली भाभी की जांघो को फैलाया और राजीव को इशारा किया।


बस फिर क्या था। राजीव का मोटा लंड चमेली भाभी की चूत में था और ऊपर से मैं चमेली भाभी की क्लिट चूस, चाट रही थी।
वो पहले ही एक बार मेरी जेठानी की बुर में झड़ चुके थे, इसलिए उन्हें टाइम तो लगना ही था।

जैसे कोई धुनिया रुई धुनें, बस उस तरह वो चमेली भाभी की चूत चोद रहे थे। और चमेली भाभी भी चूतड़ उठा उठा के जवाब दे रही थीं।

बहुत देर कि चुदायी के बाद दोनों देवर भाभी साथ झड़े।


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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:49

ससुराल की पहली होली-6

फिर हम लोग नहा धो के फ्रेश हुए, होली का रंग तो एक दिन में छूटने वाला नहीं था।

खाना खाते समय मैने अपनी जेठानी से पुछा,

" क्यों भाभी, होली हो ली। "

" अभी कहाँ, शाम की होली तो और जबरदस्त होगी। और अभी तो इनका मस्त माल, हमारी छिनार ननद मीता शाम को आएगी। जम के लेनी है उसकी। "

फिर मेरी जेठानी ने राजीव को छेड़ा,

" क्यों देवर तो होली में उद्घाटन करवा दूँ, आपसे। आखिर कोई न कोई तो लेगा ही। "

वो बिचारे झेंप के रह गए।

थोड़ी देर की नींद के बाद मैं शाम को उठी।

और थोड़ी देर में हमारी ननद और इनकी मस्त माल कम ममेरी बहन, मीता आयी।

मस्त खूब टाइट चिपका, सारे उभार कटाव दिखाता पीला टॉप, छोटी सी काली स्कर्ट,

मक्खन सी चिकनी गोरी गोरी जांघ दिखाती, ललचाती। काली कजरारी बड़ी बड़ी सी आँखे, गोरे गुलाबी भरे भरे गाल, रसीले होंठ, और सबसे बढ़कर टाइट टॉप में मुश्किल से बंद, टेनिस बॉल्स के साइज के किशोर बूब्स जिसमें सिर्फ उभार और कटाव ही नहीं दिख रहा था, बल्कि निपल्स भी हलके हलके दिख रहे थे।

चेहरे पे एक भोलापन लेकिन साथ में आँखों में एक निमंत्रण, …और देह पे आती हुयी जवानी के सारे निशान,

मैंने उसे जोर से से अपनी बाँहों में भींच लिया और अपनी बड़ी 36 डी साइज जोबन से उसके छोटे छोटे किशोर उभारों को दबाने, रगड़ने लगी, और छेड़ा,

" रास्ते में कुछ छैले मिल गए थे क्या ननद रानी, जो इतना टाइम लग गया। "


" अरे हमारी ननद को देख के तो इसके मोहल्ले के गदहों का लंड खड़ा हो जाता है, तो बिचारे छैलों कि बात ही क्या है "
चमेली भाभी ने चिढ़ाया।

मेरा एक हाथ उसकी पीठ पे ब्रा स्ट्रैप को सहला, हलके से खीच रहा था और उसके कंधे पे हाथ रख के मैंने उसे ऊपर छत पे बेडरूम में सीधे ले गयी, और समझाया

" सुन यार नीचे अभी थोड़ी भीड़ है, वो कालोनी की, … तो जरा मैं उनको निपटा के आती हूँ। तब तक तुम जरा, ....'

" एकदम भाभी, मैं कहीं जाने वाली नहीं हूँ। हाँ मैंने सूना है सुबह होली में आप लोगों ने खूब कपडे फाड़े सबके " मुझे बांहो में ले, वो किशोर सुनयना, मुस्करा के बोली।

चमेली भाभी को तो मौका चाहिए था, उन्होंने उसके गाल पे पिंच कर के कहा,

" अरे ननद रानी, उनके तो कपडे ही फाड़े थे, आपका देखिये क्या क्या फटता है "

" भाभी, आप भी न, अरे ये बिचारी तो आयी ही डलवाने है। पहले जरा ननद रानी को कुछ खिलाइये, पिलाइये, फिर डालने डलवाने का काम तो होता ही रहेगा। " मैंने चमेली भाभी को बोला।

कुछ ही देर में, मेरा इशारा समझ के चमेली भाभी, गुझिया की प्लेट और ठंडाई का ग्लास ले आयीं। ये कहने की जरूरत नहीं की दोनों में भांग की डबल डोज पड़ी थी।

मैंने एक गुझिया अपने हाथ से उसके मुंह में डाला और बोला, " ये ठंडाई भी पी ले साथ में सट से गटक जायेगी। "

चमेली भाभी नीचे पडोसिनो को सम्हालने चली गयी थीं।

बिस्तर पे कुछ मस्तराम की किताबें पड़ी थी, सचित्र। मीता की निगाहें बार बार वहीँ जा रही थीं।

मैंने उसे उठा के एक किताब दे दिया और बोली " असल में तुम्हारे भैया की ये फेवरिट किताबे हैं, हम साथ साथ पढ़ते है और प्रैक्टिस भी करते है। अब तू भी बड़ी हो गयी है ले पढ़। "

किताब खोलते ही जो उसने पढना शुरू किया, उसके आँखों की चमक बता रही थी की क्या असर हो रहा है।

मैंने टीवी भी खोल दिया, उसमें पहले से ही एक ब्ल्यू फ़िल्म की सीडी लगी हुयी थी।

"तू य किताबे पढ़, टी वी देख बस मैं १० मिनट में उन सब को निपटा के आती हूँ " मैंने बोला।

तब तक फ़िल्म शुरू हो गयी। एक जोड़ा चुम्मा चुम्मी कर रहा था। फिर लड़की के होंठ धीरे धीरे नीचे आये और पहले तो उसने बल्ज को होंठो से रगड़ा, और जिपर खोल दिया। स्प्रिंग कि तरह बड़ा लम्बा और मोटा लंड झटके से बाहर निकल आया। मीता की आँखे टी वी स्क्रीन पे चिपकी थीं।

लड़की ने पहले तो एक हाथ में पकड़ के लंड को आगे पीछे किया और फिर अपने होंठो के जोर से सुपाड़ा खोल दिया।


क्या मस्त मोटा सुपाड़ा था, मुश्किल से के मुंह में घुस पाया। लेकिन वो सपड़ सपड़ उसे चाटे चूसे जा रही थी।

तभी एक और लड़की आयी और उसने पहली वाली की स्कर्ट उठा के उसकी गुलाबी चूत चूसनी शुरू कर दी। यहाँ तक की उसकी चूत की दोनों फांको को फैला के अपनी जुबान अंदर घुसेड़ दी और जीभ से ही चोदने लगी।

मैं कनखियों से मीता पर उसका असर देख रही थी। उसके किशोर उरोज और पथरा रहे थे। अब टॉप से उस के कबूतरों की चोंचें झाँकने लगी थी। मेरी सेक्सी ननद की साँसे भी लम्बी हो रही थी।

वो हलके से बोली, " भाभी ".

मैं उठी और उससे कहा,

" अरे अभी तो फ़िल्म शुरू हुयी है है।, तू ये गुझिया भी ख़तम कर दे तो मैं प्लेट ले जाऊं। निगाहें उसकी अभीः भी टीवी पर थीं, चेहरे से मस्ती झलक रही थी। बिना कुछ सोचे उसने गुझिया उठा के खा ली और मैं प्लेट ले के बाहर निकल आयी। मैंने बाहर से दरवाजा न सिर्फ बंद किया बल्कि बोल्ट भी कर दिया।