समलिंगी कहानियाँ

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rajaarkey
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Re: समलिंगी कहानियाँ

Unread post by rajaarkey » 18 Dec 2014 16:13

जब मैं सुबह नाश्ते पर गया तो वहाँ वसीम और आसिफ़ दोनो ही थे! उस सुबह इतना कुछ हो जाने के बाद दोनो बडे दिलकश लग रहे थे! ऐसा होता भी है… जब किसी लडके के साथ ‘कर’ लो और फ़िर उसको नॉर्मल सिनैरिओ में औरों से बात करते हुये, तमीज़ से झुकते हुए, बडों से अदब से बात करते हुए, शरमा के मुस्कुराते हुए देखो तो कुछ ज़्यादा ही मन लुभावने लगते हैं! ज़ाइन भी सुबह सुबह के खुमार में बडा चिकना और नमकीन लग रहा था! उसकी भी रात की दारु की ख़ुमारी उतर गयी थी!
“क्यों? दिमाग हल्का हुआ ना?” मैने उससे हल्के से पूछा!
“जी चाचा… आपने किसी से कहा तो नहीं?”
“नहीं यार… कहूँगा क्यों?”
“थैंक्स चाचा…”

उसके बाद बिदायी का समय आ गया! और फ़िर हम जब स्टेशन पहुँचे तो ट्रेन टाइम पर थी! सब जल्दी जल्दी चढ गये! बाय बाय हुआ, मैने आसिफ़ और वसीम से गले मिल कर विदा ली और अलीगढ आने का वायदा किया और उनको भी देहली इन्वाइट किया!

ट्रेन के छोटे से सफ़र में मेरी नज़र रास्ते भर बस ज़ाइन पर ही रही! वो उस दिन नहा धो कर बडा खुश्बूदार हसीन लग रहा था! उस दिन वो व्हाइट कार्गो पहने था और लाल कॉलर वाली टी-शर्ट और ऊपर से एक नेवी ब्लू हल्की सी जैकेट डाले हुये था! उसकी भूरी आँखें और गुलाबी होंठ बात करने में मुस्कुराते तो मुझे उसका लिया हुआ वो चुम्बन याद आ जाता! फ़िर उसकी गाँड की वो दरार याद आती जिसे मैने पिछली रात बाथरूम में रगडा था!

हमारा रिज़र्वेशन सैकंड ए.सी. में था, मगर मैं बगल वाले कम्पार्ट्मेंट में सिगरेट पीने के लिये चला जाता था ताकि किसी का सामना ना करना पडे! बगल वाला कोच ए.सी. फ़र्स्ट क्लास का था! ट्रेन कुछ रुक रुक के चलने लगी थी! ऐसे ही एक बार जब में सिगरेट पीने गया तो ज़ाइन को भी बुला लिया!
“आओ, तुम खडे रहना…” मैं वहाँ खडा सिगरेट पी रहा था और वो खडा हुआ था! मैं बस उसको देख देख कर वासना में लिप्त हो रहा था!
“तुम्हारी बॉडी बडी अच्छी है वैसे…” मैने अचानक उससे कहा!
“अच्छा? थैंक्स…”
“एक्सरसाइज़ किया करो और सही हो जायेगी!”
“अच्छा चाचा, कैसी एक्सरसाइज़?”
“किसी ज़िम में पूछ लेना…” अब मैं उससे बात करते हुये उसके चेहरे से अपनी नज़रें हटा नहीं पा रहा था… बस उसकी कशिश में खिंचा हुआ था! मगर तभी उसे राशिद भाई के बुलाने की आवाज़ आयी! वो वापस जाने लगा तो वो कम्पार्ट्मेंट से निकलते एक आदमी से टकराया और सॉरी बोल के चला गया!
वो आदमी आया और मेरे बगल में उसने भी सिगरेट जला ली! मैने एक कश लिया और अचानक जब उसके चेहरे पर नज़र पडी तो वो कुछ जाना पहचना सा लगा!
मैं उसे गौर से देख रहा था और मैने देखा कि वो भी मुझे ध्यान से देख रहा था और अचानक हम एक दूसरे को पहचान गये!
“अरे… आकाश तुम?”
“अरे अम्बर तुम… अरे यार वाह, बडे दिन के बाद मिले हो…”
“हाँ यार, मैं भी पहचाने की कोशिश कर रहा था…”
“हाँ, मुझे भी तेरा चेहरा जाना पहचाना सा लगा…”
“वाह यार क्या मिले… अच्छा, कहाँ जा रहे हो?” उसने पूछा!
“यार, एक बारात में आया था… यहाँ सिगरेट पीने आ गया!”
“वाह यार…”
“और तुम कहाँ जा रहे हो?”
“मैं काम से बनारस जा रहा हूँ!”
“अरे, आओ ना… आओ, अंदर बैठते हैं!”
“अरे, फ़र्स्ट क्लास में टी.टी. पकड लेगा…”
“अरे, कुछ नहीं होगा… आओ बैठ के बातें करेंगे… इतने दिनों के बाद मिले हो यार…”

मैं उसके साथ उसके कैबिन में गया! वो दो बर्थ वाला कैबिन था, जिसकी ऊपरी सीट पर कोई सोया हुआ था!
“ये कोई तेरे साथ है क्या?”
“हाँ यार, भतीजा है!” मेरा मन तो हुआ कि देखूँ तो उसका भतीजा कैसा है… मगर कम्बल के कारण मुझे कुछ दिखा नहीं! मैं उसके साथ नीचे बैठ गया और हम बातें करने लगे!
“क्यों, तेरी शादी हुई?” फ़ाइनली मुझसे रहा ना गया और मैने पूछा तो उसकी आँखों में शरारती सी चमक आ गयी!
“क्यों, तुझे क्या लगता है?”
“क्या मतलब? यार लगेगा क्या, सीधा सा सवाल पूछा!”
“हुई भी और नहीं भी…”
“क्या मतलब?”
“मतलब, हुई थी मगर चार साल पहले डिवोर्स हो गया…”
“ओह.. अच्छा… तो अब इरादा नहीं है?”
“नहीं यार… और तू बता, तेरी हुई क्या?”
“नहीं…”
“क्यों?”
“बस ऐसे ही…”
“तो… काम कैसे मतलब… अच्छा चल रहने दे…” उसने मेरी जाँघ पर हाथ मारते हुये कहा!
“पूच ले, क्या पूछना है?”
“जब पता ही है तो क्या पूछूँ? शायद हम दोनो एक ही नाव पर हैं…”
“यार, साफ़ साफ़ बोल…”
“अच्छा, तुझे कुछ याद है?”
“क्या याद होगा?”
“वो याद है… जब हमने विनोद के यहाँ फ़िल्म देखी थी?”
“हाँ तो… क्या हुआ? उसमें याद ना रहने वाली क्या बात है?”
“उसके बाद का याद है?”
“ये सब मैं भूलता नहीं हूँ…”
“बस सोच ले… कुछ, उसी सब कारण से डिवोर्स हुआ….”
“मतलब… तुझे चूत…”
“हाँ शायद…”
“तो?”
“यार, अब मेरे मुह से क्यों कहलवाना चाह रहा है…”

पन्द्रह साल के बाद, आज उसने जब अपना हाथ मेरी जाँघ पर रखा तो मैने अपना हाथ उसके कंधों पर रख दिया! वो वैसा ही सुंदर था, जैसा तब था… बस अब थोडा मच्योर हो गया था, थोडा वेट गैन कर लिया था मगर फ़िर भी बॉडी मेन्टेन करके रखे हुये था!
“यार, तो तुझे शादी करनी ही नहीं चाहिये थी…”
“अब मैने सोचा, काम चल जायेगा… मगर साला क्या बताऊँ, एक मिनिट भी दिल नहीं लगता था!”
“हाँ, वो तो है… जब ख्वाहिश ही नहीं हो जो चीज़ खाने की, उसका स्वाद कहाँ अच्छा लगेगा…”
“हाँ, ये तो है… तो क्या तूने घर वालों को बता दिया?”
“क्या?”
“यही, कि तू गे है…”
“पागल है क्या… यार मैं अमरिका में थोडी हूँ… बस कोई ना कोई बहाना बना के काम चलाता हूँ…”

तभी ऊपर से एक दिलफ़रेब, दिलकश, दिलनशीं सी आवाज़ आयी!
“चाचू…??”
“हाँ, सोमू उठ गये? आओ, नीचे आ जाओ…”
और फ़िर दो गोरे पैरों के हसीन से तल्वे दिखे! मैने अपनी राइट तरफ़ सर उठाया तो एक व्हाइट ट्रैक, जिस पर साइड में ब्लैक लाइनिंग थी, दिखा… जो थोडा ऊपर उठा हुआ था, उसके अंदर से दो गोरे गोरे पैर दिखे, जिन पर बस रोंये थे, जो अभी बालों में तब्दील भी नहीं हुये थे!
“नीचे आ जाऊँ?”
“हाँ, आ जाओ… देखो, मेरे एक फ़्रैंड मिल गये है… आओ, मुह हाथ धो लो… चाय मँगवाता हूँ…”
फ़िर धम्म से सोमू मेरे बगल में नीचे उतर गया और समझ लीजिये कि मेरे जीवन में हसीन पल की तरह समाँ गया!
‘सौम्यदीप सिँह चौहान’ ये उसका पूरा नाम था! उस समय वो ११वीँ में था और जैसा नाम वैसा हुस्न… एकदम सौम्य! गुलाबी जिस्म, गुलाबी होंठ, हल्की ग्रे आँखें, सैन्ट्रली पार्टेड हल्के भूरे बाल, चौडा माथा, गोरे गाल, तीर की तरह आई-ब्रोज़, मोतियों की तरह दाँत, और संग-ए-मर्‍मर सा तराशा हुआ हसीन जिस्म! जब वो नीचे उतरा तो उसकी टी-शर्ट उठी रह गयी, जिस कारण मुझे सीधा उसका चिकना सा सपाट पेट दिखा! उसकी ट्रैक में आगे हल्का सा उभार था, जो जवान लडकों को अक्सर सुबह सुबह होता है! बिल्ट और बॉडी मस्क्युलर थी, गदराया हुआ बदन था… होता भी कैसे नहीं, साला डिस्ट्रिक्ट लेवल का स्विमिंग चैम्पियन जो था! मैने उससे हाथ मिलाया तो उसकी जवानी का अन्दाज़ हुआ! उसकी ग्रिप बढिया था, हाथ मुलायम और गर्म!
“चलो जाओ, जल्दी से ब्रश वगैरह कर लो… फ़िर चाय मँगाते हैं!” आकाश ने उससे कहा!
“जी चाचू…”
सौम्य ने झुक कर अपना बैग खोला और जब वो झुका तो उसकी टी-शर्ट और उठ गयी! अब उसकी पीठ और कमर दिखे! बिल्कुल चिकनी गोरी कमर, जिस पर से ट्रैक की इलास्टिक कुछ नीचे ही हो गयी थी और शायद मुझे उसकी चिकनी गाँड का ऊपरी हिस्सा दिखा रही थी!

जैसे ही वो गया, आकाश ने उठ के कैबिन को अंदर से बन्द कर दिया और खडा खडा ही मुझे देखने लगा!
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं…” उसने कहा!
मैं समझ गया कि वो क्या चाहता है… इसलिये मैं भी उसके सामने खडा हुआ! हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे, बिना एक भी पल बर्बाद किये, मैं उसकी तरफ़ बढा और अपना एक हाथ उसके सर के पीछे रख कर और दूसरे को उसकी कमर में डाल के उससे चिपक गया! उसने मुझे अपनी बाहों में भरा और हम एक दूसरे के होंठ चूसने लगे! गहरी जुदायी के बाद मिलन वाला प्यासा सा मुह खोल खोल के ज़बान से ज़बान भिडा के भूखा, एक दूसरे में समाँ जाने वाला, एक दूसरे को खा लेने वाला चुम्बन… जिसमें हमारी आँखें बन्द थी, बदन आपस में टकराये हुए और चिपके हुये थे! दोनो एक दूसरे का लँड महसूस करते हुये बस गहरे चुम्बन की आग़ोश में डूब गये! हमने पाँच मिनिट के बाद साँस लेने के लिये चुम्बन तोडा और फ़िर एक और चुम्बन में खो गये जो उससे भी बडा था! उसका हाथ मेरी गाँड पर आया और मेरा उसकी गाँड पर चला गया!
“अभी तक वैसी ही है…” उसने कहा!
“हाँ, बस छेद फ़ैल गया है…”
“वो तो तुम खूब ऑइलिंग करवाते होगे ना…”
“तुम्हारा लँड बडा हो गया है…” मैने उसके लँड को सहलाते हुये कहा!
“हाँ, निखर गया है… तुम्हारा तो पहले ही बडा था…”
“सब याद है?”
“हाँ बेटा, तू भूलने वाली चीज़ तो था ही नहीं… याद है ना, वो बस में कैसे हुआ था?”
“हाँ यार, सब याद है… मैं भी तुझे भूला नहीं कभी…” कहकर मैने फ़िर अपने होंठ उसके होंठ पर रख दिये!
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई तो हम हडबडा कर अलग हो गये! मैं जल्दी से बैठ गया और आकाश ने दरवाज़ा खोल दिया! नमकीन सौम्य वापस आ गया था!

“यार, मैं ज़रा बोल के आता हूँ कि मैं यहाँ हूँ… वरना सब सोचेंगे कि मैं कहाँ गया…”
“ठीक है…”

आकाश ने एक्स्पोर्ट का काम किया हुआ था और भोपाल में बेस्ड था! सौम्य ग्वालियर के सिन्धिया स्कूल में था! आकाश को बनारस में साडी के किसी कारीगर से मिल के कुछ माल देखना था, इसलिये सौम्य भी साथ हो लिया क्योंकि उसका ननीहाल बनारस में था!

जब मैं वापस आया तो चाय आ चुकी थी! सौम्य ने मुझे भी चाय दी और मैने आकाश के साथ साथ सोमू से भी खूब बात की! लौंडा रह रह कर मेरी जान ले रहा था! साले ने वही आकाश वाली चिकनाहट पायी थी! इन्फ़ैक्ट उससे भी ज़्यादा… क्योंकि उसके खून में तो बनारस की रेशमी लचक, देसी अल्हडपन और पुरवईया नमक भी था!

rajaarkey
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Re: समलिंगी कहानियाँ

Unread post by rajaarkey » 18 Dec 2014 16:14

बनारस पहुँच कर भी मैं सोमू का हुस्न नहीं भुला पा रहा था… और ज़ाइन तो तिरछा तिरछा भाग रहा था! मैने आकाश का नम्बर ले लिया था, जब घर पर बोर होने लगा तो सोचा कि किसी घाट की सैर लूँ! मैं अक्सर नाव लेकर घंटों वहाँ घूमा करता था! कभी कभी बिल्कुल गँगा के दूसरी तरफ़ जाकर रेत पर चड्‍डी पहन के लेट जाता था! वहाँ भीड नहीं होती थी, बडा मज़ा आता था! साथ में दो पेग भी लगा लेता था और ठँडी ठँडी हवा जब चेहरे को छूती थी तो मौसम हसीन हो जाता था! और जब चड्‍डी पहन के रेत पर बैठता था तो ठँडी ठँडी रेत बदन गुदगुदाती थी! मैं घर से निकला ही था कि अचानक आकाश का फ़ोन आ गया! मैने मन ही मन प्रोग्राम बना के उसको भी अपने साथ नाव की सैर पर चलने को कहा तो वो तैयार हो गया! नाव मेरे घर के एक ड्राइवर की थी! उसके चाचा का लडका रिशिकांत चलाया करता था! वो अक्सर मुझे दूसरे किनारे छोड के वापस आ जाया करता था! फ़िर घंटे-दो घंटे, जितना मैं कहता, उसके बाद वापस आकर मुझे ले जाता था! मैं घर से निकल के जब अपनी मेल चेक करने के लिये एक कैफ़े में गया तो अपने मेल बॉक्स में ज़ायैद की बहुत सी मेल्स देखीं! मैने उसको एक अच्छा लम्बा सा जवाब दिया! वो कहीं घूमने के लिये गया हुआ था और सिर्फ़ मेरा नाम ले लेकर ही मुठ मार रहा था! ज़ायैद के साथ मुझे रिलेशनशिप अजीब सी लग रही थी! ना देखा, ना जाना… फ़िर भी डेढ साल से कॉन्टैक्ट! दिल से दिल लगा रखा था! पता नहीं कौन होगा कैसा होगा मगर फ़िर भी…

मुझे वहाँ से निकल के आकाश से मिलते मिलते ही पाँच बज गये! जब हम घाट पर पहुँचे, काफ़ी भीड हो चुकी थी और फ़िर रिशी को ढूँढ के जब तक हम दूसरी तरफ़ पहुँचे, सूरज नीचे जाने लगा था! चारों तरफ़ सुनहरी रोशनी थी! वहाँ तक पहुँचते पहुँचते आकाश ने तीन और मैने दो पेग लगा लिये थे और हम एक दूसरे के बगल में बैठ के कंधों पर हाथ रख के हल्के हल्के सहला रहे थे!

“और बताओ यार…” हमें वहाँ बात करने में कोई प्रॉब्लम नहीं थी क्योंकि रिशी हमसे काफ़ी दूर बैठा नाव के चप्पू चला रहा था! वो २२-२३ साल का हट्‍टा कट्‍टा देसी लौंडा था जो उस दिन एक ब्राउन कलर का ट्रैक पहने था और ऊपर एक गन्दी सी टी-शर्ट… जिसकी गन्दगी के कारण उसके कलर का अन्दाज़ लगाना मुश्किल था! मगर चप्पू चला चला के उसके हाथ पैर और जाँघों की मसल्स गदरा के उचर गयी थी! उसकी छाती के कटाव उसकी शर्ट के ऊपर से उभर के अलग से दिखते थे! उसके देसी चेहरे के नमकीन रूखेपन को मैं हमेशा ही देखा करता था! मैने देखा कि आकाश भी उसको देख रहा था!

“तुमने काफ़ी पैसा कमा लिया है…”
“हाँ यार…”
“शादी नहीं करोगे दोबारा?”
“अब क्या करूँगा यार… एक बार ही सम्भालना मुश्किल हो गया था…”
“हुआ क्या था? डिवोर्स क्यों ले लिया?”
“क्या बताऊँ यार… एक बार ठरक में एक नौकर से गाँड मरवा रहा था, साली बीवी ने देख लिया…”
“तो समझा देता उसको…”
“समझी नहीं साली… मैने भी सोचा, बात दबा देने के लिये डिवोर्स सही रहेगा…”
“तो तूने उसकी चूत चोदी कि नहीं?”
“हाँ, मगर बस कभी कभी… फ़ॉर्मलिटी में… इसलिये वो और ज़्यादा फ़्रस्ट्रेटेड रहने लगी थी…”
“तो कहीं और ले जा कर नौकर के साथ करता ना…”
“यार, साली सो चुकी थी… मैने सोचा, जल्दी जल्दी काम हो जायेगा… वरना मैने तो फ़ैक्टरी में ही जुगाड कर रखा था…”
“अब क्या कहूँ, चाँस चाँस की बात है… वैसे भी अगर तुझे सही नहीं लग रहा था तो आज नहीं तो कल बात बिगडनी ही थी…”
“हाँ, वो तो है… अच्छा है, अब मैं अपने आपको ज़्यादा फ़्री महसूस कर रहा हूँ!”
“हाँ, वो तो लगता है… शादी से फ़्रीडम खत्म हो जाती है…”
“तो उस नौकर के अलावा भी कोई लडके फ़ँसाये तूने, मेरे बाद?”
“पूछ मत, गिनती नहीं है… मैं तो अपने साले पर भी ट्राई मारता… साला, बडा चिकना सा था… मगर उसके पहले ही काँड हो गया!”
“पहले ही साले को फ़ँसा लेता तो उसकी बहन भी शक़ नहीं करती और अगर देख भी लेती तो अपने भाई के कारण किसी को कहती नहीं!”
“हाँ, अब क्या कहूँ… जो होना था, हो गया…”
“वैसे तेरी बॉडी अब और गठीली हो गयी है…” मैने उसकी जाँघ पर हाथ रख के उसका घुटना हल्के हल्के से सहलाना शुरु कर दिया!
“अच्छा? मगर तू तो अभी भी वैसा चिकना ही है… हा हा हा…”
“वो बस वाली घटना याद है?”
“हाँ… और मुझे तो उसके बाद वाला सीन ज़्यादा याद आता है…”
“हाँ, वो तो असली सीन था ना… इसलिये तुझे याद आता है… थैंक्स यार, तू अभी तक भूला नहीं…”
जब हम दूसरे किनारे पर पहुँचे तो हमने एक एक पेग और लगा लिया!
“आज तेरे साथ पीने में मज़ा आ रहा है…” आकाश ने कहा!
“तो मज़ा लो ना… इतने सालों बाद मिले हैं, मज़ा तो आयेगा… क्या चाँस था यार, वरना ट्रेन में कोई ऐसे कहाँ मिलता है…”
“हाँ, मिलना था… सो मिल गये…”
फ़िर हम बॉटल और ग्लास लेकर नाव से उतर गये और रेत की तरफ़ चलने लगे! अब अँधेरा सा होने लगा था, मैने रिशी से कहा!
“तुम जाओ, डेढ-दो घंटे में आ जाना…”
“अच्छा भैयाजी, आ जाऊँगा…” कहकर वो नाव लेकर मुड गया!
“नहाना भी है क्या?” आकाश ने मुझसे पूछा! मगर मेरे जवाब के पहले ही अपने कपडे उतारने लगा और बोला “मैं तो सोच रहा हूँ, थोडा ठँडे ठँडे पानी में नहा लूँ…”
उसने अपनी शर्ट और बनियान उतार दिये! फ़िर अपनी पैंट खोली तो अंदर से उसकी इम्पोर्टेड शॉर्ट्स स्टाइल की चुस्त चड्‍डी दिखी! उसका जिस्म सच में काफ़ी मस्क्युलर होकर गदरा गया था! पिछली बार वो चिकना सा नवयुवक था, इस बार वो हसीन जवान सा मर्द बन गया था! उसकी जाँघें मस्क्युलर हो गयी थी! उसने अपनी एक जाँघ को स्ट्रैच किया और अपनी चड्‍डी की इलास्टिक अड्जस्ट की!
“तू भी आ जा ना…” उसने मुड के मुझसे कहा!
मैने भी बिना कुछ कहे अपने कपडे उतारना शुरु कर दिये! मैं उस दिन एक व्हाइट कलर की पैंटी पहने था जिसमें मेरा लँड खडा होकर उफ़ान मचा रहा था! पहले हम साथ खडे खडे सामने पानी देखते रहे, फ़िर हमारे हाथ एक दूसरे की कमर में चले गये… और बस फ़िर शायद आग लग गयी! हम घुटने घुटने पानी में गये और वहीं बैठ गये! फ़िर नहीं रहा गया तो एक दूसरे की तरफ़ मुह करके लेटे और फ़िर एक दूसरे के होंठों का रस निचोड निचोड के पीने लगे! उसने देखते देखते मेरी चड्‍डी में पीछे से हाथ डाल दिया तो मैने आगे उसका लँड सहलाना शुरु कर दिया! वो अपनी जाँघ को मेरे ऊपर चढा के मुझे अपने बदन से मसल रहा था! मैं कभी उसकी जाँघ, कभी पीठ तो कभी लँड मसल रहा था! हम ठँडे ठँडे पानी में लेटे हुये थे! उसकी बदन में सरप्राइज़िंगली ज़्यादा बाल नहीं आये थे… बस जाँघों पर हल्के से, छाती पर हल्के से, और हल्के से गाँड और झाँटों पर…
“चल, किनारे पर चल…” मैने उससे कहा और हम रेत पर लेट गये और एक दूसरे में गुथ गये!
उसने अपनी पैंट की पैकेट में कुछ ढूँढा!
“क्या ढूँढ रहा है?”
“ये…” उसने एक तेल की शीशी और कॉन्डोम का पैकेट दिखाया!
“अच्छा, पूरा इन्तज़ाम कर रखा है तुमने?”
“इतने दिनों के बाद ये तो होना ही था…”
“हाँ, मैं भी चाह रहा था… जब से आज तुमसे मिला, बस मेरा ये ही दिल कर रहा था!”
मैने उसके होंठों पर फ़िर होंठ रख दिये! मगर वो अपने लँड पर कॉन्डोम लगा रहा था!
“आज, पहले मैं लूँगा…”
“नहीं यार, पहले मुझे दे ना… तेरी गाँड को मैने बहुत याद किया है…” और मैने पलट के अपनी गाँड उसकी तरफ़ कर दी! फ़िर अपना एक पैर मोड कर उसकी जाँघ पर ऐसे रखा कि मेरी गाँड खुल गयी! मैने अपना सर मोड लिया और अपने हाथ उसकी गरदन में डाल दिये और अपनी गाँड को हल्के हल्के अपनी कमर मटका के उसके लँड पर रगडने लगा! उसने अपने लँड को अपने हाथ से पकड के मेरे छेद के आसपास लगाये रखा!
“इस बार सोच रहा हूँ, किसी लौंडे से शादी कर लूँ…”
“किससे करेगा?”
“तू कर ले…”
“ना बाबा ना… और कोई कमसिन सा ढूँढ ले, ज़्यादा दिन साथ निभायेगा…”
“तू ढूँढ दे ना…”
“कोई मिलेगा तो बताऊँगा… फ़िल्हाल काम चलाने के लिये मैं हूँ…”
“तूने भी काफ़ी लौंडे फ़ँसा रखे होंगे?” उसका सुपाडा मेरे छेद पर हल्के हल्के आगे पीछे होकर दब रहा था, जिससे मेरा छेद कुलबुला के खुल रहा था! मेरी चुन्‍नटें फ़ैलना शुरु कर रहीं थीं!
“हाँ, बहुत फ़ँसाये…” मेरे मन में ना जाने क्या आया, मैने उसको ज़ायैद के बारे में भी बताया!
“सही है… ऐसी फ़्रैंडशिप भी एक्साइटिंग होती है और ब्लाइंड डेट की तरह एण्ड में पता नहीं बन्दा कैसा हो…”
“हाँ यार, ये तो रिस्क है ही…” उसने मेरे निचले होंठों को अपने दाँतों से पकड के अपने सुपाडे को मेरी गाँड में घुसाया और मैने हल्के से ‘आह’ कहा!
“मज़ा आया ना?”
“हाँ, अब मुझे सिर्फ़ इसी में मज़ा आता है जानम…”
“अगर पता होता, तुझसे तब ही शादी कर लेता…”
“हाँ, तब सही रहता… बाकि सब लफ़डे से बच जाता…”
“हाँ और हम दोनो आराम से रहते…”
“हाँ वो तो है… मगर अब मेरा और लोगों से भी कमिटमेंट है ना… मैं इस तरह सिर्फ़ एक का बन के नहीं रह सकता…” मैने उससे कहा! उसने अब तक आधा लँड मेरी गाँड में घुसा के, मेरी वो जाँघ जिसका पैर उसकी जाँघ पर मुडा हुआ था, अपने मज़बूत हाथ से पकड ली… फ़िर उसने अपनी गाँड पीछे कर के एक ज़ोरदार धक्‍का दिया और उसका लँड मेरी गाँड में पूरा घुस गया!
“अआहहह… अभी भी दम है तेरे में…”
“हाँ, अब ज़्यादा एक्स्पीरिएंस और दम है… तब तो नया नया था…”
“इसीलिये तो लौंडे मच्योर मर्दों को ढूँढते हैं राजा…”
“हाँ…”
फ़िर वो सीधा हो गया और अपनी टाँगें फ़ैला के चित लेट गया तो मैं समझ गया कि मुझे उसके ऊपर बैठ कर सवारी करनी है! मैं उसके ऊपर बैठ गया और उसका लँड अपनी गाँड में खुद ही ले लिया और अपनी गाँड ऊपर नीचे करने लगा!
वो अपनी गाँड उठा उठा के मेरी गाँड में धक्‍के लगा रहा था! मैने उसकी छाती पर अपने दोनो हाथ रखे हुये थे!
“आह… हाँ… आकाश हाँ… आकाश… हाँ… बहु..त अच्छा ल..ग र..हा है… और डालो… मेरी गाँड में लँड डाल..ते र..हो…”
“आह… मेरी रानी ले ना… डाल तो रहा हूँ… तेरी गाँड मारने में बडा मज़ा आ रहा है…” उसने कहा और खूब गहरे गहरे धक्‍के देता रहा! कभी कभी वो मुझे बिल्कुल हवा में उछाल देता!

उसके बाद मैने उसको सीधा लिटाया और उसके पैर उसकी छाती पर ऐसे मुडवा दिये कि उसके दोनो घुटने उसके सर के इधर उधर थे! उसकी गाँड बिल्कुल मैक्सिमम चिर गयी थी! मैने उसके छेद पर मुह रखा और उसको एक किस किया! फ़िर अपनी ज़बान से उसकी गाँड को खोलने लगा! जब रहा ना गया तो मैं वैसे ही अपने घुटनों के बल वहाँ उसी पोजिशन में बैठ गया और अपना लँड उसकी गाँड की फ़ैली हुई दरार में रगडने लगा! मैने उसके छेद पर सुपाडा लगाया जो धडक रहा था! मैने दबाया तो उसकी साँस रुकी!
“साँस क्यों रुक गयी? यार, लगता है इस साइज़ का नहीं मिला कोई…”
“हाँ, मगर कम मिलता है इसीलिये तो याद रहा इतने साल… थोडा तेल लगा ले…”
“मैने उसकी गाँड पर और अपने लँड पर तेल लगाया! फ़िर अपना सुपाडा उसके छेद पर रखा और हल्के से दबाया और दबाता चला गया! जब मेरा दबाव लगातार बना रहा तो उसकी गाँड फैलने लगी और आखिर मेरा सुपाडा ‘फ़चाक’ से उसकी गाँड में घुसा!
“उहहह…”
“क्या हुआ?”
“हल्का सा दर्द…”
“बस, एक दो धक्‍के में सही हो जायेगा…”
“हाँ” उसने कहा!
मैने घप्प से अपना लँड उसकी गाँड में गहरायी तक सरका दिया तो वो हल्का सा चिहुँका!
“अबे… क्या कमसिन लौंडे की तरह उछल रहा है…” मैने कहा और लँड बाहर खींचा और फ़िर जब मैं लँड अंदर बाहर करने लगा तो उसकी गाँड अड्जस्ट हो गयी!
“आजा… तू नहीं बैठेगा लँड पर?”
इस बार मैने उसको अपने लँड पर बिठा लिया और उसको उछालने लगा!

अभी कुछ ही धक्‍के ही हुये थे कि हमें अपने बगल में कुछ आहट सी हुई! देखा तो बिल्कुल नँगे रिशिकांत को अपने नज़दीक खडे पाया! हम उसी पोजिशन में रह गये!
रिशिकांत हमारे बगल में खडा अपने खडे हुये लँड की मुठ मार रहा था! उसका नँगा बदन दूर से आती रोशनी में चमचमा रहा था! चाँदनी में दमकता उसका जिस्म पत्थर की मूरत की तरह लग रहा था! उसका चेहरा कामुकता से सुन्‍न पड चुका था! आँखों पर बस वासना की चादर थी! उसकी टाँगें हल्की सी फ़ैली थी, बदन के मसल्स दहक रहे थे! आकाश वहीं मेरे लँड पर बैठा रह गया! उसने रिशी को बुलाया!
“आ जाओ, इतनी दूर क्यों हो… इधर आ जाओ…”
रिशी उसकी तरफ़ आया और उसके इतना नज़दीक खडा हो गया कि रिशी का लँड उसके कँधे पर था!
“परेशान क्यों हो… आओ, तुम भी मज़ा ले लो…” कह कर आकाश ने अपने कंधे पर रखे उसके लँड को अपने गालों से सहलाया, जिसको देख के मैं भी मस्त होने लगा! अब मैने आकाश की गाँड में धक्‍के देना शुरु किया और उसने रिशी का लँड चूसना शुरु कर दिया! एक्साइटमेंट के मारे रिशिकांत के घुटने मुड जाते थे! वो अपने घुटने मोड कर गाँड आगे-पीछे करके आकाश के मुह में अपना लँड डालता और निकलता था! रिशिकांत का लँड उसके बदन के हिसाब से ज़्यादा बडा या ज़्यादा मोटा नहीं था मगर था देसी और गबरू और ताक़तवर! उसने आकाश के सर को अपने दोनो हाथों में पकड लिया और उसको अपने लँड पर धकाधक मारने लगा!

मैने आकाश की कमर पकड ली! फ़िर रिशी ने अपना लँड उसके मुह से निकला!
“आप भी कुछ करो ना…”
मैने उसका लँड देखा वो सीधा सामने हवा में खडा था और आकाश के थूक से भीगा हुआ था! मैने उसको अपने ऊपर खींचा और अपनी छाती पर घुटने इधर उधर कर के बिठा लिया और आकाश के थूक में भीगे उसके लँड को चाटा तो उसकी देसी खुश्बू से मस्त हो गया!

“तू मेरी गाँड में अपना लँड डाल… ऐसे ही डाल सकता है क्या?”
“हाँ, डाल दूँगा…” मेरे लँड पर आकाश बैठा था मगर फ़िर भी मैने अपने घुटने मोड लिये! आकाश की पीठ मेरी तरफ़ थी! रिशी मेरी फैली हुई जाँघों के बीच आ गया! उसने अपने घुटने मोड रखे थे! फ़िर मुझे अपनी गाँड पर उसका सुपाडा महसूस हुआ! क्योंकि वो आकाश के सामने पड रहा था, आकाश ने उसको अपनी बाहों में ले लिया और उसके होंठ चूसने लगा मगर रिशी का ध्यान नीचे था! उसने अपने हाथ से अपना लँड मेरी गाँड पर लगाया! आकाश की गाँड से काफ़ी तेल बह कर मेरी गाँड तक आ चुका था इसलिये कोई दिक्‍कत नहीं हुई! फ़िर रिशी का लँड ज़्यादा बडा भी नहीं था! साथ में उसकी देसी अखाडे वाली ताक़त… उसने घपाघप दो तीन धक्‍कों में अपना लौडा मेरी गाँड के अंदर खिला दिया! उसने अपना एक हाथ अपने चूतडों पर और दूसरा आकाश की पीठ पर रख लिया और आराम से आकाश के होंठ चूस चूस कर मेरी गाँड में अपना लँड डालने लगा!

“टट्‍टी निकाल दूँगा यार, तेरी गाँड से… टट्‍टी निकाल दूँगा…”
“अआह… हाँ, निकाल दे…” अब वो धीरे धीरे जोश में आ रहा था! तमीज़ के दायरे से बाहर हो रहा था! उसका मर्दानापन जाग कर उसके लडकपन को दूर कर रहा था!
“बेटा… मर्द का लौडा लिहिओ तो गाँड से टट्‍टी बाहर खींच देई…” उसने देसी अन्दाज़ में कहा!
“तो निकाल देओ ना…”
“हाँ साले, अभी अपने आपही हग देओगे… चल घोडा बन ज़रा… तू हट तो…” उसने आकाश को मेरे ऊपर से हटाया और मुझे पलटवा के घोडा बनवा दिया! फ़िर उसने अपने दोनो हाथ मेरे कमर पर रखे और मेरी गाँड के अंदर सीधा अंदर तक अपना लँड डालने लगा! कुछ देर में वो धकधक मेरी गाँड मारने लगा! आकाश बस बगल में अपना लँड मेरी कमर में चिपका के क्नील हो गया और रिशी के बाज़ू सहलाने लगा!
“क्या देख रहा है? है ना कररा माँस…”
“हाँ… बहुत…”
“रुक जा बेटा, अभी तेरी गाँड में भी पेलेंगे… गाँडू साले, बडी देर से तुम दोनो को साइड से देख रहा था…”

उसने थोडी देर के बाद आकाश को मेरे बगल बिल्कुल मेरी तरह घोडा बना लिया और कभी उसकी मारने लगता कभी मेरी! साले में बडा दम था! नाव खे खे कर उसने सारा ज़ोर अपने लँड में जमा कर लिया था! सच में जब उम्मीद के बाद भी उसका माल नहीं झडा और उसके धक्‍के तीखे होकर अंदर तक जाने लगे तो मेरी टट्‍टी ढीली होने लगी!
“क्यों बेटा गाँडू, टट्‍टी हुई ना…” उसने कहा!
“हाँ…”
“रुक, तू इधर आ… जरा लौडा मुह में ले….” उसने आकाश को खींचा और अपना लँड मेरी गाँड से निकाल के आकाश के मुह में देने लगा! मगर तभी शायद उसका पतन ट्रिगर हो गया और वो चिल्लाया!
“अआह मा…ल…” कहकर उसने आकाश का सर पकड लिया और उसके मुह में ही अपनी धार मार दी!
“अब इसको चटवा…” उसके कहने पर मैने आकाश के मुह पर मुह रख कर रिशिकांत का नमकीन देसी वीर्य उसके मुह से अपनी ज़बान से चाटा! रिशिकांत की देसी जवानी तो उस शाम का बोनस थी! हम दोनो उससे मस्त हो गये थे! फ़िर हमने अपना अपना माल झाडा और कपडे पहन के वापसी का सफ़र पकड लिया!

उस रात मैने आकाश को अपने साथ ही सुला लिया! हम लिपट के सोये, रात काफ़ी बातें हुई! आकाश ने मुझे बताया कि उसको अक्चुअली थ्रीसम बहुत पसंद है और अगर कोई और मिले तो मैं उसको बुला सकता हूँ! मैने भी कह दिया कि मिलेगा तो बता दूँगा! अगली सुबह वो चला गया! मगर रात भर हमनें खूब बातें की!
उधर रिशिकांत का मज़ा चखने के बाद मैने शिवेन्द्र को देखा तो वो भी कामुक लगा! वो करीब २७ साल का था जिसकी शादी हो चुकी थी मगर टाइट कपडे पहनता था!

rajaarkey
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Re: समलिंगी कहानियाँ

Unread post by rajaarkey » 18 Dec 2014 16:14

उस दिन शाम को काशिफ़ का रिसेप्शन था! मैं सुबह उठा और आकाश के जाने के बाद बिना नहाये ही सामने राशिद भैया के घर चला गया! मेरी नज़रें ज़ाइन को ही ढूँढ रहीं थी! उसने मुझे निराश नहीं किया और कुछ ही देर में अपने दो कजिन्स के साथ आया! मैने उसकी नमकीन जवानी के दर्शन से अपना दिन शुरु किया! उस दिन के बाद से ज़ाइन को वापस अकेले लाकर उस मूड में लाना मुश्किल हो रहा था! शादी के चक्‍कर में मौका ही नहीं मिल रहा था! ट्रेन पर मौका था तो आकाश मिल गया! इलाहबाद में मौका था तो वहाँ वसीम और आसिफ़ मिल गये! फ़िर मैने सोचा कि राशिद भाई के सिस्टम पर ही मेल चेक कर लूँ! उस दिन भी ज़ायैद की मेल आयी थी!

“आज मैं बहुत हॉर्नी फ़ील कर रहा हूँ… यू नो, मेरे होल में गुदगुदी हो रही है… जब उँगली से सहलाता हूँ तो बहुत अच्छा लगता है! माई फ़्रैंड्स जस्ट टॉक अबाउट गर्ल्स, बट आई कीप लुकिंग एट माई फ़्रैंड्स… समटाइम्स आई वाँट टु हैव सैक्स विथ दैम ऑल्सो! अब तो पुराने पार्टनर्स से गाँड मरवाने में मज़ा भी नहीं आता है! अब तो आपसे मिलने का दिल भी करता है! आई वाँट टु होल्ड युअर कॉक एंड फ़ील इट! आई ऑल्सो वाँट टु सक इट एंड फ़ील इट डीप इन्साइड माई होल! आपका लँड अंदर जायेगा तो दर्द होगा… मे बी आई माइट इवन शिट बट आई स्टिल वाँट इट…”

ये और ऐसी और भी बातें उसने लिखी थी! मैने उसका जवाब दिया और लॉग ऑउट हो गया! ये एक एक्सिडेंट ही था कि ज़ायैद को एक दिन हिन्दी-गे-ग्रुप के बारे में पता चला, जहाँ उसने मेरी कहानियाँ पढीं और हमारे बीच ये एक तरह का अफ़ेअर सा शुरु हो गया! ज़ायैद धीरे धीरे डेस्परेट हो रहा था!
एक बार जब मैने उससे पूछा कि उसको क्या पसंद है तो उसने लिखा था!
“अआह… मैं किसी मच्योर आदमी की वाइफ़ की तरह बहाने करना चाहता हूँ… नयी नयी चीज़ें एक्सपेरिमेंट करना चाहता हूँ! मेरे फ़्रैंड्स सिर्फ़ सैक्स करते हैं बट आई वाँट टु डू मोर… मे बी गैट लिक्ड… मे बी ट्राई इवन पिस एंड थिंग्स लाइक दैट… यु नो ना? लडका था तो गर्म, मगर था मेरी पहुँच से बहुत दूर… ना जाने कहाँ था ज़ायैद…

उस दिन मैने एक नया लडका भी देखा! उसका नाम शफ़ात था और वो मेरे एक दोस्त का छोटा भाई था जो राशिद भाई के यहाँ भी आता जाता था! उसकी काशिफ़ से दोस्ती थी! उस समय में बी.एच.यू. में एम.बी.बी.एस. सैकँड ईअर में था! पहले उसको देखा तो था मगर अब देखा तो पाया कि वो अच्छा चिकना और जवान हो गया है! मैने उससे हाथ मिलाया! वो कुछ ज़्यादा ही लम्बा था, करीब ६ फ़ीट ३ इँच का जिस कारण से उसकी मस्क्युलर बॉडी सैक्सी लग रही थी! मैने उसको देखते ही ये अन्दाज़ लगाया कि ना जाने वो बिस्तर में कैसा होगा! ये बात मैं हर लडके से मिल कर करता हूँ! मैने नोटिस किया कि ज़ाइन शफ़ात से फ़्रैंक था! मुझे कम्प्यूटर मिला हुआ था इसलिये मैं अपनी गे-स्टोरीज़ की मेल्स चेक करता रहा! कुछ इमजेज़ भी देखीं, दो विडीओज़ देखे और गर्म हो गया! फ़िर बाहर सबके साथ बैठ गया! मैने देखा कि शफ़ात की नज़रें घर की लडकियों पर खूब दौड रहीं थी… खास तौर से राशिद भाई की भतीजी गुडिया पर! वैसे स्ट्रेट लडको के लिये १२वीँ में पढने वाली गुडिया अच्छा माल थी! वो बिल्कुल वैसी थी जैसे लडके मैं ढूँढता हूँ! नमकीन, गोरी, पतली, चिकनी! शफ़ात के चिकने जवान लँड के लिये उसकी गुलाबी कामुक चूत सही रहती! गुडिया मुझसे भी ठीक ठाक फ़्रैंक थी! बस ज़ाइन मेरे हाथ नहीं आ रहा था… किसी ना किसी बहाने से बच जाता था!

उस दिन बैठे बैठे ही सबका राजधरी जाने का प्रोग्राम बन गया! क्योंकि राशिद भैया के काफ़ी रिश्तेदार थे, सबने सोचा, अच्छी पिकनिक हो जायेगी! राजधरी बनारस से करीब दो घंटे का रास्ता है और मिर्ज़ापुर के पास पडता है! वहाँ एक झरना और ताल है जिसमें लोग पिकनिक के लिये जाते हैं! उसके पास छोटे छोटे पहाड भी हैं! जब मुझे ऑफ़र मिला तो मैं भी तैयार हो गया! अगली सुबह रिसेप्शन के बाद जाने का प्रोग्राम बना! सब मिला कर करीब ३० लोग हो गये थे!

शाम के रिसेप्शन में भीड भाड थी, घर के पास ही पन्डाल लगा था, लाइट्स थी, गाने बज रहे थे, सब इधर उधर चल फ़िर रहे थे! वहाँ के घर पुराने ज़माने के बने हुये हैं… हैपज़ार्ड! जिस कारण कहीं एक दम से चार मन्ज़िलीं हो गईं थी, कहीं एक ही थी! मेरे और राशिद भैया के घर में एक जगह बडी छत कहलाती थी, जो एक्चुअली फ़िफ़्थ फ़्लोर की छत थी, फ़िफ़्थ फ़्लोर पर सिर्फ़ एक छोटी सी कोठरी थी… ये उसकी छत थी जिसके एक साइड मेरा घर था और एक साइड उनका! मैं अक्सर वहाँ जाकर सोया करता था! उसकी एक छोटी सी मुंडेर थी ताकि कोई करवट लेकर नीचे ना आ जाये! ज़्यादा बडी नहीं थी! वहाँ से पूरा मोहल्ला दिखता था!

फ़िल्हाल मैं चिकने चिकने जवान नमकीन लौंडे ताड रहा था! साफ़ सुथरे कपडों में नहाये धोये लौंडे बडे सुंदर लग रहे थे! मगर वो शाम सिर्फ़ ताडने में ही गुज़री! कोई फ़ँसा नहीं! क्योंकि अगली सुबह जल्दी उठना था मैं तो जल्दी सोने भी चला गया!

दूसरे दिन काफ़िले में पाँच गाडियाँ थीं और कुल मिलकर करीब आठ चिकने लौंडे जिसमें ज़ाइन और शफ़ात भी थे और उनके अलावा कजिन्स वगैरह थे! राजधारा पर पहुँच के पानी का झरना देख के सभी पागल हो गये! सभी पानी में चलने लगे! कुछ पत्थरों पर चढ गये! कुछ कूदने लगे! कुछ दौडने लगे! मैने पास के बडे से पत्थर पर जगह बना ली क्योंकि वो उस जगह के बहुत पास थी जहाँ सब लडके अठखेलियाँ कर रहे थे… खास तौर से ज़ाइन! उस जगह की ये भी खासियत थी कि वो उस जगह से थोडी हट के थी जहाँ बाकी लोग चादर बिछा कर बैठे थे! यानि पहाडों के कारण एक पर्दा सा था! इसलिये लडके बिना रोक टोक मस्ती कर रहे थे! मेरी नज़र पर ज़ाइन था! वो उस समय किनारे पर बैठा सिर्फ़ अपने पैरों को भिगा रहा था!
“ज़ाइन… ज़ाइन…” मैने उसे पुकारा!
“नहा लो ना… तुम भी पानी में जाओ…” मैने कहा!
“नहीं चाचा, कपडे नहीं हैं…”
“अच्छा, इधर आ जाओ.. मेरे पास… यहाँ अच्छी जगह है…”
“आता हूँ…” उसने कहा मगर उसकी अटेंशन उसके सामने पानी में होते धमाल पर थी! सबसे पहले शफ़ात ने शुरुआत की! उसने अपनी शर्ट और बनियान उतारते हुए जब अपनी जीन्स उतारी तो मैं उसका जिस्म देख के दँग रह गया! वो अच्छा मुस्च्लुलर और चिकना था, साथ में लम्बा और गोरा! उसने अंदर ब्राउन कलर की फ़्रैंची पहन रखी थी! मैने अपना फ़ोन निकाल के उस सीन का क्लिप बनाना शुरु कर दिया! शफ़ात ने जब झुक के अपने कपडे साइड में रखे तो उसकी गाँड और जाँघ का बहुत अच्छा, लँड खडा करने वाला, व्यू मिला! मेरा लौडा ठनक गया! उसको देख के सभी ने बारी बारी कपडे उतार दिये… और फ़ाइनली ज़ाइन ने भी!

मैने ज़ाइन के जिस्म पर अपना कैमरा ज़ूम कर लिया! वो किसी हिरनी की तरह सुंदर था! उसके गोरे बदन पर एक भी निशान नहीं था! व्हाइट चड्‍डी में उसकी गाँड क़यामत थी! गाँड की मस्क्युलर गोल गोल गदरायी फ़ाकें और फ़ाँकों के बीच की दिलकश दरार! पतली चिकनी गोरी कमर पर अँडरवीअर के इलास्टिक… फ़्लैट पेट… छोटी सी नाभि… तराशा हुआ जिस्म… छाती पर मसल्स के कटाव… सुडौल जाँघें और मस्त बाज़ू… वो खिलखिला के हँस रहा था और हँसता हुआ पानी की तरफ़ बढा! मेरा लँड तो जैसे झडने को हो गया! उसको उस हालत में देख कर मेरा लौडा उफ़न गया! फ़िर सब मुझे भी पानी में बुलाने लगे! जब देखा कि बच नहीं पाऊँगा तो मैं तैयार हो गया!

जब मैं किनारे पर खडा होकर अपने कपडे उतर रहा था तो मैने देखा कि ज़ाइन मेरी तरफ़ गौर से देख रहा था! उसने मेरे कपडे उतरने के एक एक एक्ट को देखा और फ़िर मेरी चड्‍डी में लँड के उभार की तरफ़ जाकर उसकी आँखें टिक गयी! मैं सबके साथ कमर कमर पानी में उतर गया! पानी में घुसते ही मेरे बदन में इसलिये सिहरन दौड गयी कि ये वही पानी था जो ज़ाइन और शफ़ात दोनो के नँगे बदनों को छू कर मुझे छू रहा था! एक तरफ़ वॉटरफ़ॉल था! मैने शफ़ात से उधर चलने को कहा! हम सीधे पानी के नीचे खडे हो गये! वो भी खूब मस्ती में था, मैं भी और बाकी सब भी…
“आपने इसके पीछे देखा है?” शफ़ात ने कहा!
वो मुझे गिरते पानी के पीछे पत्थर की गुफ़ा के बारे में बता रहा था… जहाँ चले जाओ तो सामने पानी की चादर सी रहती है!
“नहीं” मैने वो देखा हुआ तो था मगर फ़िर भी नहीं कह दिया !
“आइये, आपको दिखाता हूँ… बहुत बढिया जगह है…”
पानी में भीगा हुआ, स्लिम सा गोरा शफ़ात अपनी गीली होकर बदन से चिपकी हुई चड्‍डी में बहुत सुंदर लग रहा था… बिल्कुल शबनम में भीगे हुये किसी फ़ूल की तरह! उसके चेहरे पर भी पानी की बून्दें थमी हुई थी! जब हम वहाँ पहुँचे तो मैने झूठे एक्साइटमेंट में कहा!
“अरे ये तो बहुत बढिया है यार…”
“जी… ये जगह मैने अपने दोस्तों के साथ ढूँढी है…” मैने जगह की तारीफ़ करते हुये उसके कंधे पर हाथ रखते हुये उसकी पीठ पर हाथ फ़ेरता हुआ अपने हाथ को उसकी कमर तक ले गया तो ऐसा लगा कि ना जाने क्या हुलिया हो! उसका जिस्म चिकना तो था ही, साथ में गर्म और गदराया हुआ था!
“तुम्हारी बॉडी तो अच्छी है… लगता नहीं डॉक्टर हो…”
“हा हा हा… क्यों भैया, डॉक्टर्स की बॉडी अच्छी नहीं हो सकती क्या? हम तो बॉडी के बारे में पढते हैं…”
“ये जगह तो गर्ल फ़्रैंड लाने वाली है…”
“हाँ है तो… मगर अब सबके साथ थोडी ला पाता…”
“मतलब है कोई गर्ल फ़्रैंड?”
“हाँ है तो…” मेरा दिल टूट गया!
“मगर हर जगह उसको थोडी ला सकता हूँ… उसकी अपनी जगह होती है…”
मैने सोचा कि ये लौंडा तो फ़ँसेगा नहीं, इसलिये एक बार दिल बहलाने के लिये फ़िर उसकी पीठ सहलायी!
“तो बाकी जगह पर क्या होगा?”
“हर जगह का अपना पपलू होता है… पपलू जानते हैं ना?”
“हाँ, मगर तुम्हारा मतलब नहीं जानता… हा हा हा…”
“कभी बता दूँगा…”
“अच्छा, तुमने ऊपर देखा है? जहाँ से पानी आता है…”
“हाँ… चलियेगा क्या?”
“हाँ, चलो…”
“वो तो इससे भी ज़्यादा बढिया जगह है… आप तो यहाँ ही कमर सहलाने लगे थे… वहाँ तो ना जाने क्या मूड हो जाये आपका…”
“चलो देखते हैं…” लौंडे ने मेरा इरादा ताड लिया था… आखिर था हरामी…
ऊपर एक और गहरा सा तलाब था और उसके आसपास घनी झाडियाँ और पेड… और वहाँ का उस तरफ़ से रास्ता पत्थरों के ऊपर से था!
“कहाँ जा रहे है… मैं भी आऊँ क्या?” हमको ऊपर चढता देख ज़ाइन ने पुकारा!
“तुम नहीं आ पाओगे…” शफ़ात ने उससे कहा!
“आ जाऊँगा…”
“अबे गिर जाओगे…”
शायद ज़ाइन डर गया! हम अभी ऊपर पहुँचे ही थे कि हमें पास की झाडी में हलचल सी दिखी!
“अबे यहाँ क्या है… कोई जानवर है क्या?”
“पता नहीं…” मगर तभी हमे जवाब मिल गया! हमें उसमें गुडिया दिखी!
“ये यहाँ क्या कर रही है?” शफ़ात ने चड्‍डी के ऊपर से लँड रगडते हुए कहा!
“कुछ ‘करने’ आयी होगी…”
“‘करने’ के लिये इतनी ऊपर क्यों आयी?”
“इसको ऊपर चढ के ‘करने’ में मज़ा आता होगा…” मैने कहा!
“चुप रहिये… आईये ना देखते हैं…” उसने मुझे चुप रहने का इशारा करते हुये कहा!
उसके ये कहने पर और गुडिया को शायद पिशाब करता हुआ देखने के ख्याल से ही ना सिर्फ़ मेरा बल्कि शफ़ात का भी लँड ठनक गया! अब हम दोनो की चड्‍डियों के आगे एक अजगर का उभार था! हम चुपचाप उधर गये! गुडिया की गाँड हमारी तरफ़ थी और वो शायद अपनी जीन्स उतार रही थी! उसने अपनी जीन्स अपनी जाँघों तक सरकायी तो उसकी गुलाबी गोल गाँड दिखी… बिल्कुल किसी चिकने लौंडे की तरह… बस उसकी कमर बहुत पतली थी और जाँघें थोडी चौडी थी! उसकी दरार में एक भी बाल नहीं था! फ़िर वो बैठ गयी और शायद मूतने लगी!

“हाय… क्या गाँड है भैया..” शफ़ात ने मेरा हाथ पकड के दबाते हुए हलके से कहा!
“बडी चिकनी है…” मैने कहा!
“बुर कितनी मुलायम होगी… मेरा तो खडा हो गया…” उसने अब मेरा हाथ पकड ही लिया था!
मुझे गुडिया की गाँड देखने से ज़्यादा इस बात में मज़ा आ रहा था कि मेरे साथ एक जवान लडका भी वो नज़ारा देख के ठरक रहा था! देखते देखते मैने शफ़ात की कमर में हाथ डाल दिया और हम अगल बगल कमर से कमर, जाँघ से जाँघ चिपका के खडे थे!

फ़िर गुडिया खडी हुई, खडे होने में कुछ गिरा तो वो ऐसे मुडी कि हमें उसकी चूत और भूरी रेशमी झाँटें दिखीं! उसका फ़ोन गिरा था! उसने अपनी जीन्स ऊपर नहीं की! वो फ़ोन में कुछ कर रही थी… शायद एस.एम.एस. भेज रही थी!

“तनतना गया है क्या?” मैने मौके का फ़ायदा देखा और सीधा शफ़ात के खन्जर पर हाथ रख दिया!
“और क्या? अब भी नहीं ठनकेगा क्या?” उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, बस हल्की सी सिसकारी भर के बोला!

तभी शायद गुडिया के एस.एम.एस. का जवाब सामने की झाडी में हलचल से आया, जिस तरफ़ वो देख रही थी! उधर झाडी से मेरे बाप का ड्राइवर शिवेन्द्र निकला! गुडिया ने उसको देख के अपनी नँगी चूत उसको दिखाई! उसने आते ही एक झपट्‍टे में उसको पकड लिया और पास के एक पत्थर पर टिका के उसका बदन मसलने लगा!
“इसकी माँ की बुर… यार साली… ड्राइवर से फ़ँसी है…” शफ़ात ने अपना लँड मुझसे सहलवाते हुये कहा!
“चुप-चाप देख यार.. चुप-चाप…”
देखते देखते जब शिवेन्द्र ने अपनी चुस्त पैंट खोल के चड्‍डी उतारी तो मैने उसका लँड देखा! शिवेन्द्र साँवला तो था ही, उसका जिस्म गठीला था और लँड करीब १२ इँच का था और नीचे की तरफ़ लटकता हुआ मगर अजगर की तरह फ़ुँकार मारता हुआ था… शायद वो अपने साइज़ के कारण नीचे के डायरेक्शन में था और उसके नीचे उसकी झाँटों से भरे काले आँडूए लटक रहे थे! गुडिया ने उसके लँड को अपने हाथ में ले लिया और शिवेन्द्र उसकी टी-शर्ट में नीचे से हाथ डाल कर उसकी चूचियाँ मसलने लगा! देखते देखते उसने अपना लँड खडे खडे ही गुडिया की जाँघों के बीच फ़ँसा के रगडना शुरु किया तो हमें अब सिर्फ़ उसकी पीठ पर गुडिया के गोरे हाथ और शिवेन्द्र की काली मगर गदरायी गाँड, कभी ढीली कभी भिंचती, दिखाई देने लगी!

इस सब में एक्साइटमेंट इतना बढ गया कि मैने शफ़ात का खडा लँड उसकी चड्‍डी के साइड से बाहर निकाल के थाम लिया और उसने ना तो ध्यान दिया और ना ही मना किया! बल्कि और उसने अपनी उँगलियाँ मेरी चड्‍डी की इलास्टिक में फ़ँसा कर मेरी कमर रगडना शुरु कर दिया! वो गर्म हो गया था!
फ़िर शिवेन्द्र गुडिया के सामने से हल्का सा साइड हुआ और अपनी पैंट की पैकेट से एक कॉन्डोम निकाल के अपने लँड पर लगाने लगा तो हमें उसके लँड का पूरा साइज़ दिखा! जब वो कॉन्डोम लगा रहा था, गुडिया उसका लँड सहला रही थी!
“बडा भयँकर लौडा है साले का…” शफ़ात बोला!
“हाँ… और चूत देख, कितनी गुलाबी है…”
“हाँ, बहनचोद… इतना भीमकाय हथौडा खायेगी तो मुलायम ही होई ना…”
शिवेन्द्र ने गुडिया की जीन्स उतार दी और फ़िर खडे खडे अपने घुटने मोड और सुपाडे को जगह में फ़िट कर के शायद गुडिया की चूत में लौडा दिया तो वो उससे लिपट गयी! कुछ देर में गुडिया की टाँगें शिवेन्द्र की कमर में लिपट गयी! वो पूरी तरह शिवेन्द्र की गोद में आ गयी! शिवेन्द्र अपनी गाँड हिला हिला के उसकी चूत में लँड डालता रहा! उसने अपने हाथों से गुडिया की गाँड दबोच रखी थी!

“भैया… कहाँ हो??? भैया… चाचा… चाचा…” तभी नीचे से आवाज़ आयी! ज़ाइन था, जिसकी आवाज़ शायद गुडिया और शिवेन्द्र ने भी सुनी! शिवेन्द्र हडबडाने लगा! जब आवाज़ नज़दीक आने लगी तो दोनो अलग हो गये और जल्दी जल्दी कपडे पहनने लगे!