खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:10

खूनी हवेली की वासना पार्ट --19

गतान्क से आगे........................

कार की बॅटरी से तेज़ाब निकाल कर एक ग्लास में डाला जा चुका था. वहीं खड़े पोलीस वाले खामोशी से ये तमाशा देख रहे थे.

"इसकी आँखें खोलो" ठाकुर ने अपने आदमियों को इशारा किया. 2 आदमी आगे बढ़े और ज़बरदस्ती राजन को पकड़कर उसकी सूजी हुई आँखें खोली. सरिता देवी आगे बढ़कर राजन के करीब आई और उसकी आँखों में आँखें डालकर देखा.

"देख मुझे राजन" उन्होने हल्का सा झुकते हुए कहा.

राजन की आँखों में ख़ौफ्फ उन्हें सॉफ दिखाई दे रहा था. वो डर जैसे उनके ज़ख़्म पर मलहम का काम कर था. कलेजा जैसे ठंडा हो गया.

थोड़ी ही देर बाद राजन की दर्द भरी चीखें हवेली में गूँज उठी. ग्लास से तेज़ाब खाली हो गया था और राजन की ज़ुबान कटी हुई ज़मीन पर पड़ी थी.

3 दिन की जागी सरिता देवी को उस रात बहुत आराम की नींद आई.

2 महीने गुज़र गये पर सरिता देवी उस रात को भूल नही पाई. भले ही उन्होने राजन से अपना बदला पूरा कर लिया था पर राजन की कही बात सच हो रही थी. उनका दिन रात का सुकून उड़ गया था. हर पल दिमाग़ में वही लम्हा घूमता रहता था जब वो 7 अजनबी आदमियों के बीच नंगी बैठी लंड चूस रही थी. रात को सोती तो वही पल बार बार सपने में आता.

उस रात के बाद ठाकुर के साथ बिस्तर पर भी वो पूरा साथ नही दे पाती थी. पत्नी होने के नाते अपने पति को रोक तो नही पाती थी पर बिस्तर पर जिस तरह से वो पहले पूरी तरह ठाकुर के साथ होती थी अब वो बात नही रही थी. कपड़े उतारते ही उन्हें ऐसा लगता के अब भी आस पास खड़े कई लोग उन्हें नंगी देख रहे हैं, अपने पति से चुदवाते हुए देख रहे हैं.

और सबसे मुश्किल हो गया था उस लड़के के सामने जाना. उसको अनदेखा वो कर नही सकती थी, वो नामुमकिन था पर जब भी वो सामने आता, वो शरम से नज़र नीचे झुका लेती थी. उस लड़के के साथ उनके रिश्ते में एक ऐसा बदलाव आ गया था जिसकी उन्होने कभी कल्पना भी नही की थी. कभी उन्होने सोचा भी नही था के कमरे से निकलने से पहले ये दुआ करेंगी के वो लड़का उनके सामने ना आए.

उस रात के बाद उनकी कभी उससे बात नही हुई. ना ही लड़के ने उनसे बात करने की कोशिश की, बस उसको कुच्छ चाहिए होता तो वो माँग लेता था.

सरिता देवी को डर था के कहीं ठाकुर साहब से डर के मारे कह ना दे के राजन ने ठकुराइन से क्या कराया था पर वो उसने पूरा उनका साथ दिया. बदनामी और अपने पति की नज़र में गिर जाने के डर से उन्होने किसी से कुच्छ नही कहा तो लड़के ने भी किसी से कुच्छ नही कहा.

वक़्त यूँ ही गुज़रता रहा और ठकुराइन धीरे धीरे अपनी ज़िंदगी की तरफ वापिस जाने लगी. उस रात की याद आती तो अब भी थी पर अब बस आके गुज़र जाती थी. उस रात से जुड़ा गुस्सा और दर्द धीरे धीरे कम हो रहा था.

और फिर कुच्छ ऐसा हुआ के हर याद ताज़ा हो गयी.

उस रात ठकुराइन नहाकर कमरे से निकली थी. गर्मी के दिन थे और रात को नहाए बिना उन्हें नींद नही आती थी. वो अपनी नाइटी पहने बाथरूम से बाहर निकली और शीशे के सामने खड़ी होकर बाल सूखने लगी. लाल रंग की नाइटी में सरिता देवी का गोरा रंग और भी उभरकर सामने आ रहा था.

गीले बालों से गिरते पानी ने नाइटी को उपेर से गीला कर दिया था जिसकी वजह से ठकुराइन के निपल्स सॉफ दिखाई दे रहे थे. वो रात को कभी भी ब्रा पहेनकर नही सोती थी.

बाल झाड़ते झाड़ते उनके हाथ में पकड़ी कंघी छूट कर ज़मीन पर जा गिरी. ठकुराइन उसको उठाने के लिए नीचे को झुकी ही थी के उन्हें अपनी कमर पर 2 हाथ महसूस हुए और गांद पर एक चुभन सी हुई.

वो अच्छी तरह जानती थी के गांद पर उनको क्या चुभ रहा था. वो मुस्कुराती हुई उठकर सीधी हुई और सामने शीशे में देखा. ठाकुर पिछे खड़े हुए थे और कमर से ठकुराइन को पकड़ रखा था. अपनी गांद पर होती चुभन को महसूस करके सरिता देवी जानती थी के वो नीचे से नंगे थे.

"इसके अलावा और कुच्छ सूझता है आपको?" उन्होने मुस्कुराते हुए अपने पति से पुछा

"जिसके कमरे में इतनी खूबसूरत औरत झुकी खड़ी हो, उसको अगर और कुच्छ सूझ जाए तो लोग उसको नमार्द कहेंगे" ठाकुर ने मुस्कुराते हुए कहा

"नही नमार्द तो नही हो आप" ठकुराइन धीरे से हस्ते हुए बोली "इस बात की गवाही तो मैं दे सकती हूँ"

दोनो धीरे से हस पड़े और ठाकुर ने हाथ कमर पर रखे रखे उनकी नाइटी को उपेर उठना शुरू कर दिया.

दोनो शीशे के सामने खड़े थे और नज़र एक दूसरे की नज़र से मिला रखी थी. ठाकुर के लंड का दबाव उनकी गांद पर बढ़ गया था.

ठाकुर ने नाइटी को धीरे धीरे घुटनो के उपेर तक उठा दिया. अब उनकी नज़र ठकुराइन की नज़र से हटकर शीशे में उनकी टाँगो पर थी. खुद ठकुराइन भी उनकी नज़र का पीछा करते हुए अपनी टाँगो की तरफ ही देखने लगी थी. नाइटी धीरे धीरे जाँघो के उपेर आ गयी.

सरिता देवी ने एक नज़र शीशे में डाली. आगे वो और उनके पिछे खड़े ठाकुर जिनके दोनो हाथ उनकी नाइटी को उपेर खींच रहे थे. ठकुराइन की दोनो मासल जांघे खुली हुई थी और बड़ी बड़ी चूचियाँ भीगी हुई नाइटी से सॉफ झलक रही थी. और तब ये नज़र देखकर कई दिन बाद सरिता देवी को

वो महसूस हुआ जिसके लिए वो खुद भी तरस गयी थी.

उनकी चूत धीरे धीरे गीली हो रही थी.

पिच्छले कुच्छ दिन से ठकुराइन बिस्तर पर अपने आपको तैय्यार नही कर पाती थी. जबसे राजन ने उनके साथ बद-तमीज़ी की थी, ठाकुर को उन्हें चोदने से पहले अपने लंड पर तेल लगाना पड़ता था क्यूँ सरिता देवी की चूत बिल्कुल भी गीली नही होती थी और सूखी चूत में लंड घुसने पर उन्हें तकलीफ़ होती थी. आज महीनो बाद अपने आपको शीशे में यूँ नंगी होते देख वो उन्हें अपनी चूत में गीलापन महसूस हुआ.

नाइटी अब उनकी कमर के उपेर आ चुकी थी. ठकुराइन की सफेद रंग की पॅंटी के दोनो तरफ से बाल बाहर आ रहे थे. ठाकुर ने एक हाथ पॅंटी के उपेर से ही उनकी चूत पर फिराया और धीरे से बाल पकड़कर खींचे.

ठकुराइन के मुँह से ठंडी आह निकल पड़ी.

"जानती हूँ आपको पसंद नही" उन्होने धीरे से कहा "कल काट दूँगी"

ठाकुर ने जवाब में कुच्छ नही कहा. एक हाथ से उन्होने ठकुराइन की नाइटी को कमर पर पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ से पॅंट को पकड़कर नीचे खींचने लगे.

"इसको पाकड़ो" उन्होने ठकुराइन से कहा

ठकुराइन ने अपने दोनो हाथों से अपनी नाइटी कमर पर पकड़ ली. ठाकुर थोड़ा पिछे को हुए और ठकुराइन के पिछे अपने घुटनो पर नीचे बैठ गये. दोनो हाथों से उन्होने पॅंटी को पकड़ा और एक झटके से नीचे घुटनो तक खींच दिया.

ठकुराइन ने एक नज़र फिर अपने आप पर शीशे में डाली.

वो अपनी नाइटी को कमर तक पकड़े खड़ी थी. पॅंटी नीचे घुटनो में फसि हुई थी और बालों से धकि चूत सॉफ दिखाई दे रही थी. ठाकुर उनके पिछे घुटनो पर बैठे हुए थे. उनका चेहरा सरिता देवी की गांद के पिछे था इसलिए वो शीशे में नज़र तो नही आ रहे थे.

ठाकुर ने नीचे बैठे बैठे ठकुराइन की दोनो जाँघो को अपने हाथों से सहलाया और हाथ धीरे से उपेर लाते हुए उनकी गांद को पकड़ा.

"मस्त गांद है आपकी" पीछे से ठाकुर की आवाज़ आई.

सरिता देवी जानती थी के बिस्तर पर ठाकुर को इस तरह से बात करना बहुत पसंद था पर वो खुद चाहकर भी कभी इस तरह की बातें नही कर पाती थी. ठाकुर ने उनको कई बार उकसाया पर ठकुराइन कभी बेशर्मी से इस तरह की बातें नही कर पाई थी.

ठाकुर ने अपने हाथों से से ठकुराइन की गांद को दोनो तरफ से पकड़ा और खोला. एक हाथ नीचे से दोनो टाँगो के बीच आया और सरिता देवी की चूत को सहलाने लगा.

"आआहह" ठकुराइन के मुँह से आह निकल पड़ी

ठाकुर ने नीचे से दोनो टाँगो के बीचे अपना हाथ पूरी तरह घुसा दिया और सरिता देवी की चूत को बुरी तरह से रगड़ना शुरू कर दिया. उनके होंठ पिछे से ठकुराइन के गांद को चूम रहे थे.

और फिर जब ठाकुर की एक अंगुली ठकुराइन की चूत में घुसी तो महीनो बाद उनकी चूत से पानी छूट पड़ा.

"आआहह" ठकुराइन की आवाज़ तेज़ हो गयी "पूरी अंदर घुसाओ"

उनके कहते ही ठाकुर ने अपनी पूरी एक अंगुली चूत के अंदर घुसाई और तेज़ी से अंदर बाहर करने लगे. गीलापन अब सरिता देवी की चूत से उनकी जाँघो तक पहुँच चुका था. वो शीशे के सामने खड़ी नज़र बाँधे अपने आपको देखे जा रही थी. ठाकुर उनके पिछे बैठे थे इसलिए उनका सिर्फ़ हाथ ही सरिता देवी को नज़र आ रहा था जो उनकी चूत को बेदर्दी से मसल रहा था.

चूत में अंदर बाहर होती अंगुली बाहर आई और फिर पिछे को सरक कर ठकुराइन की गांद पे जा लगी.

वो जानती थी के ठाकुर क्या करने वाले हैं. शादी के बाद से ही ठाकुर ने कई बार उनकी गांद मारने की कोशिश की थी पर ठकुराइन ने कभी ऐसा करने नही दिया. जब भी ठाकुर उनकी गांद मारने की बात करते, वो हर बार टाल जाती थी. उन्हें लगता था के अगर एक अंगुली के घुसने से ही इतना दर्द होता है तो पूरा लंड घुसने पर क्या होगा?

चूत के पानी में भीगी अंगुली ने धीरे से उनकी गांद में घुसने की कोशिश की और थोड़ी से अंदर हो गयी.

"ऊऊओह मर गयी !!!!" सरिता देवी के मुँह से आवाज़ निकली.

वो जानती थी के अगर उन्होने ठाकुर को नही रोका तो ये अंगुली थोड़ी ही देर बाद पूरी गांद के अंदर होगी और फिर दूसरी अंगुली जाएगी और उसके बाद लंड घुसने की कोशिश. फिर वही गांद मारने देने की ज़िद.

ठकुराइन फ़ौरन पलटी और ठाकुर की तरफ मुँह करके खड़ी हो गयी. अब उनकी चूत सीधा ठाकुर के चेहरे की तरफ थी.

सरिता देवी ने नीचे बैठे ठाकुर की तरफ देखा और ठाकुर ने उपेर को उनकी तरफ. सरिता देवी अब भी अपनी नाइटी अपनी कमर पर पकड़े खड़ी थी और पॅंटी अब भी घुटनो में फसि हुई थी. ठाकुर ने एक पल उनसे नज़र मिलाई और फिर आगे बढ़कर अपने होंठ उनकी चूत पर रख दिए.

"आआआअहह" ठकुराइन के मुँह से इतनी ज़ोर से आवाज़ निकली के उन्हें लगा के कोई बाहर सुन ना ले. नीचे ठाकुर ने अपने दोनो होंठ उनकी चूत से मिला दिए और ज़ोर ज़ोर से घिसने लगे. वो अपने होंठ उनकी चूत पर ज़ोर ज़ोर से रगड़ रहे थे और ठकुराइन के दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी.

ठाकुर एक पल को पिछे हुए और घुटनो में फसि हुई पॅंटी को पूरी तरह से उतारकर कमरे में एक तरफ उच्छाल दिया. अब ठकुराइन कमर के नीचे पूरी तरह से नंगी खड़ी थी.

सरिता देवी ने अब भी अपनी नाइटी कमर पर पकड़ रखी थी और चूत ठाकुर के चेहरे के ठीक सामने खुली हुई थी. वो एक पल को रुके और चूत को गौर से देखने लगे.

"क्या हुआ?" बेसबर होती सरिता देवी ने पुछा

"देख रहा हूँ" ठाकुर ने जवाब दिया

"क्या?"

"यही के आज पहली बार आपकी चूत पूरे बालों के साथ देखी है और सच कहूँ तो बालों के साथ और भी अच्छी लग रही है" ठाकुर मुस्कुराते हुए बोला और एक हाथ से चूत को धीरे से सहलाया.

ठकुराइन से बर्दाश्त नही हुआ और एक हाथ से उन्होने ठाकुर के सर को पकड़ कर अपनी चूत की तरफ खींचा. दूसरे हाथ से उन्होने नाइटी को अच्छे से समेट कर अपनी कमर पर पकड़ लिया ताकि वो नीचे ना गिरे.

"क्या हुआ?" जब ठकुराइन ने ठाकुर के सर को आगे को खींचा तो ठाकुर ने पुछा

"करो ना" सरिता देवी बोली

"क्या करूँ?" ठाकुर ने शरारती तरीके से मुस्कुराते हुए पुछा

ठकुराइन जानती थी के वो क्या सुनना चाह रहे थे.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --19

gataank se aage........................

Car ki battery se tezaab nikal kar ek glass mein dala ja chuka tha. Vahin khade police wale khamoshi se ye tamasha dekh rahe the.

"Iski aankhen kholo" Thakur ne apne aadmiyon ko ishara kiya. 2 aadmi aage badhe aur zabardasti Rajan ko pakadkar uski sooji hui aankhen kholi. Sarita Devi aage badhkar Rajan ke kareeb aayi aur uski aankhon mein aankhen daalkar dekha.

"Dekh mujhe Rajan" Unhone halka sa jhukte hue kaha.

Rajan ki aankhon mein khauff unhen saaf dikhai de raha tha. Vo darr jaise unke zakhm par malham ka kaam kar tha. Kaleja jaise thanda ho gaya.

Thodi hi der baad Rajan ki dard bhari cheekhen haweli mein goonj uthi. Glass se tezaab khali ho gaya tha aur Rajan ki zubaan kati hui zameen par padi thi.

3 din ki jaagi Sarita Devi ko us raat bahut aaram ki neend aayi.

2 mahine guzar gaye par Sarita Devi us raat ko bhool nahi paayi. Bhale hi unhone Rajan se apna badla poora kar liya tha par Rajan ki kahi baat sach ho rahi thi. Unka din raat ka sukoon ud gaya tha. Har pal dimag mein vahi lamha ghoomta rehta tha jab vo 7 ajnabi aadmiyon ke beech nangi bethi lund choos rahi thi. Raat ko soti toh vahi pal baar baar sapne mein aata.

Us raat ke baad Thakur ke saath bistar par bhi vo poora saath nahi de paati thi. Patni hone ke naate apne pati ko rok toh nahi paati thi par bistar par jis tarah se vo pehle poori tarah Thakur ke saath hoti thi ab vo baat nahi rahi thi. Kapde utarte hi unhein aisa lagta ke ab bhi aas paas khade kai log unhen nangi dekh rahe hain, apne pati se chudwate hue dekh rahe hain.

Aur sabse mushkil ho gaya tha us ladke ke saamne jana. Usko andekha vo kar nahi sakti thi, vo namumkin tha par jab bhi vo saamne aata, vo sharam se nazar neeche jhuka leti thi. Us ladke ke saath unke rishte mein ek aisa badlaav aa gaya tha jiski unhone kabhi kalpna bhi nahi ki thi. Kabhi unhone socha bhi nahi tha ke kamre se nikalne se pehle ye dua karengi ke vo ladka unke saamne na aaye.

Us raat ke baad unki kabhi usse baat nahi hui. Na hi ladke ne unse baat karne ki koshish ki, bas usko kuchh chahiye hota toh vo maang leta tha.

Sarita Devi ko darr tha ke kahin Thakur sahab se darr ke maare keh na de ke Rajan ne Thakurain se kya karaya tha par vo usne poora unka saath diya. Badnami aur apne pati ki nazar mein gir jaane ke darr se unhone kisi se kuchh nahi kaha toh ladke ne bhi kisi se kuchh nahi kaha.

Waqt yun hi guzarta raha aur Thakurain dheere dheere apni zindagi ki taraf vaapis jaane lagi. Us raat ki yaad aati toh ab bhi thi par ab bas aake guzar jaati thi. Us raat se juda gussa aur dard dheere dheere kam ho raha tha.

Aur phir kuchh aisa hua ke har yaad taza ho gayi.

Us raat Thakurain nahakar kamre se nikli thi. Garmi ke din the aur raat ko nahaye bina unhen neend nahi aati thi. Vo apni nighty pehne bathroom se bahar nikli aur sheeshe ke saamne khadi hokar baal sukhane lagi. Laal rang ki nighty mein Sarita Devi ka gora rang aur bhi ubharkar saamne aa raha tha.

Geele baalon se girte pani ne Nighty ko uper se geela kar diya tha jiski vajah se Thakurain ke nipples saaf dikhai de rahe the. Vo raat ko kabhi bhi bra pehenkar nahi soti thi.

Baal jhaadte jhaadte unke haath mein pakdi kanghi chhut kar zameen par ja giri. Thakurain usko uthane ke liye neeche ko jhuki hi thi ke unhen apni kamar par 2 haath mehsoos hue aur gaand par ek chubhan si hui.

Vo achhi tarah janti thi ke gaand par unko kya chubh raha tha. Vo muskurati hui uthkar seedi hui aur saamne sheeshe mein dekha. Thakur pichhe khade hue the aur kamar se Thakurain ko pakad rakha tha. Apni gaand par hoti chubhan ko mehsoos karke Sarita Devi jaanti thi ke vo niche se nange the.

"Iske alawa aur kuchh soojhta hai aapko?" Unhone muskurate hue apne pati se puchha

"Jiske kamre mein itni khoobsurat aurat jhuki khadi ho, usko agar aur kuchh soojh jaaye toh log usko namard kahenge" Thakur ne muskurate hue kaha

"Nahi namard toh nahi ho aap" Thakurain dheere se haste hue boli "Is baat ki gawahi toh main de sakti hoon"

Dono dheere se has pade aur Thakur ne haath kamar par rakhe rakhe unki nighty ko uper uthana shuru kar diya.

Dono sheeshe ke saamne khade the aur nazar ek doosre ki nazar se mila rakhi thi. Thkaur ke lund ka dabaav unki gaand par badh gaya tha.

Thakur ne nighty ko dheere dheere ghutno ke uper tak utha diya. Ab unki nazar thakurain ki nazar se hatkar sheeshe mein unki taango par thi. Khud Thakurain bhi unki nazar ka pichha karte hue apni taango ki taraf hi dekhne lagi thi. Nighty dheere dheere jaangho ke uper aa gayi.

Sarita Devi ne ek nazar sheeshe mein daali. Aage vo aur unke pichhe khade thakur jinke dono haath unki nighty ko uper khinch rahe the. Thakurain ki dono maasal jaanghe khuli hui thi aur badi badi chhatiyan bheegi hui nighty se saaf jhalak rahi thi. Aur tab ye nazar dekhkar kai din baad sarita devi ko

vo mehsoos hua jiske liye vo khud bhi taras gayi thi.

Unki choot dheere dheere geeli ho rahi thi.

Pichhle kuchh din se Thakurain bistar par apne aapko taiyyar nahi kar pati thi. Jabse Rajan ne unke saath bad-tamizi ki thi, Thakur ko unhen chodne se pehle apne lund par tel lagana padta tha kyun Sarita Devi ki choot bilkul bhi geeli nahi hoti thi aur sookhi choot mein lund ghusane par unhen takleef hoti thi. Aaj mahino baad apne aapko sheeshe mein yun nangi hote dekh vo unhen apni choot mein geelapan mehsoos hua.

Nighty ab unki kamar ke uper aa chuki thi. Thakurain ki safed rang ki panty ke dono taraf se baal bahar aa rahe the. Thakur ne ek haath panty ke uper se hi unki choot par phiraya aur dheere se baal pakadkar khinche.

Thakurain ke munh se thandi aah nikal padi.

"Jaanti hoon aapko pasand nahi" Unhone dheere se kaha "Kal kaat doongi"

Thakur ne jawab mein kuchh nahi kaha. Ek haath se unhone thakurain ki nighty ko kamar par pakda hua tha aur doosre haath se pant ko pakdkar neeche khinchne lage.

"Isko pakdo" Unhone thakurain se kaha

Thakurain ne apne dono haathon se apni nighty kamar par pakad li. Thakur thoda pichhe ko hue aur thakurain ke pichhe apne ghutno par neeche beth gaye. Dono haathon se unhone panty ko pakda aur ek jhatke se neeche ghutno tak khinch diya.

Thakurain ne ek nazar phir apne aap par shishe mein daali.

Vo apni nighty ko kamar tak pakde khadi thi. Panty neeche ghutno mein phasi hui thi aur baalon se dhaki choot saaf dikhai de rahi thi. Thakur unke pichhe ghutno par bethe hue the. Unka chehra Sarita Devi ki gaand ke pichhe tha isliye vo sheeshe mein nazar toh nahi aa rahe the.

Thakur ne niche bethe bethe thakurain ki dono jaangho ko apne haathon se sehlaya aur haath dheere se uper laate hue unki gaand ko pakda.

"Mast gaand hai aapki" Pichhe se thakur ki aawaz aayi.

Sarita Devi jaanti thi ke bistar par Thakur ko is tarah se baat karna bahut pasand tha par vo khud chahkar bhi kabhi is tarah ki baaten nahi kar paati thi. Thakur ne unko kai baar uksaya par thakurain kabhi besharmi se is tarah ki baaten nahi kar paayi thi.

Thakur ne apne haathon se se thakurain ki gaand ko dono taraf se pakda aur khola. Ek haath niche se dono taango ke beech aaya aur sarita devi ki choot ko sehlane laga.

"Aaaahhhhhhh" Thakurain ke munh se aah nikal padi

Thakur ne niche se dono taango ke beeche apna haath poori tarah ghusa diya aur sarita devi ki choot ko buri tarah se ragadna shuru kar diya. Unke honth pichhe se thakurain ke gaand ko choom rahe the.

Aur phir jab thakur ki ek anguli thakurain ki choot mein ghusi toh mahino baad unki choot se pani chhot pada.

"Aaaahhhhhhh" Thakurain ki aawaz tez ho gayi "Poori andar ghusao"

Unke kehte hi thakur ne apni poori ek anguli choot ke andar ghusayi aur tezi se andar bahar karne lage. Geelapan ab sarita Devi ki choot se unki jaangho tak pahunch chuka tha. Vo sheeshe ke saamne khadi nazar baandhe apne aapko dekhe ja rahi thi. Thakur unke pichhe bethe hi isliye unka sirf haath hi Sarita Devi ko nazar aa raha tha jo unki choot ko bedardi se masal raha tha.

Choot mein andar bahar hoti anguli bahar aayi aur phir pichhe ko sarak kar Thakurain ki gaand pe ja lagi.

Vo jaanti thi ke Thakur kya karne wale hain. Shaadi ke baad se hi Thakur ne kai baar unki gaand maarne ki koshish ki thi par Thakurain ne kabhi aisa karne nahi diya. Jab bhi Thakur unki gaand maarne ki baat karte, vo har baar taal jaati thi. Unhen lagta tha ke agar ek anguli ke ghusne se hi itna dard hota hai toh poora lund ghusne par kya hoga?

Choot ke pani mein bheegi anguli ne dheere se unki gaand mein ghusne ki koshish ki aur thodi se andar ho gayi.

"Ooooohhhh mar gayi !!!!" Sarita Devi ke munh se aawaz nikli.

Vo jaanthi thi ke agar unhone thakur ko nahi roka toh ye anguli thodi hi der baad poori gaand ke andar hogi aur phir doosri anguli jaayegi aur uske baad lund ghusane ki koshish. Phir vahi gaand maarne dene ki zid.

Thakurain fauran palti aur thakur ki taraf munh karke khadi ho gayi. Ab unki choot sidha thakur ke chehre ki taraf thi.

sarita Devi ne neeche bethe Thakur ki taraf dekha aur thakur ne uper ko unki taraf. Sarita Devi ab bhi apni nighty apni kamar par pakde khadi thi aur panty ab bhi ghutno mein phasi hui thi. Thakur ne ek pal unse nazar milayi aur phir aage badhkar apne honth unki choot par rakh diye.

"Aaaaaaahhhhhhhhh" Thakurain ke munh se itni zor se aawaz nikli ke unhen laga ke koi bahar sun na le. Neeche thakur ne apne dono honth unki choot se mila diye aur zor zor se ghisne lage. Vo apne honth unki choot par zor zor se ragad rahe the aur thakurain ke dil ki dhadkan tez hoti ja rahi thi.

Thakur ek pal ko pichhe hue aur ghutno mein phasi hui panty ko poori tarah se utarkar kamre mein ek taraf uchhaal diya. Ab thakurain kamar ke niche poori tarah se nangi khadi thi.

Sarita Devi ne ab bhi apni nighty kamar par pakad rakhi thi aur choot Thakur ke chehre ke theek saamne khuli hui thi. Vo ek pal ko ruke aur choot ko gaur se dekhne lage.

"Kya hua?" Besabar hoti Sarita Devi ne puchha

"Dekh raha hoon" Thakur ne jawab diya

"Kya?"

"Yahi ke aaj pehli baar aapki choot poore baalon ke saath dekhi hai aur sach kahun toh baalon ke saath aur bhi achhi lag rahi hai" Thakur muskurate hue bola aur ek haath se choot ko dheere se sehlaya.

Thakurain se bardasht nahi hua aur ek haath se unhone thakur ke sar ko pakad kar apni choot ki taraf khincha. Doosre haath se unhone nighty ko achhe se samet kar apni kamar par pakad liya taaki vo niche na gire.

"Kya hua?" Jab thakurain ne thakur ke sar ko aage ko khincha toh thakur ne puchha

"Karo na" Sarita Devi boli

"Kya karun?" Thakur ne shararti tarike se muskurate hue puchha

Thakurain jaanti thi ke vo kya sunna chah rahe the.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:10

खूनी हवेली की वासना पार्ट --20

गतान्क से आगे........................

"जो कर रहे हो वही करो" वो थोड़ी नाराज़गी से बोली "अब रुका नही जा रहा"

"पहले कहो के मेरी चूत चॅटो, तब करूँगा" ठाकुर ने ज़िद पर आदते हुए कहा

सरिता देवी जानती थी के वो ऐसे नही मानेंगे इसलिए वो खुद ही थोड़ा आगे हुई और अपनी चूत ठाकुर के होंठों पर लगा दी.

"आआहह !!! अब करो भी" उन्होने आहें भरते हुए कहा

ठाकुर ने भी आगे ज़िद करना ठीक नही समझा और अपने होठ फिर चूत पर रगड़ने लगे. अचानक सरिता देवी के दिल में एक ख्याल आया और ठाकुर के सर को अपने टाँगो के बीच पकड़े पकड़े ही वो गोल घूमी और अपना चेहरा शीशे के सामने कर लिया.

अब वो शीशे की तरफ मुँह किए खड़ी थी और अपने आपको देख सकती थी. ठाकुर का मुँह उनकी टाँगो के बीच उनकी तरफ था और पीठ शीशे की और. ठाकुर शीशे में सॉफ सॉफ देख सकती थी के ठाकुर किस तरह से उनकी चूत चाट रहे थे.

इस तरह ठकुराइन के घूमने से ठाकुर ने अपना मुँह चूत से हटाकर उपेर की तरफ देखा, फिर पिछे शीशे की तरफ देखा और मुस्कुरा उठे.

"देखने के दिल कर रहा है?" उन्होने पुछा

ठकुराइन ने मुस्कुराते हुए हां में सर हिला दिया.

ठाकुर ने एक बार फिर अपने होंठ चूत पर रखे पर इस बार उनकी ज़ुबान चूत के होंठ खोलती हुई अंदर जा लगी.

"ओह !!!!" जीभ को अपनी चूत के अंदर महसूस करते ही ठकुराइन का मज़ा दोगुना हो गया. ठाकुर ने उनकी दोनो जाँघो को पकड़ा और टाँगो को अच्छी तरह से फेला दिया ताकि चूत नीचे से पूरी तरह खुल जाए.

अपने आपको इस तरह आज ठकुराइन पहली बार देख रही थी. अजीब नज़ारा था शीशे में. वो अपनी नाइटी कमर पर पकड़े दोनो टाँगो को फेलाए खड़ी थी और ठाकुर टाँगो के बीचे ज़मीन पर बैठे चूत चाट रहे थे. उनकी जीभ कभी चूत को बाहरी तरफ से सहलाती तो कभी अंदर घुसाने की कोशिश करती. एक हाथ से ठाकुर ने सरिता देवी की जाँघ को पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से उनकी गांद सहला रहे थे.

ठकुराइन को एहसास भी नही हुआ के कब खड़े खड़े ही उन्होने अपनी गांद हिलानी शुरू कर दी. उनकी कमर आगे पिछे को हिलने लगी और वो खुद भी अपनी चूत को नीचे बैठे अपनी पति के मुँह पर रगड़ने लगी. ठाकुर ने दोनो हाथों से उनकी गांद को पकड़ लिया और उनकी हिलती कमर को और ज़ोर से हिलाने लगी.

"आपकी जीभ ....... आपकी जीभ .... अंदर ... अंदर... और अंदर" उखड़ती हुई सांसो के बीच सरिता देवी बड़ी मुश्किल से इतना कह पाई.

ठाकुर के लिए इतना ही इशारा काफ़ी था. उन्होने अपनी जीभ को जितना हो सका ठकुराइन की चूत के अंदर कर दिया. सरिता देवी ने भी चूत के अंदर जीभ जाते ही अपनी कमर को और ज़ोर से हिलाना शुरू कर दिया. जैसे कोई औरत लंड चूत में लेकर अपनी कमर हिला रही हो, ठीक वैसे ही ठकुराइन ने अपनी के धक्के ठाकुर के मुँह पर मारने शुरू कर दिए.

"ऐसे ही.... ऐसे ही ... हां बस बस ... ऐसे ही ... ज़ोर से .. ऊऊहह .... हन आअष्ह" ठकुराइन की साँस उखाड़ने लगी, कमर और ज़ोर से हिलने लगी और वो जानती थी अब किसी भी पल उनकी चूत से पानी निकलने ही वाला था.

और तभी उन्हें वो खिड़की पर खड़ा दिखाई दिया.

ठकुराइन की पीठ कमरे में बनी उस खिड़की की तरफ थी जो हवेली के पिछे की तरफ खुलती थी. आम तौर पर वो खिड़की हमेशा ही बंद रहती थी पर आज गर्मी होने की वजह से खुली हुई थी. खिड़की पर परदा गिरा हुआ था इसलिए ना उन्हें ये ध्यान रहा के पर्दे के पिछे खिड़की खुली हुई है और ना ही ठाकुर को.

ठकुराइन का चेहरा शीशे की तरफ था और शीशे में उन्हें अपने पिछे खिड़की नज़र आ रही थी. परदा थोड़ा सा खिसका हुआ था और पर्दे के पिछे से वो लड़का अंदर झाँक रहा था. ठाकुर का मुँह ठकुराइन की टाँगो के बीच घुसा हुआ था इसलिए वो लड़का उन्हें नज़र नही आ सकता था.

सरिता देवी के मुँह से चीख निकलते निकलते रह गयी. वो एक पल के लिए हिली और ठाकुर को अपनी टाँगो से हटाने की कोशिश सी की. ठाकुर को लगा के वो मज़ा आने के कारण ऐसा कर रही हैं इसलिए इसका नतीजा ये हुआ के उन्होने और ज़ोर से चूत चाटनी शुरू कर दी.

वो ठाकुर को हटाकर उन्हें खिड़की के बारे में बताने ही वाली थी के रुक गयी. ठाकुर को अगर वो बता दें के खिड़की से खड़ा कौन देख रहा है तो वो उस लड़के को जान से मार देंगे, ये भी नही सोचेंगे को वो ठाकुर का अपना क्या लगता है.

ठकुराइन अजीब दुविधा में पड़ गयी. वो लड़का बेशर्मी से खिड़की पर खड़ा उनकी तरफ देख रहा था. देख रहा था के वो अपने कमरे में अपने पति के साथ क्या कर रही है. रिश्तों की हर मर्यादा को भूल कर वो अंदर झाँक रहा था, बिना ये सोचे के ठाकुर और ठकुराइन उसके अपने क्या लगते हैं.

इस सबके बीच ठकुराइन ये भूल ही गयी के वो अब भी नाइटी कमर पर पकड़े खड़ी थी और नीचे से पूरी तरह नंगी थी. यानी वो लड़का आराम से खिड़की पर खड़ा इतनी देर से उनकी गांद देख रहा था.

और जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ तो इस बार चीख नही रुकी.

ठकुराइन ने फ़ौरन अपनी नाइटी नीचे गिराई और पिछे को होकर खड़ी हो गयी. उन्होने खिड़की की तरफ देखा और ठीक उसी पल एक लम्हे के लिए उनकी नज़र उस लड़के से जा मिली.

"क्या हुआ?" ठाकुर ने नज़र उपेर करके पुछा. ठकुराइन ने उन्हें धक्का सा देकर अपने से दूर कर दिया था और नाइटी नीचे कर ली थी.

"वो, वो" सरिता देवी ने कुच्छ कहने की कोशिश की और नज़र खिड़की की तरफ घुमाई.

वो लड़का जा चुका था.

"खिड़की खुली हुई है" उन्होने ठाकुर से कहा "वो तो बंद कर दो पहले"

उस रात वाले इन्सिडेंट को 2 दिन चुके थे. सरिता देवी अब जानकर उस लड़के के सामने नही आती थी. वो 2 बार उन्हें नंगी देख चुका था, एक बार उनकी मर्ज़ी के खिलाफ ज़बरदस्ती पर दूसरी बार उनके कमरे में उन्हें अपने पति के साथ और ये बात उन्हें बहुत परेशान कर रही थी. वो चाह कर भी ना तो उसे खुद कुच्छ कह पाई और ना ही ठाकुर साहब से इसका ज़िक्र कर पाई.

दोपहर का वक़्त था. ठकुराइन अपने कमरे में लेटी एक किताब पढ़ रही थी. हवेली में उस वक़्त कोई नही था सिवाय उनके और कुच्छ नौकरों के. अपनी ही धुन में किताब पढ़ती सरिता देवी को जाने क्यूँ ऐसा लगा के कोई उन्हें

देख रहा है. एक नज़र उन्होने दरवाज़े पर डाली पर वो बंद था.

उनकी नज़र कमरे में लगे शीशे पर पड़ी और उन्हें फिर वो खिड़की पर खड़ा नज़र आया. वो खामोशी से वहाँ खड़ा ठकुराइन को देख रहा था.वो थोड़ा च्छुपकर खड़ा था ताकि ठकुराइन की सीधी नज़र उसपर ना पड़े पर कमरे में लगे शीशे में वो सॉफ दिखाई दे रहा है.

और इसके साथ ही ठकुराइन को ये भी नज़र आया के वो उन्हें क्यूँ देख रहा था. उन्होने एक सारी पहेन रखी थी जिसका उन्हें ख्याल ही नही था क्यूंकी वो कमरे में अकेली लेटी थी. उनकी सारी का पल्लू एक तरफ गिरा हुआ था और

सफेद रंग के ब्लाउस में उनकी छातियाँ जैसे कमरे की छत को च्छुने की कोशिश करती उपेर नीचे हो रही थी.

उन्होने अपनी एक टाँग मोड़ रखी थी जिसकी वजह से सारी खिसक कर घुटनो तक चढ़ि हुई थी.

और फिर ठकुराइन को तीसरी बात का अंदाज़ा हुआ. खिड़की पर खड़े हुआ उसका एक कंधा धीरे धीरे हिल रहा था, जो शायद उसका हाथ हिलने की वजह से था और उन्हें समझने में एक पल नही लगा के वो क्या कर रहा था.

वो उन्हें इस हालत में देख कर अपना लंड हिला रहा था.

ठकुराइन का गुस्सा पल में फ़ौरन आसमान छुने लगा. उन्होने उठकर उसको डाँटने की सोची ही थी के गुस्सा जिस तरफ चढ़ा था, एक पल में वैसे ही उतर गया और एक अजीब से एहसास ने गुस्से की जगह ले ली.

ये उनकी ज़िंदगी में पहली बार था के कोई उन्हें ऐसे चुपके चुपके देखकर अपना हिला रहा था और कहीं उनके दिल में ऐसा होता देख कर गुदगुदी सी होने लगी. वो खुद जानती थी के ये कितना ग़लत था और वो लड़का उनका क्या लगता

था पर ग़लत सही का ख्याल उस वक़्त जैसे एक तरफ हो गया.

जैसे एक नशे की सी हालत में ठकुराइन वैसे ही लेटी रही और खामोशी से शीशे में देखती रही. इस बात से अंजान के ठकुराइन ने उसको देख लिया है, वो लड़का खिड़की पर खड़ा अपना हिलाता रहा.

धीरे धीरे ठकुराइन का जिस्म गरम सा होने लगा और उनकी हैरत का कोई ठिकाना ना रहा. कहाँ तो वो 2 महीने से अपने पति से चुदवाते हुए भी गरम नही होती थी और कहाँ इस लड़के को यूँ झाँकता देखकर 2 पल में गरम हो गयी.

और फिर उनके दिल में भी शरम और हया की जगह वासना ने ले ली. उन्होने वो किया जो उनके अंदर की एक शरीफ औरत ने कभी नही किया था. धीरे से अब भी किताब पढ़ने का नाटक करते हुए उन्होने अपनी दूसरी टाँग भी मोड़

ली.

वो सीधी अपनी पीठ पर लेटी हुई थी और किताब सामने हाथों में पकड़ी हुई थी. एक टाँग उनकी पहली ही मूडी हुई थी और फिर दूसरी टाँग मोदती ही जो सारी पहले घुटने पर अटकी हुई थी अब सरक्ति हुई उनके पेट पर आ गिरी और

उनकी दोनो जांघे नंगी हो गयी.

और ये शायद उस लड़के के लिए काफ़ी ज़्यादा हो गया. उसका हाथ कुच्छ पल तेज़ी से हिला और फिर रुक गया. आँखें बंद किए उसने कुच्छ पल लंबी लंबी साँस ली और फिर एक झटके से खिड़की से हट गया.

ठकुराइन समझ गयी के उसका निकल गया था पर खुद अंदर ही अंदर वो बुरी तरह से गरम हो चुकी थी. लड़के के जाते ही फिर से वासना की जगह शरम ने ले ली और ठकुराइन को बहुत बुरा लगा के वो उस लड़के को यूँ अपना शरीर दिखा रही थी. वो लड़का जो की उनका खुद का .....

"हे भगवान !" ठकुराइन ने खुद से कहा और अपनी सारी फिर से ठीक कर ली.

उस रात जब ठाकुर ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया तो जैसे वासना का एक तूफान सा छूट पड़ा. दोपहर की गरम ठकुराइन फ़ौरन उनपर चढ़ पड़ी.

"अर्रे अर्रे "ठाकुर ने हैरत से कहा "क्या हो गया"

ठकुराइन ने कुच्छ नही कहा और उनका कुर्ता उतारने लगी

"क्या बात है" ठाकुर ने अपने हाथ उपेर किए और कुर्ता गिर जाने दिया "आज बड़े मूड में हो"

ठकुराइन ने फिर कोई जवाब नही दिया और फ़ौरन ठाकुर के सामने अपने घुटनो पर बैठ गयी. जबसे दोपहर को उन्होने उस लड़के को उन झाँकते हुए देखा था, उनके शरीर में जैसे आग सी लगी हुई थी जिसको वो जल्द से जल्द

ठंडा कर लेना चाहती थी.

उन्होने ठाकुर के पाजामे का नाडा खोला और ढीला करके नीचे खींचा. कुच्छ ही पल बाद ठाकुर कमरे में पूरे नंगे खड़े थे और ठकुराइन उनके सामने ज़मीन पर बैठी हुई थी. उन्होने धीरे से ठाकुर का लंड अपने हाथ में लिया.

"आअहह" लंड ठकुराइन के हाथ में आते ही ठाकुर के मुँह से आह निकल पड़ी

ठकुराइन ने लंड को अपने हाथ में पकड़कर थोड़ी देर हिलाया. लंड बैठा हुआ था पर ठकुराइन के हाथ में आते ही धीरे धीरे खड़ा होने लगा. ठकुराइन ने अपना मुँह खोला और जीभ निकल कर लंड के उपेर फिराने लगी.

"आपकी इस बात पे तो मैं फिदा हूँ" ठाकुर ने कहा "मस्त लंड चूस्ति हो आप"

ठाकुर थोड़ी देर तक अपनी जीभ को लंड पर उपेर नीचे फिरती रही. लंड अब तन कर पूरी तरह खड़ा हो चुका था और मुश्किल से ठकुराइन के हाथ में समा रहा था. ठकुराइन ने अपना मुँह जितना हो सका खोला और लंड को

अपने मुँह में भर लिया.

"पूरा लो" ठाकुर ने कहा "पूरा चूसो"

ठकुराइन ने लंड को थोड़े देर अपने मुँह में अंदर बाहर किया और पूरी तरह से गीला कर दिया. इस वक़्त उनको लंड चूसने से ज़्यादा दिलचस्पी छुड़वाने में थे. उनकी छूट में एक आग सी लगी हुई थी जिसको वो जल्दी से जल्दी बुझा लेना चाहती ही.

लंड को एक बार फिर अपने मुँह में लेकर उन्होने अच्छे से अपनी जीभ उसपर फिराई और उठकर खड़ी हो गयी.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --20

gataank se aage........................

"Jo kar rahe ho vahi karo" Vo thodi narazgi se boli "Ab ruka nahi ja raha"

"Pehle kaho ke meri choot chaato, tab karunga" Thakur ne zid par adte hue kaha

Sarita Devi jaanti thi ke vo aise nahi maanenge isliye vo khud hi thoda aage hui aur apni choot thakur ke honthon par laga di.

"Aaaahhhhh !!! ab Karo bhi" Unhone aahen bharte hue kaha

Thakur ne bhi aage zid karna theek nahi samjha aur apne hoth phir choot par ragadne lage. Achanak Sarita Devi ke dil mein ek khyaal aaya aur thakur ke sar ko apne taango ke beech pakde pakde hi vo gol ghoomi aur apna chehra sheeshe ke saamne kar liya.

Ab vo sheeshe ki taraf munh kiye khadi thi aur apne aapko dekh sakti thi. Thakur ka munh unki taango ke beech unki taraf tha aur peeth sheeshe ki aur. Thakur sheeshe mein saaf saaf dekh sakti thi ke Thakur kis tarah se unki choot chaat rahe the.

Is tarah thakurain ke ghoomne se thakur ne apna munh choot se hatakar uper ki taraf dekha, phir pichhe sheeshe ki taraf dekha aur muskura uthe.

"Dekhne ke dil kar raha hai?" Unhone puchha

Thakurain ne muskurate hue haan mein sar hila diya.

Thakur ne ek baar phir apne honth choot par rakhe par is baar unki zubaan choot ke honth kholti hui andar ja lagi.

"Ohhhhhhhhhhh !!!!" Jeebh ko apni choot ke andar mehsoos karte hi thakurain ka maza doguna ho gaya. Thakur ne unki dono jaangho ko pakda aur taango ko achhi tarah se phela diya taaki choot niche se poori tarah khul jaaye.

Apne aapko is tarah aaj Thakurain pehli baar dekh rahi thi. Ajeeb nazara tha sheeshe mein. Vo apni nighty kamar par pakde dono taango ko phelaye khadi thi aur thakur taango ke beeche zameen par bethe choot chaat rahe the. Unki jeebh kabhi choot ko baahri taraf se sehlati toh kabhi andar ghusne ki koshish karti. Ek haath se thakur ne sarita devi ki jaangh ko pakad rakha tha aur doosre haath se unki gaand sahlaa rahe the.

Thakurain ko ehsaas bhi nahi hua ke kab khade khade hi unhone apni gaand hilane shuru kar di. Unki kamar aage pichhe ko hilne lagi aur vo khud bhi apni choot ko niche bethe apni pati ke munh par ragadne lagi. Thakur ne dono haathon se unki gaand ko pakad liya aur unki hilti kamar ko aur zor se hilane lagi.

"Aapki jeebh ....... aapki jeebh .... andar ... andar... aur andar" Ukhadti hui saanso ke beech Sarita Devi badi mushkil se itna keh paayi.

Thakur ke liye itna hi ishara kaafi tha. Unhone apni jeebh ko jitna ho saka Thakurain ki choot ke andar kar diya. Sarita Devi ne bhi choot ke andar jeebh jaate hi apni kamar ko aur zor se hilana shuru kar diya. Jaise koi aurat lund choot mein lekar apni kamar hila rahi ho, theek vaise hi thakurain ne apni ke dhakke thakur ke munh par maarne shuru kar diye.

"Aise hi.... aise hi ... haan bas bas ... aise hi ... zor se .. oooohhh .... haan aaashhhhhh" Thakurain ki saans ukhadne lagi, kamar aur zor se hilne lagi aur vo jaanti thi ab kisi bhi pal unki choot se paani nikalne hi wala tha.

Aur tabhi unhen vo khidki par khada dikhai diya.

Thakurain ki peeth kamre mein bani us khidki ki taraf thi jo haweli ke pichhe ki taraf khulti thi. Aam taur par vo khidki hamesha hi band rehti thi par aaj garmi hone ki vajah se khuli hui thi. Khidki par parda gira hua tha isliye na unhen ye dhyaan raha ke parde ke pichhe khidki khuli hui hai aur na hi thakur ko.

Thakurain ka chehra sheeshe ki taraf tha aur sheeshe mein unhen apne pichhe khidki nazar aa rahi thi. Parda thoda sa khiska hua tha aur parde ke pichhe se vo ladka andar jhaank raha tha. Thakur ka munh Thakurain ki taango ke beech ghusa hua tha isliye vo ladka unhen nazar nahi aa sakta tha.

Sarita Devi ke munh se cheekh nikalte nikalte reh gayi. vo ek pal ke liye hili aur thakur ko apni taango se hatane ki koshish si ki. Thakur ko laga ke vo maza aane ke kaaran aisa kar rahi hain isliye iska nateeja ye hua ke unhone aur zor se choot chaatini shuru kar di.

Vo Thakur ko hatakar unhen khidki ke baare mein batane hi wali thi ke ruk gayi. Thakur ko agar vo bata den ke khidki se khada kaun dekh raha hai toh vo us ladke ko jaan se maar denge, ye bhi nahi sochenge ko vo thakur ka apna kya lagta hai.

Thakurain ajeeb duvidha mein pad gayi. Vo ladka besharmi se khidki par khada unki taraf dekh raha tha. Dekh raha tha ke vo apne kamre mein apne pati ke saath kya kar rahi hai. Rishton ki har maryada ko bhool kar vo andar jhaank raha tha, bina ye soche ke thakur aur thakurain uske apne kya lagte hain.

Is sabke beech thakurain ye bhool hi gayi ke vo ab bhi nighty kamar par pakde khadi thi aur neeche se poori tarah nangi thi. Yaani vo ladka aaram se khidki par khada itni der se unki gaand dekh raha tha.

Aur jab unhen is baat ka ehsaas hua toh is baar cheekh nahi ruki.

Thakurain ne fauran apni nighty neeche girayi aur pichhe ko hokar khadi ho gayi. Unhone khidki ki taraf dekha aur theek usi pal ek lamhe ke liye unki nazar us ladke se ja mili.

"Kya hua?" Thakur ne nazar uper karke puchha. Thakurain ne unhen dhakka sa dekar apne se door kar diya tha aur nighty neeche kar li thi.

"Vo, vo" Sarita Devi ne kuchh kehne ki koshish ki aur nazar khidki ki taraf ghumayi.

Vo ladka ja chuka tha.

"Khidki khuli hui hai" Unhone thakur se kaha "Vo toh band kar do pehle"

Us raat wale incident ko 2 din chuke the. Sarita Devi ab jaankar us ladke ke saamne nahi aati thi. Vo 2 baaar unhen nangi dekh chuka tha, ek baar unki marzi ke khilaf zabardasti par doosri baar unke kamre mein unhen apne pati ke saath aur ye baat unhen bahut pareshan kar rahi thi. Vo chah kar bhi na toh use khud kuchh keh paayi aur na hi Thakur Sahab se iska zikr kar paayi.

Dopahar ka waqt tha. Thakurain apne kamre mein leti ek kitaab padh rahi thi. Haweli mein us waqt koi nahi tha sivaay unke aur kuchh naukron ke. Apni hi dhuk mein kitaab padhti Sarita Devi ko jaane kyun aisa laga ke koi unhen

dekh raha hai. Ek nazar unhone darwaze pad daali par vo band tha.

Unki nazar kamre mein lage sheeshe par padi aur unhen phir vo khidki par khada nazar aaya. Vo khamoshi se vahan khada thakurain ko dekh raha tha.Vo thoda chhupkar khada tha taaki thakurain ki sidhi nazar uspar na pade par kamre mein lage sheeshe mein vo saaf dikhai de raha hai.

Aur iske saath hi Thakurain ko ye bhi nazar aaya ke vo unhen kyun dekh raha tha. Unhone ek saree pehen rakhi thi jiska unhen khyaal hi nahi tha kyunki vo kamre mein akeli leti thi. Unki saree ka pallu ek taraf gira hua tha aur

safed rang ke blouse mein unki chhatiyan jaise kamre ki chhat ko chhune ki koshish karti uper neeche ho rahi thi.

Unhone apni ek taang mod rakhi thi jiski vajah se saree khisak kar ghutno tak chadhi hui thi.

Aur phir thakurain ko teesri baat ka andaza hua. Khidki par khade hua uska ek kandha dheere dheere hil raha tha, jo shayad uska haath hilne ki vajah se tha aur unhen samajhne mein ek pal nahi laga ke vo kya kar raha tha.

Vo unhen is halat mein dekh kar apna lund hila raha tha.

Thakurain ka gussa pal mein fauran aasman chhune laga. Unhone uthkar usko daantne ki sochi hi thi ke gussa jis taraf chadha tha, ek pal mein vaise hi utar gaya aur ek ajeeb se ehsaas ne gusse ki jagah le li.

Ye unki zindagi mein pehli baar tha ke koi unhen aise chupke chupke dekhkar apna hila raha tha aur kahin unke dil mein aisa hota dekh kar gudgudi si hone lagi. Vo khud jaanti thi ke ye kitna galat tha aur vo ladka unka kya lagta

tha par galat sahi ka khyaal us waqt jaise ek taraf ho gaya.

Jaise ek nashe ki si haalat mein thakurain vaise hi leti rahi aur khamoshi se sheeshe mein dekhti rahi. Is baat se anjaan ke thaurain ne usko dekh liya hai, vo ladka khidki par khada apna hilata raha.

Dheere dheere thakurain ka jism garam sa hone laga aur unki hairat ka koi thikana na raha. Kahan toh vo 2 mahine se apne pati se chudwate hue bhi garam nahi hoti thi aur kahan is ladke ko yun jhankta dekhkar 2 pal mein garam ho gayi.

Aur phir unke dil mein bhi sharam aur haya ki jagah vasna ne le li. Unhone vo kiya jo unke andar ki ek shareef aurat ne kabhi nahi kiya tha. Dheere se ab bhi kitaab padhne ka natak karte hue unhone apni doosri taang bhi mod

li.

Vo sidhi apni peeth par leti hui thi aur kitaab saamne haathon mein pakdi hui thi. Ek taang unki pehli hi mudi hui thi aur phir doosri taang modti hi jo saree pehle ghutne par atki hui thi ab sarakti hui unke pet par aa giri aur

unki dono jaanghe nangi ho gayi.

Aur ye shayad us ladke ke liye kaafi zyada ho gaya. Uska haath kuchh pal tezi se hila aur phir ruk gaya. Aankhen band kiye usne kuchh pal lambi lambhi saans li aur phir ek jhatke se khidki se hat gaya.

Thakurain samajhh gayi ke uska nikal gaya tha par khud andar hi andar vo buri tarah se garam ho chuki thi. Ladke ke jaate hi phir se vasna ki jagah sharam ne le li aur thakurain ko bahut bura laga ke vo us ladke ko yun apna shareer dikha rahi thi. Vo ladka jo ki unka khud ka .....

"Hey Bhagwan !" Thakurain ne khud se kaha aur apni saree phir se theek kar li.

Us raat jab Thakur ne kamre ka darwaza band kiya toh jaise vaasna ka ek toofan sa chhut pada. Dopahar ki garam Thakurain fauran unpar chadh padi.

"Arrey arrey "Thakur ne hairat se kaha "Kya ho gaya"

Thakurain ne kuchh nahi kaha aur unka kurta utarne lagi

"Kya baat hai" Thakur ne apne haath uper kiye aur kurta gir jaane diya "Aaj bade mood mein ho"

Thakurain ne phir koi jawab nahi diya aur fauran thakur ke saamne apne ghutno par beth gayi. Jabse dopahar ko unhone us ladke ko un jhaankte hue dekha tha, unke shareer mein jaise aag si lagi hui thi jisko vo jald se jald

thanda kar lena chahti thi.

Unhone thakur ke pajame ka nada khola aur dheela karke neeche khincha. Kuchh hi pal baad thakur kamre mein poore nange khade the aur thakurain unke saamne zameen par bethi hui thi. Unhone dheere se thakur ka lund apne haath mein liya.

"Aaahhhhh" Lund thakurain ke haath mein aate hi thakur ke munh se aah nikal padi

Thakurain ne lund ko apne haath mein pakadkar thodi der hilaya. Lund betha hua tha par thakurain ke haath mein aate hi dheere dheere khada hone laga. Thakurain ne apna munh khola aur jeebh nikal kar lund ke uper phirane lagi.

"Aapki is baat pe toh main fida hoon" Thakur ne kaha "Mast lund choosti ho aap"

Thakur thodi der tak apni jeebh ko lund par uper neeche phirati rahi. Lund ab tan kar poori tarah khada ho chuka tha aur mushkil se thakurain ke haath mein sama raha tha. Thakurain ne apna munh jitna ho saka khola aur lund ko

apne munh mein bhar liya.

"Poora lo" Thakur ne kaha "Poora chooso"

Thakurain ne lund ko thode der apne munh mein andar bahar kiya aur poori tarah se geela kar diya. Is waqt unko lund choosne se zyada dilchaspi chudwane mein the. Unki choot mein ek aag si lagi hui thi jisko vo jaldi se jaldi bujha lena chahti hi.

Lund ko ek baar phir apne munh mein lekar unhone achhe se apni jeebh uspar phirayi aur uthkar khadi ho gayi.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:11

खूनी हवेली की वासना पार्ट --21

गतान्क से आगे........................

"थोड़ी देर और चूसो ना" उनको उठते देखकर ठाकुर ने कहा

"बाद में चूस दूँगी" ठकुराइन ने अपनी नाइटी उतारकर एक तरफ फेंकी और पूरी तरह नंगी होकर बिस्तर पर बैठ गयी "फिलहाल मुझे ठंडा करो"

"आज बड़ी गरम हो रखी हो" ठाकुर ने अपना लंड खुद हिलाते हुए कहा "बात क्या है?"

"कोई बात नही है" ठकुराइन ने कहा "अब जल्दी करो"

वो बिस्तर के कोने पर बैठी हुई थी और ठाकुर उनके सामने खड़े हुए थे. ठकुराइन पिछे को होती हुई बिस्तर पर लेट गयी. उनकी गांद बिस्तर के कोने पर थी और टांगे उन्होने हवा में उठा ली. चूत खुल कर पूरी तरह ठाकुर

के सामने आ गयी.

ठाकुर एक पल उन्हें देख कर मुस्कुराए और आगे बढ़कर अपना लंड चूत पर रख कर धीरे से आगे को दबाया. पूरी गीली चूत में लंड आराम से अंदर तक घुस गया.

लंड के अंदर घुसते ही ठकुराइन की चूत में लगी आग जैसे कम होने के बजाय और बढ़ गयी. उनकी चूचियो पर उनके दोनो निपल्स एकदम सख़्त हो गये, चूत इस कदर गीली हो गयी के नीचे चादर पर भी पानी नज़र आने लगा. अपने दोनो बाहें फेलाकर ठकुराइन ने ठाकुर को अपने उपेर खींच लिया. वो अब भी नीचे खड़े हुए थे और ठकुराइन की दोनो टाँगो को उपेर को पकड़ रखा था. नीचे झुकते ही उन्होने दोनो निपल्स को बार बारी चूसना शुरू कर दिया और चूत में धक्को को और तेज़ कर दिया.

उनके दोनो हाथ कभी ठकुराइन की चूचियाँ दबाते, कभी उनके टाँगो को पकड़कर फिर उपेर कर देते, कभी उनकी जाँघो को सहलाते.

उनकी इन सब हरकतों से ठकुराइन के अंदर लगी आग और बढ़ती जा रही थी. वो ठाकुर की गांद को पकड़कर अपनी ओर खींचने लगी.

"और ज़ोर से ... और ज़ोर से ...." उन्होने ठाकुर को उकसाया

ठाकुर एक बार फिर खड़े हो गये और ठकुराइन की टाँगो को पकड़ कर पूरी जान से धक्के मारने लगे. वो अपने लंड को चूत से तकरीबन पूरा ही बाहर खींच लेते और फिर एक ज़ोरदार धक्के से जड़ तक अंदर घुसा देते.

नीचे पड़ी ठकुराइन जैसे एक नशे की सी हालत में थी. ठाकुर का लंड उनकी चूत को पूरी तरह भर रहा था और ज़ोरदार धक्को से उनका पूरा जिस्म हिल रहा था. हर धक्के के साथ उनकी गांद पर ठाकुर के टटटे टकरा रहे थे.

पर ठकुराइन को फिर भी लग रहा था के उनकी आग ठंडी नही हो रही थी, कहीं कुच्छ कमी थी.

ठाकुर के धक्को में तेज़ी आ गयी थी. उन्होने अपने दोनो हाथों से ठकुराइन की दोनो चूचियो को पूरे ज़ोर से पकड़ रखा था और ठकुराइन जानती थी के अब किसी भी पल खेल ख़तम हो जाएगा.

पर ठकुराइन अब भी उसी आग में जल रही थी.

और फिर उन्होने बेकरार होकर आईने में नज़र डाली. उनके दिल में एक ख्वाहिश थी के वो वहाँ खड़ा हो, फिर से उन्हें देख रहा हो और जैसे भगवान ने उनकी सुन ली.

वो खिड़की पर च्छूपा खड़ा था और अंदर झाँक रहा था.

हवेली के बाहर अंधेरा था और उसको यूँ खड़े हुए देख पाना मुश्किल था. पहली नज़र में तो शायद पता भी ना चलता कि कोई वहाँ खड़ा अंदर देख रहा है पर ठकुराइन की नज़र तो उसी को तलाश रही थी इसलिए फ़ौरन वो नज़र आ गया.

वो उनको पूरी तरह नंगी चुदवाते हुए देख रहा था और शायद बाहर खड़ा अपना लंड हिला रहा था.

जैसे इस ख्याल ने एक कमाल सा कर दिया. जो आग ठकुराइन के अंदर लगी हुई थी वो अचानक ज्वालामुखी की तरह फॅट पड़ी. चूत से पानी बह चला और एक अजीब सा सुकून उनके दिल में उतरता चला गया.

"चोदो मुझे" अचानक ठकुराइन ने वो किया जो कभी नही किया था "ज़ोर से चोदो मुझे"

और ठीक उसी पल शीशे में एक पल के लिए ठकुराइन की नज़र उस लड़के की नज़र से मिली. दोनो ने एक दूसरे को देखा. लड़का समझ गया के वो उसको देख रही थी और वो भी ये समझ गयी के लड़का जानता है के उन्होने उसको देख लिया.

और ठकुराइन उसको देखते हुए झाड़ गयी.

"आआहह" वो चिल्ला उठी "मैं गयी. लंड पूरा अंदर घुसा दो"

ठाकुर ने एक ज़ोर से धक्का लगाया और लंड चूत में अंदर डाल कर रुक गये. उनका वीर्य ठकुराइन की चूत को धीरे धीरे भरने लगा.

दोनो की साँस भारी हो रही थी. वो लड़का खिड़की से जा चुका था.

ठाकुर ठकुराइन के उपेर लेटे हैरत से उनको देख रहे थे के आज वो ऐसा बोल कैसे पड़ी और ठकुराइन नीचे बैठी शरम से ज़मीन में गढ़ी जा रही थी.

"हे भगवान" उन्होने दिल ही दिल में सोचा "क्या कर रही हूँ मैं? वो मेरा अपना .... नही नही, ये ठीक नही है. पाप है"

उस रात ठाकुर के कुच्छ रिश्तेदार हवेली आए हुए.थे पूरा दिन घर में हसी मज़ाक का माहौल बना रहा और रात को भी सब उसी मूड में थे.

लाइट ना होने की वजह से सब लोग हवेली की छत पर बैठे हुए थे और ताश खेल रहे थे. शराब और कुच्छ खाने की चीज़ें भी वहीं लगी हुई थी.

नीचे ज़मीन पर बिछि कालीन पर गोल घेरा बनाए हुए बैठे थे. मौसम तोड़ा ठंडा था इसलिए सबने अपनी टाँगो को कंबल के अंदर घुसाया हुआ था.

खुद ठकुराइन ने भी उस रात सबके कहने पर हल्की सी शराब पी ली थी. ताश खेलना उन्हें आता नही था इसलिए वो एक तरफ छत की दीवार से टेक लगाए बैठी थी और सबको देख रही थी. तभी वो छत पर आया.

"तू भी खेलेगा?" ठाकुर ने उससे पुछा तो उसने इनकार में गर्दन हिला दी और सीधा आकर ठकुराइन के पास बैठ गया.

ठकुराइन ने अपनी नज़र दूसरी तरफ घुमा ली. उस रात के बाद वो अब तक उससे नज़र नही मिला पाई थी.

वो सीधा आकर उनकी बगल में बैठ गया और जो कंबल ठकुराइन ने ओढ़ रखा था वही कंबल अपनी टाँगो पर डालकर दीवार से टेक लगाके बैठ गया. वो ठकुराइन के बिल्कुल नज़दीक बैठा था पर वो जानकर दूसरी तरफ देखने का नाटक कर रही थी.

अंधेरी रात थी और छत पर सिर्फ़ उस वक़्त एक लालटेन जल रही थी जिसकी रोशनी में पत्ते खेले जा रहे थे. ठकुराइन और वो लड़के दूसरो से थोड़ा हटके एक तरफ बैठे थे जिसकी वजह से वो दोनो तकरीबन अंधेरे में ही थे.

ठकुराइन अपनी सोच में ही गुम थी के उन्हें अपने पावं पर कुच्छ महसूस हुआ. उन्होने नज़र घूमकर देखा तो दिल धड़क उठा. पहले वो थोड़ा सा फासला बना कर बैठा था पर अब खिसक कर बिल्कुल ठकुराइन के करीब आ चुका था और कंबल के अंदर अपना पावं ठकुराइन के पावं पर रगड़ रहा था.

ठकुराइन ने घूर कर उसकी तरफ देखा और दूर खिसकने लगी के तभी उसने उनका हाथ पकड़ लिया और अगले पल वो किया जो ठकुराइन ने अपने सपनो में भी नही सोचा था.

उसने कंबल के अंदर अपना पाजामा खिसका कर नीचे कर रखा था और ठकुराइन का हाथ पकड़ कर सीधा अपने नंगे लंड पर रख दिया.

सरिता देवी को जैसे 1000 वॉट का झटका लगा. उन्हें समझने में एक सेकेंड नही लगा के चादर के अंदर उनके हाथ में क्या था. उन्होने अपना हाथ वापिस खींचने की कोशिश की पर लड़के ने उनका हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और ज़बरदस्ती उनकी मुट्ठी अपने लंड पर बंद कर रखी थी.

सरिता देवी ने ताक़त लगाकर हाथ वापिस लेने की कोशिश की. लड़के ने भी पूरी ताक़त से उनका हाथ अपने लंड पर पकड़े रखा, इसी खींचा-तानी में ठाकुर की नज़र उन दोनो पर पड़ गयी.

"अर्रे दोनो माँ बेटे क्या आपस में लड़ रहे हो?" उन्होने हॅस्कर पुछा

"नही बस बात कर रहे हैं" ठकुराइन ने भी ऐसे ही ठंडी आवाज़ बनाकर कहा.

ठाकुर के देखने की वजह से ठकुराइन को अपना हाथ खींचने की कोशिश बंद करनी पड़ी. उनका हाथ ढीला पड़ते ही लड़के ने उसे अपने लंड पर उपेर नीचे करना शुरू कर दिया.

"मत कर" ठकुराइन ने कहा "कोई देख लेगा"

वो लड़का नही माना और ऐसे ही उनका हाथ अपने लंड पर उपेर नीचे करता रहा. वो अपने हाथ से ठकुराइन के हाथ को अपने लंड पर बंद करके मुट्ठी मार रहा था.

"भगवान के लिए मान जा. किसी ने देख लिया तो ग़ज़ब हो जाएगा" ठकुराइन ने फिर कोशिश की

वो फिर भी नही माना और ऐसे ही उनका हाथ अपने लंड पर उपेर नीचे करता रहा. अंधेरा होने की वजह से उनकी ये हरकत किसी को नज़र नही आ रही थी. लड़का वैसे ही ठकुराइन के हाथ को उपेर नीचे करता रहा और अपने हाथ में ठकुराइन को उसका लंड खड़ा होता महसूस होने लगा. धीरे धीरे पूरा लंड सख़्त हो गया और ठकुराइन के हाथ में कस गया.

एक पल के लिए ठकुराइन के दिमाग़ में वो नज़ारा याद आया जब वो नंगी बैठी इसी लंड को चूस रही थी.

ये ख्याल दिमाग़ में आते ही जैसे बेध्यानी में उनकी मुट्ठी लंड पर कस गयी. उनके ऐसा करते ही लड़के ने अपना हाथ उनके हाथ से हटा लिया पर ठकुराइन अब भी उसके लंड को वैसे ही हिलाती रही. उन्हें इस बात का एहसास ही नही हुआ के अब वो खुद उसका लंड हिला रही हैं, वो तो कबका अपना हाथ हटा चुका था.

धीरे धीरे उसका लंड फूलने लगा और उसकी तेज़ होती साँस से ठकुराइन को अंदाज़ा हो गया के वो छूटने वाला है.

उन्होने अपना हाथ हिलाना और तेज़ कर दिया. उनका पूरा हाथ कंबल के अंदर उसके लंड को जकड़े हुए थे और पूरी तेज़ी से उपेर नीचे जा रहा था.

और फिर अचानक उस लड़के के जिस्म ने झटका खाया और ठकुराइन के हाथ में कुच्छ गीला गीला आ गया. वो जानती थी के उस लड़के का काम हो चुका था और उनके हाथ में अब क्या था.

एक पल के लिए उन्हें वो वक़्त याद आया जब यही चीज़ उनके हाथ के बजाय उनके मुँह में थी और कुच्छ उन्होने अंजाने में निगल भी ली थी.

ठकुराइन तब तक लंड को हिलाती रही जब तक के वो बैठकर सिकुड गया और ठकुराइन के हाथ से अपने आप ही छूट गया. तब ठकुराइन को एहसास हुआ के इतनी देर से वो खुद ही लंड हिलाए जा रही थी. लड़का तो आँखें बंद किए बैठा था. उन्होने एक नज़र उसके चेहरे पर डाली. लड़के ने भी अपनी आँखें खोली और ठकुराइन से नज़र मिलाई.

वो दोनो अच्छी तरह से जानते थे के आज हर पुराना रिश्ता तोड़कर उनके बीच एक नया रिश्ता जनम ले चुका था.

ठाकुर उस दिन ठकुराइन को अपने आम का बाग दिखाने लाए थे. 2 गाड़ियाँ थी. एक में ठाकुर और ठकुराइन जिसे खुद ठाकुर चला रहे थे और दूसरी में वो लड़का और कुच्छ नौकर और 3 नौकर थे.

अगले एक घंटे तक ठाकुर ठकुराइन को बड़े शौक ने अपना नया खरीदा आम का बाग दिखाते रहे. ठकुराइन ने कई बार महसूस किया के वो लड़का सबकी नज़र बचा कर बार बार ठकुराइन की तरफ देख रहा था पर वो जब भी पलट कर उसकी तरफ देखती तो वो नज़र घुमा लेता था.

"मुझे प्यास लगी है" काफ़ी देर तक घूमने के बाद ठकुराइन ने कहा.

"पानी की बॉटल?" ठाकुर ने एक नौकर से पुछा

"वो गाड़ी में ही रखी है मालिक" नौकर ने कहा "मैं अभी ले आता हूँ"

नौकर जाने के लिए मुड़ा ही था के अचानक उस लड़के ने उसको रोक दिया.

"यहाँ नज़दीक में ही एक हॅंड-पंप लगा है. वहाँ चलते हैं" उसने कहा

"हां आप वहाँ जाकर पानी पी लीजिए. नलके का पानी अच्छा ताज़ा भी होगा" ठाकुर ने ठकुराइन से कहा

लकड़े ने ठकुराइन को साथ चलने का इशारा किया. वो एक पल के लिए सोच में पड़ गयी. उसके साथ अकेले जाने में वो झिझक रही थी पर इस वक़्त कुच्छ कर नही सकती थी. क्या कहती ठाकुर और नौकरों से के क्यूँ उसके साथ जाना नही चाहती. वो तो उनका खुद का ...क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --21

gataank se aage........................

"Thodi der aur chooso na" Unko uthte dekhkar thakur ne kaha

"Baad mein choos dooni" Thakur ne apni nighty utarkar ek taraf phenki aur poori tarah nangi hokar bistar par beth gayi "Filhal mujhe thanda karo"

"Aaj badi garam ho rakhi ho" Thakur ne apna lund khud hilate hue kaha "Baat kya hai?"

"Koi baat nahi hai" Thakurain ne kaha "Ab jaldi karo"

vO bistar ke kone par bethi hui thi aur thakur unke saamne khade hue the. Thakurain pichhe ko hoti hui bistar par let gayi. Unki gaand bistar ke kone par thi aur taange unhone hawa mein utha li. Choot khul kar poori tarah thakur

ke saamne aa gayi.

Thakur ek pal unhen dekh kar muskuraye aur aage badhkar apna lund choot par rakh kar dheere se aage ko dabaya. Poori geeli choot mein lund aaram se andar tak ghus gaya.

Lund ke andar ghuste hi thakurain ki choot mein lagi aag jaise kam hone ke bajay aur badh gayi. Unke chhatiyan par unke dono nipples ekdam sakht ho gaye, choot is kadar geeli ho gayi ke niche chadar par bhi pani nazar aane laga. Apne dono baahen phelakar thakurain ne thakur ko apne uper khinch liya. Vo ab bhi neeche khade hue the aur thakurian ki dono taango ko uper ko pakad rakha tha. Niche jhukte hi unhone dono nipples ko baar baari choosna shuru kar diya aur choot mein dhakko ko aur tez kar diya.

Unke dono haath kabhi thakurain ki chhatiyan dabate, kabhi unke taango ko pakadkar phir uper kar dete, kabhi unki jaangho ko sehlate.

Unki in sab harkaton se thakurain ke andar lagi aag aur badhti ja rahi thi. Vo thakur ki gaand ko pakadkar apni aur khinchne lagi.

"Aur zor se ... aur zor se ...." Unhone thakur ko uksaya

Thakur ek baar phir khade ho gaye aur thakurain ki taango ko pakad kar poori jaan se dhakke maarne lage. Vo apne lund ko choot se takriban poora hi bahar khinch lete aur phir ek zordar dhakke se jad tak andar ghusa dete.

Neeche padi thakurain jaise ek nashe ki si halat mein thi. Thakur ka lund unki choot ko poori tarah bhar raha tha aur zordar dhakko se unka poora jism hil raha tha. Har dhakke ke saath unki gaand par thakur ke tatte takra rahe the.

Par Thakurain ko phir bhi lag raha tha ke unki aag thandi nahi ho rahi thi, kahin kuchh kami thi.

Thakur ke dhakko mein tezi aa gayi thi. Unhone apne dono haathon se thakurain ki dono chhatiyon ko poore zor se pakad rakha tha aur thakurain jaanti thi ke ab kisi bhi pal khel khatam ho jaayega.

Par thakurain ab bhi usi aag mein jal rahi thi.

Aur phir unhone bekarar hokar aaine mein nazar daali. Unke dil mein ek khwahish thi ke vo vahan khada ho, phir se unhen dekh raha ho aur jaise bhagwan ne unki sun li.

Vo khidki par chhupa khada tha aur andar jhaank raha tha.

Haweli ke bahar andhera tha aur usko yun khade hue dekh pana mushkil tha. Pehli nazar mein toh shayad pata bhi na chalta ek koi vahan khada andar dekh raha hai par Thakurain ki nazar toh usi ko talash rahi thi isliye fauran vo nazar aa gaya.

Vo unko poori tarah nangi chudwate hue dekh raha tha aur shayad bahar khada apna lund hila raha tha.

Jaise is khyaal ne ek kamal sa kar diya. Jo aag thakurain ke andar lagi hui thi vo achanak jwalamukhi ki tarah phat padi. Choot se pani beh chala aur ek ajeeb sa sukoon unke dil mein utarta chala gaya.

"Chodo mujhe" Achanak thakurain ne vo kiya jo kabhi nahi kiya tha "Zor se chodo mujhe"

Aur theek usi pal sheeshe mein ek pal ke liye thakurain ki nazar us ladke ki nazar se mili. Dono ne ek doosre ko dekha. Ladka samajh gaya ke vo usko dekh rahi thi aur vo bhi ye samajh gayi ke ladka janta hai ke unhone usko dekh liya.

Aur thakurain usko dekhte hue jhad gayi.

"Aaaahhhhhh" Vo chilla uthi "Main gayi. Lund poora andar ghusa do"

Thakur ne ek zor se dhakka lagaya aur lund choot mein andar daal kar ruk gaye. Unka veerya thakurain ki choot ko dheere dheere bharne laga.

Dono ki saans bhaari ho rahi thi. Vo ladka khidki se ja chuka tha.

Thakur thakurain ke uper lete hairat se unko dekh rahe the ke aaj vo aisa bol kaise padi aur thakurain neeche bethe sharam se zameen mein gadi ja rahi thi.

"Hey bhagwan" Unhone dil hi dil mein socha "Kya kar rahi hoon main? Vo mera apna .... nahi nahi, ye theek nahi hai. Paap hai"

Us raat thakur ke kuchh rishtedar haweli aaye hue. Poora din ghar mein hasi mazak ka mahaul bana raha aur raat ko bhi sab usi mood mein the.

Light na hone ki vajah se sab log haweli ki chhat par bethe hue the aur taash khel rahe the. Sharab aur kuchh khaane ki cheezen bhi vahin lagi hui thi.

Neeche zameen par bichhi kaaleen par gol ghera banaye hue bethe the. Mausam thoda thanda tha isliye sabne anpi taango ko kambal ke andar ghusaya hua tha.

Khud thakurain ne bhi us raat sabke kehne par halki si sharab pi li thi. Taash khelna unhen aata nahi tha isliye vo ek taraf chhat ki deewar se tek lagaye bethi thi aur sabko dekh rahi thi. Tabhi vo chhat par aaya.

"Tu bhi khelega?" Thakur ne usse puchha toh usne inkaar mein gardan hila di aur sidha aakar thakurain ke paas beth gaya.

Thakurain ne apni nazar doosri taraf ghuma li. Us raat ke baad vo ab tak usse nazar nahi mila payi thi.

Vo sidha aakar unki bagal mein beth gaya aur jo kambal thakurain ne odh rakha tha vahi kambal apni taango par dalkar deewar se tek lagake beth gaya. Vo thakurain ke bilkul nazdeek betha tha par vo jaankar doosri taraf dekhne ka natak kar rahi thi.

Andheri raat thi aur chhat par sirf us waqt ek laalten jal rahi thi jiski roshni mein patte khele ja rahe the. Thakurain aur vo ladke doosro se thoda hatke ek taraf bethe the jiski vajah se vo dono takreeban andhere mein hi the.

Thakurain apni soch mein hi gum thi ke unhen apne paon par kuchh mehsoos hua. Unhone nazar ghumakar dekha toh dil dhadak utha. Pehle vo thoda sa fasla bana kar betha tha par ab khisak kar bilkul thakurain ke kareeb aa chuka tha aur kambal ke andar apna paon thakurain ke paon par ragad raha tha.

Thakurain ne ghoor kar uski taraf dekha aur door khisakne lagi ke tabhi usne unka haath pakad liya aur agle pal vo kiya jo thakurain ne apne sapno mein bhi nahi socha tha.

Usne kambal ke andar apna pajama khiska kar neeche kar rakha tha aur thakurain ka haath pakad kar sidha apne nange lund par rakh diya.

Sarita Devi ko jaise 1000 watt ka jhatka laga. Unhein samajhne mein ek second nahi laga ke chadar ke andar unke haath mein kya tha. Unhone apna haath vapis khinchne ki koshish ki par ladke ne unka haath apne haath mein pakad rakha tha aur zabardasti unki mutthi apne lund par band kar rakhi thi.

Sarita Devi ne taakat lagakar haath vaapis lene ki koshish ki. Ladke ne bhi poori taakat se unka haath apne lund par pakde rakha, Isi khincha-taani mein thakur ki nazar un dono par pad gayi.

"Arrey dono maan bete kya aapas mein lad rahe ho?" Unhone haskar puchha

"Nahi bas baat kar rahe hain" Thakurain ne bhi aise hi thandi aawaz banakar kaha.

Thakur ke dekhne ki vajah se thakurain ko apna haath khinchne ki koshish band karni padi. Unka haath dheela padte hi ladke ne use apne lund per uper neeche karna shuru kar diya.

"Mat kar" Thakurain ne kaha "Koi dekh lega"

Vo ladka nahi mana aur aise hi unka haath apne lund par uper neeche karta raha. Vo apne haath se thakurain ke haath ko apne lund par band karke mutthi maar raha tha.

"Bhagwan ke liye maan ja. Kisi ne dekh liya toh gazab ho jayega" Thakurain ne phir koshish ki

Vo phir bhi nahi mana aur aise hi unka haath apne lund par uper neeche karta raha. Andhera hone ki vajah se unki ye harkat kisi ko nazar nahi aa rahi thi. Ladka vaise hi thakurain ke haath ko uper neeche karta raha aur apne haath mein thakurain ko uska lund khada hota mehsoos hone laga. Dheere dheere poora lund sakht ho gaya aur thakurain ke haath mein kas gaya.

Ek pal ke liye thakurain ke dimag mein vo nazar yaad aaya jab vo nangi bethi isi lund ko choos rahi thi.

Ye khyaal dimag mein aate hi jaise bedhyani mein unki mutthi lund par kas gayi. Unke aisa karte hi ladke ne apna haath unke haath se hata liya par thakurain ab bhi uske lund ko vaise hi hilati rahi. Unhen is baat ka ehsaas hi nahi hua ke ab vo khud uska lund hila rahi hain, vo toh kabka apna haath hata chuka tha.

Dheere dheere uska lund phoolne laga aur uski tez hoti saans se thakurain ko andaza ho gaya ke vo chhutne wala hai.

Unhone apna haath hilana aur tez kar diya. Unka poora haath kambal ke andar uske lund ko jakde hue the aur poori tezi se uper neeche ja raha tha.

Aur phir achanak us ladke ke jism ne jhatka khaya aur thakurain ke haath mein kuchh geela geela aa gaya. Vo janti thi ke us ladke ka kaam ho chuka tha aur unke haath mein ab kya tha.

Ek pal ke liye unhen vo waqt yaad aaya jab yahi cheez unke haath ke bajay unke munh mein thi aur kuchh unhone anjane mein nigal bhi li thi.

Thakurain tab tak lund ko hilati rahi jab tak ke vo bethkar sikud gaya aur thakurain ke haath se apne aap hi chhut gaya. Tab thakurain ko ehsaas hua ke itni der se vo khud hi lund hilaye ja rahi thi. Ladka toh aankhen band kiye betha tha. Unhone ek nazar uske chehre par daali. Ladke ne bhi apni aankhen kholi aur thakurain se nazar milayi.

Vo dono achhi tarah se jaante the ke aaj har purana rishta todkar unke beech ek naya rishta janam le chuka tha.

Thakur us din Thakurain ko apne aam ka bagh dikhane laaye the. 2 gaadiyan thi. Ek mein thakur aur thakurain jise khud thakur chala rahe the aur doosri mein vo ladka aur kuchh naukar aur 3 naukar the.

Agle ek ghante tak thakur thakurain ko bade shauk ne apna naya kharida aam ka bagh dikhate rahe. Thakurain ne kai baar mehsoos kiya ke vo ladka sabki nazar bacha kar baar baar thaukrain ki taraf dekh raha tha par vo jab bhi palat kar uski taraf dekhti toh vo nazar ghuma leta tha.

"Mujhe pyaas lagi hai" Kaafi der tak ghoomne ke baad Thakurain ne kaha.

"Paani ki bottle?" Thakur ne ek naukar se puchha

"Vo gaadi mein hi rakhi hai maalik" Naukar ne kaha "Main abhi le aata hoon"

Naukar jaane ke liye muda hi tha ke achanak us ladke ne usko rok diya.

"Yahan nazdeek mein hi ek hand-pump laga hai. Vahan chalte hain" Usne kaha

"Haan aap vahan jakar paani pi lijiye. Nalke ka pani achha taza bhi hoga" Thakur ne thakurain se kaha

Lakde ne thakurain ko saath chalne ka ishara kiya. Vo ek pal ke liye soch mein pad gayi. Uske saath akele jaane mein vo jhijhak rahi thi par is waqt kuchh kar nahi sakti thi. Kya kehti thakur aur naukron se ke kyun uske saath jaana nahi chahti. Vo toh unka khud ka ...kramashah........................................