सेक्सी हवेली का सच compleet

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raj..
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Re: सेक्सी हवेली का सच

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:41

बिंदिया की ये बात सुनकर रूपाली को कल रात की कहानी समझ आ गयी और ये भी समझ आ गया के चंदर के बर्ताव में कोई बदलाव क्यूँ नही था. उसे तो पता भी नही था के बेसमेंट के अंधेरे में उसने बिंदिया की नही रूपाली की चूत मारी थी.

"तो फिर तू गयी?" रूपाली पक्का करना चाहती थी के बिंदिया ने वहाँ आकर उसे चूड़ते हुए देखा तो नही

"कहाँ मालकिन" बिंदिया हस्ते हुए बोली "गांद में से लंड निकलता तो जाती ना"

"और चंदर?" रूपाली ने कहा

"सुबह इशारा कर रहा था के रात को बेसमेंट में मज़ा नही आया. अब वहाँ नही करेंगे. पता नही क्या कह रहा था. मैं तो वहाँ गयी ही नही तो मज़ा कैसा. पक्का कोई सपना देखा होगा और बेवकूफ़ उसे ही सच समझ बैठा" बिंदिया ने कहा तो रूपाली की जान में जान आ गयी.

वो रात गुज़ारनी रूपाली के लिए जैसे मौत हो गयी. उसके जिस्म में आग लगी हुई थी. बिंदिया के साथ की गरम बातों ने उसकी गर्मी को और बढ़ा दिया था. बिस्तर पर पड़े पड़े वो काफ़ी देर तक करवट बदलती रही और जब सुकून नही मिला तो उसने अपनी नाइटी को उपेर खींचा और चूत की आग को अपनी उंगलियों से ठंडी करने की बेकार कोशिश करने लगी.

तेज शाम ढले घर वापिस आ गया था और बिंदिया आज रात भी उसके कमरे में थी. रूपाली उस दिन हॉस्पिटल नही जा पाई थी पर फोन पर भूषण से बात हुई थी. ठाकुर की हालत अब भी वैसी ही थी. बिस्तर पर पड़े पड़े ठाकुर के दिमाग़ में सिर्फ़ ठाकुर का लंड घूम रहा था. जब उंगलियों से बात नही बनी तो वो परेशान होकर उठी और तेज के कमरे के सामने पहुँची. कान लगाकर सुना तो अंदर से बिंदिया के आ ऊ की आवज़ें आ रही थी. रूपाली थोड़ी देर तक वहीं खड़ी सुनती रही. अंदर से कभी बिंदिया के "धीरे ठाकुर साहब" तो कभी "आराम से करिए ना" की आवाज़ें आ रही थी. उसकी आवाज़ सुनकर रूपाली मुस्कुरा उठी. लगता है तेज उसके लिए बिस्तर पर काफ़ी भारी पड़ रहा था.

सुबह उठी तो रूपाली का पूरा जिस्म फिर से दुख रहा था. गयी पूरी रात वो बिस्तर पर परेशान करवट बदलती रही और ढंग से सो नही पाई. दिमाग़ में कयि बार उठकर पायल के पास जाने का ख्याल आया पर फिर उसने अपना इरादा बदल दिया और पायल को सुकून से सोने दिया.

उसने आज देवधर से मिलने जाना था. गाओं से शहेर तक जाने में उसे कम से कम 4 घंटे लगने वाले थे तो वो सुबह सवेरे ही उठकर निकल गयी. दोपहर के तकरीबन 11 बजे वो देवधर के ऑफीस में बैठी थी.

देवधर पटेल कोई 45 साल का एक मोटा आदमी थी. सर से आधे बॉल उड़ चुके थे. उसका पूरा खानदान वकील ही था और शुरू से वो ही ठाकुर का खानदानी वकील था. उससे पहले उसका बाप ये काम संभाला करता था और वकील बनने के बाद देवधर ने अपने बाप की जगह ले ली.

उसने रूपाली को फ़ौरन बैठाया और अपनी सेक्रेटरी को किसी को अंदर ना आने देने को कहकर रूपाली के सामने आ बैठा.

"कहिए छ्होटी ठकुराइन" उसने रूपाली से कहा

रूपाली उम्मीद कर रही थी के वो उसे नाम से बुलाएगा पर देवधर ने ऐसा नही किया.

"सीधे मतलब की बात पे आती हूँ" रूपाली ने कहा "मैं ठाकुर साहब की वसीयत के बारे में जानना चाहती हूँ"

"मुझे लगा ही था के आप इस बारे में ही बात करेंगी."देवधर मुस्कुराते हुए बोला "असल में वसीयत ठाकुर साहब की नही आपके पति की है, ठाकुर पुरुषोत्तम सिंग की"

रूपाली ये बात ख़ान के मुँह से पहले ही सुन चुकी थी

"मैं जानता हूँ के आप ये बात पहले से जानती हैं इसलिए इसमें आपके लिए हैरानी की कोई बात नही"

"आपको कैसे पता?" रूपाली ने पुचछा

"वो ख़ान पहले मेरे पास आया था. ज़ोर ज़बरदस्ती करके सब उगलवा गया. मैं जानता था के वो आपसे इस बारे में बात करेगा" देवधर ने चोर नज़र से रूपाली की और देखते हुए कहा

"आप एक खानदानी वकील हैं. और आपको पैसे हमारे घर के राज़ पोलीस को बताने के नही मिलते. और अगर आप कहें के एक पोलीस वाला आपसे ज़बरदस्ती सब उगलवा गया तो ये बात कुच्छ हजम नही होती देवधर जी" रूपाली ज़रा गुस्से में बोली

"मैं एक वकील हूँ छ्होटी ठकुराइन. मेरे भी हाथ कई जगह फसे रहते हैं जहाँ हमें पोलीस की मदद लेनी पड़ती है. ऐसी ही कई बातों में मुझे उलझाके सब मालूम कर गया वो कमीना पर मैं माफी चाहता हूँ" देवधर ने नज़र नीची करते हुए कहा

"खैर" रूपाली भी जानती थी के अब इस बात पर बहेस करने से कोई फ़ायदा नही "मतलब की बात पर आते हैं. ये सारी जायदाद मेरी कैसे है?"

"देखिए बात सॉफ है" देवधर कुच्छ काग़ज़ खोलते हुए बोला. एक काग़ज़ का उसने रूपाली की तरफ सरकाया "ये आपके ससुर ठाकुर शौर्या सिंग के पिता की वसीयत है जिसमें उन्होने अपना सब कुच्छ आपके पति के नाम कर दिया था. तब ही जब पुरुषोत्तम सिंग छ्होटे थे."

"पर ख़ान ने तो कुच्छ और ही कहा" रूपाली थोड़ी हैरान हुई "वो तो कह रहा था वसीयत सरिता देवी की थी"

"यहाँ आकर बात थोड़ी टेढ़ी हो जाती है" देवधर ने दूसरा काग़ज़ आगे सरकाया "ये पहली वसीयत है जिसमें सब कुच्छ ठाकुर शौर्या सिंग के भाई ठाकुर गौरव सिंग के नाम किया गया था.

फिर देवधर ने एक दोसरा काग़ज़ आगे सरकाया

"जब ठाकुर गौरव सिंग और उनकी पत्नी की कार आक्सिडेंट में मौत हो गयी और पिछे उनका एकलौता बेटा जय ही रह गया तो ये दूसरी वसीयत बनाई गयी जिसमें सब कुच्छ आपकी सास सरिता देवी के नाम किया गया था."

फिर एक चौथा काग़ज़ आगे किया

"और ये आपके पति की वसीयत है जो उन्होने मरने से कुच्छ दिन पहले बनाई थी. इसमें सब कुच्छ आपके नाम किया गया है."

रूपाली परेशान सी अपने सामने रखे पेपर्स को देखने लगी

"तो अब देखा जाए तो पहले ये जायदाद ठाकुर शौर्या सिंग के भाई के पास गयी, फिर उनकी पत्नी के पास, फिर उनके बड़े बेटे के पास और अब उनकी बहू के पास. उनके पास तो कभी आई ही नही."

रूपाली थोड़ी देर खामोश रही

"ये मुझे तब क्यूँ ना बताया गया जब मेरे पति की मौत हुई थी?" उसने देवधर से पुचछा

"आप शायद अपने ससुर को नही जानती. इस इलाक़े में राज था उनका जो कुच्छ हद तक अब भी है. इस इलाक़े के नेता और मिनिस्टर्स भी उनके आगे मुँह नही खोलते और आपके देवर तेज के तो नाम से लोगों की हवा निकल जाती थी. अपनी जान मुझे भी प्यारी थी. मेरी क्या मज़ाल जो मैं उनके हुकुम खिलाफ जाता" देवधर रूपाली की आँखों में देखते हुए बोला

"आपको ठाकुर साहब ने मना किया था?" रूपाली ने पुचछा तो देवधर ने हां में सर हिला दिया

"इस वसीयत के बारे में किस किसको पता है?" रूपाली ने काग़ज़ उठाते हुए कहा

"अब तो सबको पता है पर आपके पति के मरने के बाद सिर्फ़ ठाकुर साहब को पता था. आपके पति की मौत के बाद जब मैं आपसे मिलने हवेली पहुँचा तो मुझे आपसे मिलने नही दिया गया. आपके पति के मरने के बाद ही इस वसीयत का पता ठाकुर साहब को चला था. उससे पहले सिर्फ़ मैं जानता था के जायदाद आपके नाम हो चुकी है" देवधर ने जवाब दिया.

"एक बात समझ नही आई" रूपाली ने देवधर की और देखते हुए कहा "ठाकुर गौरव सिंग के नाम से जायदाद मेरी सास के नाम पर इसलिए गयी क्यूंकी वो मारे गये. पर मेरी सास के नाम से जायदाद हटाकर मेरी पति के नाम क्यूँ की गयी जो की उस वक़्त सिर्फ़ मुश्किल से 10 साल के थे? और दूसरी बात ये के क्यूँ कभी जायदाद ठाकुर के नाम नही हुई जो की अपने पिता की बड़े बेटे थे?"

देवधर की पास इन सवालों का कोई जवाब नही था

"ये बात तो शायद सिर्फ़ ठाकुर शौर्या सिंग के पिता भी बता सकते थे" देवधर बोला "ठाकुर के नाम जायदाद ना करने की वजह शायद उनका गुस्सा हो सकता था जो हमेशा से ही बड़ा तेज़ था. सिर्फ़ 15 साल की उमर में उन्होने घर के नौकर को गोली मार दी थी जबकि उनके पिता इसके बिल्कुल उल्टा थे. वो एक शांत आदमी थे जो हर किसी से प्यार से बात करते थे. शायद उन्हें ठाकुर शौर्या सिंग के गुस्से का डर था इसलिए उनके नाम कुच्छ नही किया. पर आपकी सास के नाम से जायदाद हटाने की वजह मैं खुद भी नही जानता."

"वसीयत आपने ही बदली थी?" रूपाली ने पुचछा तो देवधर हस्ने लगा

"मैं तो उस कॉलेज में ही था शायद. वसीयत मेरे पिताजी ने बदली थी"

"और वो कहाँ हैं?" रूपाली ने पुचछा तो देवधर ने अपनी एक अंगुली आसमान की तरफ उठा दी. रूपाली समझ गयी के देवधर का बाप मार चुका था.

"और फिर मेरे नाम? वो वसीयत तो आपने बदली होगी?" रूपाली के इस सवाल पर देवधर ने हां में सर हिलाया

"मरने से कुच्छ दिन पहले ठाकुर पुरुषोत्तम मेरे पास आए थे. काफ़ी परेशान लग रहे थे. मैने वसीयत बदलने की वजह पुछि तो हॅस्कर कहने लगे के भाई आदमी का सब कुच्छ उसकी बीवी का ही तो होता है"

"तो अगर मैं कोर्ट में पहुँच जाऊं के ये सब मेरा है और बेचना शुरू कर दूँ तो मुझे कोई नही रोक सकता?" रूपाली ने पुचछा

"इतना आसान नही है" देवधर ने कहा "एक ये बात के वसीयत बार बार बदली गयी आपके खिलाफ जा सकती है. कोई भी आपके पति की वसीयत को कोर्ट में चॅलेंज कर सकता है और जब तक कोर्ट का फ़ैसला ना हो जाए, तब तक कुच्छ भी किसी को नही मिलेगा"

"कौन चॅलेंज कर सकता है?" रूपाली बोली

"कोई भी" देवधर ने हाथ फेलाते हुए जवाब दिया "ठाकुर साहब, आपके देवर ठाकुर तएजवीर, सबसे छ्होटे देवर कुलदीप, आपकी ननद कामिनी और सबसे बड़ी परेशानी खड़ी करेगा ठाकुर साहब का भतीजा जय"

"जय?" रूपाली फिर से हैरान हुई

"देखिए जय ने ठाकुर साहब की जायदाद आधी अपने नाम इस लिए कर ली क्यूंकी ठाकुर साहब के नाम पर कभी कुच्छ नही था. सब कुच्छ आपके पति के नाम पर था और ठाकुर साहब ने मुझे आपके पति की वसीयत का ज़िक्र करने से मना किया था. मैने नयी वसीयत के बारे में मुँह नही खोला और इस हिसाब से सब कुच्छ मौत के बाद भी आपके पति के नाम पर था. अब आपके पति को अपने कज़िन जय पर इतना भरोसा था के उन्होने उसे पोवेर ऑफ अटर्नी दे रखी थी जिसका फ़ायदा जय ने उनके मरने के बाद उठाया और धीरे धीरे प्रॉपर्टीस अपने नाम पर करता रहा. पेपर्स में उसने ये लिख दिया के असल मलिक अब ज़िंदा नही है और बिज़्नेस के भले के लिए ये फ़ैसला लिया जाना ज़रूरी है. अब अगर आप कोर्ट पहुँच जाती हैं ये कहते हुए के सब कुच्छ आपका है तो जो कुच्छ जाई ने अपने नाम पर किया था वो सब भी चॅलेंज हो जाएगा. क्यूंकी फिर ये बात उठ जाएगी के पति के मरते ही सब कुच्छ आपका हो गया था तो आपके पति की दी हुई पवर ऑफ अटर्नी भी बेकार हो जाती है. और उसका फ़ायदा उठाकर आपके पति के मरने के बाद उसने जो भी नये पेपर्स बनाए थे वो सब भी बेकार हो जाएँगे. इस हिसाब से सब कुच्छ फिर आपकी झोली में आ गिरेगा और जय सड़क पर आ जाएगा"

देवधर से थोड़ी देर और बात करके रूपाली वापिस हवेली की और चल पड़ी. ख़ान ने जो कुच्छ कहा था उस बात पर देवधर ने सच्चाई की मोहर लगा दी थी. रूपाली की आँखो के आगे दुनिया जैसे घूम रही थी. उसे समझ नही आ रहा था के किस्पर भरोसा करे और किस्पर नही. हर कोई उसे एक अजनबी लग रहा था. पिच्छले सवालों के जवाब मिले नही थे के नये कुच्छ और उठ खड़े हुए.

क्यूँ ठाकुर ने उस तक देवधर को पहुँचने नही दिया. क्यूँ उससे ये बात च्छुपाई गयी? शायद पहले ना बताने की वजह उसका चुप चुप रहना था पर एक बार जब वो ठाकुर के साथ सो चुकी थी तो तब ठाकुर ने उसको कुच्छ क्यूँ नही कहा? दूसरा उसे सब कुच्छ अपनी सास के नाम से हटाकर उसके पति के नाम पर कर देने की बात बहुत अजीब लगी? और पुरुषोत्तम मरने से पहले इतने परेशान क्यूँ थे? क्या उन्हें एहसास हो गया था के उन्हें नुकसान पहुँचाया जा सकता है और अगर हां तो उन्होने रूपाली से इस बात का ज़िक्र क्यूँ नही किया?

अब तक ये बात रूपाली के सामने सॉफ हो चुकी थी की उसकी पति की मौत की वजह ये सारी जायदाद ही थी. पर सवाल ये था के मौत का ज़िम्मेदार कौन था? उसके सामने सबके चेहरे घूमने लगे और उसे हर कोई एक हत्यारा नज़र आने लगा.

"जय ऐसा कर सकता था. सबसे ज़्यादा वजह उसी के पास थी क्यूंकी वो ठाकुर के खानदान से चिढ़ता था. पर तेज भी तो हो सकता है. अपनी अययाशी के लिए उसे पैसा चाहिए जो बहुत जल्दी मिलना बंद हो जाता क्यूंकी सारी जायदाद पुरुषोत्तम के पास थी. और सबसे छ्होटा भाई कुलदीप. वो भी तो उसके पति की मौत के वक़्त यहीं था. चुप चुप रहता है पर है बहुत तेज़ और इस बात का सबूत थी उसके कमरे से मिली वो ब्रा. क्या ठाकुर साहब खुद? हां क्यूँ नही. ये जायदाद बड़ा होने के नाते उन्हें मिलनी चाहिए थी पर मिली नही. कभी नही मिली. यहाँ से वहाँ होती रही पर उनके नाम नही हुई. और फिर देवधर को भी तो उन्होने मुँह खोलने से मना किया था. बिल्कुल कर सकते हैं वो ऐसा. सरिता देवी? ये सारी जायदाद अचानक ही उनके नाम से हटा दी गयी थी.हाथ आई इतनी सारी दौलत निकल जाए तो क्या बेटा और कहाँ का बेटा. हो सकता है उन्होने किया हो और पुरुषोत्तम मरने से पहले उन्हें ही तो छ्चोड़ने मंदिर गये थे. कामिनी? लड़की थी पर ऐसा करने की हिम्मत बिल्कुल थी उसमें. उसका किसी से प्यार था और ये बात ठाकुर बर्दाश्त ना करते. पर अगर सारी दौलत उसकी हो जाती तो कोई क्या कर सकता था"

कामिनी के प्रेमी के बारे में सोचते ही रूपाली को ध्यान आया के वो अब जानती है के उसका प्रेमी कौन था. उसका अपना छ्होटा भाई इंदर जिसने उससे हमेशा ये राज़ च्छुपाकर रखा. पर क्यूँ? उसको भला क्या ऐतराज़ होता अगर इंदर कामिनी से शादी करना चाहता. रूपाली अपने ख्यालों में इतना खोई हुई थी के कई बार आक्सिडेंट होते होते बचा. शाम के करीब 4 बजे वो हवेली वापिस पहुँची और हवेली में कदम रखते ही चौंक पड़ी. बड़े कमरे में खड़ा था उसका छ्होटा भाई इंदर. ठाकुर ईन्द्रसेन राणा.

"वो आए हैं महफ़िल में चाँदनी लेकर, के रोशनी में नहाने की रात आई है" रूपाली को आता देख इंदर खड़ा हुआ

"कब आया इंदर?" एक पल के लिए अपने भाई को देखकर रूपाली जैसे सब कुच्छ भूल गयी

"मैं तो सुबह ही आ गया था दीदी" इंदर बहेन के गले लग गया "पता चला के आप सुबह से कहीं गयी हुई हैं"

"हां कुच्छ काम था" रूपाली भाई के सर पर हाथ फेरते हुए बोली "आ बैठ ना"

"ठाकुर साहब के बारे में पता चला" तेज ने कहा "बहुत अफ़सोस हुआ. मैं आते हुए हॉस्पिटल होता हुआ आया था. अभी भी बेहोश हैं"

"हां जानती हूँ" रूपाली साँस छ्चोड़ते हुए बोली

इंद्रासेन राणा करीब 30 साल का एक बहुत खूबसूरत आदमी था. उसको भगवान ने ऐसा बनाया था के लड़कियाँ देखकर दिल थाम लें और लड़के जल जाए. लंबा चौड़ा कद, गोरा रंग, टन्द्रुस्त शरीर और जब बोलता था तो लगता था के जैसे फूल झाड़ रहे हों. रूपाली काफ़ी देर तक इंदर के साथ वहीं बैठी बात करती रही और पता ही नही चला के कब रात के 9 बज गये. वक़्त का एहसास तब हुआ जब तेज हवेली में दाखिल हुआ. इंदर को सामने बैठा देख वो एक पल के लिए रुका और फिर हाथ आगे करता इनडर की तरफ बढ़ा.

"कैसे हैं ठाकुर इंद्रासेन?" वो हमेशा इंदर को उसके पूरे नाम से ही बुलाता था

"मैं ठीक हूँ बड़े भाय्या" इंदर ने भी आगे बढ़कर हाथ आगे मिलाया

"आज इस तरफ कैसे आना हुआ?" तेज ने पुचछा तो इंदर ने मुस्कुरा के कंधे झटकाए

"ऐसे ही आप लोगों की याद आई तो मिलने चला आया"

खाने की टेबल पर तीनो साथ थे. रूपाली ने ध्यान दिया के पायल की नज़र तेज पर कुच्छ ज़्यादा ही थी. वो उसका ख़ास तौर पर ध्यान रख रही थी. बार बार आकर उससे पुछ्ति के कुच्छ चाहिए तो नही. इंदर को देख कर मुस्कुराती. रूपाली भी दिल ही दिल में उसकी हरकत देख कर मुस्कुरा उठी. ये पहली बार नही था के उसने अपने भाई के आस पास लड़कियों की पागल होते हुए देखा था. उसके भाई के पिछे पागल होने वाली एक तो उसकी अपनी ननद ही थी.

इंदर को उसने ग्राउंड फ्लोर पर ही कमरे दे दिया. जब वो और तेज अपने कमरे में चले गये तो वो बिंदिया और पायल को किचन सॉफ करने का कहकर अपने कमरे में पहुँची. वो तेज से कामिनी के बारे में और आज हुई देवधर से मुलाक़ात के बारे में बात करना चाह रही थी इसलिए एक नाइटी पहेनकर तेज के कमरे में पहुँची.

तेज के कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था. वो अंदर दाखिल हुई. एक नज़र केमर में दौड़ाई तो तेज कहीं नज़र नही आया. रूपाली ने उसे बुलाने के लिए आवाज़ देनी चाही ही थी के अचानक उसके पेर हवा में उठ गये. एक हाथ पिछे से उसकी कमर पर होता हुआ सीधा नाइटी के उपेर से उसकी चूत पर आया और दूसरा उसकी एक छाती पर और उसे हवा में थोडा सा उपेर उठा दिया गया. अपनी कमर पर उसे किसी की छाती महसूस हुई और नीचे से एक लंड उसकी गांद पर आ दबा.

"आज इतनी देर कहाँ लगा दी थी?" पीछे से तेज की आवाज़ आई

ये सब एक पल में हुआ. रूपाली को कुच्छ कहने या करने का मौका ही नही मिला. और उसके अगले ही पल तेज को एहसास हुआ के उसने बिंदिया को नही बल्कि रूपाली को पकड़ रखा है. उसके हाथ रूपाली के जिस्म से फ़ौरन हट गये जैसे रूपाली में अचानक से करेंट दौड़ गया हो. वो जल्दी से 2 कदम पिछे को हुआ और परेशान नज़र से रूपाली को देखने लगा.

"माफ़ कीजिएगा भाभी" उसे समझ नही आ रहा था के क्या कहे "वो मुझे लगा के..... के....."

उसे समझ नही आया के कैसे रूपाली से कहे के वो घर की नौकरानी को चोद रहा था.

दोनो के लिए वो सिचुयेशन इतनी अजीब हो गयी के रूपाली चाह कर भी कुच्छ कह ना सकी. वो तेज से कुच्छ बात करने आई थी पर उस वक़्त उसने कुच्छ ना कहना बेहतर समझा और चुपचाप कमरे से निकल गयी.

फिर मिलेंगे अगले पार्ट मैं तब तक के लिए विदा

raj..
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Re: सेक्सी हवेली का सच

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:43

सेक्सी हवेली का सच --21

अपने कमरे में पहुँच कर वो बिस्तर पर गिर पड़ी. ये दूसरी बार था के तेज ने उसे इस तरह से पकड़ा था. एक बार नशे में और दूसरी बार अंजाने में. उस्नी रूपाली की छाती को पकड़कर इतनी ज़ोर से दबाया था के रूपाली को अब तक दर्द हो रहा था. उसने अपनी छाती को सहलाया और तभी उसे तेज का वो चेहरा याद आया जब वो उसे खड़ा देख रहा था. और फिर जिस तरह से वो ये नही कह पाया था के उसने बिंदिया का सोचकर रूपाली को पकड़ा था वो सोचकर रूपाली की हल्की सी हसी छूट पड़ी. उसे क्या पता था के बिंदिया उससे चुदवा सिर्फ़ इसलिए रही है क्यूंकी रूपाली ने ऐसा कहा था.

आज की रात भी कोई अलग रात ना थी. आज की रात भी रूपाली बिस्तर पर पड़ी अपने जिस्म की आग में जल रही थी. उसे समझ नही आ रहा था के क्या करे. उसका जिस्म वासना से तप रहा था जैसे बुखार हो गया हो. थोड़ी देर के लिए उसने अपने हाथ का सहारा लेना चाहा पर बात बनी नही. उसका गला सूखने लगा था. उसने उठकर अपने कमरे में रखे जग की तरफ देखा पर उसमें पानी नही था. बिस्तर से उठकर उसने अपने कपड़े ठीक किए और नीचे उतरकर किचन की तरफ बढ़ी.

किचन में खड़ी वो पानी पी ही रही थी के उसे किसी के कदमो की आवाज़ सुनाई दी. रात का सन्नाटा हर तरफ फेल चुका था और उस खामोशी में किसी के चलने की आवाज़ सॉफ सुनाई दे रही थी. कोई सीढ़ियाँ चढ़ रहा था. रूपाली को हैरत हुई के इस वक़्त कौन हो सकता है. उसने किचन से बाहर निकालकर देखा तो इंदर सीढ़ियाँ चढ़कर कामिनी के कमरे की तरफ जा रहा था. उसके चलने का अंदाज़ ही चोरों जैसा था जैस वो घर में चुपके से चोरी करने के लिए घुसा हो. कामिनी के कमरे तक पहुँचकर उसने इधर उधर देखा और फिर धीरे से दरवाज़ा खोलने की कोशिश की. दरवाज़ा लॉक्ड था. रूपाली को सबसे ज़्यादा हैरत उस वक़्त हुई जब इंदर ने अपनी जेब से एक चाभी निकाली और कामिनी के कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाखिल हो गया.

रूपाली एक पल के लिए वही खड़ी रही. वो इंदर से अभी कामिनी के बारे में बात नही करना चाहती थी. उसका ख्याल था के सही वक़्त देखकर इंदर के सामने ये बात उठाएगी पर इंदर को कामिनी के कमरे में यूँ घुसता देख रूपाली से रहा नही गया.

वो हल्के कदमों से सीढ़ियाँ चढ़कर पहले अपने कमरे में पहुँची. उसने अलमारी से कामिनी की डाइयरी निकाली और फिर कामिनी के कमरे के सामने आई इंदर ने अपने पीछे कामिनी का कमरा बंद अंदर से कर लिया था पर रूपाली के पास हवेली के हर कमरे की चाबी थी. उसने अपनी चाबी से रूम का लॉक खोला, हॅंडल घुमाया और एक झटके में पूरा दरवाज़ा खोल दिया.

सामने इनडर कामिनी की अलमारी के सामने खड़ा उसके कपड़ो में कुच्छ ढूँढ रहा था. दरवाज़ा यूँ खोल दिए जाने से वो पलटा और सामने रूपाली को देखकर उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. चेहरा यूँ सफेद हो गया जैसे काटो तो खून नही. हाथ में पकड़े कामिनी के कुच्छ कपड़े उसके हाथ से छूट कर ज़मीन पर गिर पड़े.

"क्या ढूँढ रहे हो इंदर?" कामिनी ने पुचछा

इंदर से जवाब देते ना बना

"क्या ढूँढ रहे थे?" रूपाली ने अपने पिछे दरवाज़ा बंद कर लिया और थोड़ी ऊँची आवाज़ में पुचछा

"जी दीदी ... वो .... मैं..... "इंदर की ज़ुबान लड़खड़ा गयी

रूपाली ने अपने हाथ में पकड़ी कामिनी की डाइयरी आगे की

"ये तो नही ढूँढ रहे थे?"

रूपाली के हाथ में डाइयरी देखकर इंदर समझ गया के उसका राज़ खुल चुका है. वो नज़रें नीची करके ज़मीन की और देखने लगा

"काब्से चल रहा था ये सब?" रूपाली ने वहीं खड़े खड़े पुचछा

जब इंदर ने जवाब ना दिया तो उसने अपना सवाल फिर दोहराया.

"जी आपकी शादी होने से तकरीबन एक साल पहले से....." इंदर को इस बार जवाब देना पड़ा.

इस बार हैरान होने की बारी रूपाली की थी

"तुम मेरी शादी होने से पहले से कामिनी को जानते थे?"

थोड़ी देर बाद वो दोनो रूपाली के कमरे में बैठे थे. रूपाली को लगा के यूँ कामिनी के कमरे में खड़े होकर बात करना ठीक नही होगा. कोई भी जाग सकता है. वो इंदर को अपने आठ अपने कमरे में ले आई.

"मुझे सब कुच्छ मालूम करना है, सब कुच्छ " रूपाली ने पहले कामिनी की डाइयरी बिस्तर पर इंदर के सामने फेंकी और फिर वो काग़ज़ जिसपर इंदर ने एक शेर लिखा था "और तुम शायरी काब्से करने लगे? और वो भी इतनी अच्छी उर्दू में?"

"मेरी नही हैं" इंदर सर झुकाए बोला " कामिनी को शायरी बहुत पसंद थी इसलिए मैं कहीं से पढ़कर उसे ये सब भेजता था. आप जानती हैं शायरी करना मेरे बस की बात नही"

"कैसे शुरू हुआ ये सब?" रूपाली अपने भाई के सामने बैठते हुए बोली

"मेरे एक दोस्त की शादी में मिली थी मुझे कामिनी. वो लड़की वालों की तरफ से आई थी. वहाँ हमारी जान पहचान हो गयी. घर आकर हम अक्सर फोन पर बात किया करते थे और ये कब ये दोस्ती प्यार में बदली मुझे पता ही नही चला" इनडर किसी तोते की तरह कहानी सुना रहा था.

"इरादा क्या था?" रूपाली का गुस्सा अब थोड़ा ठंडा हो चला था

"शादी करना चाहता था मैं उससे." रूपाली को इंदर की ये बात सुनकर बड़ा अजीब लगा. इंदर शकल सूरत से ऐसा था के वो जिस लड़की की तरफ देख लेता वो लड़की उसे अपनी खुश नसीबी समझती जबकि कामिनी एक बेहद मामूली सी शकल सूरत वाली लड़की थी.

"फिर इसे किस्मत कहिए या कुच्छ और के आपकी शादी भी कामिनी के घर में ही हुई. उस वक़्त हम लोग बहुत खुश थे. कामिनी खुद बहुत खुश थी. मैने कई बार चाहा के वो आपसे बात करे और हमारे बारे में बताए पर वो हमेशा आपके सामने इस बारे में बात करने से शरमाती थी. कहती थी के भाभी पता नही क्या सोचेंगी." इंदर ने आगे कहा

उसकी ये बात सुनकर रूपाली को जैसे अपने एक सवाल का जवाब मिल गया. तो ये वजह थी के कामिनी उसके सामने आने से कतरा जाती थी. उस वक़्त रूपाली बहुत ज़्यादा पूजा पाठ में रहा करती थी तो कामिनी का ये सोचना के कहीं वो उसके और अपने भाई के रिश्ते के खिलाफ ना हो जाए जायज़ था. उसकी जगह कोई भी लड़की होती तो डरती. ख़ास तौर से जब बाप और भाई ठाकुर शौर्या सिंग और तेज जैसे हों.

"हम लोग शहेर में ही मिला करते थे. वो अपने ड्राइवर और बॉडीगार्ड को हवेली में ही छ्चोड़कर मुझसे मिलने शहेर आ जाया करती थी." इंदर अब बिना पुच्छे ही सब बता रहा था

उसकी इस बात ने रूपाली के दूसरे सवाल का जवाब दे दिया.तो वो इंदर ही था जिससे मिलने कामिनी जाया करती थी, अकेले. तभी उसे बिंदिया की कही वो बात याद आई जब उसके मर्द ने खेतों में बने ट्यूबिवेल वेल कमरे में कामिनी को चुड़वाते हुए देखा था.

"जब शहेर में मिलते थे तो यहाँ खेतों में मिलने की क्या ज़रूरत थी? डर नही लगा तुम दोनो को?" रूपाली ने पुचछा

"खेतों में?" इंदर ने हैरानी से पुचछा "आप मज़ाक कर रही हैं? यहाँ मिलना तो खुद मौत को दावत देने जैसा था"

"क्या?" रूपाली कुच्छ ऐसे बोली के उसकी हैरानी उसकी आवाज़ में छलक उठी "तुम उसे ट्यूबिवेल वाले कमरे में नही मिलते थे?"

"ट्यूबिवेल?" इंदर ने पुचछा "कौन सा ट्यूबिवेल?"

रूपाली समझ गयी के उसे इस बारे में कुच्छ पता नही था और वो उसकी आँखें देखकर बता सकती थी के वो सच बोल रहा है

"नही कुच्छ नही" रूपाली बात टालने के अंदाज़ में बोली "वो उसकी डाइयरी पढ़कर मुझे लगा के तुम लोग यहीं खेतों में मिला करते थे"

"नही यहाँ कहीं आस पास तो वो खुद ही नही मिलना चाहती थी. मैने उसे कई बार कहा के हम घर पर बात कर लेते हैं पर वो जाने क्यूँ हर बार मना कर देती थी. और फिर वो धीरे धीरे बदलने लगी. मुझसे उसकी बात भी काफ़ी कम हो गयी. मैने कई बार उससे पुच्छने की कोशिश की पर उसने हर बार टाल दिया. और फिर एक दिन उसका फोन आया के वो मुझसे शादी नही करना चाहती क्यूंकी वो मेरे लायक नही है. ये कहकर उसने फोन रख दिया"

"कबकि बात है ये?" रूपाली ने पुचछा

"ठीक उसी दिन जब जीजाजी का खून हुआ था. उसका फोन रखने के थोड़ी देर बाद ही हमें हवेली के नौकर का फोन आया था और उसने मुझे बताया के बड़े भाई साहब का खून हो गया था." इंदर ने कहा

रूपाली की धड़कन तेज़ होने लगी पर उसने अपने चेहरे पर कुच्छ ज़ाहिर ना होने दिया

"फिर कभी बात नही हुई?" उसने इंदर से पुचछा

"मैने कई बार उसे फोन करने की कोशिश की पर वो हर बार मेरी आवाज़ सुनकर फोन काट देती थी. और फिर एक दिन मुझे पता चला के वो विदेश चली गयी और बस हमारी कहानी ख़तम हो गयी" इंदर सर झुकाए बोला

कमरे में थोड़ी देर खामोशी रही

"तो तुम अब उसके कमरे में क्या ढूँढ रहे थे?" रूपाली ने खड़े होते हुए पुचछा

"ये" इंदर ने उस काग़ज़ की तरफ इशारा किया जो रूपाली को कामिनी की डाइयरी से मिला था "और ऐसे कई और पेपर्स. मुझे डर था के अगर ये आप के हाथ कभी लग गया तो आप मेरी हॅंडराइटिंग पहचान जाएँगी.

अगले दिन सुबह रूपाली रूपाली इंदर के साथ हॉस्पिटल पहुँची. डॉक्टर ने बताया के ठाकुर की हालत में अब भी कोई सुधार नही आया था. भूषण अब भी ठाकुर के साथ हॉस्पिटल में ही था.थोड़ी देर वहीं रुक कर रूपाली हवेली वापिस आ गयी. सुबह के 10 बस चुके थे. तेज रूपाली को बड़े कमरे में बैठा मिला.

"तेज हमें आपसे कुच्छ बात करनी है. आप हमारे कमरे में आ जाइए" रूपाली ने तेज से कहा और उसके जवाब का इंतेज़ार किए बिना ही अपने कमरे में चली आई

थोड़ी देर बाद ही तेज रूपाली के कमरे में दाखिल हुआ

"दरवाज़ा बंद कर दीजिए" रूपाली ने तेज से कहा

दरवाज़ा बंद कर देते ही तेज ने अपने दोनो हाथ जोड़ दिए

"हमें माफ़ कर दीजिए भाभी. बहुत बड़ा पाप हो गया हमसे कल रात. पर वो सब अंजाने में हुआ"

रूपाली ने इशारे से तेज को बैठने को कहा.

"कोई बात नही. हमने उस बारे में बात करने के लिए नही बुलाया है आपको. हमें कुच्छ और ज़रूरी बात करनी है" कहते हुए रूपाली अपनी टेबल तक गयी और ड्रॉयर से पुरुषोत्तम सिंग की वसीयत निकाली

तेज हैरानी से उसकी और देख रहा था. उसे उम्मीद थी के रूपाली उससे कल रात के बारे में सवाल जवाब करेगी पर वो तो उस बारे में कोई बात ही नही करना चाह रही थी. जैसे कुच्छ हुआ ही ना हो

"आपने कामिनी से आखरी बार बात कब की थी?" रूपाली तेज की और देखते हुए बोली

"उसके विदेश जाने से पहले" तेज ने सोचते हुए कहा

रूपाली समझ गयी के तेज को कामिनी के बारे में कोई जानकारी नही है

"और कुलदीप से?" रूपाली ने पुचछा तो तेज सोच में पड़ गया

"शायद जब वो आखरी बार हवेली आया था तब."

"फोन पर बात नही हुई आपकी कभी?" रूपाली ने पुचछा तो तेज ने इनकार में सर हिला दिया. रूपाली को इसी जवाब की उम्मीद थी. तेज को अययाशी से टाइम मिलता तो अपने भाई और बहेन के बारे में सोचता

"ये कामिनी का पासपोर्ट है" रूपाली ने अपने हाथ में पकड़ा पासपोर्ट तेज को थमा दिया "अगर ये यहाँ है तो कामिनी विदेश में कैसी हो सकती है?"

तेज हैरानी से पासपोर्ट की तरफ देखने लगा

"मतलब? तो कहाँ है कामिनी?" उसने रूपाली से पुचछा

"हमें लगा के आपको पता होगा" रूपाली ने जवाब दिया

"ये कहाँ मिला आपको?" तेज ने फिर सवाल किया

"वो ज़रूरी नही है" रूपाली ने उसे बेसमेंट में रखे बॉक्स के बारे में बताना ज़रूरी नही समझा "ज़रूरी ये है के ये यहाँ हवेली में मिला, जबकि हिन्दुस्तान में ही नही मिलना चाहिए था"

तेज खामोशी से बैठा अपनी सोच में खोया हुआ था

"एक बात और है" रूपाली ने कहा और पुरुषोत्तम की वसीयत तेज के हाथ में थमा दी और चुप रही. तेज खुद ही वसीयत खोलकर पढ़ने लगा.जैसे जैसे वो पेजस पलट रहा था, वैसे वैसे उसके चेहरे के भाव भी बदल रहे थे. जब वो पूरी वसीयत पढ़ चुका तो वो थोड़ी देर तक ज़मीन की तरफ देखता रहा और फिर नज़र उठाकर रूपाली की तरफ देखा

"कुच्छ ग़लत मत सोचना तेज" इससे पहले के वो कुच्छ कहता रूपाल खुद बोल उठी "मैं ऐसा कुच्छ नही चाहती. मैं ये वसीयत खुद बदलने वाली हूँ"

तेज अब भी खामोशी से उसे देखता रहा

"मुझे ये दौलत नही चाहिए तेज. मैं सिर्फ़ अपने घर को, इस हवेली को एक घर की तरह देखना चाहती हूँ. तुम चाहो तो मैं अभी फोन करके वकील को बुला लेती हूँ. ये दौलत सारी मुझे मिल जाए, मैं नही चाहती के ऐसा हो"

"ऐसा मैं होने भी नही दूँगा" तेज ने कहा और इससे पहले के रूपाली कुच्छ कह पाती वो उठकर कमरे से बाहर चला गया

रूपाली जो करना चाहती थी वो हो गया. उसे देखना था के क्या तेज को दौलत को भूख है और वो उसने देख लिया था. अगर तेज खामोशी से बैठा रहता तो इस बात का सवाल ही नही होता था के इस दौलत के लिए उसने अपने भाई को मारा हो पर यहाँ तो उल्टा ही हुआ. रूपाली ने उसे अभी बताया था के उसकी बहेन 10 साल से गायब है और उसकी फिकर करने के बजाय वो हाथ से निकलती दौलत के पिछे चिल्लाता हुआ कमरे से चला गया था. जिसको अपनी बहेन की कोई फिकर नही, वो दौलत के लिए अपने भाई का खून क्यूँ नही कर सकता. बिल्कुल कर सकता है.

थोड़ी देर बाद रूपाली भी नीचे बड़े कमरे में आई. तेज का कहीं आता पता नही था. रूपाली ने खिड़की से बाहर देखा तो उसकी कार भी बाहर नही थी.

सामने रखे फोन को उठाकर रूपाली देवधर का नंबर मिलाने लगी.

"कहिए रूपाली जी" दूसरी तरफ से देवधर की आवाज़ आई

"मैं चाहती हूँ के कल आप हवेली आएँ" रूपाली ने देवधर से कहा. देवधर ने हां कर दी तो उसने फोन रख दिया और इंदर के कमरे में आई

इंदर अपने कमरे में नही था. रूपाली किचन में पहुँची तो वहाँ बिंदिया दोपहर का खाना बनाने में लगी हुई थी. चंदर उसके साथ खड़ा उसकी मदद कर रहा था

"इंदर को देखा कहीं?" रूपाली ने बिंदिया से पुचछा

"अभी थोड़ी देर पहले तो बड़े कमरे में ही थे" बिंदिया ने कहा

रूपाली ने हवेली के बाहर कॉंपाउंड में आकर देखा तो इंदर की कार वहीं खड़ी हुई थी. वो कॉंपाउंड में इधर उधर देखने लगी पर इंदर नज़र नही आया. उसे ढूँढती हुई वो हवेली के पीछे की तरफ आई तो देखा के बेसमेंट का दरवाज़ा खुला हुआ था

"ये किसने खुला छ्चोड़ दिया?" सोचते हुए रूपाली दरवाज़े के पास पहुँची. उसने दरवाज़ा बंद करने की सोची ही थी के बेसमेंट के अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी. गौर से सुना तो वो आवाज़ पायल की थी.

"ये यहाँ क्या कर रही है?" सोचते हुए रूपाली ने पहली सीधी पर कदम रखा ही था के उसके कदम फिर से रुक गये

"आआअहह क्यार कर रहे हैं आप" ये आवाज़ पायल की थी

raj..
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Re: सेक्सी हवेली का सच

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:43

रूपाली ने अपने कदम धीरे धीरे सीढ़ियों पर रखे और किसी चोर की तरह उतरती हुई नीचे पहुचि. सीढ़ियों पर खड़े खड़े ही उसने धीरे से गर्दन घूमकर बेसमेंट में झाँका तो उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी.

पायल एक टेबल पर बैठी हुई थी. ये वही टेबल थी जिसपर झुका कर चंदर ने उसे चोदा था. वो टेबल के किनारे पर बैठी हुई थी और हाथों के सहारे से पिछे को झुकी हुई थी. उसकी सलवार उतरी हुई एक तरफ पड़ी थी और दोनो टांगे सामने नीचे ज़मीन पर बैठे इंदर के कंधो पर थी. इंदर ने उसकी दोनो टाँगो को पूरी तरह फेला रखा था और बीच में बैठा पायल की चूत चाट रहा था.

"आआआह्ह्ह्ह्ह मालिक" पायल कराह रही थी.

रूपाली फ़ौरन फिर से दीवार की ओट में हो गयी. उसे यकीन नही हो रहा था. वो हमेशा अपने भाई को बहुत सीधा सा समझती थी और यही वजह थी के कामिनी के साथ उसके रिश्ते के बारे में सुनकर वो चौंक पड़ी थी. और यहाँ उसका भाई घर की नौकरानी की चूत चाट रहा था, वो भी उस नौकरानी की जिससे वो कल ही मिला था.

एक पल के लिए रूपाली ने सोचा के वहाँ से चली जाए पर फिर जाने क्या सोचकर वो फिर दीवार की आड़ में खड़ी इंदर और पायल को देखने लगी.

इंदर अब उठ खड़ा हुआ था और पायल की होंठ चूम रहा था. वो पायल की टाँगो के बीच खड़ा था और पायल ने अपनी टांगे उसकी कमर के दोनो तरफ लपेट रखी थी और हाथों से वो इंदर के सर को सहला रही थी. इंदर ने थोड़ी देर उसके होंठ चूमने के बाद उसकी चूचियों को कमीज़ के उपेर से ही चूमना शुरू कर दिया और उसकी नंगी जाँघो पर हाथ फेरने लगा. पायल वासना से अपने सर को ज़ोर ज़ोर से इधर उधर झटक रही थी.

"जल्दी कीजिए मालिक. कोई आ जाएगा" पायल ने आँखें बंद किए हुए ही कहा

उसकी बात सुनकर इंदर ने दोबारा उसके होंठ चूमने शुरू कर दिए और अपनी पेंट की ज़िप खोलने लगा. थोड़ी ही देर में उसकी पेंट सरक कर नीचे जा पड़ी और रूपाली फ़ौरन फिर से दीवार के पिछे हो गयी. वो अपनी ही छ्होटे भाई को नंगा नही देखना चाहती थी. एक पल के लिए उसने कदम उठाए के बेसमेंट से बाहर चली जाए पर तब तक खुद उसके जिस्म में आग लग चुकी थी. उसका एक हाथ कब उसकी चूत पर पहुँच गया था उसे पता भी नही चला था. उसने एक पल के लिए सोचा और फिर से इंदर और पायल को देखने लगी.

इंदर अपना कार्य करम शुरू कर चुका था. उसका लंड पायल की चूत में अंदर बाहर हो रहा था. अब पायल टेबल पर सीधी लेट गयी थी. उसकी गांद टेबल के बिल्कुल कोने पर थी और टांगे इंदर के कंधो पर जो उसकी टाँगो के बीचे खड़ा अपना लंड अंदर बाहर कर रहा था. पायल की कमीज़ उसने खींच कर उपेर कर दी थी और दोनो चूचियों को ऐसा मसल रहा था जैसे आता गूँध रहा हो.

"पहले भी करवा चुकी हो क्या?" उसने पायल से पुचछा

"नही" पायल ने सर हिलाते हुए जवाब दिया

"फिर तुम्हें ..... "इंदर ने कुच्छ कहना चाहा और फिर बात अधूरी छ्चोड़कर पायल की चूत पर धक्के मारने लगा

सीढ़ियों पर खड़ी रूपाली का हाथ उसकी चूत के साथ जुंग लड़ रहा था. उसे यकीन नही हो रहा था के वो च्छुपकर अपने भाई को किसी लड़की को चोद्ते हुए देख रही है और बजे वहाँ से जाने के खुद भी गरम हो रही थी.

इंदर के धक्के अब काफ़ी तेज़ हो चुके थे.

"और ज़ोर से मलिक" पायल अपनी आह आह के बीच बोल रही थी.

रूपाली को हैरत हुई के कहाँ तक कल की सीधी सी शर्मीली और कहाँ आज खुद ज़ोर से ज़ोर से का नारा लगा रही थी. उसकी खुद की हालत अब तक खराब हो चुकी थी और वो जानती थी के फिलहाल उसके पास चूत की आग भुझाने का कोई तरीका नही था. और जिस तरह से इंदर धक्के मार रहा था, रूपाली समझ गयी के अब काम ख़तम होने वाला है. उसने अपना हाथ चूत से हटाया, अपने कपड़े ठीक किए और धीरे से सीढ़ियाँ चढ़ती बेसमेंट से बाहर निकल गयी.

थोड़ी देर बाद इंदर और रूपाली दोनो बड़े कमरे में बैठे टीवी देख रहे थे. जबसे इंदर बेसमेंट में पायल को चोद्कर आया था तबसे उसके और रूपाली के बीच कोई बात नही हुई थी. रूपाली बैठी टीवी देख रही थी और इंदर उसके पास ही आके खामोशी से बैठ गया था.

रूपाली को समझ नही आ रहा था के अपने भाई के बारे में क्या सोचे. वो भाई जिसे वो दुनिया का सबसे सीधा इंसान समझती रही. जिसके सिर्फ़ 2 शौक हुआ करते थे, शिकार करना और अपना बिज़्नेस संभालना. पिच्छले कुच्छ वक़्त में वो कितना बदल गया था. उसके शौक में कब शायरी और लड़कियाँ जुड़ गयी रूपाली को पता ही ना चला. पर पता चल भी कैसे सकता था. इंदर से पिच्छले 10 साल में मुश्किल से उसने 10 बार बात की होगी और अब पता नही कितने वक़्त के बाद मिली है.

"कामिनी के साथ तेरा रिश्ता कहाँ तक पहुँचा था?" आख़िर में उसने खामोशी तोड़ी और इंदर से पुचछा

"मतलब?" इंदर ने उसकी तरफ नज़र घुमाई

तभी पायल के ग्लास में पानी लेकर कमरे में आई तो रूपाली खामोश हो गयी. रूपाली को पानी थमाते हुए पायल ने एक नज़र इंदर को देखा और मुस्कुरा कर वापिस चली गयी.

"मतलब के तुम लोग कितने करीब थे" रूपाली ने पानी पीते हुए कहा "मेरा मतलब ....."

वो थोड़ी अटकी और फिर अपनी बात कह ही दी

"मेरा मतलब जिस्मानी तौर पर"

इंदर इस बात के लिए तैय्यार नही था. वो चौंक पड़ा

"ये कैसा सवाल है?"

"सवाल जैसा भी है" रूपाली ने सीधा उसकी आँखों में देखते हुए कहा "जवाब क्या है?"

"मैं जवाब देना ज़रूरी नही समझता" इंदर ने गुस्से में कहा और उठकर कमरे से बाहर जाने लगा

"मालकिन" बिंदिया की आवाज़ पर रूपाली ने उसकी तरफ़ नज़र उठाकर देखा

"बाहर पोलीस आई है. वही खाड़ुस इनस्पेक्टर जो हमेशा आता है"

बिंदिया ने कहा तो इंदर के कदम भी रुक गये. उसने पलटकर रूपाली की तरफ देखा

"अंदर ले आओ" रूपाली ने बिंदिया से कहा

थोड़ी देर बाद कमरे में इनस्पेक्टर ख़ान दाखिल हुआ

"सलाम अर्ज़ करता हूँ" वो अपने उसी अंदाज़ में बोला

"तुम अपने कमरे में जाओ" रूपाली ने इंदर को इशारा किया

"अरे नही रुकिये ठाकुर साहब" ख़ान ने फ़ौरन इंदर को रोका "मुझे आपसे भी कुच्छ बात करनी है"

"मुझसे?" इंदर ने हैरानी से पुचछा

"जी आपसे. आइए बैठिए ना. अपना ही घर है" ख़ान ने उसे सामने रखी कुर्सी की तरफ इशारा करके बैठने को कहा

"आप जानते हैं ये कौन है?" रूपाली हैरत में पड़ गयी थी के इंदर से ख़ान क्या बात करना चाहता था

"आपके छ्होटे भाई हैं"ख़ान खुद भी एक चेर पर बैठता हुआ बोला "ठाकुर इंद्रासेन राणा"

"आप कैसे जानते हैं मुझे?" इंदर बैठते हुए बोला

"अजी आप एक ठाकुर हैं. सूर्यवंशी हैं. आपको ना पहचान सकूँ इतनी बड़ा भी बेवकूफ़ नही हूँ मैं" ख़ान ने कहा

ना रूपाली की समझ आया के ख़ान इंदर की तारीफ कर रहा था या मज़ाक उड़ा रहा था और ना खुद इंदर की

"आपके घर फोन किया था मैने तो पता चला के आप बढ़ी बहेन से मिलने गये हुए हैं. अब पोलीस स्टेशन आना तो आप ठाकुरों की शान के खिलाफ है तो मैने सोचा के मैने के मैं ही जाके मिल आऊँ" ख़ान ऐसे कह रहा था जैसे हवेली आकर उसने ठाकुर खानदान पर बहुत बड़ा एहसान किया हो

"कौन है ये आदमी?" इंदर चिड सा गया "और ये क्या बकवास कर रहा है"

"मतलब की बात पर आइए" रूपाली ने इंदर के सवाल का जवाब ना देते हुए ख़ान की तरफ पलटकर कहा

"चलिए मतलब की बात ही करता हूँ" ख़ान बोला और फिर इंदर की तरफ पलटा "वैसे आपको बता दूं के मुझे इनस्पेक्टर मुनव्वर ख़ान कहते हैं, वैसे मेरे चाहने वाले तो मुझे मुन्ना कहते हैं पर मुनव्वर ख़ान मेरा पूरा नाम है और इस इलाक़े में नया आया हूँ. आप चाहें तो आप भी मुझे मुन्ना कहते सकते हैं. अब तो हमारी जान पहचान हो ही गयी है"

"जैसा की आप जानती हैं के आपके पति के खून में मुझे कुच्छ ज़्यादा ही इंटेरेस्ट है" ख़ान रूपाली से बोला "और यकीन मानिए जबसे मैं यहाँ आया हूँ सुबह से शाम तक इसी बारे में सोचता रहता हूँ"

"पर क्यूँ?" रूपाली ने ख़ान की बात बीच में काट दी "मैं जानती हूँ के ये आपका काम है पर हमारे देश के पोलिसेवाले अपना काम काब्से करने लगे?"

रूपाली की बात सुनकर ख़ान हसणे लगा

"फिलहाल के लिए इतना जान लीजिए के मैं ये इसलिए नही कर रहा क्यूंकी ये मेरा काम है. और भी बहुत केस पड़े हैं जिनपर मैं अपना दिमाग़ खपा सकता हूँ. यूँ समझ लीजिए के आपके पति का एक एहसान था मुझपर जो मैं अब उतारने की कोशिश कर रहा हूँ"

"मेरे पति को मरे हुए 10 साल हो चुके हैं" रूपाली ने ख़ान को ताना मारा "अब याद आया है आपको एहसान का बदला चुकाना?"

"वो एक अलग कहानी है" ख़ान ने रूपाली की बात का जवाब नही दिया "फिर कभी फ़ुर्सत में बताऊँगा. फिलहाल मैं जिसलिए आया था वो बात करता हूँ. क्या है के जब आपके पति की मौत हुई थी उस वक़्त उनका पोस्टमॉर्टम नही हुआ था. पोस्टमॉर्टम के लिए बॉडी गयी ज़रूर थी पर बीच में आपके ससुर और आपका सबसे छ्होटा देवर बीच में आ गये थे. वहाँ उन्होने डॉक्टर्स के साथ मार पीट की और बॉडी उठा लाए. अब क्यूंकी वो यहाँ के ठाकुर थे और पोलिसेवाले उनकी जेब में थे इसलिए किसी ने मुँह नही खोला."

"तो?" इस बार रूपाली की जगह इंदर बोला

"तो ये ठाकुर साहब के पोस्टमॉर्टम तो पूरा नही हुआ पर रिपोर्ट्स में इतना ज़रूर लिखा हुआ था के ठाकुर पुरुषोत्तम की मौत कैसे हुई थी"

"गोली लगने से. ये तो हम सब जानते हैं" रूपाली ने कहा

"जी हां आप सब जानते हैं पर अब मैं कुच्छ ऐसा आपको बताता हूँ जो आप नही जानती" ख़ान ले बोलने का अंदाज़ अब कासी सीरीयस हो चुका था "रिपोर्ट्स के हिसाब से ठाकुर पुरुषोत्तम सिंग को एक रेवोल्वर से गोली मारी गयी थी और वो रेवोल्वेर ना तो इंडिया में बनती है और ना ही बिकती है."

रूपाली और इंदर चुप बैठे थे

"ठाकुर साहब को एक कोल्ट अनकॉंडा 6" बॅरल से गोली मारी गयी थी. इस तरह की रिवॉलवर्स अब इंडिया में मिलती हैं या नही ये तो मैं नही जानता पर आज से 10 साल पहले तो बिल्कुल नही मिलती थी. हां ऑर्डर करके मँगवाया ज़रूर जा सकती थी पर उसमें काफ़ी परेशानी होती थी क्यूंकी आप एक हथ्यार खरीद कर दूसरे देश से मग़वा रहे हैं. ये काम सिर्फ़ किसी ऐसी आदमी के बस में था जिसकी अच्छी पहुँच हो और खर्च करने के लिए पैसा बेशुमार हो.जैसे के कोई खानदानी ठाकुर"

"क्या मतलब है आपका" ईन्देर ने गुस्से में पुचछा

"बताता हूँ. सबर रखिए " ख़ान ने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया "तो मैने सोचा के ठाकुर साहब के खानदान से ही शुरू करूँ. अब ठाकुर शौर्या सिंग के खानदान में हथ्यार तो बहुत थे, गन्स भी थी, पर ज़्यादातर दोनाली राइफल्स और जो रिवॉलवर्स या पिस्टल थी वो यहीं इंडिया से खरीदी गयी थी. किसी के भी नाम पर किसी विदेशी बंदूक का रिजिस्ट्रेशन नही था. तो मैने सोचा के क्यूँ ना ठाकुर साहब के रिश्तेदारों में तलाश किया जाए. जब पता लगाया तो मालूम चला के ठाकुर इंद्रासेन राणा ने आज से 11 साल पहले एक कोल्ट अनकॉंडा 6" बॅरल मँगवाई थी."

कमरे में सन्नाटा छा गया. रूपाली और ख़ान दोनो ही इंदर की तरफ देख रहे थे.

"वो इसलिए क्यूंकी मुझे शिकार करने और हथ्यारो का शौक था" इंदर ने अपनी सफाई में कहा

"अब आपकी रिवॉलव कहाँ है ठाकुर?" ख़ान ने सवाल किया

"वो रिवॉलव 10 साल पहले खो गयी थी. मैं शिकार पर गया था और वहीं जंगल में कहीं गिर गयी थी" इंदर ने जवाब दिया

"आपने पोलीस में रिपोर्ट कराई?" ख़ान ने पुचछा

"हम ठाकुर हैं इनस्पेक्टर" इंदर गुस्से में बोलता हुआ खड़ा हुआ "हम अपने मामलो में पोलीस को इन्वॉल्व नही करते"

ये कहकर इंदर गुस्से में पेर पटकता हुआ कमरे से निकल गया

उसके जाने के बाद रूपाली और ख़ान दोनो खामोशी से बैठे रहे. कुच्छ देर बाद रूपाली ने बोलने के लिए मुँह खोला ही था के ख़ान ने उसकी बात बीच में काट दी

"आप ग़लत सोच रही हैं. मैं ये नही कहता के आपके पति को आपके भाई ने मारा है पर ये बहुत मुमकिन है के इन्ही के रेवोल्वेर से आपके पति को गोली मारी गयी."

रूपाली ने सहमति में सर हिलाया और कमरे में फिर खामोशी छा गयी. थोड़ी देर बाद ख़ान उठा

"मुझे यही पता करना था के वो रेवोल्वेर अब ठाकुर इंद्रासेन के पास है के नही. अगर होती तो मैं चेकिंग के लिए माँगता पर ये तो कह रहे हैं के गन ही खो गयी थी. मैं चलता हूँ"

ख़ान जाने लगा तो रूपाली ने उसे रोका

"आप कल सुबह हवेली आ सकते हैं? कुच्छ काम है मुझे"

ख़ान ने हां में सर हिलाया और कमरे से बाहर निकल गया

ओके दोस्तो फिर मिलेंगे अगले पार्ट के साथ