Jaal -जाल compleet

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raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 06:17

जाल पार्ट--36

गतान्क से आगे.

"मैं जा रहा हू,तुम अंदर से दरवाज़ा बंद रखना.बाहर गार्ड को भी बोल जाउन्गा की मुस्तैद रहे."

"ठीक है.वैसे क्या हमे पोलीस को नही बता देना चाहिए?",रंभा ससुर के कोट के कॉलर पे उंगली फिरा रही थी.

"हां,मैं वाहा पहुँच के इन्वेस्टिगेटिंग ऑफीसर को खबर दूँगा..-"

"तन्णन्न्..!",विजयंत & रंभा निचली मंज़िल पे बने हाल से बाहर जाने वाले मैं दरवाज़े पे खड़े बातें कर रहे थे कि उपर कुच्छ गिरने की आवाज़ आई.

"कौन है?!",विजयंत चीखा,"..रंभा,सारी बत्तियाँ जलाओ!",वो सीढ़ियाँ फलंगता उपर भागा.

"धात तेरे की!",खामोशी हो जाने की वजह से वो शख्स कमरे से बाहर निकल के वाहा का जायज़ा लेने की सोच ही रहा था की कमरे के बाहर रखे पीतल के बड़े से सजावटी वेस से वो टकरा गया & वो ज़ोर की आवाज़ करता गिरा.रंभा ने बत्तियाँ जलानी शुरू की & वो शख्स उधर ही भागा जिधर से आया था.

"आए!रुक!",विजयंत ने उस शख्स को अपने कमरे मे घुसते हुए,उसकी पीछे से बस 1 झलक देखी.वो शख्स दौड़ता हुआ बाल्कनी मे पहुँचा & जिस दरवाज़े का शीशा तोड़ अंदर घुसा था उसी से बाहर निकला & उसे बाहर से बंद कर भागा.

"साले..!रुक..!",विजयंत ने कंधे से धक्के मार दरवाज़े को खोलना चाहा & 2-3 धक्को मे वो कामयाब हो गया.इधर रंभा ने बाहर भाग के दरबान को आगाह किया तो उसने दिमाग़ लगाते हुए बुंगले के पीछे की ओर दौड़ लगाई.जब तक विजयंत बाल्कनी मे आया & दरबान पीछे पहुँचा,वो शख्स दूसरी तरफ से घूम बंगल के मेन गेट तक पहुँच गया था.

"हेयययी..!",रंभा चीखी,वो अभी तक बंगल के सामने की तरफ ही थी.वो शख्स घुमा & रंभा ने उसके चेहरे पे वही निशान देखा & देखी उसकी नफ़रत से भरी आँखे.वो शख्स घुमा & फुर्ती से गेट पे चढ़ उसे फाँद गया.बगल के बंगल का चौकीदार शोरॉगुल सुन बाहर आ ही रहा था कि उस शख्स ने उसे करारा घूँसा उसके जबड़े पे जमाया & बंगल के पिच्छली तरफ भागा & वही से अपनी कार मे सवार हो निकल भागा.

"#!$%^&*&..साला..!",वो गालिया बकता गाड़ी को वाहा से भगाए जा रहा था.वो मंज़िल के इतने करीब पहुँच नाकाम होके लौट रहा था.

"ये आदमी अंदर घुसा कैसे?",विजयंत की रोबदार आवाज़ ने दरबान का खून जमा दिया.

"प-पता नही साहब..म-मैं तो जगा था & यहा से तो कोई नही घुसा."

"ये ठीक कह रहा है.जब मैं इसे बुलाने निकली तो ये हंगामा सुन इधर ही आ रहा था.",रंभा को उस बेचारे पे तरस आ गया.वो समझ रही थी कि वो सच कह रहा है.

"आप पोलीस को खबर कर दीजिए प्लीज़."

"हूँ.",विजयंत ने जेब से मोबाइल निकाला & पहले समीर का केस देख रहे अफ़सर की नींद खराब की & फिर क्लेवर्त की पोलीस की,"..अब मैं जा रहा हू.कही देर ना हो जाए."

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ब्रिज कोठारी कोई कच्चा खिलाड़ी तो था नही & बलबीर मोहन की लाख होशियारी के बावजूद उसने भाँप लिया कि वो उसका पीछा कर रहा है.आज उसने सोच ही लिया था कि इस फोन की गुत्थी सुलझा के ही रहेगा.वो रात भर गाड़ी चलाके अब आवंतिपुर से आगे आ गया था & अब मौका था उसका पीछा कर रहे शख्स को चकमा देने का.

उसने कार की रफ़्तार बिना कम किए अचानक उसे बाई तरफ 1 कच्चे रास्ते पे उतार दिया.बलबीर चौंक गया & वो उस रास्ते से आगे बढ़ गया.उसने फ़ौरंम ब्रेक लगाया & वापस आया.उस कच्चे रास्ते पे उतर वो आयेज बढ़ा लेकिन उसे ब्रिज की कार नज़र नही आ रही थी.ब्रिज इस इलाक़े से अच्छी तरह से वाकिफ़ था & उसने फ़ौरन कार को आगे ले जाके वापस मेन रोड की तरफ घुमाया & फिर मैं रोड पार कर दूसरी तरफ के कच्चे रास्ते पे उतार दिया.उस रास्ते से होके वो फिर से थोडा आगे मेन रोड पे आया & फिर कार तेज़ी से क्लेवर्त की ओर भगा दी.जब तक बलबीर मोहन ने उसकी तरकीब समझी तब तक वो बहुत आगे निकल चुका था.

अब बलबीर मोहन को ये तो पता था नही कि ब्रिज जा कहा रहा है.वो आगे बढ़ने लगा लेकिन उसने सोचा की अब विजयंत को इस बारे मे बता देना चाहिए.विजयंत वक़्त से पहले ही झरने पे पहुच जाना चाहता था & वो अपनी कार टेढ़े-मेधे पहाड़ी रास्ते पे चला रहा था जब बलबीर का फोन आया.

"वो क्लेवर्त आ रहा है,बलबीर."

"आपको कैसे पता,मिस्टर.मेहरा?",विजयंत ने उसे फोन & घर मे घुसे आदमी वाली बातें बता दी.

"मिस्टर.मेहरा,आप प्लीज़ अकेले मत जाइए.पोलीस का या मेरे आने का इंतेज़ार कीजिए."

"मेरे बेटे का सवाल है,बलबीर!..मैं कोई ख़तरा नही ले सकता.",उसने फोन काट दिया.

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धारदार फॉल्स सैलानियो के बीच बहुत मशहूर था & वाहा तक पहुँचने के लिए 1 पक्का पैदल रास्ता था.नीचे कार पार्किंग मे गाड़ी लगा लोग उपर जाते थे & झरने के नीचे नहाने या फीओर आस-पास के खूबसूरत नज़ारे का लुत्फ़ उठाते थे.विजयंत वही खड़ा फोन करने वाले का इंतेज़ार कर रहा था कि तभी उसे दूर से कोई आता दिखा.

अभी उजाला होना शुरू नही हुआ था & उस अंधेरे मे उसे उस आदमी की शक्ल नही दिखी.हां,उसने ये ज़रौर भाँप लिया कि कद-काठी उसी के जैसी थी.उसकी चाल उसे जानी-पहचानी लगी.शायद अस आदमी ने भी उसे देख लिया & ठिठक गया.

ब्रिज ने दूर खड़े आदमी को पहचानना चाहा मगर उसे भी कुच्छ सॉफ नही दिखा.वो आगे बढ़ा की तभी उसके पैरो से कोई चीज़ आ टकराई.ऐसा लगता था जैसे किसी ने कुच्छ फेंका था उसके पैरो पे.उसने उसे उठाया तो वो कोई पॅकेट था.उसके हाथ मे कुच्छ गीला महसूस हुआ तो उसने पॅकेट को चेहरे के पास किया & फिर ऐसे दूर फेका जैसे वो कोई बड़ी ख़तरनाक चीज़ है.

ब्रिज ने सामने खड़े इंसान को देखा & सब समझ गया.ये किसी की साज़िश थी उसे फँसाने की & वो भी बेवकूफो की तरह इस जाल मे फँसता चला आया था.वो सामने खड़ा इंसान मेहरा था & उस पॅकेट मे कोई कपड़ा था जिसपे खून लगा था.ब्रिज उल्टे पाँव भागा.

विजयंत ने दूर खड़े इंसान को वो कपड़ा फेंकते देख सोचा की वो वो पॅकेट उसकी ओर फेंका रहा है.वो आगे बढ़ा & उस पॅकेट को उठाया & उसे खोल के देखा.अंदर खून के धब्बो वाली 1 कमीज़ थी.

1 पल को ब्रिज ने सोचा कि मेहरा को सब बता दे लेकिन उसे पता था कि मेहरा उसपे कभी यकीन नही करेगा & फिर ये भी तो हो सकता था की ये मेहरा की ही कोई चाल हो उसे फँसाने की.ब्रिज अपनी कार तक पहुँचा & उसे स्टार्ट कर वाहा से निकल गया.चाहे कुच्छ भी हो उसे आवंतिपुर पहुँचना था अपने होटेल & फिर वाहा से वापस डेवाले.

"कामीने..!",विजयंत बुदबुडाया.उसे समझ आ गया था की उस शख्स की कद-कती,चल-ढाल उसे क्यू जाने-पहचाने लगे थे.वो & कोई नही उसका दुश्मन कोठारी था.उसने पॅकेट को टटोला तो अंदर 1 छ्होटे से प्लास्टिक पॅकेट मे कंप्यूटर पे टाइप किया 1 खत था.

"मेहरा

ये खून तुम्हारे बेटे का है मगर घबराओ मत उसकी जान ख़तरे मे नही है.थोड़ी खरॉच आई थी उसे तो सोचा कि उस खरॉच को & कुरेद कर उसी के खून को सबूत के तौर पे तुम्हे भेजा जाए.ये कमीज़ भी उसी की है ताकि तुम्हे पक्का यकीन हो जाए की ये खत सच्चा है.

मेहरा,तुम कुच्छ दिन कोई नया काम ना करो तो तुम्हारा बेटा सही-सलामत तुम्हारे पास पहुँच जाएगा.ये बात लिख के दे दो की तुम अगले 6 महीनो तक कोई नया टेंडर लेने की कोशिश नही करोगे तो समीर तुम्हे लौटा दिया जाएगा वरना ये हो सकता है कि अगली बार खून के साथ-2 तुम्हारे प्यारे बेटे के जिस्म का कोई टुकड़ा भी तुम्हे भेजना पड़े."

खत पढ़ते ही विजयंत गुस्से से भर उठा.कुच्छ आवाज़ें सुनी तो उसने देखा की पोलिसेवाले वाहा आ रहे हैं.उसने पॅकेट थामा & उनकी ओर बढ़ गया.

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रंभा ने चाइ बनाई & 1 प्याला ले हॉल मे बैठ गयी.उस शख्स की शक्ल उसकी आँखो के सामने से हट नही रही थी & उनकी आँखो मे वो नफ़रत!..था कौन वो & इतनी नफ़रत से क्यू देखा था उसने उसको?..वो समझ नही पा रही थी की आख़िर समीर किस मुसीबत मे & क्यू फँस गया था?

वो शख्स घर मे किस इरादे से घुसा था?..उसने बंगल मे घूम रहे पोलिसेवालो को देखा.उसने उनके लिए भी चाइ बनाके हॉल के डाइनिंग टेबल पे रख दी थी & वो सब अपने-2 प्याले उठा रहे थे.

"मेडम..",थानेदार उसके पास आके बैठ गया,"..आपके ससुर के कमरे के बाल्कनी के दरवाज़े का काँच टूटा हुआ है.वो आदमी वही से घुसा था लेकिन सवाल ये है की उस वक़्त आपके ससुर कहा थे?",रंभा का दिल धड़क उठा..यानी की वो तब घुसा था जब वो विजयंत से चुद रही थी..कही उसने उन दोनो की चुदाई तो नही देख ली थी!

"मेडम..आपने जवाब नही दिया."

"हूँ..हां....देखिए,रात को 10 बजे के करीब हम दोनो अपने-2 कमरो मे सोने चले गये,उसके बाद मेरे ससुर ने मुझे 1 बजे जगाया & उस फोन का बारे मे बताया..",अभी तक थानेदार को पंचमहल पोलीस से समीर के केस के बारे मे भी जानकारी मिल गयी थी,"..हम दोनो मेरे कमरे मे ही बैठ के उस सिलसिले मे बातें करने लगे."

"आपलोगो ने कोई आवाज़ नही सुनी?"

"नही..",सुनते भी कैसे दोनो को फ़ुर्सत कहा थी 1 दूसरे के जिस्मो से खेलने से,"..हम उस फोन के बारे मे सुनके बहुत चिंतित हो गये थे."

"हूँ.",थानेदार उसे देखते हुए चाइ पीता रहा.

जब रात वियजयंत मेहरा & रंभा क्लेवर्त के बुंगले मे 1 दूसरे की बाहो मे समाए थे & ब्रिज कोठारी तेज़ी से धारदार फॉल्स जा रहा था,उस वक़्त रीता अपने कमरे मे अपने बिस्तर पे लेटी हल्के सरदर्द से परेशान अपना माथा सहला रही थी.समीर की गुमशुदगी का राज़ उसे भी समझ नही आ रहा था.पहले तो उसने सोचा था कि वो किसी हादसे का शिकार हो गया लेकिन अब उसे भी लग रहा था कि वो किसी साज़िश का शिकार हुआ है.वो इन्ही ख़यालो मे खोई थी की दरवाज़े पे दस्तक हुई.

"कौन है?"

"मैं,प्रणव."

"आ जाओ,बेटा.",वो उठ के बैठ गयी.

"क्या हुआ,मोम..तबीयत ठीक नही क्या?"

"नही,ठीक है.हल्का सरदर्द है."

"लाइए मैं दबा दू.",प्रणव उसके बाई तरफ बैठ गया & उसका सर दबाने लगा.

"अरे नही बेटा..ठीक है..तुम मत परेशान हो!",उसने उसका हाथ पकड़ हटाने की कोशिश की.

"क्यू?मैं नही दबा सकता क्या?..चलिए दबाने दीजिए.",प्रणव ने उसका हाथ हटाया & उसकी निगाह 1 पल को रीता के पतले स्ट्रॅप्स वाले नाइट्गाउन के गले पे चली गयी.रीता का दूधिया क्लीवेज हाथ उठाने-गिरने से छल्छला रहा था.उसने तुरंत नज़रे फेर ली लेकिन रीता ने उसे देख लिया था.

उसे थोड़ी शर्म आई & उसके गाल लाल हो गये लेकिन साथ ही उसे थोडा अच्छा भी लगा.प्रणव चुप-चाप उसका सर दबा रहा था & रीता भी नही समझ पा रही थी कि क्या बोले.

"शिप्रा कहा है?",उसने सवाल कर वो असहज चुप्पी तोड़ी.

"उसकी किसी सहेली की हें पार्टी थी.मैने उसे वही भेजा है.वो तो जाना नही चाह रही थी.मैने इसरार किया की जाएगी तो दिल बहलेगा."

"अच्छा किया.उसे भी परेशानी से राहत तो मिलनी ही चाहिए."

"& आपको?",प्रणव बिस्तर पे थोड़ा उपर हो गया था & उसका सर दबा रहा था.

"मैं तो ठीक हू."

"प्लीज़ मोम,झूठ मत बोलिए.आप आजकल अकेली बैठी रहती हैं & ना जाने क्या-2 सोचती रहती हैं.",रीता ने फीकी हँसी हँसी & प्रणव के हाथ हटा दिए & बिस्तर से उतरने लगी.उसका गाउन बिस्तर & उसके जिस्म के बीच फँस उसके घुटनो से उपर हो गया & प्रणव ने सास की गोरी टाँगे देखी.उसे पहली बार ये एहसास हुआ कि उसकी सास उम्र से कम दिखती थी & उसका जिस्म अभी बहुत ढीला नही पड़ा था.रीता ने जल्दी से गाउन ठीक किया & जाके कमरे की खिड़की पे खड़ी हो गयी.

"प्लीज़ मोम.संभालिए खुद को.",प्रणव उसके पीछे गया & उसके कंधो पे हाथ रख दिए.उसने ऐसा करने का सोचा नही था पर उसका दिल रीता के रेशमी जिस्म को छुना चाह रहा था.उसके हाथो के एहसास से रीता के जिस्म मे सनसनी दौड़ गयी लेकिन प्रणव का साथ उसे भला लग रहा था.प्रणव उसके कंधो को हल्के-2 दबाने लगा था.रीता ने आँखे बंद कर ली & उस छुअन के एहसास मे खोने लगी.

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क्रमशः.......

JAAL paart--36

gataank se aage.

"main ja raha hu,tum andar se darwaza band rakhna.bahar guard ko bhi bol jaunga ki mustaid rahe."

"thik hai.vaise kya hume police ko nahi bata dena chahiye?",rambha sasur ke coat ke collar pe ungli fira rahi thi.

"haan,main vaha pahunch ke investigating officer ko khabar dunga..-"

"tannnn..!",vijayant & rambha nichli manzil pe bane hal se bahar jane vale main darwaze pe khade baaten kar rahe the ki upar kuchh girne ki aavaz aayi.

"kaun hai?!",vijayant chikha,"..rambha,sari battiyan jalao!",vo seedhiyan falangta upar bhaga.

"dhat tere ki!",khamoshi ho jane ki vajah se vo shakhs kamre se bahar nikal ke vaha ka jayza lene ki soch hi raha tha ki kamre ke bahar rakhe pital ke bade se sajawati vase se vo takra gaya & vo zor ki aavaz karta gira.rambha ne battioyan jalani shuru ki & vo shakhs udhar hi bhaga jidhar se aaya tha.

"aye!ruk!",vijayant ne us shakhs ko apne kamre me ghuste hue,uski peechhe se bas 1 jhalak dekhi.vo shakhs daudta hua balcony me pahuncha & jis darwaze ka shisha tod andar ghusa tha usi se bahar nikla & use bahar se band kar bhaga.

"sale..!ruk..!",vijayant ne kandhe se dhakke maar darvaze ko kholna chaha & 2-3 dhakko me vo kamyab ho gaya.idhar rambha ne bahar bhag ke darban ko aagah kiya to usne dimagh lagate hue bungle ke peechhe ki or daud lagayi.jab tak vijayant balcony me aaya & darban peechhe pahuncha,vo shakhs dusri taraf se ghum bungle ke main gate tak pahunch gaya tha.

"heyyyy..!",rambha chikhi,vo abhi tak bungle ke samne ki taraf hi thi.vo shakhs ghuma & rambha ne uske chehre pe vahi nishan dekha & dekhi uski nafrat se bhari aankhe.vo shakhs ghuma & furti se gate pe chadh use phand gaya.bagal ke bungle ka chaukidar shorogul sun bahar aa hi raha tha ki us shakhs ne use karara ghunsa uske jabde pe jamaya & bungle ke pichhli taraf bhaga & vahi se apni car me savar ho nikal bhaga.

"#!$%^&*&..sala..!",vo galiya bakta gadi ko vaha se bhagaye ja raha tha.vo manzil ke itne karib pahunch nakaam hoke laut raha tha.

"ye aadmi andar ghusa kaise?",vijayant ki robdar aavaz ne darban ka khun jama diya.

"p-pata nahi sahab..m-main to jaga tha & yaha se to koi nahi ghusa."

"ye thik keh raha hai.jab main ise bulane nikli to ye hungama sun idhar hi aa raha tha.",rambha ko us bechare pe taras aa gaya.vo samajh rahi thi ki vo sach keh raha hai.

"aap police ko khabar kar dijiye please."

"hun.",vijayant ne jeb se mobile nikala & pehle Sameer ka case dekh rahe afsar ki nind kharab ki & fir Clayworth ki police ki,"..ab main ja raha hu.kahi der na ho jaye."

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Brij Kothari koi kachcha khiladi to tha nahi & Balbir Mohan ki lakh hoshiyaro ke bavjud usne bhanp liya ki vo uska peechha kar raha hai.aaj usne soch hi liya tha ki is fone ki gutthi suljha ke hi rahega.vo raat bhar gadi chalake ab Avantipur se aage aa gaya tha & ab mauka tha uska peechha kar rahe shakhs ko chakma dene ka.

usne car ki raftar bina kam kiye achanak use bayi taraf 1 kachche raste pe utar diya.balbir chaunk gaya & vo us raste se aage badh gaya.usne fauranm brake lagaya & vapas aaya.us kachche raste pe utar vo aage badha lekin use brij ki car nazar nahi aa rahi thi.brij is ialke se achhi tarah se vakif tha & usne fauran car ko aage le jake vapas main road ki taraf ghumaya & fir main road paar kar dusri taraf ke kacche raste pe utar diya.us raste se hoke vo fir se thoda aage main road pe aaya & fir car tezi se clayworth ki or bhaga di.jab tak balbir mohan ne uski tarkib samjhi tab tak vo bahut aage nikal chuka tha.

ab balbir mohan ko ye to pata tha nahi ki brij ja kaha raha hai.vo aage badhne laga lekin usne socha ki ab vijayant ko is bare me bata dena chahiye.vijayant waqt se pehle hi jharne pe pahucnh jana chahta tha & vo apni car tedhe-medhe pahadi raste pe chala raha tha jab balbir ka fone aaya.

"vo clayworth aa raha hai,balbir."

"aapko kaise pata,mr.mehra?",vijayant ne use fone & ghar me ghuse admi vali baaten bata di.

"mr.mehra,aap please akele mat jaiye.police ka ya mere aane ka intezar kijiye."

"mere bete ka sawal hai,balbir!..main koi khatra nahi le sakta.",usne fone kaat diya.

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dhardar falls sailaniyo ke beech bahut mashur tha & vaha tak pahunchne ke liye 1 pakka paidal rasta tha.neeche car parking me gadi laga log upar jate the & jharne ke neeche nahane ya fior aas-paas ke khubsurat nazare ka lutf uthate the.vijayant vahi kahda fone karne vale ka intezar kar raha tha ki tabhi use door se koi aata dikha.

abhi ujala hona shuru nahi hua tha & us andhere me use us aadmi ki shakl nahi dikhi.haan,usne ye zaraur bhanp liya ki kad-kathi usi ke jaisi thi.uski chaal use jani-pehchani lagi.shayad uis aadmi ne bhi use dekh liya & thithak gaya.

brij ne door khade aadmi ko pehchanana chaha magar use bhi kuchh saaf nahi dikha.vo aage badha ki tabhi uske pairo se koi chiz aa takrayi.aisa lagta tha jaise kisi ne kuchh fenka tha uske pairo pe.usne use uthaya to vo koi packet tha.uske hath me kuchh gila mehsus hua to usne packet ko chehre ke paas kiya & fir aise door pehnka jaise vo koi badi khatarnak chiz hai.

brij ne samne khade insan ko dekha & sab samajh gaya.ye kisi ki sazish thi use fansane ki & vo bhi bevkufo ki tarah is jaal me phansta chala aaya tha.vo samne khada insan mehra tha & us packet me koi kapda tha jispe khoon laga tha.brij ulte panv bhaga.

vijayant ne door khade insan ko vo kapda fenklte dekh socha ki vo vo packet uski or fenka raha hai.vo aage badha & us packet ko uthaya & use khol ke dekha.andar khun ke dhabbo vali 1 kamiz thi.

1 pal ko brij ne socha ki mehra ko sab bata de lekin use pata tha ki mehra uspe kabhi yakin nahi karega & fir ye bhi to ho sakta tha ki ye mehra ki hi koi chaal ho use phansane ki.brij apni car tak pahuncha & use start kar vaha se nikal gaya.chahe kuchh bhi ho use avantipur pahunchana tha apne hotel & fir vaha se vapas Devalay.

"kamine..!",vijayant budbudaya.use samajh aa gaya tha ki us shakhs ki kad-kathi,chal-dhal use kyu jane-pehchane lage the.vo & koi nahi uska dushman kothari tha.usne packet ko tatola to andar 1 chhote se plastic packet me computer pe type kiya 1 khat tha.

"mehra

ye khun tumhare bete ka hai magar ghabrao mat uski jaan khatre me nahi hai.thodi kharoch aayi thi use to socha ki us kharoch ko & kured kar usi ke khun ko saboot ke taur pe tumhe bheja jaye.ye kamiz bhi usi ki hai taki tumhae pakka yakin ho jaye ki ye khat sachcha hai.

mehra,tum kuchh din koi naya kaam na karo to tumhara beta sahi-salamat tumhare paas pahunch jayega.ye baat likh ke de do ki tum agle 6 mahino tak koi naya tender lene ki koshish nahi karoge to sameer tumhe lauta diya jayega varna ye ho sakta hai ki agli baar khun ke sath-2 tumhare pyare bete ke jism ka koi tukda bahi tumhe bhejna pade."

khat padhte hi vijayant gusse se bhar utha.kuchh avazen suni to usne dekha ki policevale vaha aa rahe hain.usne packet thama & unki or badh gaya.

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rambha ne chai banayi & 1 pyala le hall me baith gayi.us shakhs ki shakl uski aankho ke samne se hat nahi rahi thi & unki aankho me vo nafrat!..tha kaun vo & itni nafrat se kyu dekha tha usne usko?..vo samajh nahi pa rahi thi ki aakhir sameer kis musibat me & kyu phans gaya tha?

vo shakhs ghar me kis irade se ghusa tha?..usne bungle me ghum rahe policevalo ko dekha.usne unke liye bhi chai banake hall ke dining table pe rakh di thi & vo sab apne-2 pyale utha rahe the.

"madam..",thanedar uske paas aake baith gaya,"..aapke sasur ke kamre ke balcony ke darwaze ka kanch tuta hua hai.vo admi vahi se ghusa tha lekin sawal ye hai ki us waqt aapke sasur kaha the?",rambha ka dil dhadak utha..yani ki vo tab ghusa tha jab vo vijayant se chud rahi thi..kahi usne un dono ki chudai to nahi dekh li thi!

"madam..aapne jawab nahi diya."

"hun..haan....dekhiye,raat ko 10 baje ke karib hum dono apne-2 kamro me sone chale gaye,uske baad mere sasur ne mujhe 1 baje jagaya & us fone ka bare me bataya..",abhi tak thanedar ko Panchmahal police se sameer ke case ke bare me bhi jankari mil gayi thi,"..hum dono mere kamre me hi baith ke us silsile me baaten karne lage."

"aaplogo ne koi aavaz nahi suni?"

"nahi..",sunte bhi kaise dono ko fursat kaha thi 1 dusre ke jismo se khelne se,"..hum us fone ke bare me sunke bahut chintit ho gaye the."

"hun.",thanedar use dekhte hue chai pita raha.

Jab raat Viajyant Mehra & Rambha Clayworth ke bungle me 1 dusre ki baaho me samaye the & Brij Kothari tezi se Dhardar Falls ja raha tha,us waqt Rita apne kamre me apne bistar pe leti halke sardard se pareshan apna matha sehla rahi thi.sameer ki gumshudgi ka raaz use bhi samajh nahi aa raha tha.pehle to usne socha tha ki vo kisi hadse ka shikar ho gaya lekin ab use bhi lag raha tha ki vo kisi sazish ka shikar hua hai.vo inhi khayalo me khoi thi ki darwaze pe dastak hui.

"kaun hai?"

"main,Pranav."

"aa jao,beta.",vo uth ke baith gayi.

"kya hua,mom..tabiyat thik nahi kya?"

"nahi,thik hai.halka sardard hai."

"laiye main daba du.",pranav uske bayi taraf baith gaya & uska sar dabane laga.

"are nahi beta..thik hai..tum mat pareshan ho!",usne uska hath pakad hatane ki koshish ki.

"kyu?main nahi daba sakta kya?..chaliye dabane dijiye.",pranav ne uska hath hataya & uski nigah 1 pal ko rita ke patle straps vale nightgown ke gale pe chali gayi.rita ka doodhiya cleavage hath uthane-girane se chhalchhala raha tha.usne turant nazre fer li lekin rita ne use dekh liya tha.

use thodi sharm aayi & uske gaal laal ho gaye lekin sath hi use thoda achha bhi laga.pranav chup-chap uska sar daba raha tha & rita bhi nahi samajh pa rahi thi ki kya bole.

"Shipra kaha hai?",usne sawal kar vo asahaj chuppi todi.

"uski kisi saheli ki hen party thi.maine use vahi bheja hai.vo to jana nahi chah rahi thi.maine israr kiya ki jayegi to dil bahlega."

"achha kiya.use bhi pareshani se rahat to milni hi chahiye."

"& aapko?",pranav bistar pe thoda upar ho gaya tha & uska sar daba raha tha.

"main to thik hu."

"please mom,jhuth mat boliye.aap aajkal akeli baithi rehti hain & na jane kya-2 sochti rehti hain.",rita ne fiki hansi hansi & pranav ke hath hata diye & bistar se utarne lagi.uska gown bistar & uske jism ke beech fans uske ghutno se upar ho gaya & pranav ne saas ki gori tange dekhi.use pehli baar ye ehsas hua ki uski saas umra se kam dikhti thi & uska jism abhi bahut dhila nahi pada tha.rita ne jaldi se gown thik kiya & jake kamre ki khidki pe khadi ho gayi.

"please mom.sambhaliye khud ko.",pranav uske peechhe gaya & uske kandho pe hath rakh diye.usne aisa karne ka socha nahi tha par uska dil rita ke reshmi jism ko chhuna chah raha tha.uske hatho ke ehsas se rita ke jism me sansani daud gayi lekin pranav ka sath use bhala lag raha tha.pranav uske kandho ko halke-2 dabane laga tha.rita ne aankhe band kar li & us chhuan ke ehsas me khone lagi.

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kramashah.......


raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 06:18

जाल पार्ट--37

गतान्क से आगे.

पता नही कितनी देर दोनो वैसे ही खड़े रहे & प्रणव उसके कंधो को सहलाता रहा.अब दोनो दिल ही दिल मे ये समझ गये थे कि दोनो के दिलो मे क्या चल रहा था.रीता ने आँखे खोली & जैसे नींद से जागी.उसने उसका हाथो को हटाया & वाहा से जाने लगी तो प्रणव ने कंधो पे हाथ वापस जमा दिए & उसे अपनी ओर घुमाया.

"प्रणव..",वो आगे झुका & रीता के गुलाबी होंठ चूम लिए.रीता की भी आँखे बंद हो गयी & उसके होंठ अपनेआप प्रणव के लबो को चूमने की इजाज़त देते हुए खुल गये.प्रणव ने उसके होंठो पे ज़ुबान फिराके उसे अंदर घुसाया & जैसे ही रीता क़ी ज़ुबान से सताया उसे जैसे करेंट लगा & आँखे खोल उसे परे धकेला लेकिन प्रणव ने उसे खुद से अलग नही होने दिया.

ये क्या कर रहे हो,प्रणव?..ये ठीक नही..प्लीज़..!",प्रणव उसे बाँहो मे भर पागलो की तरह चूम रहा था,"..नही..प्रणव..!"

"तड़क्ककक..!",कमरे मे चाँते की आवाज़ गूँजी,"निकलो यहा से!",रीता चीखी.

"नही!..नही जाउन्गा..पहले ये कहिए कि आपको मेरा छुना अच्छा नही लगा.आपके लब मेरे लबो को अपनी लज़्ज़त नही चखने देना चाहते थे..आपका जिस्म मेरे जिस्म के साथ मिलना नही चाहता..!"

"हां.नही अच्छा लगा मुझे & मैं नही चाहती ये करना!",रीता अपने सीने पे बाहे बाँध तेज़ी से साँसे लेते हुए घूम गयी & प्रणव की ओर पीठ कर ली.

"यही बातें मेरी आँखो मे आँखे डाल के कहिए.",उसने रीता की बाई बाँह पकड़ उसे घुमाया & बाए हाथ से उसका चेहरा पकड़ उसे अपनी आँखो मे देखने को मजबूर किया.

"प्लीज़..प्रणव..प्लीज़.",रीता की आँखे छल्छला आई.

"क्यू रोक रही हैं खुद को?..",उसने रीता को फिर से बाहो मे भर लिया.रीता की आँखो से आँसू बह रहे थे,"..कबूल कर लीजिए मुझे!"

"मगर ये ठीक नही..शिप्रा..-",प्रणव ने बाए हाथ की 1 उंगली उसके लबो पे रख उसे खामोश कर दिया.उसकी उंगली की च्छुअन ने रीता को मदहोश कर दिया & उसने आँखे बंद कर ली.चेहरे पे आँसुओ की चिलमन के पीछे उलझन के साथ-2 अब मदहोशी भी दिख रही थी.

"आप मुझे चाहती हैं & मैं आपको..बस..शिप्रा को ये राज़ ना जानने की ज़रूरत है ना हमे उसे बताने की.",उंगली हटा के वो झुका & इस बार जब उसने अपनी सास को चूमा तो उसने भी पुरज़ोर तरीके से उसकी किस का जवाब दिया.प्रणव की बाहें रीता की 32 इंच की कमर पे कस गयी & उसने उसके जिस्म को अपनी बाहो मे बिल्कुल भींच लिया.

कहते हैं कि औरत की मस्ती मर्द की मस्ती से कही ज़्यादा होती है & शायदा इसीलिए उपरवाले ने उसे शर्म नाम के गहने से नवाज़ा है ताकि वो अपनी मर्यादा ना भूले & इंसान उलझानो से बचा रहे लेकिन उसी खुदा ने मर्द को इसरार कर अपनी बात मनवाने का हौसला भी दे दिया है.और मर्द भी तब तक दम नही लेता जब तक उसकी चहेती उसकी बाहो मे ना झूल जाए.यहा भी कुच्छ ऐसा ही हुआ लगता था.

रीता को भी दामाद के जिस्म का एहसास बड़ा नशीला लग रहा था.इस उम्र मे भी 1 जवान मर्द उसकी चाहत अपने दिल मे रखता था,इस ख़याल ने ना केवल उसके दिल मे खुशी की लहर दौड़ा दी थी बल्कि उसकी मस्ती की आग को भी भड़का दिया था.

प्रणव उसे बाहो मे कसे हुए बिस्तर तक ले गया & उसे लिटा उसके उपर सवार हो उसे चूमता रहा.कयि पलो बाद दोनो ने सांस लेने के लिए अपने होंठो को जुदा किया तो प्रणव ने रीता के चेहरे से अपने होंठो से आँसुओ के निशान सॉफ कर दिए.रीता ने उसके बाल पकड़ उसके चेहरे पे किस्सस की झड़ी लगा दी.

प्रणव का बया हाथ नीचे आ रीता के दाए घुटने को उठा रहा था.उसका लंड रीता की चूत के उपर दबा हुआ था & अब उसे दामाद के अंग से निकलती गर्मी पागल कर रही थी.प्रणव ने उसकी बाई जाँघ पे से गाउन सरका उसे नंगा किया तो रीता को शर्म आ गयी & उसने हाथ बढ़ा गाउन को नीचे करने की कोशिश की लेकिन प्रणव ने उसके हाथ को पकड़ उसके सर के पीछे बिस्तर पे रख दिया & उसके लब चूमने लगा.

रीता उसकी ज़ुबान से अपनी ज़ुबान लड़ाती मस्ती मे खो रही थी.प्रणव ने उसके दोनो हाथो को अपनी गिरफ़्त मे ले उसके सर के उपर बिस्तर से लगाए पकड़ा हुआ था & उसकी गर्दन चूम रहा था.उसके जिस्म के नीचे दबी रीता को अपनी बेबसी से बहुत मज़ा आ रहा था.

"ऊहह..प्रणव..नही..!",प्रणव उसके क्लीवेज को चूम रहा था & चूचियाँ नंगी होने के ख़याल से रीता शर्मा गयी थी.प्रणव ने अपनी जीभ उसके सीने की 36सी साइज़ की गोलैयो पे फिराई जोकि जोश मे और बड़ी हो गयी दिख रही थी.रीता अब मस्ती मे अपना सर इधर-उधर झटक रही थी.प्रणव अपनी कमर हिला उसकी गाउन से धकि चूत पे अपने लंड के धक्के लगा रहा था.रीता को अंदाज़ा हो अगया था कि उसके दामाद का लंड अच्छे आकर का है & उसकी चूत भी अब पानी छ्चोड़ रही थी.

"आननह..!",प्रणव ने अपनी नाक से उसके गाउन को थोड़ा नीचे कर उसके दाए निपल को नुमाया किया & जैसे ही उसपे अपनी जीभ फिराई,रीता झाड़ गयी & बिस्तर पे उचकने लगी.प्रणव ने उसके हाथ छ्चोड़े & उसकी नंगी छाती को चूसने लगा तो रीता ने उसका सर पकड़ के अपने सीने से उठाया & उसे चूमने लगी.थोड़ी देर बाद प्रणव ने किस तोड़ी & उसके जिस्म से उठ गया & अपनी शर्ट निकाल दी.

दामाद को नंगा होते देख रीता ने शर्म से आँखे बंद कर ली.जब अपनी जाँघो पे उसने प्रणव के हाथ महसूस किए तो उसने आँखे खोली,"..नही परणाव..आन्न्‍नणणनह..!",प्रणव उसके गाउन को कमर तक उठाके उसकी जाँघो पे चूमे चला जा रहा था.उसने उसकी मोटी जाँघ पे हल्के से काटा तो वो उसे मना करना भूल अपने बालो से बेचैनी से खेलने लगी.

उसकी गुलाबी पॅंटी मे छिपि चूत गीली हो रही थी & प्रणव का लंड भी उसकी पॅंट मे प्रेकुं बहा रहा था.उसने घड़ी की ओर देखा,शिप्रा कभी भी आ सकती थी.उसके पहले ही उसे अपनी सास के साथ शुरू किए इस नये रिश्ते की नीव उसकी चुदाई कर पुख़्ता का देनी थी.

"ऊहह..प्रणव..आहह...आनन्नह..उउन्न्नह..!",उसने रीता की चूत पे पॅंटी के उपर से जी अपना मुँह चिपका दिया था & वो बिस्तर से उठाके उक्से सर के बाल खींचती आहें भर रही थी.प्रणव ने उसकी पॅंटी को उतारा नही बस उसे बाए हाथ से 1 तरफ खींच उसकी चिकनी चूत को अपनी निगाहो के सामने किया.इस उम्र मे भी रीता की चूत ढीली नही हुई थी.उसने जल्दी-2 उसकी चूत से बह रहे रस को चाटना शुरू कर दिया.

रीता वापस बिस्तर पे लेट गयी & अपना जिस्म कमान की मोड़ने लगी.उसके जिस्म मे मस्ती बिजली बन के दौड़ रही थी.वक़्त के साथ-2 विजयंत अपने उपर काबू रखना सीख गया था.रीता को चोद्ते हुए वो उसे मस्ती से भर देता था लेकिन खुद जोश की वजह से आपे से बाहर जाता नही दिखता था.मगर प्रणव अभी जवान था & उसकी हर्कतो का बेसबरापन & कुच्छ हद्द तक का जंगली पन रीता को अपनी जवानी की याद दिलाने लगा.

"ऊन्नह..प्रणव....!",रीता कमर उचकाते झड़ी तो प्रणव ने उसकी पॅंटी खींच दी.रीता अधखुली आँखो से अपने दामाद को खुद को नंगा करते देख रही थी.उसके हाथ अभी भी उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे मगर ये साफ ज़ाहिर था कि उसके हाथ केवल रोकने की रस्म निभा भर रहे थे.

प्रणव ने अपनी पॅंट उतारी & उसका 8.5 इंच लंबा लंड तना उसकी सास की आँखो के सामने आ आगाया.रीता के दिल मे खुशी की 1 लहर उठी.प्रणव ने उसकी मोटी जाँघो को फैलाया & उसकी चूत के दाने पे अंगूठे से रगड़ते हुए उसके पेट को दबाया & अपना लंड अंदर घुसा दिया.

"उउन्न्ह....!",रीता ने जिस्म मोडते हुए सर पीछे ले जाके दर्द & मज़े से आँखे बंद कर ली.लंड विजयंत के लंड से बड़ा नही था मगर इतना छ्होटा भी नही था कि उसे मज़ा ना आए.प्रणव ने धक्के लगाके सास की चुदाई शुरू कर दी.रीता से दामाद की वासना से भरी निगाहें बर्दाश्त नही हुई & उसने अपनी आँखे बंद कर ली & अपना चेहरा घुमा लिया.

प्रणव ने उसके गाउन को उसके सर से निकाला & अब उसकी सास पूरी नंगी उसके नीचे उस से चुद रही थी.रीता ने आँखे और ज़ोर से मिंच ली.

"मॉम,आप कितनी हसीन हैं..",जवान मर्द के मुँह से तारीफ सुन के रीता का दिल बल्लियो उच्छलने लगा,"..आपकी चूचिया अभी भी कितनी कसी हुई है..किसी जवान लड़की से ज़्यादा खूबसूरत हैं ये गोलाइयाँ..!",उसने दोनो छातियो को आपस मे मिलके दबाते हुए बाए निपल को इतनी ज़ोर से चूसा की आहत हो रीता ने उसके सर को अपने हाथो मे कस लिया,"..आहह..आपकी चूत तो बहुत कसी है,मोम..बहुत मज़ा आ रहा है मुझे!"

प्रणव की गुस्ताख बातों & उस से भी कही ज़्यादा गुस्ताख हरकतो ने रीता को मुस्कुराते हुए आँखे खोलने पे मजबूर कर ही दिया.दामाद का लंड उसे भी जन्नत की सैर करा रहा था.

"शर्म नही आती अपनी सास से ऐसी बातें करते हुए..आननह..!",प्रणव ने 1 ज़ोर का धक्का लगाया & रीता ने दामाद की पीठ मे अपने नाख़ून गढ़ा दिए.उसकी टाँगे खुद बा खुद उसकी कमर पे कस गयी.

"तारीफ करने मे शर्म कैसी,मों!मैं बेवकूफ़ था जो इतने दिनो आपके हुस्न को देखा नही मगर आज से अपनी ग़लती सुधारना शुरू कर दिया है मैने.",उसने अपना मुँह उसकी मोटी चूचियो मे छुपा लिया.सच कहा था उसने.रीता को अपने पाले मे करना बहुत ज़रूरी था & आज के बाद तो वो उसी की तरफ रहने वाली थी.सास की गोरी चूचियो को भींचते हुए प्रणव ने महसूस किया कि ट्रस्ट ग्रूप पे भी उसकी पकड़ मज़बूत हो रही है.

इस ख़याल ने उसके जोश मे इज़ाफ़ा किया & उसके धक्के और तेज़ हो गये.रीता दामाद की ज़ोरदार चुदाई से मस्ती मे पागल हो गयी थी & उसकी गंद दबोच कमर उचका उसके हर धक्के का जवाब दे रही थी....अब जो भी हो,वो अपनी कुर्सी छ्चोड़ेगा नही!

"आन्न्‍नननणणनह..!",रीता ने ज़ोर से आह भारी & प्रणव के सर को अपने सीने पे बिल्कुल भींच दिया & पागलो की तरह कमर उचकाने लगी.वो अपने दामाद के लंड के धक्को से झाड़ गयी थी.उसने चूत मे कुच्छ गर्म & गीला महसूस किया & उसके होंठो पे सुकून भरी मुस्कान फैल गयी.उसकी चूत मे पहली बार उसके प्यारे दामाद मे अपना गाढ़ा वीर्य छ्चोड़ा था.

"हूँ..इस खत के हिसाब से तो आपका कोई दुश्मन मिस्टर.समीर मेहरा की गुमशुदगी का ज़िम्मेदार है,मिस्टर.विजयंत मेहरा?",केस की छान-बीन कर रहे इन्वेस्टिगेटिंग ऑफीसर अकरम रज़ा ने खून के धब्बो वाले खत को बड़ी हिफ़ाज़त से 1 प्लास्टिक बॅग मे डाल अपने साथ आए 1 सब-इनस्पेक्टर को थमाया,"..इसे फोरेन्सिक लॅब भेजो & पक्का करो कि ये समीर के ही खून के निशान हैं."

"तो मिस्टर.मेहरा..",वो वापस विजयंत से मुखातिब हुआ.उसके साथ बैठी रंभा गहरी सोच मे डूबी थी,"..आपको अभी भी किसी पे शक़ नही?"

"नही ऑफीसर,मुझे अभी भी किसी पे शक़ नही है.",विजयंत ने ना जाने क्यू ब्रिज कोठारी के धारदार फॉल्स पे मौजूद होने वाली बात च्छूपा ली थी.

"हूँ.."रज़ा गौर से ससुर & बहू को देख रहा था,"मिस्टर.मेहरा,क्या मैं आप दोनो के यहा आने की वजह जान सकता हू?"

"हम समीर की तलाश करते यहा पहुँचे हैं,ऑफीसर.मैने सोचा कि क्यू ना मैं उसी रास्ते से उन जगहो पे जाके खुद थोड़ी पुच्छ-ताछ करू,जिनपे समीर ने आख़िरी बार सफ़र किया था.आप तो जानते ही हैं कि पिच्छले 1 महीने से समीर हमसे अलग रह रहा था.मैने अपनी बहू को इसलिए साथ रखा ताकि कोई ऐसी बात जोकि इस दौरान हुई हो जिसके बारे मे मुझे जानकारी ना हो & इन्हे पता हो तो ये मुझे बता दें."

"रंभा जी,आपने मुझसे कही कुच्छ च्छुपाया तो नही है?",रज़ा अब रंभा से मुखातिब था.

"जी नही लेकिन इस सवाल की वजह जान सकती हू?"

"देखिए,मिस्टर.मेहरा को 1 फोन आता है & उन्हे 4 बजे धारदार झरने पे बुलाया जाता है.उसी वक़्त घर मे कोई शख्स घुस के बैठा है..क्या है उसकी यहा आने की वजह?..चोरी या कुच्छ और?..मुझे ये लगता है कि किसी का इरादा विजयंत साहब को घर से बाहर कर आपको अकेला करने का था?"

"क्या?!",विजयंत & रंभा 1 साथ चौंके,"..लेकिन किसलिए?.ऐसा क्यू चाहेगा कोई?",रज़ा दोनो को गहरी निगाहो से देख रहा था.दोनो सच मे चौंकते दिख रहे थे मगर उसे पक्का यकीन तो था नही.

"हो सकता है कोई रंभा जी को नुकसान पहुँचना चाहता हो."

"मुझे?..लेकिन क्यू?"

"अब यही तो पता लगाना है,मेडम!या तो मुजरिम हाथ आ जाए या उसका मक़सद पता चल जाए..केस सुलझ जाएगा..वैसे 1 बात और पुच्छनी है मुझे.मिस्टर.मेहरा,आपके कमरे के दरवाज़े का काँच तोड़ वो शख्स अंदर घुसा था लेकिन आपको काँच टूटने की आवाज़ नही सुनाई दी?"

"नही."

"हूँ..ऐसा कैसे हो सकता है?"

"देखिए.मुझे फोन आया तो मैने फ़ौरन रंभा के कमरे मे जाके उसे जगाया & सारी बात बताई जिसे सुन ये घबरा गयी.धारदार जाने मे काफ़ी वक़्त था & मैने इसे सोने को कहा लेकिन ये अकेली डर रही थी तो मैने इसे सोने को कहा & खुद इसके कमरे की आराम कुर्सी पे बैठ गया & ना जाने कब मेरी आँख लग गयी.ख़ैरियत थी कि मैने अपने मोबाइल पे 2.30 बजे का अलार्म लगा रखा था & उसके बजने से ही मेरी नींद टूटी जिसके बाद मैने कपड़े बदले & यहा से जाने लगा & फिर सारी घटना घटी."

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क्रमशः.......

JAAL paart--37

gataank se aage.

pata nahi kitni der dono vaise hi khade rahe & pranav uske kandho ko sehlata raha.ab dono dil hi dil me ye samajh gaye the ki dono ke dilo me kya chal raha tha.rita ne aankhe kholi & jaise nind se jaagi.usne uska hatho ko hataya & vaha se jane lagi to pranav ne kandho pe hath vapas jama diye & use apni or ghumaya.

"pranav..",vo aage jhuka & rita ke gulabi honth chum liye.rita ki bhi aankhe band ho gayi & uske honth apneaap pranav ke labo ko chumne ki ijazat dete hue khul gaye.pranav ne uske hotho pe zuban firake use andar ghusaya & jaise hi rita ki zuban se sataya use jaise current laga & aankhe khol use pare dhakela lekin pranav ne use khud se alag nahi hone diya.

ye kya kar rahe ho,pranav?..ye thik nahi..please..!",pranav use baahho me bhar pagalo ki tarah chum raha tha,"..nahi..pranav..!"

"tadakkkk..!",kamre me chante ki aavaz gunji,"niklo yaha se!",rita chikhi.

"nahi!..nahi jaunga..pehle ye kahiye ki aapko mera chhuna achha nahi laga.aapke lab mere labo ko apni lazzat nahi chakhne dena chahte the..aapka jism mere jism ke sath milna nahi chahta..!"

"haan.nahi achha laga mujhe & main nahi chahti ye karna!",rita apne seene pe baahe bandh tezi se sanse lete hue ghum gayi & pranav ki or pith kar li.

"yehi baaten meri aankho me aankhe daal ke kahiye.",usne rita ki bayi banh pakad use ghumaya & baye hath se uska chehra pakad use apni aankho me dekhne ko majbur kiya.

"please..pranav..please.",rita ki aankhe chhalchhala aayi.

"kyu rok rahi hain khud ko?..",usne rita ko fir se baaho me bhar liya.rita ki aankho se aansu beh rahe the,"..kabul kar lijiye mujhe!"

"magar ye thik nahi..shipra..-",pranav ne baye hath ki 1 ungli uske labo pe rakh us ekhamosh kar diya.uski ungli ki chhuan ne rita ko madhosh kar diya & usne aankhe band kar li.chehre pe aansuo ki chilman ke peechhe uljhan ke sath-2 ab madhoshi bhi dikh rahi thi.

"aap mujhe chahti hain & main aapko..bas..shipra ko ye raaz na jaanane ki zarurat hai na hume use batane ki.",ungli hatake vo jhuka & is baar jab usne apni saas ko chuma to usne bhi purzor tarike se uski kiss ka jawab diya.pranav ki baahen rita ki 32 inch ki kamar pe kas gayi & usne uske jism ko apni baaho me bilkul bhinch liya.

kehte hain ki aurat ki masti mard ki masti se kahi zyada hoti hai & shayda isiliye uparwale ne use sharm naam ke gehne se navaza hai taki vo apni maryada na bhule & insan uljhano se bacha rahe lekin usi khuda ne mard ko israr kar apni baat manwane ka hausla bhi de diya hai.aur mardf bhi tab tak dum nahi leta jab tak uski chaheti uski baaho me na jhul jaye.yaha bhi kuchh aisa hi hua lagta tha.

rita ko bhi damad ke jism ka ehsas bada nashila lag raha tha.is umra me bhi 1 jawan mard uski chahat apne dil me rakhta tha,is khayal ne na keval uske dil me khushi ki lehar dauda di thi balki uski masti ki aag ko bhi bhadka diya tha.

pranav use baaho me kase hue bistar tak le gaya & use lita uske upar savara ho use chumta raha.kayi palo baad dono ne sans lene ke liye apne hotho ko juda kiya to pranav ne rita ke chehre se apne hotho se aansuo ke nishan saaf kar diye.rita ne uske baal pakad uske chehre pe kisses ki jhadi laga di.

pranav ka baya hath neeche aa rita ke daye ghutne ko utha raha tha.uska lund rita ki chut ke upar daba hua tha & ab use damad ke ang se nikalti garmi pagal kar rahi thi.pranav ne uski bayi jangh pe se gown sarka use nanga kiya to rita ko sharm aa gayi & usne hath badha gown ko neeche karne ki koshish ki lekin pranav ne uske hath ko pakd uske sar ke peechhe bistar pe rakh diya & uske lab chumane laga.

rita uski zuban se apni zuban ladati masti me kho rahi thi.pranav ne uske dono hatho ko apni giraft me le uske sar ke upar bistar se lagaye pakda hua tha & uski garadn chum raha tha.uske jism ke neeche dabi rita ko apni bebasi se bahut maza aa raha tha.

"oohhhhh..pranav..nahi..!",pranav uske cleavage ko chum raha tha & chhatiyan nangi hone ke khayal se rita sharma gayi thi.pranav ne apni jibh uske seene ki 36C size ki golaiyo pe firayi joki josh me aur badi ho gayi dikh rahi thi.rita ab masti me apna sar idhar-udhar jhatak rahi thi.pranav apni kamar hila uski gown se dhaki chut pe apne lund ke dhakke laga raha tha.rita ko andaza ho agya tha ki uske damad ka lund achhe aakar ka hai & uski chut bhi ab pani chhod rahi thi.

"aannhhhhh..!",pranav ne apni naak se uske gown ko thoda neeche kar uske daye nipple ko numaya kiya & jaise hi uspe apni jibh fiaryi,rita jhad gayi & bistar pe uchakne lagi.pranav ne uske hath chhode & uski nangi chhati ko chusne laga to rita ne uska sar pakad ke apne seene se uthaya & use chumne lagi.thodi der baad pranav ne kiss todi & uske jism se uth gaya & apni shirt nikal di.

damad ko nanga hote dekh rita ne sharm se aankhe band kar li.jab apni jangho pe usne pranav ke hath mehsus kiye to usne aankhe kholi,"..nahi parnav..aannnnnnhhhhh..!",pranav uske gown ko kamar tak uthake uski jangho pe chume chala ja raha tha.usne uski moti jangh pe halke se kata to vo use mana karna bhul apne baalo se bechaini se khelne lagi.

uski gulabi panty me chhipi chut gili ho rahi thi & pranav ka lund bhi uski pant me precum baha raha tha.usne ghadi ki or dekha,shipra kabhi bhi aa sakti thi.uske pehle hi use apnio saas ke sath shuru kiye is naye rishte ki neev uski chudai kar pukhta ka deni thi.

"oohhhhhhhh..pranav..aahhhhhhh...aannnhhhhhh..uunnnhhhh..!",usne rita ki chut pe panty ke upar se hji apna munh chipka diya tha & vo bistar se uthke ukse sar ke baal khinchti aahen bhar rahi thi.pranav ne uski panty ko utara nahi bas use baye hath se 1 taraf khinch uski chikni chut ko apni nigaho ke samne kiya.is umra me bhi rita ki chut dhili nahi hui thi.usne jaldi-2 uski chut se beh rahe ras ko chatna shuru kar diya.

rita vapas bistar pe let gayi & apna jism kaman ki modne lagi.uske jism me masti bijli ban ke daud rahi thi.waqt ke sath-2 vijayant apne upar kabu rakhna sikh gaya tha.rita ko chodte hue vo use masti se bhar deta tha lekin khud josh ki vajah se aape se bahar jata nahi dikhta tha.magar pranav abhi jawan tha & uski harkato ka besabrapan & kuchh hadd tak ka junglipan rita ko apni jawani ki yaad dilane laga.

"oonnhhhhhhh..pranav....!",rita kamar uchkate jhadi to pranav ne uski panty khinch di.rita adhkhuli aankho se apne damad ko khud ko nanga krte dekh rahi thi.uske hath abhi bhi use rokne ki koshish kar rahe the magar ye saaf zahir tha ki uske hath keval rokne ki rasm nibha bhar rahe the.

pranav ne apni pant utari & uska 8.5 inch lumba lund tana uski saas ki aankho ke samne a agaya.rita ke dil me khushi ki 1 lehar uthi.pranav ne uski moti jangho ko failaya & uski chut ke dane pe anguthe se ragadte hue uske pet ko dabaya & apna lund andar ghusa diya.

"uunnhhhhh....!",rita ne jism modte hue sar peechhe le jake dard & maze se aankhe band kar li.lund vijayant ke lund se bada nahi tha magar itna chhota bhi nahi tha ki use maza na aaye.pranav ne dhakke lagake saas ki chudai shuru kar di.rita se damad ki vasna se bhari nigahen bardasht nahi hui & usne apni aankhe band kar li & apna chehra ghuma liya.

pranav ne uske gown ko uske sar se nikala & ab uski saas puri nangi uske neeche us se chud rahi thi.rita ne aankhe aur zor se minch li.

"mom,aap kitni haseen hain..",jawan mard ke munh se tairf sun ke rita ka dil balliyo uchhalne laga,"..aapki choochiya abhi bhi kitni kasi hui hai..kisi jawan ladki se zyada khubsurat hain ye golaiyan..!",usne dono chhatiyo ko aapas me milake dabate hue baye nipple ko itni zor se chusa ki aahat ho rita ne uske sar ko apne hatho me kas liya,"..aahhhh..aapki chut to bahut kasi hai,mom..bahut maza aa raha hai mujhe!"

pranav ki gustakh baaton & us se bhi kahi zyada gustakh harkto ne rita ko muskurate hue aankhe kholne pe majboor kar hi diya.damad ka lund use bhi jannat ki sair kara raha tha.

"sharm nahi aati apni saas se aisi baaten karte hue..aannhhhh..!",pranav ne 1 zor ka dhakka lagaya & rita ne damad ki pith me apne nakhun gada diye.uski tange khud ba khud uski kamar pe kas gayi.

"tarif karne me sharm kaisi,mom!main bevkuf tha jo itne dino aapke husn ko dekha nahi magar aaj se apni galti sudharna shuru kar diya hai maine.",usne apna munh uski moti choochiyo me chhupa liya.sach kaha tha usne.rita ko apne pale me karna bahut zaruri tha & aja ke baad to vo usi ki taraf rehne vali thi.saas ki gori chhatiyo ko bhinchte hue pranav ne mehsus kiya ki Trust Group pe bhi uski pakad mazbut ho rahi hai.

is khayal ne uske josh me izafa kiya & uske dhakke aur tez ho gaye.rita damad ki zordar chudai se masti me pagal ho gayi thi & uski gand daboch kamar uchka uske har dhakke ka jawab de rahi thi....ab jo bhi ho,vo apni kursi chhodega nahi!

"aannnnnnnnhhhhhhh..!",rita ne zor se aah bhari & pranav ke sar ko apne seene pe bilkul bhinch diya & paglo ki tarah kamar uchkane lagi.vo apne damad ke lund ke dhakko se jhad gayi thi.usne chut me kuchh garm & gila mehsus kiya & uske hotho pe sukun bhari muskan fail gayi.uski chut me pehli baar uske pyare damad me apna gadha virya chhoda tha.

"Hun..is khat ke hisab se to aapka koi dushman Mr.Sameer Mehra ki gumshudgi ka zimmedar hai,Mr.Vijayant Mehra?",case ki chhan-been kar rahe investigating officer Akram Raza ne khoon ke dhabbo vale khat ko badi hifazat se 1 plastic bag me daal apne sath aaye 1 sub-inspector ko thamaya,"..ise forensic lab bhejo & pakka karo ki ye sameer ke hi khoon ke nishan hain."

"to mr.mehra..",vo vapas vijayant se mukhatib hua.uske sath baithi Rambha gehri soch me doobi thi,"..aapko abhi bhi kisi pe shaq nahi?"

"nahi officer,mujhe abhi bhi kisi pe shaq nahi hai.",vijayant ne na jane kyu Brij Kothari ke Dhardar Falls pe maujood hone wali baat chhupa li thi.

"hun.."raza gaur se sasur & bahu ko dekh raha tha,"mr.mehra,kya main aap dono ke yaha aane ki vajah jaan sakta hu?"

"hum sameer ki talash karte yaha pahunche hain,officer.maine socha ki kyu na main usi raste se un jagaho pe jake khud thodi puchh-tachh karu,jinpe sameer ne aakhiri baar safar kiya tha.aap to jante hi hain ki pichhle 1 mahine se sameer humse alag reh raha tha.maine apni bahu ko isliye sath rakha taki koi aisi baat joki is dauran hui ho jiske bare me mujhe jankari na ho & inhe pata ho to ye mujhe bata den."

"rambha ji,aapne mujhse kahi kuchh chhupaya to nahi hai?",raza ab rambha se mukhatib tha.

"ji nahi lekin is sawal ki vajah jaan sakti hu?"

"dekhiye,mr.mehra ko 1 fone aata hai & unhe 4 baje dhardar jharne pe bulaya jata hai.usi waqt ghar me koi shakhs ghus ke baitha hai..kya hai uski yaha aane ki vajah?..chori ya kuchh aur?..mujhe ye lagta hai ki kisi ka irada vijayant sahab ko ghar se bahar kar aapko akela karne ka tha?"

"kya?!",vijayant & rambha 1 sath chaunke,"..lekin kisliye?.aisa kyu chahega koi?",raza dono ko gehri nigaho se dekh raha tha.dono sach me chaunkte dikh rahe the magar use pakka yakin to tha nahi.

"ho sakta hai koi rambha ji ko nuksan pahunchana chahta ho."

"mujhe?..lekin kyu?"

"ab yehi to pata lagana hai,madam!ya to mujrim hath aa jaye ya uska maqsad pata chal jaye..case sulajh jayega..vaise 1 baat aur puchhni hai mujhe.mr.mehra,aapke kamre ke darwaze ka kanch tod vo shakhs andar ghusa tha lekin aapko kanch tutne ki aavaz nahi sunai di?"

"nahi."

"hun..aisa kaise ho sakta hai?"

"dekhiye.mujhe fone aaya to maine fauran rambha ke kamre me jake use jagaya & sari baat batayi jise sun ye ghabra gayi.dhardar jane me kafi waqt tha & maine ise sone ko kaha lekin ye akeli darr rahi thi to maine ise sone ko kaha & khud iske kamre ki aaram kursi pe baith gaya & na jane kab meri aankh lag gayi.khairiyat thi ki maine apne mobile pe 2.30 baje ka alarm laga rakha tha & uske bajne se hi meri nind tuti jiske baad maine kapde badle & yaha se jane laga & fir sari ghatna ghati."

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kramashah.......


raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 06:19

जाल पार्ट--38

गतान्क से आगे.

"हूँ..जब आप कपड़े बदलने गये तो भी आपकी निगाह फर्श पे पड़े शीशे के टुकड़ो पे नही गयी?"

"जी,नही.आपने देखा होगा कि कमरे का कपबोर्ड उस टूटे काँच वाले दरवाज़े से बिल्कुल उल्टी दिशा मे है.मैं बेटे के बारे मे सोचता तैय्यार हुआ & वाहा से निकल गया."

"यानी की जब आप रंभा जी के कमरे की आरामकूर्सी पे सो रहे थे उसी दौरान वो अंदर घुसा होगा..खैर!",वो खड़ा हो गया,"..मैं चलता हू.आप अभी भी यही,इसी बंगल मे रहेंगे?"

"नही,मैं तो अभी अपने होटेल शिफ्ट हो रहा हू & रंभा को मैं कल ही डेवाले भेज रहा हू.मैं नही चाहता की ये ज़रा भी ख़तरे मे पड़े.वैसे ऑफीसर मैं चाहता हू कि आप मीडीया से ये बोल दें की मैं भी वापस पंचमहल जा रहा हू."

"ठीक है..",रज़ा हंसा.सवेरे की घटनाओ की कुच्छ भनक तो मीडीया को लग ही गयी थी & वो खबर सूंघते बस उस बुंगले तक पहुँचने ही वाले थे,"..बढ़िया सोचा है आपने.वैसे कुच्छ भी ध्यान आए तो मुझे ज़रूर बताएँ.ओके!",उसने हाथ मिलाया & निकल गया.

"आपने ये क्यू कहा कि मैं डेवाले जा रही हू?",विजयंत बाहर अपनी प्राडो मे बैठ गया था जिसमे बंगल का डरबन उनका समान चढ़ा रहा था.

"क्यूकी तुम जा रही हो.",रंभा ने बैठ के कार का दरवाज़ा बंद किया तो विजयंत ने डरबन को कुच्छ बखशीश दी & कार वाहा से निकली.

"आप ऐसे मेरा फ़ैसला नही ले सकते.मैं नही जा रही!",गुस्से से रंभा का चेहरा लाल हो रहा था.विजयंत उसे क्या डरपोक समझ रहा था!..वो घबराई ज़रूर थी लेकिन अब तैय्यार भी थी.आगे वो शख्स उसके करीब आके देखे,वो उसका मुँह नोच लेगी!

"बहस मत करो!",विजयंत ने उसे डांटा,"..तुम्हारी समझ मे कुच्छ नही आ रहा.बहुत ख़तरा है यहाँ!"

"मुझे डर नही लगता किसी भी बात से."

"बस!",विजयंत की भारी आवाज़ तेज़ हो गयी & उसने बाया हाथ उठाके बहू को चुप रहने का इशारा किया,"..तुम कल जा रही हो.इस बात का फ़ैसला हो चुका है.",रंभा की आँखो मे पानी आ गया.उसे आजतक ऐसे किसी ने नही डांटा था.वो खामोश हो गयी & खिड़की से बाहर देखने लगी.विजयंत को भी महसूस हुआ कि उसने बहू से कुच्छ ज़्यादा ही सख्ती से बात की है & उसने बाया हाथ बढ़ा के स्लीव्ले ब्लाउस से बाहर झाँक रही उसकी नर्म,गोरी दाई बाँह को च्छुआ तो रंभा ने उसे झटक दिया.विजयंत ने हाथ पीछे खींचा & खामोशी से कार चलाने लगा.

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पंचमहल के अपने होटेल मे ब्रिज कोठारी आराम कर रहा था.सवेरे धारदार झरनो पे विजयंत को देख वो बहुत घबरा गया था लेकिन जब उसकी घबराहट कम हुई तो उसने डेवाले वापस लौटने का ख़याल दिमाग़ से निकाल दिया.उस से अंजाने मे 1 अच्छा काम हुआ था.वो अपने ऑफीस की 1 कार उठाके क्लेवर्त तक चला आया था जोकि उसके नाम पे रिजिस्टर नही थी.उस कार को उसने आवंतिपुर के अपने दफ़्तर की पार्किंग मे लगाया & ऐसा करते उसे किसी ने नही देखा.

उसके बाद 1 प्राइवेट टॅक्सी बुक की & पंचमहल पहुँचा & वाहा से सीधा अपने होटेल.अपने आदमियो से उसने यही कहा की वो होटेल की सर्प्राइज़ चेकिंग पे आया है.वाहा से उसने आवंतिपुर के दफ़्तर फोन कर कहा कि डेवाले ऑफीस की 1 कार वाहा पार्क है जिसे वापस भिजवा दिया जाए.

ब्रिज ने सोच लिया था कि वो इस मामले को सुलझा के ही मानेगा & जो भी उसे ऐसे फँसाने की कोशिश कर रहा था उसे वो मज़ा ज़रूर चखायगा.वो बिस्तर पे लेटा था की उसका मोबाइल बजा,"हेलो."

"हाई,जानेमन!कहा रहते हो आजकल?पिक्चर साइन करवा के तो भूल ही गये मुझे.",कामया की खनकती आवाज़ सुनते ही ब्रिज के होंठो पे मुस्कान फैल गयी.

"मेरी जान!हम तो तुम्हारे दिल मे ही रहते हैं,तुम्ही उसे टटोल के देखती नही कभी."

"उफफफ्फ़!..",कामया बिस्तर मे नंगी लेटी थी.उसने अपनी चूत पे हाथ फिराया जिस से कबीर का वीर्य बह रहा था.बस अभी ही उनकी चुदाई ख़त्म हुई थी & कबीर बाथरूम मे नहा रहा था,"..तुमने तो लाजवाब कर दिया,जान!वैसे कहा हो अभी?"

"जहा इस वक़्त होना चाहिए.",ब्रिज ने जान बुझ के बात घुमा दी,"..& तुम?"

"मैं तो आवंतिपुर मे हू,यार.शूटिंग के लिए आई हूँ."

"अच्छा.कब आई..ई मीन कब गयी वाहा?"

"बस सवेरे की फ्लाइट से पहुँची थी.धारदार पे गाना शूट होना था लेकिन पता नही आज वाहा कुच्छ गड़बड़ थी तो पूरा इलाक़ा सील था.अब देखें कल क्या होता है.आज का पूरा दिन तो खाली बैठे बोर होंगी.",कामया ने कितनी सफाई से झूठ बोल दिया था.शूटिंग कॅन्सल होने की खबर सुन कबीर खुशी से उच्छल पड़ा था & उसे अपने कमरे मे ले आया था & अगली सुबह तक कामया वही रहने वाली थी.

"अच्छा.वैसे क्या गड़बड़ हुई है वहाँ?"

"पता नही.कह रहे हैं कि कोई गुंडा दिखा था वाहा तो पहले पूरे इलाक़े को छान के सेफ डिक्लेर करेंगे फिर पब्लिक को जाने देंगे वाहा."

"ओह.",ब्रिज समझ गया की पोलीस असल बात च्छूपा रही है.सही भी था,आख़िर समीर की जान का सवाल था लेकिन फिर उसे क्यू बुलाया था वाहा उस कॉलर ने?..हो ना हो ये विजयंत की ही घिनोनी साजिश है..कमीना!बेटे को मोहरा बना मुझे फाँसना चाहता है,अपने बिज़्नेस के लिए!

"क्या हुआ,ब्रिज डार्लिंग चुप क्यू हो गये?..कही किसी दिलरुबा के साथ तो मसरूफ़ नही हो?",कामया ने उसे छेड़ा.

"दिलरुबा तो इस वक़्त आवंतिपुर मे बैठी है यहा तो बस नीरस फाइल्स & उबाउ काम है.",ब्रिज ने नाटकिया आह भरी तो कामया हंस पड़ी.

"तो यहा आ जाओ ना!अभी तो शूटिंग चलेगी कुच्छ दिन यहा & फिर यहा का मौसम कितना सुहाना है.ऐसे आलम मे तुम्हारी मज़बूत बाजुओ मे पिस्ने का जी कर रहा है,डार्लिंग!"

"थोड़ा सब्र करो,मेरी जान.हो सकता है बहुत जल्द ही तुम्हारी तमन्ना पूरी हो जाए."

"सच?",कामया ने बहुत खुश होने का नाटक किया.कबीर अपने बॉल पोन्छ्ता बाथरूम से बाहर आ गया था.उसका लंड झड़ने के बाद सिकुड़ने के बावजूद अच्छा-खास लंबा था.कामया ने उसे देख होंठो पे जीभ फिराई & अपनी टाँगे फैला अपनी चूत पे 1 उंगली फिराई.

"सच."

"तो जल्दी आना.ओके,बाइ!",कामया ने फोन किनारे फेंका & अपनी फैली टाँगो के बीच उसकी चूत से अपना वीर्य अपनी ज़ुबान से साफ करते कबीर के बालो को सहलाने लगी.

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"मिस्टर.मेहरा,वो बहुत चालाक आदमी है & उसने भाँप लिया था कि मैं उसका पीछा कर रहा हू & क्या चकमा दिया उसने मुझे.उसी कारण मुझे आने मे देर हो गयी वरना उसे रंगे हाथो पकड़ लेता.",बलबीर मोहन होटेल क्लेवर्त वाय्लेट के बार मे विजयंत के साथ बैठा था & दोनो बियर पी रहे थे.बार अभी खुला नही था & इसीलिए दोनो आराम से बाते कर रहे थे.

"बलबीर,उसे कभी भी कम नही आँकना.बहुत शातिर है वो.",विजयंत ने बियर का 1 घूँट भरा,"..वैसे 1 बात समझ नही आई मुझे?"

"क्या?"

"अगर वो समीर की गुमशुदगी के पीछे है तो वो पीछे ही रहना पसंद करेगा बल्कि ऐसा जाल बुनेगा कि कोई ये समझ ही नये पाए की उस जाल के सिरे उस तक जाते हैं.इस तरह से खुद झरने पे आना कुच्छ समझ नही आया."

"हूँ..झरने पे आपके पीछे-2 पोलीस ने भी पहुँचने मे ज़रा देर कर दी नही तो उसका खेल उसी वक़्त ख़त्म हो जाता."

"अभी तक फिर कोई फोन नही आया बलबीर.मुझे समीर की फ़िक्र हो रही है."

"आप घबराईए मत,मेहरा साहब.समीर की कीमत बहुत ऊँची लगाई है उसे अगवा करने वाले ने.बिना आपका जवाब सुने वो उसे हाथ नही लगाएँगे."

"उसके खून से रंगी कमीज़ भेजी है उन्होने बलबीर!",एंहरा की आँखो मे गुस्सा & डर दोनो थे.

"मेहरा साहब,वो आपको डराना चाहते हैं ताकि आप फ़ौरन उनकी बात मान लें.समीर उनके लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है,उसे मारने की बेवकूफी वो नही कर सकते.उन्होने सरिंज से उसकी बाँह से खून निकाल के उस कमीज़ पे गिरा दिया होगा.किसी भी वालिद के लिए औलाद के खून को देखना कितना खौफनाक तजुर्बा हो सकता है,उसी बात पे खेल रहे हैं वो."

"तो क्या करू मैं?",विजयंत पहली बार इतना बेबस महसूस कर रहा था.

"आप उनकी बात मान लीजिए."

"क्या?!"

"हां,आपको अगला फोन जल्द आएगा & वो आपको फिर से समीर को नुकसान पहुचाने की बात कहेंगे.आप घबरा के उनकी बात मान लीजिए फिर देखिए वो क्या बोलते हैं.किसी भी तरह हमे समीर को अपने पास लाना है.आपको बस बात मानने की बात कहनी है सच मे माननी थोड़े ही है.",बलबीर की बात से विजयंत के होंठो पे मुस्कान आ गयी.

"मैं समझ गया तुम्हारी बात,बलबीर."

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"तुम कहा हो,ब्रिज?",ब्रिज कामया से बात कर तैय्यार हुआ ही था की सोनिया का फोन आ गया.

"मैं पंचमहल मे हू,डार्लिंग."

"तुम तो क्लेवर्त गये थे ना?"

"हां,वाहा का काम निपटा के यहा आ गया."

"इतनी जल्दी?"

"हां,काम जल्दी हो गया."

"ओह.वैसे क्या काम था,जान?",सोनिया की आँखे रात भर रोने से ला हो चुकी थी.अगर ब्रिज देख सकता तो देखता कि उसकी बीवी की आवज़ से बिल्कुल उल्टे भाव उसकी सूरत पे थे.

"अरे,मेरी रानी..अपने लोगो को बीच-2 मे चौंकाने से वो मुस्तैद रहते हैं.बस ऐसे ही चेकिंग कर रहा हू."

"हूँ..तो लोटोगे कब?"

"क्यू?याद आ रही है मेरी?",ब्रिज मुस्कुराया.

"ऐसे अचानक चले जाओगे तो चिंता तो होगी ना."

"ओह,डार्लिंग आइ लव यू!मैं जल्दी ही आ जाऊँगा.ओके?"

"ओके,डार्लिंग.आइ लव यू.बाइ!",सोनिया ने फोन कटा & फिर दूसरा नंबर डाइयल किया.

"हाई सोनिया.",विजयंत ने बलबीर को भी अपने होटेल के मॅनेजर से कहके 1 कमरा दिलवा दिया था.बियर पीने के बाद बलबीर आराम करने चला गया था जबकि विजयंत वही बैठा दूसरी बियर पी रहा था.

"विजयंत,मुझे सब कुच्छ बताओ."

"किस बारे मे,सोनिया?"

"समीर के बारे मे जो भी पता चला है तुम्हे.",विजयंत खामोश हो गया.

"क्या हुआ,विजयंत?"

"छ्चोड़ो ना,सोनिया.क्या करोगी जान के?",विजयंत ने जान बुझ के नाटक किया था.कल रात को सोनिया से हुई बात से उसे इतना तो समझ आ गया था कि वो ब्रिज को इस सब के पीछे का दिमाग़ समझ रही थी & इस बात से पति से दुखी भी थी.यही तो उसे चाहिए था.ब्रिज की बर्बादी तो उसका बहुत पुराना सपना था.

"प्लीज़,विजयंत.तुम्हे मेरी कसम.मुझे सब बताओ."

"ओके.",विजयंत ने 1 लंबी सांस ले उसे सारी बात शुरू से बताना चालू किया,"..लेकिन मैं यकीन से नही कह सकता कि वो ब्रिज ही था.अंधेरा था उस वक़्त."

"मैं तुमसे मिलना चाहती हू,विजयंत."

"प्लीज़,सोनिया यहा मत आओ.ख़तरा है यहा!"

"विजयंत,मैं तुमसे मिलने आ रही हू.",सोनिया ने फोन काट दिया.इतने दिनो से दोनो मर्दो के बीच झूलते हुए उसे कभी-2 बहुत ग्लानि होती थी.उसे लगता था कि वो पति से बेवफ़ाई कर रही है & प्रेमी से खेल रही है मगर अब उसकी उलझन सुलझती दिख रही थी.उसे समझ आ गया था कि उसका पति ग़लत था & प्रेमी सही.अब उसे किसी बात की परवाह भी नही थी.वो जानती थी कि विजयंत उस से कभी शादी नही करेगा लेकिन अब उसे उसकी रखैल बनके रहना भी मंज़ूर था.

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क्रमशः.......

JAAL paart--38

gataank se aage.

"hun..jab aap kapde badalne gaye to bhi aapki nigah farsh pe pade shishe ke tukdo pe nahi gayi?"

"ji,nahi.aapne dekha hoga ki kamre ka cupboard us tute kanch vale darwaze se bilkul ulti diha me hai.main bete ke bare me sochta taiyyar hua & vaha se nikal gaya."

"yani ki jab aap rambha ji ke kamre ki aaramkursi pe so rahe the usi dauran vo andar ghusa hoga..khair!",vo khada ho gaya,"..main chalta hu.aap abhi bhi yehi,isi bungle me rahenge?"

"nahi,main to abhi apne hotel shift ho raha hu & rambha ko main kal hi Devalay bhej raha hu.main nahi chahta ki ye zara bhi khatre me pade.vaise officer main chahta hu ki aap media se ye bol den ki main bhi vapas Panchmahal ja raha hu."

"thik hai..",raza hansa.savere ki ghatnao ki kuchh bhanak to media ko lag hi gayi thi & vo kahabr sunghte bas us bungle tak pahunchane hi vale the,"..badhiya socha hai aapne.vaise kuchh bhi dhyan aaye to mujhe zarur batayen.ok!",usne hath milaya & nikal gaya.

"aapne ye kyu kaha ki main devalay ja rahi hu?",vijayant bahar apni Prado me baith gaya tha jisme bungle ka darban unka saman chadha raha tha.

"kyuki tum ja rahi ho.",rambha ne baith ke car ka darwaza band kiya to vijayant ne darban ko kuchh bakhshish di & car vaha se nikali.

"aap aise mera faisla nahi le sakte.main nahi ja rahi!",gusse se rambha ka chehra laal ho raha tha.vijayant use kya darpok samajh raha tha!..vo ghabrayi zarur thi lekin ab taiyyar bhi thi.aage vo shakhs uske karib aake dekhe,vo uska munh noch legi!

"bahas mat karo!",vijayant ne use danta,"..tumhari samajh me kuchh nahi aa raha.bahut khatra hai yahan!"

"mujhe darr nahi lagta kisi bhi baat se."

"bas!",vijayant ki bhari aavaz tez ho gayi & usne baya hath uthake bahu ko chup rehne ka ishara kiya,"..tum kal ja rahi ho.is baat ka faisla ho chuka hai.",rambha ki aankho me pani aa gaya.use aajtak aise kisi ne nahi danta tha.vo khamosh ho gayi & khidki se bahar dekhne lagi.vijayant ko bhi mehsus hua ki usne bahu se kuchh zyada hi sakhti se baat ki hai & usne baya hath badha ke sleeveless blouse se bahar jhank rahi uski narm,gori dayi banh ko chhua to rambha ne use jhatak diya.vijayant ne hath peechhe khincha & khamoshi se car chalane laga.

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panchmahal ke apne hotel me Brij Kothari aaram kar raha tha.savere dhardar jharno pe vijayant ko dekh vo bahut ghabra gaya tha lekin jab uski ghabrahat kam hui to usne devalay vapas lautne ka khayal dimagh se nikal diya.us se anjane me 1 achha kaam hua tha.vo apne office ki 1 car uthake Clayworth tak chala aaya tha joki uske naam pe register nahi thi.us car ko usne Avantipur ke apne daftar ki parking me lagaya & iasa karte use kisi ne nahi dekha.

uske baad 1 private taxi book ki & panchmahal pahuncha & vaha se seedha apne hotel.apne aadmiyo se usne yahi kaha ki vo hotel ki surprise checking pe aaya hai.vaha se usne avantipur ke daftar fone kar kaha ki devalay office ki 1 car vaha park hai jise vapas bhijwa diya jaye.

brij ne soch liya tha ki vo is mamle ko suljha ke hi manega & jo bhi use aise phansane ki koshish kar raha tha use vo maza zarur chakhayega.vo bistar pe leta tha ki uska mobile baja,"hello."

"hi,janeman!kaha rehte ho aajkal?picture sign karwa ke to bhul hi gaye mujhe.",kamya ki khanakti aavaz sunte hi brij ke hotho pe muskan fail gayi.

"meri jaan!hum to tumhare dil me hi rehte hain,tumhi use tatol ke dekhti nahi kabhi."

"uffff!..",kamya bistar me nangi leti thi.usne apni chut pe hath firaya jis se kabir ka virya beh raha tha.bas abhi hi unki chudai khatm hui thi & kabir bathroom me naha raha tha,"..tumne to lajawab kar diya,jaan!vaise kaha ho abhi?"

"jaha is waqt hona chahiye.",brij ne jaan bujh ke baat ghuma di,"..& tum?"

"main to avantipur me hu,yaar.shooting ke liye aayi hun."

"achha.kab aayi..i mean kab gayi vaha?"

"bas savere ki flight se pahunchi thi.dhardar pe gana shoot hona tha lekin pata nahi aaj vaha kuchh gadbad thi to pura ilaka seal tha.ab dekhen kal kya hota hai.aaj ka pura din to khali baithe bore houngi.",kamya ne kitni safai se jhuth bol diya tha.shooting cancel hone ki khabar sun kabir khushi se uchhal pada tha & use apne kamre me le aaya tha & agli subah tak kamya vahi rehne vali thi.

"achha.vaise kya gadbad hui hai vahan?"

"pata nahi.keh rahe hain ki koi gunda dikha tha vaha to pehle pure ilake ko chhan ke safe declare karenge fir public ko jane denge vaha."

"oh.",brij samajh gaya ki police asal baat chhupa rahi hai.sahi bhi tha,aakhir sameer ki jaan ka sawal tha lekin fir use kyu bulaya tha vaha us caller ne?..ho na ho ye vijayant ki hi ghinoni sazis hai..kamina!bete ko mohra bana mujhe phansana chahta hai,apne business ke liye!

"kya hua,brij darling chup kyu ho gaye?..kahi kisi dilruba ke sath to masruf nahi ho?",kamya ne use chheda.

"dilruba to is waqt avantipur me baithi hai yaha to bas niras files & ubau kaam hai.",brij ne natkiya aah bhari to kamya hans padi.

"to yaha aa jao na!abhi to shooting chalegi kuchh din yaha & fir yaha ka mausam kitna suhana hai.aise aalam me tumhari mazbut bazuo me pisne ka ji kar raha hai,darling!"

"thoda sabr karo,meri jaan.ho sakta hai bahut jald hi tumhari tamanna puri ho jaye."

"sach?",kamya ne bahut khush hone ka natak kiya.kabir apne baal ponchhta bathroom se bahar aa gaya tha.uska lund jhadne ke baad sikudne ke bavjood achha-khas lumba tha.kamya ne use dekh hotho pe jibh firayi & apni tange faila apni chut pe 1 ungli firayi.

"sach."

"to jaldi aana.ok,bye!",kamya ne fone kinare fenka & apni faili tango ke beech uski chut se apna virya apni zuban se saaf karte kabir ke baalo ko sehlane lagi.

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"mr.mehra,vo bahut chalak aadmi hai & usne bhanp liya tha ki main uska peechha kar raha hu & kya chakma diya usne mujhe.usi karan mujhe aane me der ho gayi varna use range hatho pakad leta.",Balbir Mohan Hotel Clayworth Violet ke bar me vijayant ke sath baitha tha & dono beer pi rahe the.bar abhi khula nahi tha & isiliye dono aaram se baate kar rahe the.

"balbir,use kabhi bhi kam nahi aankna.bahut shatir hai vo.",vijayant ne beer ka 1 ghunt bhara,"..vaise 1 baat samajh nahi aayi mujhe?"

"kya?"

"agar vo sameer ki gumshudgi ke peechhe hai to vo peechhe hi rehna pasand karega balki aisa jaal bunega ki koi ye samajh hi naye paye ki us jaal ke sire us tak jate hain.is tarah se khud jharne pe aana kuchh samajh nahi aaya."

"hun..jharne pe aapke peechhe-2 police ne bhi pahunchane me zara der kar di nahi to uska khel usi waqt khatm ho jata."

"abhi tak fir koi fone nahi aaya balbir.mujhe sameer ki fikr ho rahi hai."

"aap ghabraiye mat,mehra sahab.sameer ki keemat bahut oonchi lagayi hai use agwa karne vale ne.bina aapka jawab sune vo use hath nahi lagayenge."

"uske khoon se rangi kamiz bheji hai unhone balbir!",emhra ki aankho me gussa & darr dono the.

"mehra sahab,vo aapko darana chahte hain taki aap fauran unki baat maan len.sameer unke liye sone ke ande dene vali murgi hai,use marne ki bevkufi vo nahi kar sakte.unhone syringe se uski banh se khun nikal ke us kameez pe gira diya hoga.kisi bhi valid ke liye aulad ke khoon ko dekhna kitna khaufnak tajurba ho sakta hai,usi baat pe khel rahe hain vo."

"to kya karu main?",vijayant pehli baar itna bebas mehsus kar raha tha.

"aap unki baat maan lijiye."

"kya?!"

"haan,aapko agla fone jald ayega & vo aapko fir se sameer ko nuksan pahuchane ki baat kahenge.aap ghabra ke unki baat maan lijiye fir dekhiye vo kya bolte hain.kisi bhi tarah hume sameer ko apne paas lana hai.aapko bas baat maanane ki baat kehni hai sach me maanani thode hi hai.",balbir ki baat se vijayant ke hotho pe muskan aa gayi.

"main samajh gaya tumahri baat,balbir."

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"tum kaha ho,brij?",brij kamya se baat kar taiyyar hua hi tha ki Soniya ka fone aa gaya.

"main panchmahal me hu,darling."

"tum to clayworth gaye the na?"

"haan,vaha ka kaam nipta ke yaha aa gaya."

"itni jaldi?"

"haan,kaam jaldi ho gaya."

"oh.vaise kya kaam tha,jaan?",soniya ki aankhe raat bhar rone se laa ho chuki thi.agar brij dekh sakta to dekhta ki uski biwi ki aavz se bilkul ulte bhav uski surat pe the.

"are,meri rani..apne logo ko beech-2 me chaunkane se vo mustaid rehte hain.bas aise hi checking kar raha hu."

"hun..to lautoge kab?"

"kyu?yaad aa rahi hai meri?",brij muskuraya.

"aise achanak chale jaoge to chinta to hogi na."

"oh,darling i love you!main jaldi hi aa jaoonga.ok?"

"ok,darling.i love you.bye!",soniya ne fone kata & fir dusra number dial kiya.

"hi soniya.",vijayant ne balbir ko bhi apne hotel ke manager se kehke 1 kamra dilwa diya tha.beer pine ke baad balbir aaram karne chala gaya tha jabki vijayant vahi baitha dusri beer pi raha tha.

"vijayant,mujhe sab kuchh batao."

"kis bare me,soniya?"

"sameer ke bare me jo bhi pata chala hai tumhe.",vijayant khamosh ho gaya.

"kya hua,vijayant?"

"chhodo na,soniya.kya karogi jaan ke?",vijayant ne jaan bujh ke natak kiya tha.kal raat ko soniya se hui baat se use itna to samajh aa gaya tha ki vo brij ko is sab ke peechhe ka dimagh samajh rahi thi & is baat se pati se dukhi bhi thi.yehi to use chahiye tha.brij ki barbadi to uska bahut purana sapna tha.

"please,vijayant.tumhe meri kasam.mujhe sab batao."

"ok.",vijayant ne 1 lumbi sans le use sari baat shuru se batana chalu kiya,"..lekin main yakin se nahi keh sakta ki vo brij hi tha.andhera tha us waqt."

"main tumse milna chahti hu,vijayant."

"please,soniya yaha mat aao.khatra hai yaha!"

"vijayant,main tumse milne aa rahi hu.",soniya ne fone kaat diya.itne dino se dono mardo ke beech jhulte hue use kabhi-2 bahut galni hoti thi.use lagta tha ki vo pati se bewafai kar rahi hai & premi se khel rahi hai magar ab uski uljhan sulajhti dikh rahi thi.use samajh aa gaya tha ki uska pati galat tha & premi sahi.ab use kisi baat ki parwah bhi nahi thi.vo janti thi ki vijayant us se kabhi shadi nahi karega lekin ab use uski rakhail banke rehna bhi manzur tha.

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kramashah.......