Maa ka dulara -माँ का दुलारा compleet

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rajaarkey
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Maa ka dulara -माँ का दुलारा compleet

Unread post by rajaarkey » 13 Dec 2014 01:47

माँ का दुलारा

सावधान........... ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े क्योंकि ये कहानी एक मा बेटे के सेक्स की कहानी है


दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी मा का दुलारा ले कर आपके लिए हाजिर हूँ

ये तो हम सभी जानते है की जिंदगी मे इंसान सिर्फ़ और सिर्फ़ सेक्स के बारे मे सोचता है दोस्तो जो इंसान ये कहता है कि वह अपने ईमान का पक्का है तो ग़लत कहता है क्योकि सेक्स तो जीवन का एक रूप है अगर सेक्स नही होता तो शायद ये दुनिया नही होती लेकिन हम इंसानो ने सेक्स की कुछ सीमाए बना दी ताकि इंसान कम से कम अपने घर अपने कुछ रिश्तो को सेक्स की नज़र से ना देखे लेकिन फिर भी हर इंसान बेशक वह सेक्स करे या ना करे लेकिन उसके मन मे अपनी मा या बहन के लिए ग़लत विचार आ ही जाते हैं चाहे थोड़ी देर के लिए ही क्यो ना आए इंसान के मन मे ग़लत भावना आ ही जाती है दोस्तो मे भी मा बहन के लिए सेक्स के बारे सोचना पाप समझता हू लेकिन फिर भी कुछ पारशेंट लोग तो अपने चरित्र से गिर ही जाते है ये कहानी भी एक ऐसे बेटे की है जो अपनी मा का दुलारा था लेकिन जब वो बड़ा हुआ तो.........................................अब आप ये कहानी उसी की ज़ुबानी सुने ............मेरा नाम अनिल है. घर मे बस मैं और मेरी मोम रीमा है. मोम और डॅडी का बहुत पहले डाइवोर्स हो गया था. उसके बाद डॅडी से हमारा कोई संपर्क नही रहा है. डॅडी दुबाई मे जा बसे है, वाहा उन्होंने दूसरी शादी कर ली है. दाइवोर्स के बाद मैंने मोम के साथ रहने का फ़ैसला किया था. तब मैं सिर्फ़ आठ साल का था. दोनों मे बहुत झगड़ा होता था इसलिए एक तराहा से जब मोम अलग हुई तो मेरी जान मे जान आई. मैं मोम से बहुत प्यार करता था, उसके बिना रहने की कल्पना भी नही कर सकता था.

हमारा घर मुंबई मे है. मोम ने दाइवोर्स के बाद दिल्ली मे नौकरी पकड़. ली और मुझे पूना मे होस्टल मे रख दिया कि मेरी पढ़ाई मे खलल ना हो. मैं काफ़ी रोया चिल्लाया पर मोम के समझाने पर आख़िर मान गया. उसने मुझे बाँहों मे भर कर प्यार से समझाया कि उसे अब नौकरी करना पड़ेगी और एक होस्टल मे रहना होगा. इसलिए यही बेहतर था कि मैं होस्टल मे रहूं. तब हमारा खुद का घर भी नही था और मोम मुझे नानाजी के यहाँ नही रखना चाहती थी. बड़ी स्वाभिमानी है.

पिछले साल मोम ने नौकरी बदल कर यहाँ मुंबई मे नौकरी कर ली. यहाँ उसे अच्छी काफ़ी सैलरि वाली नौकरी मिल गयी. घर भी किराए पर ले लिया. मेरा भी एच.एस.सी पूरा हो गया था इसलिए मोम ने मुझे फिर यहाँ अपने पास बुला लिया की आगे की पढ़.आई यही करूँ.

अब तक मैं साल मे सिर्फ़ दो तीन बार मोम से मिलता था, गरमी और दीवाली की छुट्टी मे.वह सारा समय मज़ा करने मे जाता था. मोम भी नौकरी करती थी इसलिए साथ मे रहना कम ही होता था, बस रविवार को. पिछले एक दो सालों से, ख़ास कर जब से मैंने किशोरावस्था मे कदमा रखा, धीरे धीरे मोम के प्रति मेरा नज़रिया बदलने लगा था. अब मैं उसे एक नारी के रूप मे भी देखने लगा था. होस्टल मे रहकर लड़के बदमाश हो ही जाते हैं. तराहा तराहा की कहानियाँ पढ़ते है और पिक्चर देखते है. मेरे साथ भी यही हुआ. उन कहानियों मे कई मोम बेटे के कहानियाँ होती थीं. बाद.आ मज़ा आता था मैं ज़्यादातर राज शर्मा के ब्लॉग कामुक-कहानियाँ.ब्लॉगस्पोट.कॉम पर सेक्सी कहानियाँ पढ़ता था पर कभी कभी जब मैं मोम और मेरी उन कहानियों जैसी स्थिति मे होने की कल्पना करता था तो पहले तो सब अटपटा लगता था. मोम आख़िर मोम थी, मुझे प्यार करने वाली, मुझपर ममता की वर्षात करने वाली. बहुत अपराधिपन भी महसूस होता था पर मन को कौन पिंजरे मे डाल पाया है.

जब मैं एच.एस.सी के बाद घर रहने वापस आया तो मोम के साथ हरदम रहकर उसके प्रति मेरा आकर्षण चरमा सीमा पर पहुँच गया. मोम अब करीब सैंतीस साल की है. मोम का चेहरा बहुत सुंदर है, कम से कम मेरे लिए तो वा सबसे बड़ी ब्यूटी क्वीन है. शरीर थोड़ा मांसल और मोटा है, जैसा अक्सर इस उमर मे स्त्रियों का होता है, पर फिगर अब भी अच्छा है. मोम रहती एकदमा टिप टाप है. आख़िर एक बड़ी मलतिनेशनल मे आफिसर है. पहले वह ड्रेस और पैंट सूट भी पहनती थी, आजकल हमेशा साड़ी पहनती है. कहती है कि अब इस उमर मे और कुछ अच्छा नही लगता. पर साड़ियाँ एकदमा अच्छी चाइस की होती हैं. चेहरे पर सादा पर मोहक मेकअप करती है ज़रा सी गुलाबी लिपस्टिक भी लगा लेती है जिससे उसके रसीले होंठ गुलाब की कलियों से मोहक लगने लगते है.

जब मैं वापस मोम के साथ रहने आया तब अक्सर दिन भर अकेला रहता था. उसे इतना काम रहता था कि वह अक्सर रात को देर से आती थी. शनिवार को भी जाना पड़.आता था. बस रविवार हम साथ बिताते थे. तब मुझसे खूब गप्पे लगाती, मेरे लिए ख़ास चीज़े बनाती और शामा को मेरे साथ घूमने जाती.

पर अब मैं उससे बात करने मे थोड़ा झिझकने लगा था. मेरी नज़र बार बार उसके मांसल शरीर पर जाती. घर मे वह गाउन पहनती थी और इसलिए तब उसके स्तनों का उभार उस ढीले गाउन मे छिप जाता. पर जब्वह साड़ी पहने होती और उसका पल्लू कभी गिरता तो मेरी नज़र उसके वक्षास्तल के मुलायम उभार पर जाती. उसके ब्लओज़ थोड़ा लो कट है इसलिए स्तनों के बीच की खाई हमेशा दिखती थी. अगर वह झुकती तो मेरे सारे प्राण मेरी आँखों मे सिमट आते, उसके उरजों के बीच की वह गहरी वैली देखने को. वह अगर स्लीवलेस ब्लाउz पहनती तो उसकी गोरी गोरी बाँहे मुझे मंत्रमुग्धा कर देतीं. मोम की कांखे बिलकुल चिकनी थीं, वह उन्हे नियमित शेव करती थी. स्लीवलेस ब्लाउz पहनने के लिए यहा ज़रूरी था. पीछे से साड़ी और ब्लाउz के बीच दिखती उसकी गोरी कमर देखकर मैं दीवाना सा हो जाता. थोड़ा मुटापे के कारण उसकी कमर मे अक्सर हल्के टायर से बन जाते. और मोम की दमकती चिकनी गोरी पीठ, उसपरासे मेरी नज़र नही हटती थी! उसके लो कट के ब्लओज़ मे से उसकी करीब करीब पूरी पीठ दिखती. मोम की त्वचा बहुत अच्छी है, एकदम कोमल और निखरी हुई.

और उसके नितंबों का तो क्या कहना. पहले से ही उसके कूल्हे चौड़े हैं. मुझे याद है कि बहुत पहले जब उसका बदन छरहरा था, तब भी उसके कूल्हे ज़्यादा चौड़े दिखते थे. वह उसपर कई बार झल्लाति भी, क्योंकि उसे लगता कि वह बेडौल लगती है. पर उसे कौन बताए की उन चौड़े कुल्हों के कारण मेरी नज़रों मे वह कितनी सुंदर दिखती थी. ख़ासकर जब वह चलती तो उसे पीछे से देखने को मैं आतुर रहता था. मोटे मोटे तरबूजों जैसे नितंब और बड़े स्वाभाविक तरीके से लहराते हुए; मुझे लगता था कि वही मोम के पीछे बैठ जाउ और अपना चेहरा उनके बीच छुपा दूँ.

और मोम के पाँव. एकदम गोरे और नाज़ुक पाँव थे उसके. मोतिया रंग का नेल पेंट लगी वो पतली नाज़ुक उंगलियाँ और चिकनी मासल एडी. वह चप्पले और सैंडल भी बड़ी फैशनेबल पहनती थी जिससे वो और सुंदर लगते थे. इसलिए मोम के पैर छूने मे मुझे बहुत मज़ा आता था. और ख़ासकर पिछले एक साल से जब मैं होस्टल से आता या वापस जाता, ज़रूर झुककर दोनों हाथों से उसके पैर छूटा, अच्छे से और देर तक; उसे वह अच्छा नही लगता था.

"क्यों पैर छूता है रे मेरे, मैं क्या तेरे नानी हू. बंद कर दे." वह अक्सर झल्लाति पर मैं बाज नही आता था. मन मे कहता

"मॅमी, तू नाराज़ ना हो तो मैं तो तेरे पाँव चुम लूँ." एस डी बर्मन का एक गाना मुझे याद आता, मोम के चरणामृत के बारे मे "... ये चरण तेरे माँ, देवता प्याला लिए, तरसे खड़े माँ!" उस गाने मे मों के प्रति भक्ति है पर मेरे मन मे यहा गाना मीठे नाजायज़ ख़याल उभार देता.

कम से कम यह अच्छा था कि अब मोम मुझे प्यार से अपनी बाँहों मे नही भरती थी जैसा वह बचपन मे करती थी. मैं बड़ा हो गया था. यहा अच्छा ही था क्योंकि अब मोम को देखकर मैं उत्तेजित होने लगा था. जब वह घर का काम करती और उसका ध्यान मेरी ओर नही होता तब मैं उसे मन भर कर घुरता. मेरा लंड तन्नाकार खड़ा हो जाता था. कभी उसके सुंदर चेहरे और रसीले होंठों को देखता, कभी उसके नितंबों को और कभी उसकी पीठ और कमर पर नज़र गढ़ाए रहता. उसके सामने किसी तरह से मैं कंट्रोल कर लेता था पर मौका मिले तो ठीक से घूर कर मैं उसकी मादक सुंदरता का मन ही मन पान करते हुए अपने लंड पर हाथ रखकर सहलाने लगता.

कभी मोम सोफे पर बैठकर सामने की सेती पर पैर रख कर टीवी देखती या कुछ पढ़ती तो मेरा मन झुम उठता क्योंकि अक्सर उसका गाउन सरककर उपर हो जाता और उसके गोरे पैर और मांसल चिकनी पिंडलियाँ दिखाने लगती. मैं भी वही एक किताब लेकर बैठ जाता और उसके पीछे से उन्हे देखता रहता और एक हाथ से अपना लंड सहलाता.

अक्सर मोम पैर पर पैर रखकर एक पैर हिलाती, तो उसकी उंगलियों से लटकी चप्पल हिलने लगती. यहा देखकर तो मैं और मदहोश हो जाता. पहले ही मैं उसके पैरों और चप्पालों का दीवाना था, फिर वह पैर से लटककर नाचती रबर की मुलायम चप्पल देखकर मुझे लगता था कि अभी उसे हाथ मे ले लूँ और चुम लूँ, चबा चबा कर खा जाउ. एक बार मोम ने मुझे अपने पैर की ओर घुरते हुए देख लिया था, तुरंत पैर हिलाना बंद करके देखने लगी कि कुछ लगा है क्या, मैंने बात बना दी कि मोम शायद एक कीड़ा चढ़ा था, उसे देख रहा था.

मोम को पसीना भी ज़्यादा आता था. उसके ब्लओज़ की कांख भीगी रहती थी. वह नज़ारा भी मुझे बहुत उत्तेजित करता था. कई बार मैंने कोशिश की की कपड़े बदलते समय उसे देखु. पर वह हमेशा अपने बेडरूम मे दरवाजा लगाकर ही कपड़े बदलती. सोचती होगी क़ी अब बेटा बड़ा हो गया है.

मैं घर के काम करने मे उसकी खूब मदद करता, जो वह कहती तुरंत भाग कर करता. वह भी मुझ पर खुश थी. मैं परेशान था, आख़िर क्या करूँ, कुछ समझ नही पा रहा था. बीच बीच मे लगता कि मोम के बारे मे ऐसा सोचना पाप है पर उसके मादक आकर्षण के आगे मैं विवश हो गया था. मैं अक्सर यहा भी सोचता की मोम जैसी सुंदर नारी आख़िर अकेले कैसे रहती है, क्या उसे कभी सेक्स की चाहत नही होती? क्या उसका कोई अफेयर है? लगता तो नही था क्योंकि बेचारी आफ़िस से आती तो थॅकी हुई. उसे समय ही कहाँ था कुछ करने के लिए. और घर मे भी अब वह अकेली नही थी, मैं जो था.

रात को और दिन मे भी अकेले मे (कालेज खुलने मे अभी समय था, एडमिशन भी नही हुए थे) उसके रूप को आँखों के सामने को लाकर मैं हस्तमैथुन करता, कल्पना करता की मोम नग्नावस्था मे कैसी लगेगी. मन ही मन अपनी फ़ैंतसी मे उससे तरह तरह की रति करता. मोम को मैं अच्छा लगता हम और वह बड़े अधिकार से मुझसे मन चाहे संभोग करा रही है, यहा मेरी पेट फ़ैंतसी थी.

अब हौसला करके मैंने उसके अंतर्वस्त्रा चुराने शुरू कर दिए थे. उसकी ब्रा और पैंटी मैं चुपचाप उठा लाता और अकेले मे घर मे उनमे लंड लपेट कर मुत्ता मारता. मोम के पास बड़ा अच्छा कलेक्शन था. उनमे से एक लेस वाली सफेद ब्रा और एक नायलाँ की काली ब्रा मेरी ख़ास पसंद की थीं. उन्हे सूँघते हुए मुझे ऐसा लगता जैसे मई मों के आगोश मे उसकी छाती मे सिर छुपाए पद.आ हुआ हम. लंड पर उनका मुलायामा स्पर्श मुझे दीवाना कर देता.

एक दो बार मैं पकड़ा जाता पर बच गया. अक्सर मुत्ता मारने से मेरा वीर्या उनमे लग जाता. तब मैं धो कर दिन मे उन्हे सूखा कर वापस रख देता. एक दिन सुबह मोम परेशान लगी. मैंने पूछा तो बोली कि उसकी काली ब्रा नही मिल रही है. वह काली साड़ी पहन कर आफ़िस जाना चाहती थी. आख़िर झल्ला कर दूसरी साड़ी पहन कर चली गयी. ब्रा मिलती कैसे, रात को मुत्ता मार कर मैंने उस ब्रेसियार को अपने कमरे मे छुपा दिया था. मुझे क्या मालूमा कि आज वह उसे ही पहनेगी! मोम के जाने के बाद उसे धोकर सुखाकर मैंने मोम की अलमारी मे सेडियीओ के बीच छुपा दिया. बाल बाल बचा क्योंकि रात को वापस आकर मोम ने सारी अलमारी ढूँढना शुरू कर दी. जब ब्रा मिली तो वह निश्चिंत हुई. बोली

"अनिल, मैंने भी देखो कहाँ रख दी थी, इसीलिए नही मिल रही थी, मुझे लगा था कि गुम तो नही गयी या बाहर गैलरी से सुखाते समय गिर तो नही गयी."

उसके बाद मैंने उसकी अलमारी से ब्रा चुराना बंद कर दिया. मोम के जाने के बाद धोने को डाली उसकी ब्रा और पैंटी से काम चलाने लगा. यहा और भी मतवाला काम था. उनमे मोम के शरीर की और उसके पसीने की भीनी खुशबू छुपी होती. उसकी पैंटी के क्रेच मे से मोम की चूत की मतवाली महक आती. अब तो मैं मस्त होकर उन्हे मुँहा मे भर लेता और कस कर मूठ मारता. फिर कामवाली बाई आने के पहले उन्हे धोने को रख देता. मेरी दोपहर तो रंगीन हो गयी पर रात को परेशानी होनी लगी.

रात की परेशानी दूर करने के लिए मैंने मोम की चप्पलो का सहारा लेना शुरू कर दिया. जैसा मैंने बताया, मोम के पैर बड़े खूबसूरत हैं. उसके पास सात आठ जोड़ी चप्पले और सैंडल भी हैं, अधिकतर हाई हिल की. रात को मैं मोम के सो जाने के बाद बाहर के शू-रैक से चुपचाप एक जोड़ी उठा लाता. फिर उन्हे लंड से सहलाता, चूमता, चाटता और मूठ मारता. अगर विर्य सैंडल पर छलक जाता तो ठीक से पोंछ कर वापस रख देता. वैसे सबसे अच्छी मुझे मोम की रबर की बाथरुम स्लीपर लगती थी. नाज़ुक सी गुलाबी वा चप्पल जब मोम के पैरों मे देखता और चलते समय होने वाली सपाक सपाक की आवाज़ सुनता जो मोम के तलवं से चप्पल के टकराने से होती थी तो मैं अपना संयम खोने लगता था. दोपहर को वह चप्पल मैं ले आता था पर रात को मोम उसे पहने होती और सोने के बाद उसके बेडरूमा से उन्हे उठाने का मेरा साहस नही था.

इसी चक्कर मे एक दिन आख़िर मैं पकड़.आ गया. एक हिसाब से अच्छा ही हुआ क्योंकि उस घटना ने आख़िर मोम और मेरे बीच की सारी दीवारे हटा दी

क्रमशः......................

दोस्तों पूरी कहानी जानने के लिए नीचे दिए हुए पार्ट जरूर पढ़े .................................
आपका दोस्त
राज शर्मा
माँ का दुलारा पार्ट -1
माँ का दुलारा पार्ट -2
माँ का दुलारा पार्ट -3
माँ का दुलारा पार्ट -4
माँ का दुलारा पार्ट -5
माँ का दुलारा पार्ट -6
माँ का दुलारा पार्ट -7
माँ का दुलारा पार्ट -8
माँ का दुलारा पार्ट -9
माँ का दुलारा पार्ट -10

MAA KAA DULAARA

mera naam anil hai. ghar me bas mai aur meri mom rima hai. mom aur daddy ka bahut pahale divorce ho gaya tha. usake baad daddy se hamara koi sampark nahi raha hai. daddy dubaai me ja base hai, wahaa unhomne dusari shaadi kar li hai. daaivors ke baad maimne mom ke saath rahane ka faisala kiya tha. tab mai sirf aath saal ka tha. donom me bahut jhagad.a hota tha isaliye ek taraha se jab mom alag hui to meri jaan me jaan aayi. mai mom se bahut pyaar karata thaa, usake bina rahane ki kalpana bhi nahi kar sakata tha.

hamaara ghar mumbai me hai. mom ne daaivors ke baad dilli me naukari pakad. li aur mujhe poona me hostal me rakh diya ki meri padhaai me khalal na ho. mai kaafi roya chillaaya par mom ke samajhaane par aakhir maan gaya. usane mujhe baamhom me bhar kar pyaar se samajhaaya ki use ab naukari karana padegi aur ek hostal me rahana hoga. isaliye yahi behatar tha ki mai hostal me rahum. tab hamaara khud ka ghar bhi nahi tha aur mom mujhe naanaaji ke yahaam nahi rakhana chaahati thi. badi swaabhimaani hai.

pichale saal mom ne naukari badal kar yahaam mumbai me naukari kar li. yahaam use achchi kaafi sailari waali naukari mil gayi. ghar bhi kiraaye par le liya. mera bhi H.S.C pura ho gaya tha isaliye mom ne mujhe fir yahaam apane paas bula liya ki aage ki padh.aai yahi karum.

ab tak mai saal me sirf do tin baar mom se milata thaa, garami aur diwaali ki chutti me.wah saara samaya maja karane me jaata tha. mom bhi naukari karati thi isaliye saath me rahana kama hi hota thaa, bas ravivaar ko. pichale ek do saalom se, khaas kar jab se maimne kishoraawastha me kadama rakhaa, dhire dhire mom ke prati mera najariya badalane laga tha. ab mai use ek naari ke rup me bhi dekhane laga tha. hostal me rahakar ladake badamaash ho hi jaate haim. taraha taraha ki kahaaniyaam padhate hai aur pikchar dekhate hai. mere saath bhi yahi hua. un kahaaniyom me kai mom bete ke kahaaniyaam hoti thim. bad.a maja aata tha par kabhi kabhi jab mai mom aur meri un kahaaniyom jaisi sthiti me hone ki kalpana karata tha to pahale to bad.a atapata lagata tha. mom aakhir mom thi, mujhe pyaar karane waali, mujhapar mamata ki warshat karane waali. bahut aparaadhipan bhi mahasus hota tha par man ko kaun pimjare me daal paaya hai.

jab mai ech.es.si ke baad ghar rahane waapas aaya to mom ke saath haradama rahakar usake prati mera aakarshan charama sima par pahumch gaya. mom ab karib saimtis saal ki hai. mom ka chehara bahut sumdar hai, kama se kama mere liye to wah sabase bad.i byuti kwin hai. sharir thod.a maamsal aur mota hai, jaisa aksar is umara me striyom ka hota hai, par figar ab bhi achcha hai. mom rahati ekadama tip taap hai. aakhir ek bad.i maltineshanal me aafisar hai. pahale wah dres aur paimt sut bhi pahanati thi, aajakal hamesha saad.i pahanati hai. kahati hai ki ab is umar me aur kuch achcha nahi lagata. par saad.iyaam ekadama achchi chaais ki hoti haim. chehare par saada par mohak mekap karati hai jara si gulaabi lipastik bhi laga leti hai jisase usake rasile honth gulaab ki kaliyom se mohak lagane lagate hai.

jab mai waapas mom ke saath rahane aaya tab aksar din bhar akela rahata tha. use itana kaam rahata tha ki wah aksar raat ko der se aati thi. shaniwaar ko bhi jaana pad.ata tha. bas raviwaar ham saath bitaate the. tab mujhase khub gappe lagaati, mere liye khaas chije banaati aur shaama ko mere saath ghumane jaati.

par ab mai usase baat karane me thod.a jhijhakane laga tha. meri najar baar baar usake maamsal sharir par jaati. ghar me wah gaaun pahanati thi aur isaliye tab usake stanom ka ubhaar us dhile gaaun me chip jaata. par jabwah saad.i pahane hoti aur usaka pallu kabhi girata to meri najar usake wakshasthal ke mulaayama ubhaar par jaati. usake blaauz thod.e lo kat hai isaliye stanom ke bich ki khaai hamesha dikhati thi. agar wah jhukati to mere saare praan meri aamkhom me simat aate, usake urojom ke bich ki wah gahari vaili dekhane ko. wah agar slivales blaauz pahanati to usaki gori gori baamhe mujhe mamtramugdha kar detim. mom ki kaamkhe bilakul chikani thim, wah unhe niyamit shev karati thi. slivales blaauz pahanane ke liye yaha jaruri tha. piche se saadi aur blaauz ke bich dikhati usaki gori kamar dekhakar mai diwaana sa ho jaata. thod.e mutaape ke kaaran usaki kamar me aksar halke taayar se ban jaate. aur mom ki damakati chikani gori pith, usaparase meri najar nahi hatati thi! usake lo kat ke blaauz me se usaki karib karib puri pith dikhati. mom ki twacha bahut achchi hai, ekadam komal aur nikhari hui.

aur usake nitambom ka to kya kahana. pahale se hi usake kulhe chaud.e haim. mujhe yaad hai ki bahut pahale jab usaka badan charahara thaa, tab bhi usake kulhe jyaada chaud.e dikhate the. wah usapar kai baar jhallaati bhi, kyomki use lagata ki wah bedaul lagati hai. par use kaun bataaye ki un chaud.e kulhom ke kaaran meri najarom me wah kitani sumdar dikhati thi. khaasakar jab wah chalati to use piche se dekhane ko mai aatur rahata tha. mote mote tarabujom jaise nitamb aur bad.e swaabhaawik tarike se laharaate hue; mujhe lagata tha ki wahi mom ke piche baith jaaum aur apana chehara unake bich chupa dum.

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"kyom pair chuta hai re mere, mai kya tere naani hum. bamd kar de." wah aksar jhallaati par mai baaj nahi aata tha. man me kahata

"mami, tu naaraaj na ho to mai to tere paamv chuma lum." es di barman ka ek gaana mujhe yaad aataa, mom ke charanaamrut ke baare me "... ye charan tere maam, devata pyaala liye, tarase khad.e maam!" us gaane me mom ke prati bhakti hai par mere man me yaha gaana mithe naajaayaj khayaal ubhaar deta.

kama se kama yaha achcha tha ki ab mom mujhe pyaar se apani baamhom me nahi bharati thi jaisa wah bachapan me karati thi. mai bad.a ho gaya tha. yaha achcha hi tha kyomki ab mom ko dekhakar mai uttejit hone laga tha. jab wah ghar ka kaama karati aur usaka dhyaan meri or nahi hota tab mai use man bhar kar ghurata. mera lund tannaakar khad.a ho jaata tha. kabhi usake sumdar chehare aur rasile homthom ko dekhataa, kabhi usake nitambom ko aur kabhi usaki pith aur kamar par najar gad.aaye rahata. usake saamane kisi taraha se mai kamtrol kar leta tha par mauka mile to thik se ghur kar mai usaki maadak sumdarata ka man hi man paan karate hue apane lund par haath rakhakar sahalaane lagata.

kabhi mom sofe par baithakar saamane ki seti par pair rakh kar tivi dekhati ya kuch padh.ati to mera man jhuma uthata kyomki aksar usaka gaaun sarakakar upar ho jaata aur usake gore pair aur maamsal chikani pimdaliyaam dikhane lagatim. mai bhi wahi ek kitaab lekar baith jaata aur usake piche se unhe dekhata rahata aur ek haath se apana lund sahalaata.

aksar mom pair par pair rakhakar ek pair hilaati, to usaki umgaliyom se lataki chappal hilane lagati. yaha dekhakar to mai aur madahosh ho jaata. pahale hi mai usake pairom aur chappalom ka diwaana thaa, fir wah pair se latakakar naachati rabar ki mulaayama chappal dekhakar mujhe lagata tha ki abhi use haath me le lum aur chuma lum, chaba chaba kar kha jaaum. ek baar mom ne mujhe apane pair ki or ghurate hue dekh liya thaa, turamt pair hilaana bamd karake dekhane lagi ki kuch laga hai kyaa, maimne baat bana di ki mom shaayad ek kid.a chadh.a thaa, use dekh raha tha.

mom ko pasina bhi jyaada aata tha. usake blaauz ki kaamkh bhigi rahati thi. wah najaara bhi mujhe bahut uttejit karata tha. kai baar maimne koshish ki ki kapad.e badalate samaya use dekhu. par wah hamesha apane bedaruma me darawaaja lagaakar hi kapad.e badalati. sochati hogi ki ab beta bad.a ho gaya hai.

mai ghar ke kaama karane me usaki khub madad karataa, jo wah kahati turamt bhaag kar karata. wah bhi mujh par khush thi. mai pareshaan thaa, aakhir kya karum, kuch samajh nahi pa raha tha. bich bich me lagata ki mom ke baare me aisa sochana paap hai par usake maadak aakarshan ke aage mai vivash ho gaya tha. mai aksar yaha bhi sochata ki mom jaisi sumdar naari aakhir akele kaise rahati hai, kya use kabhi seks ki chaahat nahi hoti? kya usaka koi afeyar hai? lagata to nahi tha kyomki bechaari aafis se aati to thaki hui. use samaya hi kahaam tha kuch karane ke liye. aur ghar me bhi ab wah akeli nahi thi, mai jo tha.

raat ko aur din me bhi akele me (kaalej khulane me abhi samaya thaa, edamishan bhi nahi hue the) usake rup ko aamkhom ke saamane ko laakar mai hastamaithun karataa, kalpana karata ki mom nagnaawastha me kaisi lagegi. man hi man apani faimtasi me usase taraha taraha ki rati karata. mom ko mai achcha lagata hum aur wah bad.e adhikaar se mujhase man chaahe sambhog kara rahi hai, yaha meri pet faimtasi thi.

ab hausala karake maimne usake amtarwastra churaane shuru kar diye the. usaki bra aur paimti mai chupachaap utha laata aur akele me ghar me uname lund lapet kar muththa maarata. mom ke paas bad.a achcha kalekshan tha. uname se ek les waali safed bra aur ek naayalaan ki kaali bra meri khaas pasamd ki thim. unhe sumghate hue mujhe aisa lagata jaise mai mom ke aagosh me usaki chaati me sir chupaaye pad.a hua hum. lund par unaka mulaayama sparsh mujhe diwaana kar deta.

ek do baar mai pakad.a jaata par bach gaya. aksar muththa maarane se mera wirya uname lag jaata. tab mai dho kar din me unhe sukha kar waapas rakh deta. ek din subaha mom pareshaan lagi. maimne pucha to boli ki usaki kaali bra nahi mil rahi hai. wah kaali saadi pahan kar aafis jaana chaahati thi. aakhir jhalla kar dusari saad.i pahan kar chali gayi. bra milati kaise, raat ko muththa maar kar maimne us bresiyar ko apane kamare me chupa diya tha. mujhe kya maaluma ki aaj wah use hi pahanegi! mom ke jaane ke baad use dhokar sukhaakar maimne mom ki almaari me saad.iyom ke bich chupa diya. baal baal bacha kyomki raat ko waapas aakar mom ne saari almaari dhumdhana shuru kar di. jab bra mili to wah nishchimt hui. boli

"anil, maimne bhi dekho kahaam rakh di thi, isiliye nahi mil rahi thi, mujhe laga tha ki gum to nahi gayi ya baahar gailari se sukhate samay gir to nahi gayi."

usake baad maimne usaki almaari se bra churaana bamd kar diya. mom ke jaane ke baad dhone ko daali usaki bra aur paimti se kaama chalaane laga. yaha aur bhi matawaala kaama tha. uname mom ke sharir ki aur usake pasine ki bhini khushabu chupi hoti. usaki paimti ke kraach me se mom ki chut ki matawaali mahak aati. ab to mai mast hokar unhe mumha me bhar leta aur kas kar muththa maarata. fir kaamawaali baai aane ke pahale unhe dhone ko rakh deta. meri dopahar to ramgin ho gayi par raat ko pareshaani honi lagi.

raat ki pareshaani dur karane ke liye maimne mom ki chappalom ka sahaara lena shuru kar diya. jaisa maimne bataayaa, mom ke pair bad.e khubasurat haim. usake paas saat aath jod.i chappale aur saimdal bhi haim, adhikatar haai hil ki. raat ko mai mom ke so jaane ke baad baahar ke shoo-raik se chupachaap ek jodi utha laata. fir unhe lund se sahalaataa, chumataa, chaatata aur muththa maarata. agar wirya saimdal par chalak jaata to thik se pomch kar waapas rakh deta. waise sabase achchi mujhe mom ki rabar ki baatharuma slipar lagati thi. naajuk si gulaabi wah chappal jab mom ke pairom me dekhata aur chalate samaya hone waali sapaak sapaak ki aawaaj sunata jo mom ke talawom se chappal ke takaraane se hoti thi to mai apana samyama khone lagata tha. dopahar ko wah chappal mai le aata tha par raat ko mom use pahane hoti aur sone ke baad usake bedaruma se unhe uthaane ka mera saahas nahi tha.

isi chakkar me ek din akhir mai pakad.a gaya. ek hisaab se achcha hi hua kyomki us ghatana ne aakhir mom aur mere bich ki saari diwaare hata di

rajaarkey
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Re: Maa ka dulara -माँ का दुलारा

Unread post by rajaarkey » 13 Dec 2014 01:48

माँ का दुलारा पार्ट--2


गतान्क से आगे...............

उस शनिवार रात को मोम देरी से आई. थॅकी हुई थी इसलिए खाना खाकर तुरंत सो गयी. गर्मी के कारण उसके कपड़े गीले हो गये थे इसलिए उसने सारे कपड़े बदलकर बाथरुम मे डाल दिए. मेरी चाँदी हो गयी. मोम के सोने के बाद मैं उसका ब्लओज़, ब्रा और पैंटी उठा लाया. सारे पसीने से तर थे. साथ ही उसने उस दिन पहने हुए हाई हिल के सैंडल भी ले लिए. मोम गहरी नींद मे सोई थी इसलिए चुपचाप उसके बेडरूम से उसके स्लीपर भी उठा लाया. आज तो मानों मुझे खजाना मिल गया था.

उस रात मैंने इतनी मूठ मारी जितनी कभी नही मारी होगी. मोम के कपड़े सूँघे, उन्हे मुँह मे लेकर चूसा कि मोम के शरीर का कुछ तो रस मिल जाए. सैंडल छाती से पकड़े, उन्हे मुँह से लगाया और चूमा, लंड को स्लीपरों के मुलायम स्ट्राइप्स मे फंसाया, चप्पालों के नरम नरम तलवे पर रगड़ा और शुरू हो गया. तीन चार बार झाड़. कर मुझे शांति मिली.

पहले मेरा यहा प्लान था कि तुरंत मैं उठाकर सब चीज़े चुपचाप जगहा पर रख दूँगा. पर दो तीन घंटे के घमासान हस्तमैथुन के बाद उस तृप्ति की भावना के जादू ने मेरी आँखे लगा दीं. ऐसा गहरा सोया कि सुबहा देर से आँख खुली. हड़बड़ा कर उठा तो देखा पास के टेबल पर चाय रखी है. ये कहानी कामुक-कहानियाँडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम की है याने मोम मेरे कमरे मे आई थी! मैं मूरख जैसा रात को दरवाजा भी ठीक से लगा कर नही सोया था. और मेरे बिस्तर पर मोम के कपड़े और सैंडल पड़े थे. स्लीपर गायब थी. पाजामे मे से लंड भी निकल कर खड़ा था, जैसा सुबहा को होता है. मोम ने ज़रूर देख लिया होगा! अपनी स्लीपर भी उसने पहन ली होगी पर उसे कितना अटपटा लगा होगा कि उसका बेटा उसके कपड़ो और चप्पालों के साथ क्या कर रहा था!

मुझे समझ मे नही आ रहा था कि कैसे मोम को मुँह दिखाउ. आख़िर किसी तरह कमरे के बाहर आया. मोम किचन मे थी. बिना कुछ कहे उसने मुझे फिर चाय बना दी. उसका चेहरा गंभीर था.

मैं किसी तरह चाय पीकर भागा. नहाया और फिर कमरे मे एक किताब पढ़ने बैठ गया. मोम दिन भर कुछ नही बोली, दोपहर को बाहर निकल गयी. उसे ज़रूर बुरा लगा होगा. आख़िर मैं भी क्या कहता!

रात को खाने के बाद मोम ने आख़िर मुझे पूछा "ये क्या कर रहा था तू मेरे कपड़ो और चप्पालों के साथ?"

मैं चुप रहा, सिर्फ़ सिर झुका कर सॉरी बोला. मोम ने और कठोर स्वर मे पूछा. "ये तूहमेशा करता है लगता है! और उस दिन मेरी काली ब्रा नही मिल रही थी. तूने ही ली थी ना? और चंदा बाई भी कपड़े ठीक से नही धोती, मुझे अपनी ब्रा और पैंटी मे एक दो बार कुछ दाग से मिले थे. तूने लगाए क्या ये गंदी हरकते करते हुए?"

मैं चुप रहा. मोम अब मुझे डाँटने लगी. काफ़ी गुस्से मे थी. बोली कि उसे उम्मीद नही थी कि मैं ऐसा करूँगा. ऐसी गंदी आदते मुझे कहाँ से लगीं? और वह भी अपनी मोम के कपड़ो और चप्पालों के साथ? अंत मे गुस्से मे आकर उसने मुझे एक तमाचा भी रसीद कर दिया और फिर मुझे झिंझोड़. कर बोली

"बोल, ऐसा क्यों किया?" मोम ने अब तक कभी मुझे पीटा नही था. मैं रुआंसा होकर आख़िर बोला

"सॉरी मॉम, अब नही करूँगा, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो इसलिए ऐसा किया" वह एक क्षण स्तब्ध रहा गयी. कुछ बोलना चाहती थी पर फिर चुप ही रही और अपने कमरे मे चली गयी.

उसके बाद के तीन चार दिन बड़े बुरे गुज़रे. मोम ने मुझसे बात करना ही छोड़. दिया था. ऑफीस से और देर से आती थी और जल्दी सुबह घर से निकल जाती थी. बेडरूम और अलमारी मे ताला लगा देती थी. कपड़े भी धोने को नही डालती थी बल्कि आकर खुद धोती. मेरा भी लंड खड़ा होना बंद हो गया, सारा हस्तमैथुन बंद हो गया. मैने एक दो बार और मोम को सॉरी कहा पर उसने जवाब नही दिया. हाँ उसका कड़ा रूख़ फिर थोड़ा नरम हो गया.

अगले शनिवार को मोम की छुट्टी थी. शुक्रवार को वह जल्दी घर आ गयी. मेरी पसंद का खाना बनाया. मुझसे ठीक से कुछ बाते भी कीं. मैंने चैन की साँस की ली और कान को हाथ लगाया कि अब ऐसा कुछ नही करूँगा. असल मे मैं मोम को बहुत प्यार करता था, एक नारी की तरह ही नही, एक बेटे के तरह भी और उसे खोना नही चाहता था.

रात को मैं अपने कमरे मे पढ़. रहा था तब मोम अंदर आई. उसने गाउन पहन रखा था. सारा मेकअप वग़ैरहा धो डाला था. चेहरा गंभीर था, एक टेंशन सा था उसके चेहरे पर जैसे कुछ फ़ैसला करना चाहती हो. आकर मेरे पास पलंग पर बैठ गयी. मैं थोड़ा घबरा गया, ना जाने क्या बाते करे, फिर डाँटने लगे.

"अनिल, तू बड़ा हो गया है, तेरी कोई गर्ल फ़्रेंड नही है?" उसने मेरे बालों मे हाथ चलाकर पूछा.

"नही माम, मुझे कोई लड़की अच्छी नही लगती आज कल" मैंने कहा.

"तो फिर क्या अच्छा लगता है?" उसने पूछा. ना जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया.

"तुम बहुत अच्छी लगती हो ममी, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हू" कहने के बाद फिर मैंने अपने आप को कोस डाला कि ऐसा क्यों कहा. मोम फिर नाराज़ हो गयी तो सब गड़बड़. हो जाएगा.

"अरे पर मैं तेरी मॉं हू. तू भी मुझे अच्छा लगता है पर एक बेटे की तरह. मोम के बारे मे ऐसा नही सोचते बेटे जैसा तू सोचता है" मोम ने मेरे चेहरे पर नज़र गढ़ाकर कहा. आज बात कुछ और थी. मोम शायद मुझसे सब कुछ डिस्कस करना चाहती थी. मैंने साहस करके कहा डाला.

"मैं क्या करूँ माँ, तुम बहुत सुंदर हो, मुझसे रहा नही जाता"

"अरे तूने ही कहा तेरी गर्ल फ़्रेंड नही हैं, तूने और किसी को देखा ही नही है. और मान भी ले कि मैं तुझे अच्छी लगती हू तो यहा तेरा वहम है. आख़िर मेरी उमर हो चली है, मोटी भी हो गयी हम. तेरे जैसे जवान लड़के को तो कमसिन युवतियाँ भानी चाहिए, मुझा जैसी अधेड़ औरते नहीं" मोम ने गंभीर स्वर मे कहा.

"नही माँ, मुझे उनमे कोई दिलचस्पी नही है. तुम नही जानती तुम कितनी खूबसूरत हो. पर मैं तेरा दिल नही दुखाना चाहता ममी, अब मैं कोई गंदी बात नही करूँगा, ठीक से रहूँगा." मैं अपनी बात पर अड़ा रहा. मोम झल्ला कर उठ कर खड़ी हो गयी. उसने एक निश्चय कर लिया था शायद.

"कैसा मूर्ख लड़का है, समझता ही नही मैं क्या कहा रही हू. तू नादान है, आज तुझे समझाना ही पड़ेगा. इस बात का निपटारा मैं आज ही करना चाहती हू कि तू कम से कम अपना यहा पागलपन तो बंद करे. तू फिर शुरू हो जाएगा मैं जानती हू, ऐसी चीज़ों की आदत जल्दी नही जाती. तू बस मेरा चेहरा देखता है और वो तुझे अच्छा लगता है. माना की मेरी सूरत अच्छी है पर शरीर तो बेडौल हो गया है. चल आज तुझे दिखाती हू, फिर शायद तेरा यहा वहम दूर हो जाए." उसने दरवाजा बंद किया और अपना गाउन उतारने लगी. मैं हक्का बक्का देखता ही रहा गया. मोम ने मेरे चेहरे से नज़र हटाकर दूसरी ओर देखते हुए गाउन उतार दिया और बोली

"देख, कैसी मोटी और बेढब हू. अब बोल कि तुझे अच्छी लगती हू" उसके चेहरे पर एक कठोरता सी आ गयी थी. मोम अब सिर्फ़ ब्रा और पैंटी मे मेरे सामने थी. आज उसने अपने अच्छे मादक अंतर्वस्त्रा नहीं, एक पुरानी काटन की ब्रा और बड़ी सी पुरानी सफेद पैंटी पहन रखी थी. शायद यहा सोच रही थी कि अगर मैं सादे पुराने अंतर्वस्त्रों मे लिपटे उसके मध्यमवाइन शरीर को देखूँगा तो मेरी चाहत अपने आप ठंडी हो जाएगी. ऐसा करने मे उसे कितनी मनोवयता हुई होगी, मैं कल्पना कर सकता था. आख़िर कौन औरत खुद ही किसी से अपने आप को बेढब कहलवाने की ज़िद करेगी.

पर हुआ उल्टा ही. मोम का अर्धनगञा शरीर मेरे मन मे ऐसी मतवाली हलचल पैदा कर गया कि इतने दिनों बाद मेरा लंड फिर सिर उठाने लगा. मोम नही जानती थी कि मैं अच्छी तरह से इस बात से वाकिफ़ था कि मोम का शरीर मांसल और भरा हुआ है. वह यह भी नही जानती थी कि उसका भरा पूरा मोटा सा शरीर उसका आकर्षण मेरे लिए और बढ़ा देता था.

मैं मन भर कर मोम के अर्धनगञा रुप को देखने लगा. उसकी जांघे अच्छी मोटी थी पर एकदमा चिकनी और गोरी. पैंटी बड़ी होने से और कुछ नही दिख रहा था पर चौड़े कूल्हे और भारी भरकम नितंबों का आकार उसमे से दिख रहा था. पेट भी थोड़ा थुलथुल था पर उस गोरी चिकनी त्वचा और कमर मे पड़ते मासल बलों से वह बाला की मादक लग रही थी. गोरे गोरे फूले हुए पेट मे गहरी नाभि उसके इस रूप को और मतवाला कर रही थी. पुरानी ढीली ढाली ब्रा मे उसके स्तन थोडे लटक आए थे पर उन माँस के मुलायामा गोलों को देखकर ऐसा लगता था कि अभी इन्हे चबा कर खा जाउ. लंबी गोरी बाँहे तो मैं कई बार देख चुका था पर इस अर्धनगञा अवस्था मे भी और सुंदर लग रही थीं. चिकने भरे हुए कंधे जिनपर ब्रा के स्ट्रैप लगे हुए थे! क्या नज़ारा था. मोम मूडी तो सिर्फ़ ब्रा के स्ट्रैप से धकि उसकी गोरी चिकनी पीठ भी मुझे दिखी. मोम बाजू मे नज़र करके एक बार पूरी घुमा कर मुझसे बोली.

"देख लिया अपनी अधेड़. मोम को? अब तो तसल्ली हुई कि मुझमे ऐसा कुछ नही है जो तुझे भाए. देख मैं कितनी मोटी हो गयी हू, नीचे का भाग देख, बिलकुल कितना चौड़ा और मोटा हो गया है" मैं कुछ ना बोला, बस उसे देखता रहा. मेरी चुप्पी पर झल्ला कर वह बोली

"अरे चुप क्यों है, कुछ बोल ना? वैसे इतना पटारे पाटर बोल रहा था, अब साँप सूंघ गया क्या"" कहकर उसने मेरी ओर देखा तो देखती रह गयी. मेरा लंड अब तन कर खड़ा था और इतना तना था कि पाजामे के ढीले बटन खोल कर बाहर आ गया था. उसकी नज़र लंड पर पड़ी और वह आश्चर्या से उसकी ओर देखने लगी. धीरे धीरे उसके चेहरे की कठोरता कम हुई और एक अजीब ममता और चाहत उसकी आँखों मे झलकने लगी. उसने मेरे चेहरे की ओर देखा. उसमे उसे ज़रूर तीव्र चाहत और प्यार दिखा होगा.

"लगता है कि सच मे मैं तुझे अच्छी लगती हू! मुझे लगा था कि ..." अपनी बात पूरी ना कर के मोम आकर मेरे पास बैठ गयी. उसकी आँखे मेरे लंड पर से हट ही नही रही थी. मैं भले ही यहा खुद कह रहा हू पर मेरा लंड काफ़ी सुंदर है, गोरा और कसा हुआ, भले ही बहुत बड़ा ना हो, फिर भी करीब करीब साढ़े पाँच- छः इंच का तो है ही.

मोम ने अचानक झुक कर मेरा गाल चूमा लिया. उसका चेहरा अब गुलाबी हो गया था, खिल कर उसकी सुंदरता मे और चार चाँद लगा रहा था. मेरे कुछ ना कहने पर भी उसने भाँप लिया था कि वह मुझे कितनी अच्छा लगती थी. और एक औरत के लिए इससे बड़े कामपलिमेंट और क्या हो सकता है, ख़ास कर जब वह खुद अपनी सुंदरता के प्रति आश्वस्त ना हो. मेरा लंड अब ऐसा थारतरा रहा था जैसे फट जाएगा. इतनी खुमारी मैंने जिंदगी मे कभी महसूस नही की थी.

"कितना प्यारा है! तू सच मे बड़ा हो गया है बेटे" मोम मेरे पास सरककर बोली. फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और हिचकते हुए मेरा लंड मुठ्ठी मे पकड़. लिया. वह ऐसे डर रही थी जैसे काट खाएगा.

"कितना सूज गया है! तुझे तकलीफ़ होती है क्या?" उसकी हथेली के मुलायम स्पर्श से मैं ऐसा बहका कि अचानक एक सिसकी के साथ मैं स्खलित हो गया. वीर्य की फुहारे लंड मे से निकलने लगीं. मोम पहले चौंक गयी और अपना हाथ हटा लिया पर मैंने तड़प कर उससे लिपटाते हुए कहा.

क्रमशः..............................


gataank se aage...............

us shaniwaar raat ko mom deri se aai. thaki hui thi isaliye khaana khaakar turamt so gayi. garmi ke kaaran usake kapad.e gile ho gaye the isaliye usane saare kapade badalakar baatharuma me daal diye. meri chaamdi ho gayi. mom ke sone ke baad mai usaka blaauz, bra aur paimti utha laaya. saare pasine se tar the. saath hi usane us din pahane hue haai hil ke saimdal bhi le liye. mom gahari nimd me soi thi isaliye chupachaap usake bedarum se usake slipar bhi utha laaya. aaj to maanom mujhe khajaana mil gaya tha.

us raat maimne itani muththa maari jitani kabhi nahi maari hogi. mom ke kapad.e sumghe, unhe mumha me lekar chusa ki mom ke sharir ka kuch to ras mil jaaye. saimdal chaati se pakad.e, unhe mumha se lagaaya aur chumaa, lund ko sliparom ke mulaayama straips me famsaayaa, chappalom ke narama narama talawe par ragad.a aur shuru ho gaya. tin chaar baar jhad. kar mujhe shaamti mili.

pahale mera yaha plaan tha ki turamt mai uthakar sab chije chupachaap jagaha par rakh dumga. par do tin ghamte ke ghamaasaan hastamaithun ke baad us trupti ki bhaavana ke jaadu ne meri aamkhe laga dim. aisa gahara soya ki subaha der se aamkh khuli. hadbada kar utha to dekha paas ke tebal par chaay rakhi hai. yaane mom mere kamare me aayi thi! mai murakh jaisa raat ko darawaaja bhi thik se laga kar nahi soya tha. aur mere bistar par mom ke kapade aur saimdal pade the. slipar gaayab thi. paajaame me se lund bhi nikal kar khad.a thaa, jaisa subaha ko hota hai. mom ne jarur dekh liya hogaa! apani slipar bhi usane pahan li hogi par use kitana atapata laga hoga ki usaka beta usake kapado aur chappalom ke saath kya kar raha thaa!

mujhe samajh me nahi a raha tha ki kaise mom ko mumha dikhaaum. aakhir kisi taraha kamare ke baahar aaya. mom kichan me thi. bina kuch kahe usane mujhe fir chaay bana di. usaka chehara gambhir tha.

mai kisi taraha chaay pikar bhaaga. nahaaya aur fir kamare me ek kitaab padh.ane baith gaya. mom din bhar kuch nahi boli, dopahar ko baahar nikal gayi. use jarur bura laga hoga. aakhir mai bhi kya kahataa!

raat ko khaane ke baad mom ne aakhir mujhe pucha "ye kya kar raha tha tu mere kapad.om aur chappalom ke saath?"

mai chup rahaa, sirf sir jhuka kar sorry bola. mom ne aur kathor swar me pucha. "ye hamesha karata hai lagata hai! aur use din meri kaali bra nahi mil rahi thi. tune hi li thi naa? aur chamda baai bhi kapade thik se nahi dhoti, mujhe apani bra aur paimti me ek do baar kuch daag se mile the. tune lagaaye kya ye gamdi harakate karate hue?"

mai chup raha. mom ab mujhe daamtane lagi. kaafi gusse me thi. boli ki use ummid nahi thi ki mai aisa karumga. aisi gamdi aadate mujhe kahaam se lagim? aur wah bhi apani mom ke kapad.om aur chappalom ke saath? amt me gusse me aakar usane mujhe ek tamaacha bhi rasid kar diya aur fir mujhe jhimjhod. kar boli

"bol, aisa kyom kiyaa?" mom ne ab tak kabhi mujhe pita nahi tha. mai ruaamsa hokar aakhir bola

"sorry mommy, ab nahi karungaa, tum mujhe bahut achchi lagati ho isaliye aisa kiyaa" wah ek kshan stabdh raha gayi. kuch bolana chaahati thi par fir chup hi rahi aur apane kamare me chali gayi.

usake baad ke tin chaar din bad.e bure gujare. mom ne mujhase baat karana hi chod. diya tha. office se aur der se aati thi aur jaldi subaha ghar se nikal jaati thi. bedarum aur almaari me taala laga deti thi. kapade bhi dhone ko nahi daalati thi balki aakar khud dhoti. mera bhi lund khada hona band ho gayaa, saara hastamaithun band ho gaya. maine ek do baar aur mom ko sorry kaha par usane jawaab nahi diya. haam usaka kada rookh fir thoda narama ho gaya.

agale shaniwaar ko mom ki chutti thi. shukrawaar ko wah jaldi ghar a gayi. meri pasamd ka khaana banaaya. mujhase thik se kuch baate bhi kim. maimne chain ki saams ki li aur kaan ko haath lagaaya ki ab aisa kuch nahi karumga. asal me mai mom ko bahut pyaar karata thaa, ek naari ki taraha hi nahi, ek bete ke taraha bhi aur use khona nahi chaahata tha.

raat ko mai apane kamare me padh. raha tha tab mom amdar aai. usane gaaun pahan rakha tha. saara mekap wagairaha dho dhaala tha. chehara gambhir thaa, ek temshan sa tha usake chehare par jaise kuch faisala karana chaahati ho. aakar mere paas palamg par baith gayi. mai thod.a ghabara gayaa, na jaane kya baate kare, fir daamtane lage.

"anil, tu bada ho gaya hai, teri koi girl frend nahi hai?" usane mere baalom me haath chalaakar pucha.

"nahi maam, mujhe koi ladaki achchi nahi lagati aaj kal" maimne kaha.

"to fir kya achcha lagata hai?" usane pucha. na jaane kaise mere mumha se nikal gaya.

"tuma bahut achchi lagati ho mami, mai tumase bahut pyaar karata hum" kahane ke baad fir maimne apane aap ko kos daala ki aisa kyom kaha. mom fir naaraaj ho gayi to sab gadabad. ho jaayega.

"are par mai teri mom hum. tu bhi mujhe achcha lagata hai par ek bete ki taraha. mom ke baare me aisa nahi sochate bete jaisa tu sochata hai" mom ne mere chehare par najar gad.aakar kaha. aaj baat kuch aur thi. mom shaayad mujhase sab kuch diskas karana chaahati thi. maimne saahas karake kaha daala.

"mai kya karum maam, tuma bahut sumdar ho, mujhase raha nahi jaataa"

"are tune hi kaha teri garl frend nahi haim, tune aur kisi ko dekha hi nahi hai. aur maan bhi le ki mai tujhe achchi lagati hum to yaha tera wahama hai. aakhir meri umara ho chali hai, moti bhi ho gayi hum. tere jaise jawaan ladake ko to kamasin yuwatiyaam bhaani chaahiye, mujha jaisi adheda aurate nahim" mom ne gambhir swar me kaha.

"nahi maam, mujhe uname koi dilachaspi nahi hai. tuma nahi jaanati tuma kitani khubasurat ho. par mai tera dil nahi dukhaana chaahata mami, ab mai koi gamdi baat nahi karumgaa, thik se rahumga." mai apani baat par ada raha. mom jhalla kar uth kar khada ho gayi. usane ek nishchaya kar liya tha shaayad.

"kaisa murkh lad.aka hai, samajhata hi nahi mai kya kaha rahi hum. tu naadaan hai, aaj tujhe samajhaana hi pad.ega. is baat ka nipataata mai aaj hi karana chaahati hum ki tu kama se kama apana yaha paagalapan to bamd kare. tu fir shuru ho jaayega mai jaanati hum, aisi chijom ki aadat jaldi nahi jaati. tu bas mera chehara dekhata hai aur wo tujhe achcha lagata hai. maana ki meri surat achchi hai par sharir to bedaul ho gaya hai. chal aaj tujhe dikhaati hum, fir shaayad tera yaha wahama dur ho jaaye." usane darawaaja bamd kiya aur apana gaaun utaarane lagi. mai hakka bakka dekhata hi raha gaya. mom ne mere chehare se najar hataakar dusari or dekhate hue gaaun utaar diya aur boli

"dekh, kaisi moti aur bedhab hum. ab bol ki tujhe achchi lagati hum" usake chehare par ek kathorata si a gayi thi. mom ab sirf bra aur paimti me mere saamane thi. aaj usane apane achche maadak amtarwastra nahim, ek puraani kaatan ki bra aur bad.i se puraani safed paimti pahan rakhi thi. shaayad yaha soch rahi thi ki agar mai saade puraane amtarwastrom me lipate usake madhyamawayin sharir ko dekhumga to meri chaahat apane aap thamdi ho jaayegi. aisa karane me use kitani manowyatha hui hogi, mai kalpana kar sakata tha. akhir kaun aurat khud hi kisi se apane aap ko bedhab kahalawaane ki jid karegi.

par hua ulta hi. mom ka ardhanagna sharir mere man me aisi matawaali halachal paida kar gaya ki itane dinom baad mera lund fir sir uthaane laga. mom nahi jaanati thi ki mai achchi taraha se is baat se waakif tha ki mom ka sharir maamsal aur bhara hua hai. wah yaha bhi nahi jaanati thi ki usaka bhara pura mota sa sharir usaka aakarshan mere liye aur badh.a deta tha.

mai man bhar kar mom ke ardhanagna rupa ko dekhane laga. usaki jaamghe achchi moti thi par ekadama chikani aur gori. paimti bad.i hone se aur kuch nahi dikh raha tha par chaud.e kulhe aur bhaari bharakama nitambom ka aakaar usame se dikh raha tha. pet bhi thod.a thulathula tha par us gori chikani twacha aur kamar me pad.ate maasal balom se wah bala ki maadak lag rahi thi. gore gore fule hue pet me gahari naabhi usake is rup ko aur matawaala kar rahi thi. puraani dhili dhaali bra me usake stan thod.e latak aaye the par un maams ke mulaayama golom ko dekhakar aisa lagata tha ki abhi inhe chaba kar kha jaaum. lambi gori baamhe to mai kai baar dekh chuka tha par is ardhanagna awastha me we aur sumdar lag rahi thim. chikane bhare hue kamdhe jinapar bra ke straip lage hue the! kya najaara tha. mom mud.i to sirf bra ke straip se dhaki usaki gori chikani pith bhi mujhe dikhi. mom baaju me najar karake ek baar puri ghuma kar mujhase boli.

"dekh liya apani adhed.a mom ko? ab to tasalli hui ki mujhame aisa kuch nahi hai jo tujhe bhaaye. dekh mai kitani moti ho gayi hum, niche ka bhaag dekh, bilakul kitana chaud.a aur mota ho gaya hai" mai kuch na bolaa, bas use dekhata raha. meri chuppi par jhalla kar wah boli

"are chup kyom hai, kuch bol naa? waise itana patare patar bol raha thaa, ab saamp sumgh gaya kyaa"" kahakar usane meri or dekha to dekhati raha gayi. mera lund ab tan kar khada tha aur itana tana tha ki paajaame ke dhile batan khol kar baahar a gaya tha. usaki najar lund par padi aur wah aashcharya se usaki or dekhane lagi. dhire dhire usake chehare ki kathorata kama hui aur ek ajib mamata aur chaahat usaki aamkhom me jhalakane lagi. usane mere chehare ki or dekha. usame use jarur tivra chaahat aur pyaar dikha hoga.

"lagata hai ki sach me mai tujhe achchi lagati hum! mujhe laga tha ki ..." apani baat puri na kar ke mom aakar mere paas baith gayi. usaki aamkhe mere lund par se hat hi nahi rahi thi. mai bhale hi yaha khud kaha raha hum par mera lund kaafi sumdar hai, gora aur kasa huaa, bhale hi bahut bada na ho, fir bhi karib karib saadh.e paamch- chaha imch ka to hai hi.

mom ne achaanak jhuk kar mera gaal chuma liya. usaka chehara ab gulaabi ho gaya thaa, khila kar usaki sumdarata me aur chaar chaamd laga raha tha. mere kuch na kahane par bhi usane bhaamp liya tha ki wah mujhe kitani achcha lagati thi. aur ek aurat ke liye isase bad.a kaamplimemt aur kya ho sakata hai, khaas kar jab wah khud apani sumdarata ke prati aashwast na ho. mera lund ab aisa tharathara raha tha jaise fat jaayega. itani khumaari maimne jimdagi me kabhi mahasus nahi ki thi.

"kitana pyaara hai! tu sach me bad.a ho gaya hai bete" mom mere paas sarakakar boli. fir usane apana haath badh.aaya aur hichakate hue mera lund muththi me pakad. liya. wah aise dar rahi thi jaise kaat khaayega.

"kitana suj gaya hai! tujhe takalif hoti hai kyaa?" usaki hatheli ke mulaayama sparsh se mai aisa bahaka ki achaanak ek sisaki ke saath mai skhalit ho gaya. wirya ki fuhaare lund me se nikalane lagim. mom pahale chaumk gayi aur apana haath hata liya par maimne tad.ap kar usase lipatate hue kaha.


rajaarkey
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Re: Maa ka dulara -माँ का दुलारा

Unread post by rajaarkey » 13 Dec 2014 01:49

माँ का दुलारा पार्ट--3

गतान्क से आगे...............

"पकडो ना मम्मी, मत छोड़ो" उसने फिर मेरे लंड को पकड़. लिया और तब तक पकड़े रही जब तक पूरा झाड़. कर वह मुरझा नही गया. मोम ने फिर मुझे गाल पर चूमा

"बिलकुल पागला है तू अनिल, मुझे क्या मालूमा था कि मैं तुझे इस कदर अच्छी लगती हू. देख सब पाजामा गीला हो गया है, चादर भी खराब हो गयी है. चल उठ और निकाल दे. चादर भी डाल दे धोने को. मैं अभी आई. तेरी इस हालत का कोई इलाज करना पड़ेगा मुझे ही"

मुझे एक बार और चूमा कर वह वैसे ही गाउन लेकर कमरे से बाहर चली गयी. मैंने पाजामा निकाला और तावेल बाँध कर चादर बदल दी. मेरा दिल खुशी से धड़क रहा था कि कम से कम अब वह मुझसे नाराज़ तो नही थी, यह मेरे लिए बहुत था. पर मैं सोच रहा था कि आगे क्या होगा, मोम अब क्या करेगी.

इसका जवाब दस मिनिट बाद मिला जब मोम फिर मेरे कमरे मे आई. उसकी काया पलट गयी थी. वह काला स्लीवलेस ब्लाउz और काली शिफान की साड़ी पहने हुए थी. मेकअप भी कर लिया था. बालों का जुड़ा बाँध लिया था जैसे वह बाहर जाते समय करती थी. अंदर की ब्रा बदल ली थी क्योंकि पतले ब्लाउz मे से उसकी वही काली मेरी मनपसंद ब्रा अंदर दिख रही थी. मोम इतनी सुंदर दिख रही थी जैसे औरत नही साक्षात अप्सरा हो. मैंने चकराकर पूछा.

"ये क्या मोम, कही जाना है" मों मुझे बाहों मे लेते हुए बोली

"हाँ बेटे, मेरे कमरे मे जाना है, चल आज से तू वही सोएगा." मैंने मोम की आँखों मे देखा, उसमे अब प्यार, दुलार और एक चाहत की मिली जुली असिम भावना थी. इतने पास से मोम के रसीले लिपस्टिक से रंगे होंठ देखकर अब मुझसे नही रहा गया. धीरे से मैंने उसके होंठ चुम लिए. मोम ने मुझे आलिंगन मे लेकर मेरा गहरा चुंबन लिया. उनके फूल जैसे कोमल स्पर्श से और उसके मुँह की मिठास से मैं सिहर उठा.

अपना चुंबन तोड़. कर मोम ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने कमरे मे ले गयी. उसने टेबल लैंप जलाया और उपर की बत्ती बुझा दी. वापस आकर दरवाजा बंद किया और फिर चुपचाप मेरे कपड़े उतारने लगी. मेरा कुरता और बनियान उतारकर उसने मेरा तावेल भी निकाल दिया. नीचे मैंने कुछ नही पहना था इसलिए मैं थोड़ा शरमा रहा था.

"अब क्यों शरमाता है? नादान कही का. बचपन मे जैसे मों के सामने कभी नंगा हुआ ही नही था तू" मुझे नग्न करके वह दूर होकर मुझे निहारने लगी. अब तक मेरा लंड फिर से सिर उठाने लगा था.

"कितना हेंडसम और जवान हो गया है रे तू!" मों ने लाड़. से कहा.

"पर माँ, तुझसा नहीं, तुम तो रूप की परी हो" मैंने मोम से कहा.

"हाँ जानती हू की तुझे मैं कितनी अच्छी लगती हू. और तू भी मुझे बहुत अच्छा लगता है बेटे, तू नही जानता इस हफ्ते भर मेरी क्या हालत रही है" मोम ने कहा और और मुझे पलंग पर लिटा दिया. फिर वह मेरे उपर लेट गयी और मुझपर चुम्बनो की वर्षा करने लगी. उसकी साँसे तेज चल रही थी और अपने हाथों से वह मेरा पूरा शरीर सहला रही थी. मुझे बचपन की याद आ गयी. बहुत बार मुझे मोम गोद मे लेकर चूमती थी. पर तब उसमे सिर्फ़ वात्सल्या होता था, आज उसके साथ एक नारी की प्रखर कामना भी उसके स्पर्श और चुंबानों मे थी.

मैं पड़ा पड़ा मोम के प्यार का आनंद ले रहा था. लगता था कि स्वर्ग मे पहुँच गया हू. मोम ने फिर मेरे होंठों का गहरा चुंबन लिया, मैं भी उसके होंठ चूसने लगा. मोम के मधुर मुखरस का पान करके ऐसा लग रहा था जैसे मैं शहद चख रहा हम. मोम चुंबन तोड़कर अचानक उठा बैठी और नीचे खिसककर मेरा लंड हाथ मे लेकर उसे चूमने लगी.

"हाय, कितना प्यारा है! लगता है खा जाउ!" कहकर मोम उसे अपने गालों और होंठों पर रगाडकर फिर मेरे सुपाड़ा मुँह मे लेकर चूसने लगी. मैं स्तब्ध रहा गया. मोम की वासना इतनी प्रखर हो जाएगी यहा मैंने कभी सोचा नही था. मोम के मुँह का गीला तपता मुलायम स्पर्श इतना जानलेवा था कि मुझे लगा कि मैं फिर झाड़. जाउन्गा. लंड एक मिनिट मे फिर कस के खड़ा हो गया. पर मैं अभी झड़ना नही चाहता था. मोम के दमकते रूप को अब मैं ठीक से देखना चाहता था इसलिए मैंने मोम की साड़ी निकालना शुरू की.

"मम्मी, अब तुम भी कपड़े निकाल दो ना, प्लीज़!" मोम उठ बैठी. कामना और थोड़ी लजजासे उसका चेहरा लाल हो गया था.

"निकालती हू बेटे, तू लेटा रहा. मैंने गाउन निकालकर अपना मोटापा तुझे दिखाया था. अब ये कपड़े निकालकर मेरा कंचन सा बदन तुझे दिखाती हू, यह तेरे ही लिए है मेरे लाल" मोम ने उठकर साड़ी निकाली और फिर पेटीकोत खोल दिया. उसकी मदमस्त जांघे फिर से नग्न हो गयीं. पर अब फरक था. उस पुरानी पैंटी के बजाय एक सुंदर लेस वाली काली तंग पैंटी उसने पहनी थी. उसमे से उसके पेट के नीचे का मांसल उभार निखर कर दिख रहा था. पैंटी की पट्टी के सकरे होने के बावजूद आस पास बस मोम की गोरी त्वचा ही दिख रही थी.

"मोम क्या नीचे भी शेव करती है!" मेरे मन मे आया. तंग पैंटी के तलामा कपड़े मे से मोम की योनि के बीच की गहरी लकीर की भी झलक दिख रही थी.

अब तक मोम ने अपना ब्लओज़ भी निकाल दिया था. मेरी पहचान की उस काली ब्रा मे लिपटे मोम के गोरे बदन को देखकर मुझे रोमांच हो आया. कितनी ही बार मैंने उसमे मूठ मारी थी. मोम के मोटे मोटे स्तनों के उपरी भाग उसके कपड़ो मे से दिख रहे थे. ब्रा शायद पुश अप थी क्योंकि अब वह स्तनों को आधार दे कर उन्हे उठाए हुए थी, इसलिए मोम के स्तन और बड़े और फूले हुए लग रहे थे. बड़े गर्व से वो सीना तान कर खड़े थे मानों कहा रहे हों कि देखो, अपनी मोम की ममता की इस निशानी को देखो, एक बेटे के लिए अपनी मोम के सबसे खूबसूरत अंग को देखो. मुझे घुरता देखकर मोम ने हँस कर कहा.

"अरे कुछ बोल, तब तो खूब चहक रहा था, अब मोम सुंदर लग रही है या नहीं, इन्हे निकाल दूं कि रहने दूं?" मैं कुछ ना बोल पाया. मेरी वह हालत देख कर मोम प्यार से मुसकर्ाई और वैसे ही आकर पलंग पर मेरे पास लेट गयी और मैं उससे लिपट गया.