संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:45

लेकिन धन्नो के इस अस्वासन से काफ़ी राहत मिली की वह किसी से कुच्छ नही कहेगी और वह अपनी जवानी के समय की मुनिया के रस वाली बात खूद ही बता कर यह भी स्पष्ट कर दी थी कि धन्नो का सावित्री के उपर भी बहुत विश्वास है. अब धन्नो ने पूरे हथियार सावित्री के उपर चला दी थी और सावित्री वैसे ही एक मूर्ति की तरह जस की तस बैठी थी. चेहरे पर एक लाज़ डर और पसीने उभर आए थे. साथ साथ उसके बदन मे एक मस्ती की लहर भी तेज हो गयी थी. धन्नो चाची उसे अपना असली रूप दिखा चुकी थी.

धन्नो का काम लगभग पूरा हो चुका था. वह सावित्री के साथ जिस तरह का संबंध बनाना चाह रही थी अब बनती दीख रही थी. सावित्री की चुप्पी इस बात को प्रमाणित कर रहा था की अब धन्नो के किसी बात का विरोध नही करना चाह रही थी. फिर धन्नो ने पीठ पर हाथ रखते धीरे से फुसफुससाई "कल मेरी बेटी को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे हैं ..शगुन चाचा के घर ..और मैं सोचती हूँ की तुम भी दुकान के बहाने मेरे साथ शगुन चाचा के यहाँ चलती तो बहुत अच्च्छा होता..." इतना कह कर धन्नो चाची सावित्री के चहरे पर देखते हुए उसके जबाव का इंतज़ार करने लगी. सावित्री के समझ मे नही आ रहा था की आख़िर कैसे दुकान का काम छोड़ कर अपनी मा को बिना बताए वह ऐसा कर सकती है. इसी लिए चुप रही. फिर धन्नो ने थोड़ा ज़ोर लगा कर सावित्री से कुच्छ अनुरोध के अंदाज मे बोली "तुझे किसी तरह की कोई परेशानी नही होगी..मैं पंडित जी से बात कर लूँगी की कल मेरी बेटी मुसम्मि को देखने आ रहे हैं और इस कारण वह दुकान पर नही आएगी और मेरे साथ शगुन चाचा के घर जाएगी..बोल बेटी..." इतना सुनकर सावित्री की परेशानिया बढ़ गयीं और धीरे से बोली "लेकिन मेरी मा मुझे आपके साथ कहीं नही जाने देगी.." धन्नो तुरंत बोली "जब तुम दुकान के लिए आओगी तब मैं खूद तुम्हे गाओं के बाहर मिल लूँगी और फिर मेरे साथ शगुन चाचा के घर चलना..और शाम को जिस समय दुकान से घर जाती हो ठीक उसी समय मैं तुम्हे गाँव के बाहर तक छ्चोड़ दूँगी...तो मा को कैसे मालूम होगा?..." धन्नो के समझाने से सावित्री चुप रही और फिर कुच्छ नही बोली. अब दुकान के अंदर वाले हिस्से मे चौकी पर सो रहे पंडित जी का नाक का बजना बंद हो गया था. सावित्री और धन्नो दोनो को यह शक हो गया था की पंडित जी अब जाग गये हैं. धन्नो सावित्री से पुछि "पेशाब कहाँ करती हो...चलो पेशाब तो कर लिया जाय नही तो पंडित जी जाग जाएँगे ..." सावित्री ने अंदर एक शौचालय के होने का इशारा किए तो धन्नो ने तपाक से बोली "जल्दी चलो ...मुझे ज़ोर से लगी है और तुम भी कर लो." इतना कहते हुए धन्नो चटाई पर से उठ कर एक शरीफ औरत की तरह अपने सारी का पल्लू अपने सर पर रखी और फिर सावित्री भी उठी और अपने दुपट्टे को ठीक कर ली. धन्नो पर्दे को हटा कर अंदर झाँकी तो पंडित जी चौकी पर सोए हुए थे और उनके पैर के तरफ शौचालय का दरवाज़ा था जो की खुला हुआ था. धन्नो को पर्दे के बगल से केवल पंडित जी का सर ही दिखाई दे रहा था. लेकिन नाक ना बजने के वजह से धन्नो और सावित्री दोनो ही यह सोच रही थी की पंडित जी जागे हो सकते हैं. और ऐसे मे जब दोनो शौचालय के तरफ जाएँगी तब पंडित जी जागे होने की स्थिति मे बिना सर को इधेर उधर किए सोए सोए आराम से देख सकते हैं. सावित्री इस बात को सोच कर डर रही थी. लेकिन तभी धन्नो ने पर्दे को एक तरफ करते हुए अपने कदम अंदर वाले कमरे मे रखते हुए फुसफुसा "अभी पंडित जी नीद मे हैं चल जल्दी पेशाब कर लूँ नही तो जाग जाएँगे तो मुझे बहुत लाज़ लगेगी उनके सामने शौचालय मे जाना...और सुन शौचालय के दरवाज़े को बंद करना ठीक नही होगा नही तो दरवाज़े के पल्ले की चर्चराहट या सिटकिनी के खटकने की आवाज़ से पंडित जी जाग जाएँगे...बस चल धीरे से बैठ कर मूत लिया जाय..." धन्नो के ठीक पीछे खड़ी सावित्री का कलेजा धक धक कर रहा था. वह सोच रही थी की कहीं पंडित जी जागे होंगे तो पेशाब करते हुए दोनो को देख लेंगे. धन्नो क्कुहह दबे कदमो से अंदर वाले कमरे मे चौकी के बगल से शौचालय के दरवाज़े के पास पहुँच गयी. लेकिन जैसे ही पीछे देखी तो सावित्री अभी भी पर्दे के पास खड़ी थी. क्योंकि सावित्री को अंदाज़ा था की पंडित जी का नाक बाज़ना बंद हो गया है और अब वे जागे होंगे ऐसे मे शौचालय का दरवाज़ा बिना बंद किए पेशाब करने का मतलब पंडित जी देख सकते हैं. धन्नो ने पर्दे के पास खड़ी सावित्री को शौचालय के दरवाज़े के पास बुलाने के लिए धीमी आवाज़ मे बोली "अरी जल्दी आ और यही धीरे से पेशाब कर लिया जाय....नही तो पंडित जी कभी भी जाग सकते हैं..जल्दी आ......" धन्नो ने इतना बोलते हुए अपनी तिरछि नज़रों से पंडित जी के आँख के. बंद पलकों को देखते हुए यह भाँप चुकी पंडित जी पूरी तरह से जाग चुके हैं लेकिन पेशाब करने की बात उनके कान मे पड़ गयी है इस वजह से जान बुझ कर अपनी पॅल्को को ऐसे बंद कर लिए हैं की देखने पर मानो सो रहे हों और पलकों को बहुत थोड़ा सा खोल कर दोनो के पेशाब करते हुए देख सकते हैं. पंडित जी के कान मे जब ये बात सुनाई दी की धन्नो शौचालय के दरवाज़े को बंद नही करना चाहती है क्योंकि उसे इस बात का डर है की दरवाज़ा बंद करने पर दरवाज़े के चर्चराहट और सिटकिनी के खटकने के वजह से उनकी नीद खुल सकती है तो पंडित जी अंदर ही अंदर मस्त हो उठे और सोने का नाटक कर अपने आँख के पलकों को इतनी बारीकी से सुई की नोक के बराबर फैला कर देखने लगे. धन्नो के दबाव के चलते सावित्री भी धीरे धीरे दबे पाँव शौचालय के पास खड़ी धन्नो के पास आकर खड़ी हो गयी. उसे यह विश्वास था की पंडित जी जागे होंगे लेकिन उसकी हिम्मत नही थी की वह सोए हुए पंडित जी के चेहरे पर अपनी नज़र दौड़ा सके इस वजह से अपनी नज़रे फर्श पर झुका कर खड़ी हो गयी. तभी धन्नो ने अपना मुँह शौचालय के अंदर की ओर करते हुए ठीक शौचालय के दरवाज़े पर ही खड़ी हो गयी और वह ना तो शौचालय के अंदर घुसी ना ही शौचालय के बाहर ही रही बल्कि ठीक दरवाज़े के बीचोबीच ही खड़ी हो कर जैसे ही अपने सारी और पेटिकोट कमर तक उठाई उसका सुडौल चौड़ा और बड़ा बड़ा दोनो चूतड़ जो आपस मे सटे हुए थे और एक गहरी दरार बना रहे थे एक दम नंगा हो गया और नतीज़ा की पंडित जी अपनी आँखो के पलकों को काफ़ी हल्के खुले होने के कारण सब कुच्छ देख रहे थे. धन्नो का चूतदों की बनावट बहुत ही आकर्षक थी. दोनो चूतर कुछ साँवले रंग के साथ साथ मांसल और 43 साल की उम्र मे काफ़ी भरा पूरा था. दोनो चूतदों की गोलाइयाँ इतनी मांसल और कसी हुई थी और जब धन्नो एक पल के लिए खड़ी थी तो ऐसे लग रहा था मानो चूतड़ के दोनो हिस्से आपस मे ऐसे सटे हों की उन्हे

जगह नही मिल रही हो और दोनो बड़े बड़े हिस्से एक दूसरे को धकेल रहे हों. धन्नो के चूतड़ के दोनो हिस्सों के बीच का बना हुआ दरार काफ़ी गहरा और खड़ी होने की स्थिति मे काफ़ी सांकरा भी लग रहा था. धन्नो ने सारी और पेटिकोट को कमर तक उठा कर लगभग पीठ पर ही रख लेने के वजह से कमर के पास का कटाव भी दीख जा रहा था. पंडित जी इतना देख कर मस्त हो गये. धन्नो के एक पल के ही इस नज़ारे ने पंडित जी को मानो धन्नो का दीवाना बना दिया हो. तभी दूसरे पल धन्नो एक झटके से पेशाब करने के लिए बैठ गयी. पंडित जी का मुँह शौचालय के दरवाज़े की ओर होने की वजह से वह बैठी हुई धन्नो को अपनी भरपूर नज़र से देख रहे थे. सावित्री एक पल के लिए सोची की वह धन्नो के पीछे ही जा कर खड़ी हो जाए जिससे पंडित जी उसे देख ना सकें. लेकिन उसकी हिम्मत नही हुई. सावित्री को जैसे ही महसूस हुया की धन्नो चाची के नंगे चूतदों को पंडित जी देख रहें हैं वह पूरी तरह सनसना गयी. उसे ऐसा लगा मानो उसकी बुर मे कुच्छ चुलबुलाहट सी होने लगी है. जैसे ही धन्नो बैठी की उसके दोनो गोल गोल चूतड़ हल्के से फैल से गये मानो वो आपस मे एक दूसरे से हल्की दूरी बना लिए हों और इस वजह से दोनो चूतदों के बीच का काफ़ी गहरा और सांकरा दरार फैल गया और कमर के पास से उठने वाली दोनो चूतदों के बीच वाली लकीर अब एक दम सॉफ सॉफ दीखने लगी. धन्नो ने जब अपनी सारी और पेटिकोट को दोनो हाथों से कमर के उपर करते हुए जैसे ही झटके से पेशाब करने बैठी की उसके सर पर रखा सारी का पल्लू सरक कर पीठ पर आ गया और नंगे चूतदों के साथ साथ उसके पीठ के तरफ जा रही सिर के बॉल की चोटी भी पंडित जी को दीखने लगी. धन्नो के पीठ का ज़्यादा हिस्सा पेटिकोट से ही ढक सा गया था क्योंकि धन्नो ने बैठते समय सारी और पेटिकोट को कमर के उपर उठाते हुए अपनी पीठ पर ही लहराते हुए रख सी ली थी. धन्नो यह जान रही थी की पंडित जी के उपर इस हमले का बहुत ही गरम असर पड़ गया होगा जो उस पहलवान और मजबूत शरीर के मर्द को फँसाने के लिए काफ़ी था. दूसरी तरफ बगल मे खड़ी सावित्री के भी बेशर्म और अश्लीलता का मज़ा देने के लिए काफ़ी था. धन्नो जानती थी की सावित्री काफ़ी सीधी और शरीफ है और उसे बेशर्म और रंगीन बनाने के लिए इस तरह की हरकत बहुत ही मज़ेदार और ज़रूरी है. धन्नो जैसी चुदैल किस्म की औरतें दूसरी नयी उम्र की लड़कियो को अपनी जैसे छिनाल बनाने की आदत सी होती है और इसमे उन्हे बहुत मज़ा भी आता है जो किसी चुदाइ से कम नही होता है. इस तरह धन्नो सावित्री को यह दीखाना चाह रही थी की कोई भी ऐसी अश्लील हरकत के लिए हिम्मत की भी ज़रूरत होती है साथ साथ रिस्क लेने की आदत भी होनी चाहिए. अब तक सावित्री को यही पता था की किसी दूसरे मर्द को अपने शरीर के अंद्रूणी हिस्से को दिखाना बेहद शर्मनाक और बे-इज़्ज़त वाली बात होती है लेकिन धन्नो की कोशिस थी की सावित्री को महसूस हो सके की इस तरह के हरकत करने मे कितना मज़ा आता है जो अब तक वह नही जानती थी. इधेर धन्नो के मन मे जब यह बात आई की पंडित जी उसके चूतड़ ज़रूर देख रहे होंगे और इतना सोचते ही वह भी एक मस्ती की लहर से सराबोर हो गयी. धन्नो बैठे ही बैठे जैसे ही अपनी नज़र बगल मे खड़ी सावित्री पर डाली तो देखी की वह अपनी नज़रें एक दम फर्श पर गढ़ा ली है और उसके चेहरे पर पसीना उभर आया था. जो शायद लाज़ के वजह से थी. तभी पेशाब करने बैठी हुई धन्नो ने सावित्री की ओर देखते हुए काफ़ी धीरे से फुसफुसा "देख कहीं जाग ना जाएँ..." धन्नो के इस बात पर सावित्री की नज़रें अचानक सामने चौकी पर लेटे हुए और शौचालय की ओर मुँह किए पंडित जी के चेहरे पर चली गयी और जैसे ही देखी की उनकी आँख की पलकें बंद होने के बावजूद कुच्छ हरकत कर रही थीं और इतना देखते ही एक डर लाज़ से पूरी तरह हिल उठी सावित्री वापस अपनी नज़रे फर्श पर गढ़ा ली. धन्नो ने सावित्री के नज़रों के गौर से देखी की पंडित जी के चेहरे पर से इतनी झटके से हट कर वापस झुक गयी तो मतलब सॉफ था की पंडित जी जागे और देख रहे हैं जो अब सावित्री को भी मालूम चल गया था. धन्नो ने आगे बिना कुछ बोले अपने नज़रों को सावित्री के चहरे पर से हटा ली और काफ़ी इतमीनान के साथ मुतना सुरू कर दी. दोपहर के समय दुकान के अंदर वाले हिस्से मे एक दम सन्नाटा था और धन्नो के पेशाब के मोटी धार का फर्श पर टकराने की एक तेज आवाज़ शांत कमरे मे गूंजने लगी. पंडित जी अब धन्नो के चूतड़ को देखने के साथ साथ धन्नो के मुतने की तेज आवाज़ कान मे पड़ते ही एकदम मस्त हो गये और उनकी धोती के अंदर लंगोट मे कुच्छ कसाव होने लगा. एक पल के लिए उन्होने सावित्री के लाज़ से पानी पानी हुए चहरे को देखा जो एकदम से लाल हो गया था और माथे और चेहरे पर पसीना उभर आया था.

क्रमशः.....................

rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:45

Sangharsh--27

dhanno ke is tagade prahaar ka asar savitri ki man aur dharnaa dono par ek saath padaa. vah sochne lagi ki pandit ji ne pahle hi use bataa diyaa tha ki laxmi ka dusra ladka unke shareer se paida hai. fir bhi laxmi ko savitri ki maa sita aur khood savitri bhi kafi shareef maanti thi lekin ab savitri ko mahsoos hone lagaa ki jaisi vah sochti thi vaisi duniaa nahi hai aur laxmi bhi doodh ki dhoi nahi hai. dhanno ki baaten use sahi aur vastvik lagne lagi. savitri mano aur adhik sunane ki ichchha se chup chap baithi rahi. dhanno andar hi andar khush ho gayi thi. use pataa tha ki jawaan ladki ke liye itni garm aur rangeen baat use besharami ke rashte par le jaane ke liye

theek thi. savitri bhi ab dhanno ki baat ko sunane ke liye betaav hoti jaa rahi thi lekin abhi bhi use bahut hi laaz lag rahi thi is vajah se apni nazren jhukaaye chupchap baithi thi. fir dhanno ne dheere se aage boli "naye umra ka lund to aurton ko kafi jawaan aur taza rakhta hai aur isi liye to laxmi aaj kal gaon me kuchh naye umra ke ladkon ke paani se apni munia ko roz nahwaati hai..wo bhi dheere dheere bahut mazaa le rahi hai..lekin ye baat gaon ke andar keval main aur kuchh uski sahelian hi jaanti hain...aur dusaron ko jaanane ki kyaa jaroorat bhi hai..badnaami kisi ko pasand thodi hai..wo bhi to bechaari ek aurat hi hai..bas kaam ho jaaye aur shor bhi na mache yahi to har aurat chahti hi" dhanno ne itnaa kah kar savitri ke tej sans par gaur karte huye baat aage badhaayi "vaise laxmi kaam hi aisa karti hai ki ...saamp bhi mar jaaye aur laathi bhi naa tute...bahut hi chalanki se aur hoshiyaari se apni munia ko ladkon ka paani pilaati hai...mujhe to usake dimaag par kafi ascharyaa bhi hota hai...bahut hi chalaak aur samajhdaari se rahti hai..ab ye hi samajh ki teri maa sita uski bahut kareebi saheli hai aur use khood hi nahi pataa ki laxmi vastav me kitani chudail hai..aur teri maa use ek shareef aurat samajhti hai. lekin sach puchho to mere vichaar me vah ek shareef hai bhi...bahut savdhaani se chudati hai...kyonki uski is kartoot me uski kuchh sahelian madad karti hain aur isi kaaran uske upar koi shak nahi kartaa...aur hota bhi yahi hai yadi koi ek aurat kisi dusare aurat ka madam lete huye mazaa leti hai to badnaami ka khatra bahut hi kam hota hai...aur aaj kal to isi me samajhdaari bhi hai..." savitri is baat ko sunkar fir ek alag soch me pad gayi ki dhanno usase aisi baat kah kar kyaa samjhana chah rahi thi. savitri ke dimaag me dhanno dwara lund ka intzaam aur fir ek aurat ki madad se mazaa lutane ka plan bataane ke peechhe ka matlab samajh aane lagaa. ab vah bahut hi mast ho gayi thi. mano dhanno use swarg ke rashte ke baare me bataa rahi ho. savitri ne mahsoos kiya ki uski bur kuchh chipchipaa si gayi thi. fir aage dhanno ne savitri ke kaan ke paas dheere se kuchh gambhirta ke saath fusfussai "meri in baaton ko kisi se kahnaa mat...samajhi ki nahi ..." dhanno ne savitri ke kandhe par ek haath rakh kar mano usase haami bharvana chahti thi lekin savitri apni ankhe ekdam farsh par tikaaye baithi rah gayi. vah han kahnaa chahti thi lekin uske paas ab andar se taakat nahi lag rahi thi kyonki vah itni gandi aur khuli hui baat kisi se nahi ki thi. aur chup baithi dekh dhanno ne uske kandhe ko usi haath se lagbhag hilaate huye fir boli "are pagli meri in baaton ko kisi se kahegi to log kyaa sochenge ki main is umra me ek jawaan ladki ko bigaad rahi hun...ye sab kisi se kahnaa mat ...kyon kuchh bolti kyon nahi..." dubaara dhanno ki koshis se savitri ka himmat kuchh badhaa aur kafi dheere se apni nazren jhukaye huye hi fusfusaai "nahi kahungi" itna sunkar dhanno ne savitri ke kandhe par se haath hataa li aur fir boli "haan beti tum ab samajhdaar ho gayi ho aur tujhe maloom hi hai ki kaun si baat kisase karni chahiye kisase nahin....aur aaj se tum meri ek bahut hi achhi saheli bhi hai aur wo isliye ki saheli ke roop me tum hamse khool kar baat kar sakogi aur main hi ek saheli ke rup me jab tera man karega tab us cheez ka intzaam bhi dheere se karwaa dungi...teri munia ki bhi jaroorat puri ho jayegi aur dunia ko pataa bhi nahi chalega..." itna kah kar dhanno hansne lagi aur savitri ke peeth par dheere ek thappad bhi jad di aur savitri aisi baat dubaraa suanane ke baad muskuraana chah rahi thi lekin aa rahi muskuraahat ko rokte huye boli "dhaattt...chheee aap ye sab mujhse mat kahaa karen..mujhe kuchh nahi chahiye..." dhanno ne jab savitri ke munh se aisi baat suni to use bahut khushi hui aur use lagaa ki aaj ki mehnat rang laa di thi. fir hansate huye boli "haan tumhe nayaa ya puranaa koi auzaar nahi chahiye ..main jaanti hun kyon nahi chahiye ...aaj kal pandit ji to khood hi tumhaari munia ka khyaal rakh rahe hain 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bhi spasht kar di thi ki dhanno ka savitri ke upar bhi bahut vishwaas hai. ab dhanno ne pure hathiyaar savitri ke upar chalaa di thi aur savitri vaise hi ek murti ki tarah jas ki tas baithi thi. chehre par ek laaz dar aur paseene ubhar aaye the. saath saath uske badan me ek masti ki lahar bhi tej ho gayi thi. dhanno chachi use apnaa aslee rup dikhaa chuki thi.

dhanno ka kaam lagbhag puraa ho chukaa tha. vah savitri ke saath jis tarah ka sambandh banaana chah rahi thi ab banati deekh rahi thi. savitri ki chuppi is baat ko pramaanit kar rahaa tha ki ab dhanno ke kisi baat ka virodh nahi karnaa chah rahi thi. fir dhanno ne peeth par haath rakhte dheere se fusfussai "kal meri beti ko dekhne ke liye ladke wale aa rahe hain ..shagun chacha ke ghar ..aur main sochti hun ki tum bhi dukaan ke bahaane mere saath shagun chacha ke yahaan chalti to bahut achchha hotaa..." itna kah kar dhanno chachi savitri ke chahre par dekhte huye uske jabaav ka intazaar karne lagi. savitri ke samajh me nahi aa rahaa tha ki akhir kaise dukaan ka kaam chhor kar apni maa ko binaa bataaye vah aisa kar sakti hai. isi liye chup rahi. fir dhanno ne thoda jor lagaa kar savitri se kuchh anurodh ke andaaj me boli "tujhe kisi tarah ki koi pareshaani nahi hogi..main pandit ji se baat kar lungi ki kal meri beti musammi ko dekhne aa rahe hain aur is kaaran vah dukaan par nahi aayegi aur mere saath shagun chacha ke ghar jaayegi..bol beti..." itnaa sunkar savitri ki pareshaania badh gayin aur dheere se boli "lekin meri maa mujhe aapke saath kahin nahi jaane degi.." dhanno turant boli "jab tum dukaan ke liye aaogi tab main khood tumhe gaon ke baahar mil lungi aur fir mere saath shagun chacha ke ghar chalnaa..aur sham ko jis samay dukaan se ghar jaati ho theek usi samay main tumhe goan ke baahar tak chhor dungi...to maa ko kaise maloom hoga?..." dhanno ke samjhaane se savitri chup rahi aur fir kuchh nahi boli. ab dukaan ke andar wale hisse me chauki par so rahe pandit ji ka naak ka bajnaa band ho gayaa tha. savitri aur dhanno dono ko yah shak ho gayaa tha ki pandit ji ab jag gaye hain. dhanno savitri se puchhi "peshaab kahaan karti ho...chalo peshaab to kar liyaa jaay nahi to pandit ji jag jaayenge ..." savitri ne ander ek shauchalay ke hone ka ishara kiye to dhanno ne tapaak se boli "jaldi chalo ...mujhe jor se lagi hai aur tum bhi kar lo." itna kahte huye dhanno chataai par se uth kar ek shareef aurat ki tarah apne saari ka pallu apne sar par rakhi aur fir savitri bhi uthi aur apne dupatte ko theek kar lee. dhanno parde ko hataa kar andar jhanki to pandit ji chauki par soye huye the aur unke pair ke taraf shauchalay ka darwaaza tha jo ki khulaa hua tha. dhanno ko parde ke bagal se keval pandit ji ka sar hi dikhaai de rahaa tha. lekin naak na bajne ke vajah se dhanno aur savitri dono hi yah soch rahi thin ki pandit ji jage ho sakte hain. aur aise me jab dono shauchalay ke taraf jaayengi tab pandit ji jage hone ki sthiti me bina sar ko idher udhar kiye soye soye araam se dekh sakte hain. savitri is bat ko soch kar dar rahi thi. lekin tabhi dhanno ne parde ko ek taraf karte huye apne kadam andar wale kamre me rakhte huye fusfusaai "abhi pandit ji need me hain chal jaldi peshaab kar lun nahi to jag jaayenge to mujhe bahut laaz lagegi unke saamne shauchalay me jana...aur sun shauchalay ke darwaaze ko band karnaa theek nahi hoga nahi to darwaaze ke palle ki charcharaahat ya sitkini ke khatakne ki awaaj se pandit ji jag jaayenge...bas chal dheere se baith kar mut liyaa jaay..." dhanno ke theek peechhe khadi savitri ka kalejaa dhak dhak kar rahaa tha. vah soch rahi thi ki kahin pandit ji jage honge to peshaab karte huye dono ko dekh lenge. dhanno kcuhh dabe kadmo se andar waale kamre me chauki ke bagal se shauchalay ke darwaaze ke paas pahunch gayi. lekin jaise hi peechhe dekhi to savitri abhi bhi parde ke paas khadi thi. kyonki savitri ko andazaa tha ki pandit ji kaa naak baznaa band ho gayaa hai aur ab ve jage honge aise me shauchalay ka darwaza bina band kiye peshaab karne ka matlab pandit ji dekh sakte hain. dhanno ne parde ke paas khadi savitri ko shauchalay ke darwaaze ke paas bulaane ke liye dheemi awaaz me boli "aree jaldi aa aur yahi dheere se peshaab kar liyaa jaay....nahi to pandit ji kabhi bhi jag sakte hain..jaldi aa......" dhanno ne itnaa bolte huye apni tirachhi nazron se pandit ji ke ankh ke band palkon ko dekhte huye yah bhamp chuki pandit ji puri tarah se jag chuke hain lekin peshaab karne ki baat unke kaan me pad gayi hai is vajah se jaan bujh kar apni palko ko aise band kar liye hain ki dekhne par mano so rahe hon aur palkon ko bahut thodaa sa khol kar dono ke peshaab karte huye dekh sakte hain. pandit ji ke kaan me jab ye baat sunaayi di ki dhanno shauchalay ke darwaaze ko band nahi karna chahti hai kyonki use is baat ka dar hai ki darwaaza band karne par darwaaze ke charcharaahat aur sitkini ke khatakne ke vajah se unki need khul sakti hai to pandit ji andar hi andar mast ho uthe aur sone ka naatak kar apne aankh ke palkon ko itni bareeki se sui ki nok ke baraabar failaa kar dekhne lage. dhanno ke dabaav ke chalte savitri bhi dheere dheere dabe paanv shauchalay ke paas khadi dhanno ke paas aakar khadi ho gayi. use yah vishvaas tha ki pandit ji jage honge lekin uski himaat nahi thi ki vah soye huye pandit ji ke chehare par apni bazar dauda sake is vajah se apni nazre farsh par jhukaa kar khadi ho gayi. tabhi dhanno ne apna munh shauchalay ke andar ki or karte huye theek shauchalay ke darwaaze par hi khadi ho gayi aur wah na to shauchalay ke andar ghusi na hi shauchalay ke baahar hi rahi balki theek darwaaze ke beechobeech hi khadi ho kar jaise hi apne saari aur peticot kamar tak uthaai uska sudaul chaudaa aur bada badaa dono chutad jo aapas me sate huye the aur ek gahari daraar banaa rahe the ek dam nanga ho gayaa aur nateeza ki pandit ji apni andkh ke palkon ko kafi halke khule hone ke kaaran sab kuchh dekh rahe the. dhanno ka chutadon ki banaavat bahut hi aakarshak thi. dono chutak kuch sanwale rang ke saath saath mansal aur 43 saal ki umra me kaafi bharaa puraa tha. dono chutadon ki golaaian itni mansal aur kasi huyi thi aur jab dhanno ek pal ke liye khadi thi to aise lag rahaa tha mano chutad ke dono hisse apas me aise sate hon ki unhe

jagah nahi mil rahi ho aur dono bade bade hisse ek dusare ko dhakel rahe hon. dhanno ke chutad ke dono hisson ke beech ka banaa hua daraar kafi gahra aur khadi hone ki sthiti me kafi sankaraa bhi lag rahaa tha. dhanno ne saari aur peticot ko kamar tak utha kar lagbhag peeth par hi rakh lene ke vajah se kamar ke paas ka kataav bhi deekh jaa rahaa tha. pandit ji itna dekh kar mast ho gaye. dhanno ke ek pal ke hi is nazaare ne pandit ji ko maano dhaano ka deewanaa banaa diyaa ho. tabhi dusare pal dhanno ek jhatake se peshaab karne ke liye baith gayi. pandit ji ka munh shauchalay ke darwaaze ki or hone ki vajah se vah baithi hui dhanno ko apni bharpur nazar se dekh rahe the. savitri ek pal ke liye sochi ki vah dhanno ke peechhe hi ja kar khadi ho jaaye jisase pandit ji use dekh naa saken. lekin uski himmat nahi hui. savitri ko jaise hi mahsoos huyaa ki dhanno chachi ke nange chutadon ko pandit ji dekh rahen hain vah puri tarah sansanaa gayi. use aisa lagaa mano uski bur me kuchh chulbulaahat si hone lagi hai. jaise hi dhanno baithi ki uske dono gol gol chutad halke se fail se gaye mano we apas me ek dusare se halki duri banaa liye hon aur is vajah se dono chutadon ke beech ka kaafi gaharaa aur sankaraa daraar fail gayaa aur kamar ke paas se uthne wali dono chutadon ke beech vali lakeer ab ek dam saaf saaf deekhne lagi. dhannoe ne jab apni saari aur petikot ko dono haathon se kamar ke upar karte huye jaise hi jhatke se peshaab karne baithi ki uske sar par rakhaa saari ka pallu sarak kar peeth par aa gayaa aur nange chutadon ke saath saath uske peeth ke taraf jaa rahi sir ke baal ki choti bhi pandit ji ko deekhne lagi. dhanno ke peeth ka jyada hissaa peticot se hi dhak sa gayaa tha kyonki dhanno ne baithte samay saari aur peticot ko kamar ke upar uthaate huye apni peeth par hi lahraate huye rakh si lee thi. dhanno yah jaan rahi thi ki pandit ji ke upar is hamale ka bahut hi garam asar pad gayaa hogaa jo us pahlwaan aur majboot shareer ke mard ko fansane ke liye kafi tha. dusari taraf bagal me khadi savitri ke bhi besharm aur ashleelta ka mazaa dene ke liye kafi tha. dhanno jaanti thi ki savitri kafi seedhi aur shareef hai aur use besharm aur rangeen banaane ke liye is tarah ki harkat bahut hi mazedaar aur jaroori hai. dhanno jaise chudail kism ki aurten dusri nayi umra ki ladkion ko apni jaise chinaal banaane ki aadat si hoti hai aur isme unhe bahut mazaa bhi aata hai jo kisi chudaai se kam nahi hota hai. is tarah dhanno savitri ko yah deekhana chah rahi thi ki koi bhi aisi ashleel harkat ke liye himmat ki bhi jaroorat hoti hai saath saath risk lene ki aadat bhi honi chahiye. ab tak savitri ko yahi pataa tha ki kisi dusare mard ko apne shareer ke androoni hisse ko dikhaana behad sharmnaak aur be-izzat wali baat hoti hai lekin dhanno ki koshis thi ki savitri ko mahsoos ho sake ki is tarah ke harkat karne me kitnaa mazaa ata hai jo ab tak vah nahi jaanti thi. idher dhanno ke man me jab yah baat aayi ki pandit ji uske chutad jaroor dekh rahe honge aur itna sochte hi vah bhi ek masti ki lahar se saraabor ho gayi. dhanno baithe hi baithe jaise hi apni nazar bagal me khadi savitri par dali to dekhi ki vah apni nazren ek dam farsh par gadaa li hai aur uske chehre par paseena ubhar aaya tha. jo shayad laaz ke vajah se thi. tabhi peshaab karne baithi huyi dhanno ne savitri ki or dekhte huye kafi dhere se fusfusaai "dekh kahin jag naa jaayen..." dhanno ke is baat par savitri ki nazren achanak samne chauki par lete huye aur shauchalay ki or munh kiye pandit ji ke chehre par chali gayi aur jaise hi dekhi ki unki ankh ki palken band hone ke baavjood kuchh harkat kar rahi thin aur itna dekhte hi ek dar laaz se puri tarah hil uthi savitri vapas apni nazre farsh par gadaa li. dhanno ne savitri ke nazron ke gaur se dekhi ki pandit ji ke chehare par se itni jhatke se hat kar vaapas jhuk gayi to matlab saaf tha ki pandit ji jage aur dekh rahe hain jo ab savitri ko bhi maloom chal gayaa tha. dhanno ne aage binaa kuch bole apne nazaron ko savitri ke chahre par se hataa li aur kafi itminaan ke saath mutna suru kar di. dopahar ke samay dukaan ke andar waale hisse me ek dam sannata tha aur dhanno ke peshaab ke moti dhaar ka farsh par takraane ki ek tej awaaj shant kamare me gunjne lagi. pandit ji ab dhanno ke chutad ko dekhne ke saath saath dhanno ke mutane ki tej aawaz kaan me padate hi ekdam mast ho gaye aur unki dhoti ke andar langot me kuchh kasaav hone lagaa. ek pal ke liye unhone savitri ke laaz se paani paani huye chahre ko dekha jo ekdam se laal ho gayaa tha aur maathe aue chehre par paseena ubhad aaya tha.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 21 Dec 2014 12:12

संघर्ष--28

धन्नो के बुर से निकला मूत शौचालय के फर्श पर फैल कर अंदर की ओर बहने लगा. पेशाब ख़त्म होने के बाद धन्नो जैसे ही खड़ी हुई की उसकी दोनो चूतड़ फिर आपस मे सॅट गये और दरार फिर काफ़ी गहरी हो गयी और दोनो गोलाईयो के बीच वाली लकीर अब दीखाई नही दे पा रही थी. पंडित जी ने जब धन्नो के मोटे मोटे दोनो जांघों को देखा तो उसकी बनावट और भराव के वजह से धन्नो को चोदने की तीव्र इच्च्छा जाग उठी. तभी धन्नो ने अपनी सारी और पेटिकोट को कमर और पीठ से नीचे गिरा दी और सब कुच्छ धक गया. धन्नो अपनी जगह से हट कर बगल मे खड़ी सावित्री को बोली "चल जल्दी से यहीं बैठ कर मूत ले..." सावित्री जो की धन्नो की गंदी और अश्लील बातों और पंडित जी को चोरी और चलाँकि से गांद दीखाने की घटना से एकदम गर्म और उत्तेजित भी हो चुकी थी. उसकी बुर बहुत गर्म हो गयी थी. पता नही क्यों धन्नो चाची का पंडित जी को गांद दिखाना उसे बहुत अच्च्छा लगा था. जैसे ही उसने धन्नो चाची ने उससे कहा की वहीं मुताना है वह समझ गयी की उसकी भी गांद पंडित जी देख लेंगे और वह भी धन्नो चाची के सामने. इतनी बात मन मे आते ही वह एकदम से सनसना कर मस्त सी हो गयी. पता नही क्यों उसे ऐसा करने मे जहाँ डर और लाज़ लग रही थी वहीं अंदर ही अंदर कुच्छ आनंद भी मिल रही थी. धन्नो चाची ने उसे फिर मूतने के लिए बोली "अरे जल्दी मूत नही तो जाग जाएँगे तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी..." सावित्री समझ रही थी कि पंडित जी जागे हुए हैं. इसी वजह से उसके पैर अपनी जगह से हिल नही पा रहे थे. उसकी नज़रें झुकी हुई थी. धन्नो समझ गयी की सावित्री अब जान चुकी है की पंडित जी जागे हैं और इसी लिए मूत नही रही है. लेकिन वह सावित्री को मुताने पर बाध्या. करना चाह रही थी की उसके अंदर भी निर्लज्जता का समावेश हो जाय. यही सोचते हुए धन्नो ने तुरंत सावित्री के बाँह को पकड़ कर शौचालय के दरवाजे पर खींच लाई और बोली "जल्दी मूत ले..देर मत कर..चल मैं तेरे पीछे खड़ी हूँ ..यदि जाग जाएँगे तो भी नही देख पाएँगे. ." सावित्री ठीक शौचालय के दरवाजे के बीच जहाँ धन्नो ने पेशाब की थी वही खड़ी हो गयी. उसके काँपते हुए हाथ सलवार के नाडे को खोलने की कोशिस कर रहे थे. जैसे ही नाडे की गाँठ खुली की उसने अपने कमर के हिस्से मे सलवार को ढीली की और फिर चड्डी को नीचे सरकाने की कोशिस करने लगी. चड्डी काफ़ी कसी होने के वजह से सावित्री के बड़े बड़े चूतदों पर से नीचे नही सरक पा रही थी.

धन्नो जो ठीक सावित्री के पीछे ही खड़ी थी जब देखी की चड्डी काफ़ी कसी होने के वजह से सावित्री के बड़े बड़े चूतदों पर से नीचे नही सरक पा रही है तब धीरे से फुसफुसा " हाई राम इतना बड़ा चूतड़ है तुम्हारा ..और कपड़े के उपर से तो मालूम ही नही चलता की अंदर दो बड़े बड़े तरबूज़ रखी हो..तेरी चड्डी फट ना जाए..ला मैं पीछे का सरका देती हूँ..." इतना कह कर धन्नो सावित्री के पीछे से थोड़ी बगल हो गयी और अब पंडित जी को सावित्री का पूरा पीच्छवाड़ा दीखने लगा. धन्नो ने काफ़ी चलाँकि से पंडित जी से बिना नज़र मिलाए तेज़ी से अपनी पल्लू को सर के उपर रखते हुए पल्लू के एक हिस्से को खींच कर अपने मुँह मे दाँतों दबा ली और अब उसका शरीर लगभग पूरी तरह से ढक गया था मानो वह बहुत ही शरीफ और लज़ाधुर औरत हो. दूसरे ही पल बिना देर किए झट से सावित्री के समीज़ वाले हिस्से को एक हाथ से उसके कमर के उपर उठाई तो पंडित जी को सावित्री के दोनो बड़े बड़े चूतड़ उसकी कसी हुई चड्डी मे दीखने लगे. धन्नो के एक हाथ जहाँ समीज़ को उसके कमर के उपर उठा रखी थी वहीं दूसरे हाथ की उंगलियाँ तेज़ी से सावित्री की कसी हुई चड्डी को दोनो चूतदों पर से नीचे खिसकाने लगी. सलवार का नाडा ढीला होने के बाद सलवार सावित्री की भारिपुरी जांघों मे जा कर रुक गया था क्योंकि सावित्री ने एक हाथ से सलवार के नाडे को पकड़ी थी और दूसरी हाथ से अपनी चड्डी को नीचे सरकाने की कोशिस कर रही थी. धन्नो के एक निहायत शरीफ औरत की तरह सारी मे खूद को ढक लेने और अपने सर पर पल्लू रखते हुए मुँह पर भी पल्लू के हिस्से डाल कर मानो एक नई नवेली और लज़ाधुर दुल्हन की तरह पल्लू के कोने को अपने दाँतों से दबा लेने के बाद सावित्री की चूतड़ पर से समीज़ को उपर उठा कर चड्डी को जल्दी जल्दी सरकाना पंडित जी को बहुत अजीब लगने के साथ साथ कुच्छ ऐसा लग रहा था की धन्नो खूद तो शरीफ बन कर एक जवान लड़की के शरीर को किसी दूसरे मर्द के सामने नंगा कर रही थी और धन्नो की इस आडया ने पंडित जी को घायल कर दिया. पंडित जी धन्नो की हाथ की हरकत को काफ़ी गौर से अपनी पलकों के बीच से देख रहे थे जो चड्डी को सरकाने के लिए कोशिस कर रही थी. आख़िर किसी तरह सावित्री की कसी हुई चड्डी दोनो चूतदों से नीचे एक झटके के साथ सरक गयी और दोनो चूतड़ एक दम आज़ाद हो कर अपनी पूरी गोलायओं मे बाहर निकल कर मानो लटकते हुए हिलने लगे. तभी धन्नो ने धीरे से फुसफुसा "तेरी भी चूतड़ तेरी मा की तरह ही काफ़ी बड़े बड़े हैं ...इसी वजह से चड्डी फँस जा रही है...जब इतनी परेशानी होती है तो सलवार के नीचे चड्डी मत पहना कर..इतना बड़ा गांद किसी चड्डी मे भला कैसे आएगी..." इतना कह कर धन्नो धीरे से हंस पड़ी और चड्डी वाले हाथ खाली होते ही अपने पल्लू को फिर से ऐसे ठीक करने लगी की पंडित जी उसके शरीर के किसी हिस्से ना देख संकें मानो वह कोई दुल्हन हो. लेकिन सावित्री की हालत एकदम बुरी थी. जिस पल चड्डी दोनो गोलायओं से नीचे एक झटके से सर्की उसी पल उसे ऐसा लगा मानो मूत देगी. वह जान रही थी की पंडित जी काफ़ी चलाँकि से सब कुच्छ देख रहें हैं. अब उसे धन्नो के उपर भी शक हो गया की धन्नो को भी अब यह मालूम हो गया है की पंडित जी उन दोनो की इस करतूतों को देख रहें हैं. लेकिन उसे यह सब कुच्छ बहुत ही नशा और मस्त करने वाला लग रहा था. उसका कलेजा धक धक कर रहा था और बुर मे एक सनसनाहट हो रही थी. लेकिन उसे एक अजीब आनंद मिल रहा था और शायद इसी लिए काफ़ी लाज़ और डर के बावजूद सावित्री को ऐसा करना अब ठीक लग रहा था.

दूसरे पल सावित्री पेशाब करने बैठ गयी और बैठते ही समीज़ के पीछे वाला हिस्सा पीठ पर से सरक कर दोनो गोल गोल चूतदों को ढक लिया. इतना देखते ही धन्नो ने तुरंत समीज़ के उस पीछे वाले हिस्से को अपने हाथ से उठा कर वापस पीठ पर रख दी जिससे सावित्री का चूतड़ फिर एकदम नंगा हो गया और पंडित जी उसे अपने भरपूर नज़रों से देखने लगे. सावित्री की बुर से पेशाब की धार निकल कर फर्श पर गिरने लगी और एक धीमी आवाज़ उठने लगी. सावित्री जान बूझ कर काफ़ी धीमी धार निकाल रही थी ताकि कमरे मे पेशाब करने की आवाज़ ना गूँजे. धन्नो सावित्री के पीछे के बजाय बगल मे खड़ी हो गयी थी और उसकी नज़रें सावित्री के नंगे गांद पर ही थी. तभी धन्नो ने पंडित जी के चेहरे के तरफ अपनी नज़र दौड़ाई और एक हाथ से अपनी सारी के उपर से ही बुर वाले हिस्से को खुजुला दी मानो वह पंडित जी को इशारा कर रही हो. लेकिन पंडित जी अपने आँखों को बहुत ही चलाँकि से बहुत थोड़ा सा खोल रखे थे. फिर भी पंडित जी धन्नो को समझ गये की काफ़ी खेली खाई औरत है. और धन्नो के अपने सारी के उपर से ही बुर खुजुलाने की हरकत का जबाव देते हुए काफ़ी धीरे से अपने एक हाथ को अपनी धोती मे डाल कर लंगोट के बगल से कुच्छ कसाव ले रहे लंड को बाहर निकाल दिए और लंड धोती के बगल से एकदम बाहर आ गया और धीरे धीरे खड़ा होने लगा.