बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:20

बाली उमर की प्यास पार्ट--10

गतांक से आगे.......................

उस समय उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गयी.. पर वो कहते हैं ना.. हरियाली के अंधे को हमेशा हरा ही नज़र आता है.. मेरे पेट में उसकी दी हुई सफाई पची नही.. भला एक लड़का और एक लड़की सबसे अलग जाकर अकेले बात कर रहे हों.. और उनमें कुच्छ 'ना' हो.. ये कैसे हो सकता है?.. मैं बैठी बैठी यही सोच रही थी...

वैसे भी संदीप बहुत स्मार्ट था.. लंबा कद और गोरे चेहरे पर हुल्की मूच्च दाढ़ी उस पर बहुत जाँचती थी.. लड़कियाँ उसको देख वैसे ही आहें भरती थी जैसे मुझे देख कर लड़के...

पर सभी का मान'ना था कि वो निहायत ही शरीफ और भला लड़का है.. गाँव भर में ये बात चलती थी कि वो कभी सिर उठा कर नही चलता... स्कूल में देखो या घर में.. हमेशा उसकी आँखें किताबों में ही गढ़ी रहती थी.. लड़कियों की तरफ तो वो ध्यान देता ही नही था.. शायद इसीलिए लड़कियाँ उसको दूर से ही देख कर आहें भर लेती थी बस... कभी कोई उसके पास मुझे नज़र नही आई.. सिर्फ़ आज, इस तरह पिंकी को छ्चोड़ कर....

पर कहने से क्या होता है.. यूँ तो लोग तरुण को भी बहुत अच्च्छा लड़का मानते थे.. पर देख लो; क्या निकला! मुझे विश्वास था की पिंकी और संदीप के बीच कोई लेफ्डा तो ज़रूर है...

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खैर.. एग्ज़ॅम के लिए बेल बजी और हम सीटिंग शीट देख कर अपनी अपनी सीट पर जाकर बैठ गये... मैं एग्ज़ॅम को लेकर बहुत सहमी हुई थी.. इंग्लीश का पेपर मेरे लिए टेढ़ी खीर था.. 3-4 पर्चियाँ बनाकर ले गयी थी.. पर भरोसा नही था उसमें से कुच्छ आएगा या नही...

अचानक संदीप हमारे कमरे में आया और मेरी बराबर वाली सीट पर बैठ गया... मेरी खुशी का कोई ठिकाना ना रहा.. 'अगर ये मदद कर दे तो...' मैने सोचा और उसकी तरफ मुड़कर बोली," कैसी तैयारी है.... संदीप?"

"ठीक है.. तुम्हारी?" उसने शराफ़त से जवाब देकर पूचछा...

"मेरी? ... क्या बटाओ? आज तो कुच्छ नही आता.. मैं तो पक्का फेल हो जाउन्गि आज के पेपर में..." मैने बुरा सा मुँह बनाकर कहा...

"कुच्छ नही होता.. रिलॅक्स होकर पेपर देना... जो क्वेस्चन अच्छे आते हों.. उनका जवाब पहले लिखना... एक्षमिनोर पर इंप्रेशन बनेगा...ऑल दा बेस्ट!" उसने कहा और सीधा देखने लगा...

"सिर्फ़ ऑल दा बेस्ट से काम नही चलेगा..." मैं अब उसका यूँ पीछा छ्चोड़ने को तैयार नही थी....

"मतलब?" उसने अर्थपूर्ण निगाहो से मेरी तरफ देखा....

"कुच्छ हेल्प कर दोगे ना.. प्लीज़..." मैने उसकी तरफ प्यार भरी मुस्कान उच्छलते हुए कहा....

"मुझे अपना पेपर भी तो करना है... बाद में कुच्छ टाइम बचा तो ज़रूर..." उसने फॉरमॅलिटी सी पूरी कर दी....

"प्लीज़.. हेल्प कर देना ना... !" मैने बेचारगी से उसकी और देखते हुए याचना सी की..

इस'से पहले कि वो कोई जवाब देता... कमरे में इनविजाइलेटर्स आ गये.. उनके आते ही क्लास एकदम चुप हो गयी.. संदीप भी सीधा होकर बैठ गया... मैं मन मसोस कर भगवान को याद करने लगी....

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पेपर हाथ में आते ही सबके चेहरे खिल गये.. पर मेरे चेहरे पर तो पहले की तरह ही 12 बजे हुए थे... मैं डिफिकल्ट क्वेस्चन्स की नकल लेकर आई थी.. पर पेपर आसान आ गया... मेरे लिए तो इंग्लीश में आसान और मुश्किल; सब एक जैसा ही था...

"अब तो खुश हो जाओ... पेपर बहुत ईज़ी है.. और लेन्ग्थि भी नही..." मेरे कानों में धीरे से संदीप की आवाज़ सुनाई दी... मैने कुच्छ बोलने के लिए उसकी और देखा ही था की वह फिर से बोल पड़ा...

"मेरी तरफ मत देखो.. 'सर' की नज़रों में आ जाओगी..."

मैने अपना सिर सीधा कर के झुका लिया," मुझे नही आता कुच्छ भी इसमें से..."

काफ़ी देर तक जब उसने कोई जवाब नही दिया तो मैने अपनी नज़रें तिर्छि करके उसको देखा.. वह मस्ती से लिखने में खोया हुआ था.. मैं रॉनी शकल बनाकर कभी क्वेस्चन पेपर को कभी आन्सर शीट को देखने लगी....

पेपर शुरू हुए करीब आधा घंटा हो गया था और मैं फ्रंट पेज पर अपनी डीटेल लिखने के अलावा कुच्छ नही कर पाई थी... अचानक पिछे से एक पर्ची आकर मेरे पास गिरी... इसके साथ ही किसी लड़के की हल्की सी आवाज़.. "उठा लो.. 10 मार्क्स का है!"

मैने 'सर' पर एक निगाह डाली और उनकी नज़र से बचाते हुए अचानक पर्ची को उठाकर अपनी कछी में थूस लिया....

मुझे कुच्छ तसल्ली हुई.. कि आख़िर मेरा भी कोई 'कद्रदान' कमरे में मौजूद है... मैने पिछे देखा.. पर सभी नीचे देख रहे थे... समझ में नही आया कि मुझ पर ये 'अहसान' किसने किया है...

कुच्छ देर मौके का इंतज़ार करने के बाद धीरे से मैने अपनी स्कर्ट के नीचे अपनी कछी में हाथ डाला और पर्ची निकाल कर आन्सर शीट में दबा ली...

पर्ची को खोल कर पढ़ते ही मेरा माथा ठनक गया... मैने कुच्छ दिन पहले स्कूल में मिले लेटर का जिकर किया था ना! कुच्छ इसी तरह की अश्लील बातें उसमें लिखी हुई थी.... मैने हताश होकर पर्ची को पलट कर देखा... शुक्र था एक एसे टाइप क्वेस्चन का आन्सर था वहाँ...

ज़्यादा ध्यान ना देकर मैने फटाफट उसकी नकल उतारनी शुरू कर दी.. पर उस दिन मेरा लक ही खराब था..

शायद बाहर बरामदे की खिड़की में से किसी ने मुझे ऐसा करते देख लिया था... मैने अभी आधा क्वेस्चन भी नही किया था कि अचानक बाहर से एक 'सर' आए और मेरी आन्सर शीट को उठाकर झटक दिया.. पर्ची नीचे आ गिरी...

"ये क्या है?" उन्होने गुस्से से पूचछा... करीब 35-40 साल के आसपास की उमर होगी उनकी...

"ज्ज..जी.. पिछे से आई थी..!" मैं सहम गयी...

"क्या मतलब है पिछे से आई थी...? अभी तुम्हारी शीट से निकली है या नही..." उनका लहज़ा बहुत ही सख़्त था..

मैं अंदर तक काँप गयी..," ज्जई.. पर मैने कुच्छ नही लिखा.. आप चाहे देख लो..!"

उस 'सर' ने मुझे घूर कर देखा और पर्ची उठाकर हाथ में ले ली.. थोड़ी देर मुझे यूँ ही उपर से नीचे देखते रहने के बाद उन्होने मेरी शीट इनविजाइलेटर को पकड़ा दी," शीट वापस नही करनी है.. मैं थोड़ी देर में आकर इसका यू.एम.सी. बनौँगा" उन्होने कहा और पर्ची हाथ में लेकर निकल गये...

मैं बैठी बैठी सुबकने लगी.. अचानक संदीप ने कहा," रिक्वेस्ट कर लो.. नही तो पूरा साल खराब हो जाएगा...!"

उसके कहने पर मैं उठकर 'सर' के पास जाकर खड़ी हो गयी," सर.. प्लीज़.. सीट दे दो... अब नही करूँगी..."

"इसमें मैं क्या कर सकता हूँ भला? .. बोर्ड अब्ज़र्वर ने तुम्हारी शीट छ्चीनी है.. मैने तो तुम्हे पर्ची उठाते देख कर भी इग्नोर कर दिया था.... पर अब तो जैसा वो कहेंगे वैसा ही करना पड़ेगा... उनसे रिक्वेस्ट करके देख लो.. ऑफीस में प्रिन्सिपल मेडम के पास बैठे होंगे..." सर ने अपनी मजबूरी जाता दी...

"जी ठीक है.." मैं कहकर बाहर निकली और ऑफीस के सामने पहुँच गयी... 'वो' वहीं बैठे प्रिन्सिपल मेडम के साथ खिलखिला रहे थे....

मुझे देखते ही उन्होने अपना थोबड़ा चढ़ा लिया," हां.. क्या है?"

"ज्जई.. मेरा साल बर्बाद हो जाएगा..." मैने सहमे हुए स्वर में कहा....

"साल? तुम्हारे तीन साल खराब होंगे.. मैं तुम्हारा यू.एम.सी. बनाने जा रहा हूँ.. सारा साल पढ़ाई क्यूँ नही...?" उसकी आवाज़ उसके शरीर की तरह ही बहुत भारी थी....

"सर प्लीज़! कुच्छ भी कर लो.. पर सीट दे दो" मैने याचना की...

वह कुच्छ देर तक मेरी और देखता रहा.. मुझे उसकी नज़रें सीधी मेरी चूचियो में गढ़ी महसूस हो रही थी.. पर मैने परवाह ना की... मैं यूँही बेचारी नज़रों से उसके सामने खड़ी रह कर उसको नज़रों से अपनी जवानी का जाम पीते देखती रही..

वह कुच्छ नरम पड़ा... प्रिन्सिपल की और देख कर बोला," क्या करें मेडम?"

प्रिन्सिपल खिलखिला कर बोली," ये तो आपको ही देखना है माथुर साहब.. वैसे.. लड़की का बदन भरा हुआ हा... मेरा मतलब पूरी जवान लग रही है.." उसने पैनी नज़रों से मुझे देखते हुए कहा और उसकी तरफ बत्तीसी निकाल दी...," घर वाले भी लड़का वाडका देख लेंगे अगर पास हो गयी तो..."

"ठीक है... पीयान भेज कर सीट दिलवा दो.. मैं सोचता हूँ तब तक!" उसने मेरी जवानियों का लुत्फ़ लेते हुए कहा...

मुझे थोड़ी शांति मिली... अपनी आन्सर शीट लेकर में अपनी सीट पर जा बैठी... पर अब करने को तो कुच्छ था नही.. बैठी बैठी जितना लिखा था.. उसको पढ़ने लगी...

मुश्किल से 5 मिनिट भी नही हुए होंगे.. क्लास में पीयान आकर बोला," उस लड़की को प्रिन्सिपल मेडम बुला रही हैं.. जिसको अभी शीट मिली थी...."

मैं एक बार फिर मायूस सी होकर उठी और आन्सर शीट वहीं छ्चोड़ कर ऑफीस के बाहर चली आई.. पर मुझे ना तो मेडम ही दिखाई दी और ना ही 'सर'

"कहाँ हैं मेडम?" मैने पीयान से पूचछा...

"अंदर चली जाओ.. पिछे बैठे होंगे..." पीयान ने कहा....

मैने अंदर जाकर देखा.. दोनो ऑफीस में पिछे सोफे पर साथ साथ बैठे कुच्छ पढ़ रहे थे... मेरे अंदर जाते ही मेडम ने मुझे घूर कर देखा," आ जा.. पहले तो तू मेरे पास आ...!"

"जी..", मैं मेडम के पास जाकर नज़रें झुका कर खड़ी हो गयी...

"ये क्या है?" मेडम ने एक पर्ची मुझे दिखा कर टेबल पर पटक दी....

मैने देखा.. वो वही पर्ची थी जो सर मुझसे छ्चीन कर लाए थे... उन्होने टेबल पर मेरे सामने उस 'लव लेटर' को उपर करके रखा हुआ था....," ज्जी.. मुझे नही पता कुच्छ भी..." मैने शर्मिंदा सी होकर जवाब दिया.....

"अच्च्छा.. तुझे अब कुच्छ भी नही पता.. यू.एम.सी. बना दूँगा तब तो पता चल जाएगा ना...?" सर ने गुस्से से कहा....

"ज़्ज़ि.. ययए मेरे पास पिछे से आकर गिरी थी.. मुझे नही पता किसने..." मैने धीमे स्वर में हड़बड़ा कर कहा.....

"क्या नाम है तेरा?" मेडम ने पूचछा...

"जी.. अंजलि!"

"ये देख.. तेरा ही नाम लिखा है उपर.. और तू कह रही है कि तुझे कुच्छ नही पता... ऐसे कितने यार बना लिए हैं तूने अब से पहले...!" मेडम ने तैश में आकर कहा...

मुझसे कुच्छ बोला ही नही गया... मैं चुपचाप सिर झुकाए खड़ी रही...

"मैं ना कहता था मेडम.. आजकल लड़कियाँ उमर से पहले ही जवान हो जाती हैं... अब देख लो.. सबूत आपके सामने है!" सर ने मेडम को मुस्कुराते हुए मुझे देख कर कहा.. वह मेरी मजबूरी पर चटखारे ले रहा था....

"हुम्म.. और बेशर्मी की भी हद होती है.. जवान हो गयी तो क्या? हमारे टाइम में तो ऐसी गंदी बातों का पता ही नही होता था इस उमर में.. और इसको देख लो.. कैसे कैसे गंदे लेटर आते हैं इसके पास... कौन है तेरा यार.. बता!"

"जी.. मुझे सच में कुच्छ नही पता.. भगवान की कसम.." मैने आँखों में आँसू लाते हुए कहा...

"अब छ्चोड़ो मेडम.. जो करेगी वो भरेगी.. हमारा क्या लेगी...? इसकी शीट मंगवा लो.. मैं यू.एम.सी. बना देता हूँ.. तीन साल के लिए बैठी रहेगी घर.. और ये लेटर भी तो अख़बार में देने लायक है...." सर ने कहा...

"सर प्लीज़.. ऐसा मत कीजिए..!" मैने नज़रें उठाकर सिर को देखा....मेरी आँखें दबदबा गयी.. पर वो अभी भी मेरी कमीज़ में बिना ब्रा के ही तनी हुई मेरी चूचियो को घूर रहे था.....

"तो कैसा करूँ..?" उसने मुझे देख कर कहा और फिर मेडम की तरफ बत्तीसी निकाल कर हंस दिया...

"देख लीजिए सर.. अब इसकी जिंदगी और इज़्ज़त आपके ही हाथ में है...!" मेडम भी कुच्छ अजीब से तरीके से उनकी ओर मुस्कुराइ...

"पूच्छ तो रहा हूँ.. क्या करूँ ? ये कुच्छ बोलती ही नही...." उसकी वासना से भारी आँखें लगातार मेरे बदन में ही गढ़ी हुई थी...

"सर.. प्लीज़.. मुझे माफ़ कर दो.. आइन्दा नही करूँगी..." मैने अपनी आवाज़ को धीमा ही रखा....

"इसकी तलाशी तो ले लो एक बार.. क्या पता कुच्छ और भी च्छूपा रखा हो...!" सर ने मेडम से कहा....

तलाशी की बात सुनते ही मेरे होश उड़ गये.. जो पर्चियाँ मैं घर से बना कर लाई थी.. वो अभी भी मेरी कछी में ही फँसी हुई थी.. मुझे अब याद आया....

"ना जी ना.. मैं क्यूँ लूं.. ? ये आपकी ड्यूटी है.. जो करना हो करिए... मुझे कोई मतलब नही...!" मेडम ने हंसते हुए जवाब दिया..

"मैं.. मैं मर्द भला इसकी तलाशी कैसे ले सकता हूँ मेडम... वैसे भी ये पूरी जवान है! मुझे तो ये हाथ भी नही लगाने देगी..." बोलते हुए उसकी आँखें कभी मुझे और कभी मेडम को देख रही थी....

"ऐसी वैसी लड़की नही है ये.. हज़ार आशिक तो जेब में रख कर चलती होगी... इसको कोई फ़र्क नही पड़ेगा मर्द के हाथों से... और मना करती है तो आपको क्या पड़ी है.. बना दीजिए यू.एम.सी. सबूत तो आपके सामने रखा ही है... पर मैं तलाशी नही लूँगी सर!" मेडम ने सॉफ मना कर दिया...

"मैं सेंटर को देख आती हूँ सर.. तब तक आप..." मेडम मुस्कुरकर कहते हुए अपनी बात को बीच में ही छ्चोड़ कर उठी और बाहर चली गयी....

उनकी बातों से मुझे अहसास होने लगा था कि सर की नज़र मेरी जवानी पर है.. और मेडम भी इसके साथ मिली हुई है....

"अब तलाशी तो लेनी ही पड़ेगी.. समझ रही हो ना!" सर ने मेरी आँखों में देख कर कहा...

मेरा टाइम निकला जा रहा था और उन्हे मस्ती सूझ रही थी... मैं कुच्छ ना बोली.. सिर्फ़ सिर झुका लिया अपना....

"बोलो.. जवाब दो..! या मैं यू.एम.सी. बना दूँ...? सर ने कहा....

"ज्जी.. मेरे पास 2 और हैं.. मैं निकाल कर आ जाती हूँ अभी..." मैने कसमसा कर कहा....

"निकालो.. जो कुच्छ है एक मिनिट में निकाल दो.. यहीं!" सर ने कहा....

मैं एक पल को हिचकिचाई.. फिर कुच्छ सोच कर तिछि हुई और उपर से अपनी स्कर्ट में हाथ डाल लिया... वो अब भी मेरी और ही देख रहा था.. मैने और अंदर हाथ लेजकर पर्चियाँ निकाली और उसको पकड़ा दी...

"हूंम्म... " उसने अपनी नाक के पास ले जाकर पर्चियों को सूँघा.. शर्म के मारे मेरा बुरा हाल हो गया... कुच्छ देर बाद वह फिर मुझे घूर्ने लगा," और निकालो..."

"जी.. और नही है.. एक भी...!" मैने जवाब दिया....

"तुम कुच्छ भी कहोगी और मैं विश्वास कर लूँगा... तलाशी तो देनी ही पड़ेगी तुम्हे...!" उसने बनावटी से गुस्से से मुझे घूरा....

"पर सर.. आधा टाइम पहले ही निकल चुका है पेपर का...!" मैने डरते डरते कहा....

"आज के पेपर को तो भूल ही जाओ... सिर्फ़ ये दुआ करो कि तुम्हारे तीन साल बच जायें.. समझी..." उसने गुर्रकार कहा...

"सर प्लीज़..." मैने सहम कर उसकी आँखों में देखा... वह एकटक मुझे ही घूरे जा रहा था...

"तुम समझ रही हो या नही.. तलाशी तो तुम्हे देनी ही पड़ेगी अगर तुम यू.एम.सी. से बचना चाहती हो.... तुम्हारी मर्ज़ी है.. कहो तो यू.एम.सी. बना दूं..." सर ने इस बार एक एक शब्द को जैसे चबा कर कहा....

"जी..." मुझे उसको तलाशी देने में कोई दिक्कत नही थी.. ऐसी तलाशी तो स्कूल के टीचर जाने कितनी ही बार ले चुके थे.. बातों बातों में.. सिर्फ़ मुझे टाइम की चिंता हो रही थी...

"क्या जी जी लगा रखा है.. मैने तो अब तुम पर ही छ्चोड़ दिया है.... तुम्ही बोलो क्या करूँ.. तलाशी लूँ या यू.एम.सी. बनाऊँ....?"

"जी.. तलाशी ले लो... पर प्लीज़.. केस मत बनाना.." मैने याचना सी करते हुए कहा...

"वो तो मैं तलाशी लेने के बाद सोचूँगा.. इधर आ जाओ.. मेरे पास...!" सर ने मुझे दूसरी और बुलाया.....

मैं टेबल के साथ साथ चलकर सर के पास जाकर खड़ी हो गयी.. मेरा चेहरा ये सोच कर ही लाल हो गया था कि अब वह तलाशी के बहाने जाने कहाँ कहाँ हाथ मारेगा... वह मुझे यूँ घूर रहा था मानो कच्चा ही चबा जाने के मूड में हो...

थोड़ा हिचकने के बाद उसने मेरी कमर पर हाथ रख दिया," अब भी सोच लो.. मैं तलाशी लूँगा तो अच्छे से लूँगा.. फिर ये मत कहना कि यहाँ हाथ मत लगाओ.. वहाँ हाथ मत लगाओ.. तुम्हारे पास अब भी मौका है.. बीच में अगर टोका तो मैं तुरंत यू.एम.सी. बना दूँगा...."

"जी.. मैं कुच्छ नही बोलूँगी... पर आप प्लीज़ केस मत बनाना.." मैं अब थोड़ा खुल कर बोलने लगी थी...

"ठीक है.. मैं देखता हूँ.." कहकर वो मेरे नितंबों पर हाथ फेरने लगा...," एक बात तो है..." उसने बात अधूरी छ्चोड़ दी और मेरे नितंबों की दरार टटोलने लगा.....

मेरे पुर बदन में झुरजुरी सी मचने लगी.. अब मुझे पूरा यकीन हो चला था कि तलाशी सिर्फ़ एक बहाना है.. मेरे बदन से खेलने के लिए...

"मेरी तरफ मुँह करके खड़ी हो जाओ.." उसने कहा और मैं उसकी तरफ घूम गयी... मेरी पकी हुई सी गोल गोल मस्त चूचियाँ अब कुर्सी पर बैठे हुए सर की आँखों से कुच्छ ही उपर थी.. और उसके होंटो से कुच्छ ही दूर...

"एक बात सच सच बतओगि तो मैं तुम्हे माफ़ कर दूँगा..!" सर ने मेरी शर्ट स्कर्ट में से निकालते हुए कहा....

"ज्जी..." मैने आँखें बंद कर ली थी...

"तुम्हे पता है ना कि ये लेटर वाली पर्ची किसने दी है तुम्हे?" उसने मेरी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और मेरे चिकने पेट पर हाथ फेरने लगा..

मैं सिहर उठी.. उसके खुरदारे मोटे हाथ का स्पर्श मुझे अपने पेट पर बहुत कामुक अहसास दे रहा था... मैने आह सी भरकर जवाब दिया," नही सर.. भगवान की कसम..."

"चलो कोई बात नही.. जवानी में ये सब तो होता ही है.. इस उमर में मज़े नही लिए तो कब लॉगी..? ठीक कह रहा हूँ ना...?" उसने बोलते बोलते दूसरा हाथ मेरी स्कर्ट के नीचे से ले जाकर मेरे घुटनो से थोड़ा उपर मेरी जाँघ को कसकर पकड़ लिया....

"जी.. प्लीज़.. जल्दी कर लो ना!" मैने उस'से प्रार्थना की...

"मुझे कोई दिक्कत नही है.. मैं तो इसीलिए धीरे कर रहा हूँ.. ताकि तुम्हे शर्म ना आए.. ऐसा करने से तुम गरम हो रही होगी ना..." सर ने कहा और अपना हाथ एक दम उपर चढ़ा कर कछी के उपर से ही मेरे मांसल नितंबों में से एक को मसल सा दिया...

"आआअहह.." मेरे मुँह से एकदम तेज साँस निकली.. उत्तेजना के मारे मेरा बदन अकड़ने सा लगा था.....

"कैसा लग रहा है.. मतलब कोई दिक्कत तो नही है ना?" उसने नितंब पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली करते हुए कहा...

"जी.. नही..." मैने जवाब दिया.. मेरी टाँगें काँपने सी लगी थी.... यूँ लग रहा था जैसे ज़्यादा देर खड़ी नही रह पाउन्गि....

"अच्च्छा लग रहा है ना.." उसने दूसरे नितंब पर हाथ फेरते हुए पूचछा...

मैने सहमति में सिर हिलाया और थोड़ी आगे होकर उसके और पास आ गयी... मुझे बहुत मज़ा आ रहा था.. सिर्फ़ पेपर की चिंता थी....

अगले ही पल वो अपनी औकात पर आ ही गया.. मेरे नितंब को अपनी हथेली में दबोचे दूसरे हाथ को वो धीरे धीरे पेट से उपर ले जाने लगा..," तुम गजब की हसीन और चिकनी हो.. तुम्हारे जैसी लड़की तो मैने आज तक देखी भी नही... तुम चिंता मत करो.. तुम्हारा हर पेपर अब अच्च्छा होगा... मैं गॅरेंटी देता हूँ... बस. तुम थोड़ा सा मुझे खुश कर दो.. मैं तुम्हारी ऐश कर दूँगा यहाँ.."

"पर.. आज का पेपर सर...?" मैने कसमसाते हुए कहा....

"ओह्हो..मैं कह तो रहा हूँ.. तुम्हे चिंता करने की कोई ज़रूरत नही अब... आज तुम्हे पेपर के बाद एक घंटा दे दूँगा... और किसी अच्छे बच्चे का पेपर भी तुम्हारे सामने रखवा दूँगा... बस.. अब तुम पेपर की बात भूल जाओ थोड़ी देर...." उसने कहा और मेरी कछी के अंदर हथेली डाल कर मेरी दरार को उंगलियों से कुरेद'ने लगा...

मैं मॅन को मिल्ली शांति और तन को मिली इस गुदगुदी से मचल सी उठी.. एक बार मैने अपनी आएडियन उठाई और और आगे हो गयी.. अब उसके चेहरे और मेरी चूचियो के बीच 2 इंच का ही फासला रहा होगा....," अयाया.. थॅंक्स सर.."

"हाए.. कितनी गरम गरम है तू.. मेरी किस्मत में ही थी तू.. तभी मुझे लव लेटर वाली पर्ची हाथ लगी.. वरना तो मैं सपने में भी नही सोच पाता कि यहाँ स्कूल में मुझे तुझ जैसी लौंडिया मिल सकती है... मज़ा आ रहा है ना..?" उसकी भी साँसें सी उखाड़ने लगी थी...

"जी.. आप जी भर कर तलाशी ले लो. बहुत मज़ा आ रहा है...!" मैने भी सिसकी सी लेकर कहा...

मेरे लाइन देते ही उसने झट से अपना हाथ उपर चढ़ा कर मेरे उरोज को पकड़ लिया... मेरी गदराई हुई चूचियाँ हाथ में आते ही वह मचल उठा," वाह.. क्या चीज़ बनाई है तू राम ने... तेरी चूचियाँ तो बड़ी मस्त हैं.. सेब के जैसी... दिल कर रहा है खा जाउ इन्हे..." वह मेरे उरोज के दाने को छेड़ता हुआ बोला.. वो भी अकड़ से गये थे....

मैं अपनी प्रशंसा सुनकर बाग बाग हो गयी.. थोड़ा इतराते हुए मैने आँखें खोल कर उसको देखा और मुस्कुरा दी..

उसने अपना हाथ निकाल कर मेरी कछी को थोड़ा नीचे सरका दिया.. गरम हो चुकी मेरी योनि ठंडी हवा लगते ही तिठुर सी उठी.. अगले ही पल वो अपनी एक उंगली को मेरी योनि की फांकों के बीच ले गया और उपर नीचे करते हुए उसका च्छेद ढूँढने लगा... मैं दहक उठी.. मेरी योनि ने रस बहाना शुरू कर दिया... उतावलेपन और उत्तेजना में मैने 'सर' का सिर पकड़ और अपनी तरफ खींच कर अपनी चूचियो में दबा लिया...

इसी दौरान उसकी उंगली मेरी योनि में उतर गयी.. मैं उच्छल सी पड़ी.. पर योनि ने उसको जल्दी ही अपने अंदर अड्जस्ट कर लिया...

"बहुत टाइट है तेरी 'ये' तो.. पहले कभी किया नही.. लगता है..!" उसने कहा और मेरी शर्ट के उपर वाले दो बटन खोल दिए... मेरी मस्तयि हुई गौरी चूचियाँ तपाक से उपर से छलक सी आई....

मेरी कमीज़ में घुसे हुए उसके हाथ से उसने एक चूची को और उपर खिसका दिया.. और चूची पर जड़े मोती जैसे गुलाबी दाने को कमीज़ से बाहर निकाल लिया.... उसको देखते ही वह पागल सा हो गया," वाह.. इसको कहते हैं चूचक.. कितना प्यारा और रसीला है.." आगे वह कुच्छ ना बोला.. अपने होंटो में उसने मेरे दाने को दबा लिया था और किसी बच्चे की तरह उसको चूसने लगा...

मैं घिघिया उठी... बुरा हाल हो रहा था... उसने अपनी उंगली बाहर निकाली और फिर से अंदर सरका दी... इतना मज़ा आ रहा था कि बयान नही कर सकती... मेरे होश उड़े जा रहे थे.. मैं सब कुच्छ भूल चुकी थी... ये भी कि मैं यहाँ पेपर देने आई हूँ...

उसकी उंगली अब सतसट अंदर बाहर हो रही थी.. मैने अपनी जांघों को और खोल दिया था और जमकर सिसकियाँ लेते हुए आँखें बंद किए आनंद में डूबी रही... वह भी पागलों की भाँति उंगली से रेलाम पेल करता हुआ लगातार मेरे दाने को चूस रहा था.. जैसे ही मेरा इस बार रस निकला.. मैने अपनी जांघें ज़ोर से भींच ली," बस.. सर.. और नही.. अब सहन नही होता मुझसे..."

वह तुरंत हट गया और जल्दबाज़ी सी करता हुआ बोला...," ठीक है.. जल्दी नीचे बैठ जाओ..."

मैं पूरी तरह उसका मतलब नही समझी पर.. जैसे ही उसने कहा.. मैने अपनी कछी ठीक करके शर्ट के बटन बंद किए और नीचे बैठ कर उसकी आँखों में देखने लगी....

उसने झट से अपनी पॅंट की ज़िप खोल कर अपना लिंग मेरी आँखों के सामने निकाल दिया..," लो! इसको पकड़ कर आगे पिछे करो...!"

हाथ में लेने पर उसका लिंग मुझे तरुण जितना ही लंबा और मोटा लगा... मैने खुशी खुशी उसको हिलाना शुरू कर दिया...

"जब मैं कहूँ.. अया.. अपना मुँह.... खोल देना..." उसने सिसकते हुए कहा...

मुझे मम्मी और सुन्दर वाला सीन याद आ गया," मुझे पीना है क्या सर?"

"अरे वाह.. अया.. तू तो बड़ी समझ..दार.. है... अया.. हां.. जल्दी जल्दी कर..." उसकी साँसें उखड़ी हुई थी..

करीब 2 मिनिट के बाद ही वह कुर्सी से सरक कर आगे की ओर झुक गया..," हाआँ... आआआः.. ले.. मुँह खोल..."

मैने अपना मुँह पूरा खोल कर उसके लिंग के सामने कर दिया... उसने झट से अपना सूपड़ा मेरे मुँह में फँसाया और मेरा सर पकड़ लिया..," आआआः... अयाया.. अयाया"

सुन्दर के मुक़ाबले रस ज़्यादा नही निकला था.. पर जितना भी था.. मैने उसकी एक एक बूँद को अपने गले से नीचे उतार लिया... जब तक उसने अपना लिंग बाहर नही निकाला.. मेरे गुलाबी रसीले होन्ट उसके सूपदे को अपनी गिरफ़्त में जकड़े रहे... स्वाद मुझे कुच्छ खास अच्च्छा नही लगा.. पर कुच्छ खास बुरा भी नही था....

कुच्छ देर यूँही झटके खाने के बाद उसका लिंग अपने आप ही मेरे होंटो से बाहर निकल आया... उसको अंदर करके उसने अपनी ज़िप बंद की और अपना मोबाइल निकाल कर फोन मिलाया और बोला," आ जाओ मेडम!"

"तू इस गाँव की नही है ना?" उसने प्यार से पूचछा...

"जी नही.." मैने मुस्कुरकर जवाब दिया.....

"कौन आया है तेरे साथ?"

"जी कोई नही.. अपनी सहेली के साथ आई हूँ...!" मैने जवाब दिया...

"वेरी गुड.. ऐसा करना.. पेपर के बाद यहीं रहकर सारा पेपर कर लेना.. तुझे तो मैं 2 घंटे भी दे दूँगा.. तू तो बड़े काम की चीज़ है यार... अपनी सहेली को जाने के लिए बोल देना.. तुझे मैं अपने आप छ्चोड़ आया करूँगा.. ठीक है ना...?"

"जी.." मैने सहमति में सर हिलाया...

तभी मेडम दरवाजा खोल कर अंदर आ गयी," तलाशी दी या नही.." उसने अजीब से ढंग से सर को देखा और मुस्कुराने लगी...

"ये तो कमाल की लड़की है... बहुत प्यारी है.. ये तो सब कुच्छ दे देगी.. तुम देखना..." सर ने मेडम की और आँख मारी और फिर मेरी तरफ देख कर बोले..," जा! कर ले आराम से पेपर.. और पेपर टाइम के बाद सीधे यहीं आ जाना.. मैं निकाल कर दे दूँगा तुझे वापस.. आराम से सारा पेपर करना... और ये ले.. तेरी पर्ची... इसमें से लिख लेना तब तक.. मैं तुम्हारी क्लास में कहलवा देता हूँ.. तुझे कोई नही रोकेगा अब नकल करने से..." कहकर उसने मेरे गाल थपथपा दिए....

मैं खुश होकर बाहर निकली तो पीयान मुझे अजीब सी नज़रों से घूर रहा था.. पर मैने परवाह नही की और अपने रूम में आ गयी...

"क्या हुआ?" क्लास में टीचर ने पूचछा...

"कुच्छ नही सर.. मान गये वो..." मैने कहा और अपनी सीट पर बैठ गयी.. अब आधा घंटा ही बचा था एग्ज़ॅम ख़तम होने में... मैने जैसे ही अपनी शीट खोली.. मैं चौंक गयी...

मैने संदीप की तरफ देखा.. वो मेरी तरफ ही मुस्कुरा रहा था...

"ये.. ये सब तुमने किया है....?" मैं अचरज से बोली....

"हां.. मेरा पेपर पूरा होने के करीब था.. तुम्हारी शीट यहीं पड़ी थी.. तो मैने तुम्हारा पास होने का जुगाड़ कर दिया..." वो अब भी मुस्कुरा रहा था....

मैने शीट के पन्ने पलट पलट कर देखे.. जितना पेपर उसने मेरा हाल कर दिया था.. उतना तो मैं नकल से 3 घंटे में भी ना कर पाती... मैं अजीब सी नज़रों से उसको देखने लगी.. समझ में ही नही आया की 'थॅंक्स' कैसे बोलूं.....

क्रमशः ..................

raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:21

Uss samay uski baat sunkar main chup ho gayi.. par wo kahte hain na.. hariyali ke andhe ko hamesha hara hi najar aata hai.. Mere pate mein uski di huyi safayi pachi nahi.. bhala ek ladka aur ek ladki sabse alag jakar akele baat kar rahe hon.. aur unmein kuchh 'na' ho.. ye kaise ho sakta hai?.. main baithi baithi yahi soch rahi thi...

Waise bhi Sandeep bahut Smart tha.. lamba kad aur gore chehre par hulki moochh dadhi uss par bahut janchti thi.. ladkiyan usko dekh waise hi aahein bharti thi jaise mujhe dekh kar ladke...

Par Sabhi ka maan'na tha ki wo nihayat hi shareef aur bhala ladka hai.. gaanv bhar mein ye baat chalti thi ki wo kabhi sir utha kar nahi chalta... School mein dekho ya ghar mein.. hamesha uski aankhein kitaabon mein hi gadi rahti thi.. Ladkiyon ki taraf toh wo dhyan deta hi nahi tha.. Shayad isiliye ladkiyan usko door se hi dekh kar aahein bhar leti thi bus... kabhi koyi uske paas mujhe najar nahi aayi.. Sirf aaj, iss tarah Pinky ko chhod kar....

Par kahne se kya hota hai.. yun toh log Tarun ko bhi bahut achchha ladka maante the.. par dekh lo; kya nikla! Mujhe vishvas tha ki Pinky aur Sandeep ke beech koyi lafda to jaroor hai...

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khair.. Exam ke liye bell baji aur hum seating sheet dekh kar apni apni seat par jakar baith gaye... Main exam ko lekar bahut sahmi huyi thi.. English ka paper mere liye tedhi kheer tha.. 3-4 parchiyan banakar le gayi thi.. par bharosa nahi tha usmein se kuchh aayega ya nahi...

Achanak Sandeep hamare kamre mein aaya aur meri barabar wali seat par baith gaya... Meri khushi ka koyi thikana na raha.. 'Agar ye madad kar de toh...' maine socha aur uski taraf mudkar boli," kaisi taiyari hai.... Sandeep?"

"Theek hai.. tumhari?" Usne sharafat se jawab dekar poochha...

"Meri? ... kya bataaun? aaj toh kuchh nahi aata.. main toh pakka fail ho jaaungi aaj ke paper mein..." Maine bura sa Munh banakar kaha...

"Kuchh nahi hota.. relax hokar paper dena... jo question achchhe aate hon.. unka jawab pahle likhna... Examinor par impression banega...All the best!" Usne kaha aur seedha dekhne laga...

"Sirf All the best se kaam nahi chalega..." Main ab uska yun peechha chhodne ko taiyaar nahi thi....

"Matlab?" Usne arthpoorn nigaaahon se meri taraf dekha....

"Kuchh help kar doge na.. pls..." Maine uski taraf pyar bhari muskaan uchhalte huye kaha....

"Mujhe apna paper bhi toh karna hai... baad mein kuchh time bacha toh jaroor..." Usne formality si poori kar di....

"Pls.. help kar dena na... !" Maine bechargi se uski aur dekhte huye yaachna si ki..

Iss'se pahle ki wo koyi jawab deta... kamre mein invigilators aa gaye.. unke aate hi class ekdum chup ho gayi.. Sandeep bhi seedha hokar baith gaya... main man masos kar bhagwan ko yaad karne lagi....

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Paper hath mein aate hi sabke chehre khil gaye.. par mere chehre par toh pahle ki tarah hi 12 baje huye the... main difficult questions ki nakal lekar aayi thi.. par paper aasan aa gaya... Mere liye toh English mein aasan aur mushkil; sab ek jaisa hi tha...

"ab toh khush ho jao... paper bahut easy hai.. aur lengthy bhi nahi..." Mere kaanon mein dheere se Sandeep ki aawaj sunayi di... Maine kuchh bolne ke liye uski aur dekha hi tha ki wah fir se bol pada...

"Meri taraf mat dekho.. 'Sir' ki najron mein aa jaogi..."

Maine apna sir seedha kar ke jhuka liya," Mujhe nahi aata kuchh bhi ismein se..."

Kafi der tak jab usne koyi jawab nahi diya toh maine apni najrein tirchhi karke usko dekha.. wah masti se likhne mein khoya hua tha.. Main roni shakal banakar kabhi question paper ko kabhi answer sheet ko dekhne lagi....

Paper shuru huye kareeb aadha ghanta ho gaya tha aur main front page par apni detail likhne ke alawa kuchh nahi kar payi thi... achanak pichhe se ek parchi aakar mere paas giri... iske sath hi kisi ladke ki hulki si aawaj.. "utha lo.. 10 marks ka hai!"

Maine 'Sir' par ek nigah dali aur unki najar se bachte huye achanak parchi ko uthakar apni kachchhi mein thoos liya....

Mujhe kuchh tasalli huyi.. ki aakhir mera bhi koyi 'kadradaan' kamre mein moujood hai... Maine pichhe dekha.. par sabhi neeche dekh rahe the... samajh mein nahi aaya ki mujh par ye 'ahsaan' kisne kiya hai...

Kuchh der mouke ka intzaar karne ke baad dheere se maine apni skirt ke neeche apni kachchhi mein hath daala aur parchi nikal kar answer sheet mein daba li...

Parchi ko khol kar padhte hi mera matha thanak gaya... Maine kuchh din pahle School mein mile letter ka jikar kiya tha na! kuchh isi tarah ki ashleel baatein usmein likhi huyi thi.... Maine hatash hokar parchi ko palat kar dekha... Shukra tha ek essay type question ka answer tha wahan...

Jyada dhyan na dekar maine fatafat uski nakal utaarni shuru kar di.. par uss din mera luck hi kharaab tha..

Shayad bahar baramade ki khidki mein se kisi ne mujhe aisa karte dekh liya tha... Maine abhi aadha question bhi nahi kiya tha ki achanak bahar se ek 'sir' aaye aur meri answer sheet ko uthakar jhatak diya.. parchi neeche aa giri...

"Ye kya hai?" Unhone gusse se poochha... kareeb 35-40 saal ke aaspaas ki umar hogi unki...

"jj..ji.. pichhe se aayi thi..!" Main saham gayi...

"Kya matlab hai pichhe se aayi thi...? abhi tumhari sheet se nikli hai ya nahi..." Unka lahja bahut hi sakht tha..

main andar tak kaanp gayi..," jji.. par maine kuchh nahi likha.. aap chahe dekh lo..!"

Uss 'Sir' ne mujhe ghoor kar dekha aur parchi uthakar hath mein le li.. thodi der mujhe yun hi upar se neeche dekhte rahne ke baad unhone meri sheet invigilator ko pakda di," Sheet wapas nahi karni hai.. main thodi der mein aakar iska U.M.C. banaunga" Unhone kaha aur parchi hath mein lekar nikal gaye...

Main baithi baithi subakne lagi.. Achanak Sandeep ne kaha," Request kar lo.. nahi toh poora saal khrab ho jayega...!"

Uske kahne par main uthkar 'Sir' ke paas jakar khadi ho gayi," Sir.. pls.. Seat de do... ab nahi karoongi..."

"Ismein main kya kar sakta hoon bhala? .. Board observer ne tumhari sheet chheeni hai.. maine toh tumhe parchi uthate dekh kar bhi ignore kar diya tha.... par ab toh jaisa wo kahenge waisa hi karna padega... Unse request karke dekh lo.. Office mein Principal madam ke paas baithe honge..." Sir ne apni majboori jata di...

"Ji theek hai.." Main kahkar bahar nikali aur office ke saamne pahunch gayi... 'wo' wahin baithe Principal madam ke sath khilkhila rahe the....

Mujhe dekhte hi unhone apna thobda chadha liya," Haan.. kya hai?"

"Jji.. mera saal barbaad ho jayega..." Maine sahme huye swar mein kaha....

"Saal? tumhare teen saal kharab honge.. main tumhara U.M.C. banane ja raha hoon.. Sara saal padhi kyun nahi...?" Uski aawaj uske shareer ki tarah hi bahut bhari thi....

"Sir pls! kuchh bhi kar lo.. par seat de do" Maine yachna ki...

Wah kuchh der tak meri aur dekhta raha.. Mujhe uski najrein seedhi meri chhatiyon mein gadi mahsoos ho rahi thi.. par maine parwah na ki... Main yunhi bechari najron se uske saamne khadi rah kar usko najron se apni jawani ka jaam pite dekhti rahi..

Wah kuchh naram pada... Principal ki aur dekh kar bola," Kya karein madam?"

Principal khilkhila kar boli," ye toh aapko hi dekhna hai Mathur sahab.. waise.. ladki ka badan bhara hua ha... mera matlab poori jawan lag rahi hai.." Usne paini najron se mujhe dekhte huye kaha aur Uski taraf batteesi nikal di...," Ghar wale bhi ladka wadka dekh lenge agar paas ho gayi toh..."

"Theek hai... peon bhej kar seat dilwa do.. main sochta hoon tab tak!" Usne meri jawaniyon ka lutf lete huye kaha...

Mujhe thodi shanti mili... Apni Answer sheett lekar mein apni seat par ja baithi... Par ab karne ko toh kuchh tha nahi.. baithi baithi jitna likha tha.. usko padhne lagi...

Mushkil se 5 minute bhi nahi huye honge.. Class mein peon aakar bola," Uss ladki ko Principal madam bula rahi hain.. jisko abhi sheet mili thi...."

Main ek baar fir mayoos si hokar uthi aur Answer sheet wahin chhod kar office ke bahar chali aayi.. par mujhe na toh Madam hi dikhayi di aur na hi 'Sir'

"Kahan hain madam?" Maine Peon se poochha...

"Andar chali jao.. pichhe baithe honge..." Peon ne kaha....

Maine andar jakar dekha.. Dono Office mein pichhe sofe par sath sath baithe kuchh padh rahe the... Mere andar jate hi Madam ne mujhe ghoor kar dekha," Aa ja.. pahle toh tu mere paas aa...!"

"Ji..", Main madam ke paas jakar najrein jhuka kar khadi ho gayi...

"Ye kya hai?" Madam ne ek parchi mujhe dikha kar table par patak di....

Maine dekha.. Wo wahi parchi thi jo Sir mujhse chheen kar laye the... unhone table par mere saamne uss 'love letter' ko upar karke rakha hua tha....," jji.. mujhe nahi pata kuchh bhi..." Maine sharminda si hokar jawab diya.....

"Achchha.. tujhe ab kuchh bhi nahi pata.. U.M.C. bana doonga tab toh pata chal jayega na...?" Sir ne gusse se kaha....

"JJi.. yye mere paas pichhe se aakar giri thi.. mujhe nahi pata kisne..." Maine dheeme swar mein hadbada kar kaha.....

"Kya naam hai tera?" Madam ne poochha...

"Ji.. Anjali!"

"Ye dekh.. tera hi naam likha hai upar.. aur tu kah rahi hai ki tujhe kuchh nahi pata... aise kitne yaar bana liye hain tune ab se pahle...!" Madam ne taish mein aakar kaha...

Mujhse kuchh bola hi nahi gaya... Main chupchap sir jhukaye khadi rahi...

"Main na kahta tha madam.. Aajkal ladkiyan umar se pahle hi jawaan ho jati hain... ab dekh lo.. Saboot aapke saamne hai!" Sir ne madam ko muskurate huye mujhe dekh kar kaha.. wah meri majboori par chatkhare le raha tha....

"Humm.. aur besharmi ki bhi had hoti hai.. jawan ho gayi toh kya? Hamare time mein toh aisi gandi baaton ka pata hi nahi hota tha iss umar mein.. aur isko dekh lo.. kaise kaise gande letter aate hain iske paas... koun hai tera yaar.. bata!"

"Ji.. mujhe sach mein kuchh nahi pata.. bhagwan ki kasam.." Maine aankhon mein aansoo late huye kaha...

"Ab chhodo madam.. jo karegi wo bharegi.. hamara kya legi...? Iski Sheet mangwa lo.. Main U.M.C. bana deta hoon.. teen saal ke liye baithi rahegi ghar.. aur ye letter bhi toh akhbaar mein dene layak hai...." Sir ne kaha...

"Sir pls.. aisa mat kijiye..!" Maine najrein uthakar Sir ko dekha....Meri aankhein dabdaba gayi.. Par wo abhi bhi meri kameej mein bina bra ke hi tani huyi meri chhatiyon ko ghoor rahe tha.....

"Toh kaisa karoon..?" Usne mujhe dekh kar kaha aur fir madam ki taraf batteesi nikal kar hans diya...

"Dekh lijiye Sir.. ab iski jindagi aur ijjat aapke hi hath mein hai...!" Madam bhi kuchh ajeeb se tareeke se unki aur muskurayi...

"Poochh toh raha hoon.. kya karoon ? ye kuchh bolti hi nahi...." Uski wasna se bhari aankhein lagataar mere badan mein hi gadi huyi thi...

"Sir.. pls.. mujhe maaf kar do.. aayinda nahi karoongi..." Maine apni aawaj ko dheema hi rakha....

"Iski talashi toh le lo ek baar.. kya pata kuchh aur bhi chhupa rakha ho...!" Sir ne madam se kaha....

Talashi ki baat sunte hi mere hosh ud gaye.. jo parchiyan main ghar se bana kar layi thi.. wo abhi bhi meri kachchhi mein hi fansi huyi thi.. mujhe ab yaad aaya....

"Na ji Na.. main kyun loon.. ? ye aapki duty hai.. jo karna ho kariye... Mujhe koyi matlab nahi...!" Madam ne hanste huye jawab diya..

"Main.. Main mard bhala iski talashi kaise le sakta hoon madam... waise bhi ye poori jawaan hai! Mujhe toh ye hath bhi nahi lagane degi..." Bolte huye uski aankhein kabhi mujhe aur kabhi madam ko dekh rahi thi....

"Aisi waisi ladki nahi hai ye.. hazar aashik toh jeb mein rakh kar chalti hogi... Isko koyi fark nahi padega mard ke hathon se... aur mana karti hai toh aapko kya padi hai.. bana dijiye U.M.C. Saboot toh aapke saamne rakha hi hai... Par main talashi nahi loongi Sir!" Madam ne saaf mana kar diya...

"Main Centre ko dekh aati hoon Sir.. tab tak aap..." Madam Muskurakar kahte huye apni baat ko beech mein hi chhod kar uthi aur bahar chali gayi....

Unki baaton se mujhe ahsaas hone laga tha ki Sir ki najar meri jawani par hai.. aur madam bhi iske sath mili huyi hai....

"Ab talashi toh leni hi padegi.. Samajh rahi ho na!" Sir ne meri aankhon mein dekh kar kaha...

Mera time nikla ja raha tha aur unhe masti soojh rahi thi... Main kuchh na boli.. Sirf sir jhuka liya apna....

"Bolo.. jawab do..! ya main U.M.C. bana doon...? Sir ne kaha....

"Jji.. mere paas 2 aur hain.. main nikal kar aa jati hoon abhi..." Maine kasmasa kar kaha....

"Nikalo.. jo kuchh hai ek minute mein nikal do.. yahin!" Sir ne kaha....

Main ek pal ko hichkichayi.. fir kuchh soch kar tichhi huyi aur upar se apni skirt mein hath daal liya... Wo ab bhi meri aur hi dekh raha tha.. Maine aur andar hath lejakar parchiyan nikali aur usko pakda di...

"Hummm... " Usne apni naak ke paas le jakar parchiyon ko Soongha.. Sharm ke mare mera bura haal ho gaya... Kuchh der baad wah fir mujhe ghoorne laga," Aur nikalo..."

"Ji.. aur nahi hai.. ek bhi...!" Maine jawab diya....

"Tum kuchh bhi kahogi aur main vishvas kar loonga... Talashi toh deni hi padegi tumhe...!" Usne banawati se gusse se mujhe ghoora....

"Par Sir.. Aadha time pahle hi nikal chuka hai paper ka...!" Maine darte darte kaha....

"Aaj ke paper ko toh bhool hi jao... Sirf ye dua karo ki tumhare teen saal bach jayein.. Samjhi..." Usne gurrakar kaha...

"Sir pls..." Maine saham kar uski aankhon mein dekha... wah ektak mujhe hi ghoore ja raha tha...

"Tum samajh rahi ho ya nahi.. Talashi toh tumhe deni hi padegi agar tum U.M.C. se bachna chahti ho.... tumhari marji hai.. kaho toh U.M.C. bana doon..." Sir ne iss baar ek ek shabd ko jaise chaba kar kaha....

"Ji..." Mujhe usko talashi dene mein koyi dikkat nahi thi.. Aisi talashi toh School ke teacher jane kitni hi baar le chuke the.. baaton baaton mein.. Sirf mujhe time ki chinta ho rahi thi...

"Kya Ji ji laga rakha hai.. maine toh ab tum par hi chhod diya hai.... tumhi bolo kya karoon.. Talashi loon ya U.M.C. banaoon....?"

"Ji.. Talashi le lo... par pls.. Case mat banana.." Maine yachna si karte huye kaha...

"Wo toh main talashi lene ke baad sochoonga.. Idhar aa jao.. mere paas...!" Sir ne mujhe dusri aur bulaya.....

Main Table ke sath sath chalkar Sir ke paas jakar khadi ho gayi.. Mera chehra ye soch kar hi laal ho gaya tha ki ab wah talashi ke bahane jane kahan kahan hath maarega... Wah mujhe yun ghoor raha tha mano kachcha hi chaba jane ke mood mein ho...

Thoda hichakne ke baad usne meri kamar par hath rakh diya," Ab bhi soch lo.. Main talashi loonga toh achchhe se loonga.. fir ye mat kahna ki yahan hath mat lagao.. wahan hath mat lagao.. tumhare paas ab bhi mouka hai.. beech mein agar toka toh main turant U.M.C. bana doonga...."

"Ji.. main kuchh nahi bolungi... par aap pls Case mat banana.." Main ab thoda khul kar bolne lagi thi...

"Theek hai.. main dekhta hoon.." Kahkar wo mere nitambon par hath ferne laga...," Ek baat toh hai..." Usne baat adhoori chhod di aur mere nitambon ki daraar tatolne laga.....

Mere poore badan mein jhurjhuri si machne lagi.. Ab mujhe poora yakeen ho chala tha ki talashi sirf ek bahana hai.. mere badan se khelne ke liye...

"Meri taraf munh karke khadi ho jao.." Usne kaha aur main uski taraf ghoom gayi... Meri paki huyi si gol gol mast chhatiyon ab kursi par baithe huye Sir ki aankhon se kuchh hi upar thi.. aur uske honton se kuchh hi door...

"Ek baat sach sach bataogi toh main tumhe maaf kar doonga..!" Sir ne meri shirt skirt mein se nikalte huye kaha....

"Jji..." Maine aankhein band kar li thi...

"Tumhe pata hai na ki ye letter wali parchi kisne di hai tumhe?" Usne meri kameej ke andar hath daala aur mere chikne pate par hath ferne laga..

Main sihar uthi.. uske khurdare mote hath ka sparsh mujhe apne pate par bahut kamuk ahsaas de raha tha... Maine aah si bharkar jawab diya," Nahi Sir.. bhagwan ki kasam..."

"Chalo koyi baat nahi.. jawani mein ye sab toh hota hi hai.. iss umar mein maje nahi liye toh kab logi..? theek kah raha hoon na...?" Usne bolte bolte dusra hath meri skirt ke neeche se le jakar mere ghutno se thoda upar meri jangh ko kaskar pakad liya....

"Ji.. pls.. Jaldi kar lo na!" Maine uss'se prarthna ki...

"Mujhe koyi dikkat nahi hai.. main toh isiliye dheere kar raha hoon.. taki tumhe sharm na aaye.. aisa karne se tum garam ho rahi hogi na..." Sir ne kaha aur apna hath ek dum upar chadha kar kachchhi ke upar se hi mere maansal nitambon mein se ek ko masal sa diya...

"aaaaahhh.." Mere munh se ekdum tej saans nikli.. uttejana ke maare mera badan akadne sa laga tha.....

"Kaisa lag raha hai.. matlab koyi dikkat toh nahi hai na?" Usne nitamb par apni pakad thodi dheeli karte huye kaha...

"Ji.. nahi..." Maine jawab diya.. meri taangein kaampne si lagi thi.... yun lag raha tha jaise jyada der khadi nahi rah paaungi....

"achchha lag raha hai na.." Usne dusre nitamb par hath ferte huye poochha...

Maine sahmati mein sir hilaya aur thodi aage hokar uske aur paas aa gayi... Mujhe bahut maja aa raha tha.. sirf paper ki chinta thi....

Agle hi pal wo apni aukaat par aa hi gaya.. Mere nitamb ko apni hatheli mein daboche dusre hath ko wo dheere dheere pate se upar le jane laga..," tum gajab ki haseen aur chikni ho.. tumhare jaisi ladki toh maine aaj tak dekhi bhi nahi... tum chinta mat karo.. tumhara har paper ab achchha hoga... main guarantee deta hoon... bus. tum thoda sa mujhe khush kar do.. main tumhari aish kar doonga yahan.."

"Par.. aaj ka paper sir...?" Maine kasmasate huye kaha....

"ohho..Main kah toh raha hoon.. tumhe chinta karne ki koyi jarurat nahi ab... aaj tumhe paper ke baad ek ghanta de doonga... aur kisi achchhe bachche ka paper bhi tumhare saamne rakhwa doonga... bus.. ab tum paper ki baat bhool jao thodi der...." Usne kaha aur meri kachchhi ke andar hatheli daal kar meri daraar ko ungaliyon se kured'ne laga...

Main mann ko milli shanti aur tan ko mili iss gudgudi se machal si uthi.. ek baar maine apni aediyan uthayi aur aur aage ho gayi.. ab uske chehre aur meri chhatiyon ke beech 2 inch ka hi faasla raha hoga....," Aaaah.. thanx Sir.."

"Haye.. kitni garam garam hai tu.. meri kismat mein hi thi tu.. tabhi mujhe love letter wali parchi hath lagi.. warna toh main sapne mein bhi nahi soch pata ki yahan School mein mujhe tujh jaisi loundiyan mil sakti hai... maja aa raha hai na..?" Uski bhi saansein si ukhadne lagi thi...

"Ji.. aap ji bhar kar talashi le lo. bahut maja aa raha hai...!" Maine bhi siski si lekar kaha...

Mere line dete hi usne jhat se apna hath upar chadha kar mere uroj ko pakad liya... Meri gadrayi huyi chhatiyan hath mein aate hi wah machal utha," Wah.. kya cheej banayi hai tu raam ne... teri choochiyan toh badi mast hain.. Seb ke jaisi... dil kar raha hai kha jaaun inhe..." wah mere uroj ke daane ko chhedta hua bola.. wo bhi akad se gaye the....

Main apni prashansa sunkar baag baag ho gayi.. thoda itraate huye maine aankhein khol kar usko dekha aur muskura di..

Usne apna hath nikal kar meri kachchhi ko thoda neeche sarka diya.. garam ho chuki meri yoni thandi hawa lagte hi thithur si uthi.. agle hi pal wo apni ek ungali ko meri yoni ki faankon ke beech le gaya aur upar neeche karte huye uska chhed dhoondhne laga... Main dahak uthi.. meri yoni ne ras bahana shuru kar diya... utaawalepan aur uttejana mein maine 'Sir' ka sir pakad aur apni taraf kheench kar apni chhatiyon mein daba liya...

Isi douran uski ungali meri yoni mein utar gayi.. main uchhal si padi.. par yoni ne usko jaldi hi apne andar adjust kar liya...

"Bahut tight hai teri 'ye' toh.. pahle kabhi kiya nahi.. lagta hai..!" Usne kaha aur meri shirt ke upar wale do button khol diye... Meri mastayi huyi gouri chhatiyan tapak se upar se chhalak si aayi....

Meri kameej mein ghuse huye uske hath se usne ek chhati ko aur upar khiska diya.. aur chhati par jade moti jaise gulabi daane ko kameej se bahar nikal liya.... usko dekhte hi wah pagal sa ho gaya," Wah.. isko kahte hain choochak.. kitna pyara aur rasila hai.." Aage wah kuchh na bola.. apne honton mein usne mere daane ko daba liya tha aur kisi bachche ki tarah usko choosne laga...

Main ghighiya uthi... bura haal ho raha tha... Usne apni ungali bahar nikali aur fir se andar sarka di... itna maja aa raha tha ki bayan nahi kar sakti... mere hosh ude ja rahe the.. main sab kuchh bhool chuki thi... ye bhi ki main yahan paper dene aayi hoon...

Uski ungali ab satasat andar bahar ho rahi thi.. maine apni jaanghon ko aur khol diya tha aur jamkar siskiyan lete huye aankhein band kiye aanand mein doobi rahi... wah bhi paaglon ki bhanti ungali se relam pale karta hua lagataar mere daane ko choos raha tha.. Jaise hi mera iss baar ras nikla.. maine apni jaanghein jor se bheench li," Bus.. sir.. aur nahi.. ab sahan nahi hota mujhse..."

Wah turant hat gaya aur jaldbazi si karta hua bola...," theek hai.. jaldi neeche baith jao..."

Main poori tarah uska matlab nahi samjhi par.. jaise hi usne kaha.. maine apni kachchhi theek karke shirt ke button band kiye aur neeche baith kar uski aankhon mein dekhne lagi....

Usne jhat se apni pant ki zip khol kar apna ling meri aankhon ke saamne nikal diya..," Lo! isko pakad kar aage pichhe karo...!"

hath mein lene par uska ling mujhe Tarun jitna hi lamba aur mota laga... Maine khushi khushi usko hilana shuru kar diya...

"Jab main kahoon.. aaah.. apna munh.... khol dena..." Usne sisakte huye kaha...

Mujhe Mummy aur Sunder wala scene yaad aa gaya," Mujhe peena hai kya sir?"

"Arey wah.. aaah.. tu toh badi samajh..daaar.. hai... aaah.. haan.. jaldi jaldi kar..." Uski saansein ukhadi huyi thi..

Kareeb 2 minute ke baad hi wah kursi se sarak kar aage ki aur jhuk gaya..," haaan... aaaaah.. le.. munh khol..."

Maine apna munh poora khol kar uske ling ke saamne kar diya... usne jhat se apna supada mere munh mein fansaya aur mera sir pakad liya..," aaaaah... aaaah.. aaaah"

Sunder ke mukable ras jyada nahi nikla tha.. par jitna bhi tha.. maine uski ek ek boond ko apne gale se neeche utaar liya... jab tak usne apna ling bahar nahi nikala.. mere gulabi rasile hont uske supade ko apni giraft mein jakde rahe... swad mujhe kuchh khas achchha nahi laga.. par kuchh khas bura bhi nahi tha....

kuchh der yunhi jhatke khane ke baad uska ling apne aap hi mere honton se bahar nikal aaya... usko andar karke usne apni zip band ki aur apna mobile nikal kar fone milaya aur bola," aa jao madam!"

"Tu iss gaanv ki nahi hai na?" Usne pyar se poochha...

"Ji nahi.." Maine muskurakar jawab diya.....

"Koun aaya hai tere sath?"

"ji koyi nahi.. apni saheli ke sath aayi hoon...!" Maine jawab diya...

"Very good.. aisa karna.. paper ke baad yahin rahkar sara paper kar lena.. tujhe toh main 2 ghante bhi de doonga.. tu toh bade kaam ki cheej hai yaar... apni saheli ko jane ke liye bol dena.. tujhe main apne aap chhod aaya karoonga.. theek hai na...?"

"Ji.." maine sahmati mein sir hilaya...

tabhi madam darwaja khol kar andar aa gayi," talashi di ya nahi.." usne ajeeb se dhang se Sir ko dekha aur muskurane lagi...

"Ye toh kamaal ki ladki hai... bahut pyari hai.. ye toh sab kuchh de degi.. tum dekhna..." Sir ne madam ki aur aankh mari aur fir meri taraf dekh kar bole..," ja! kar le aaram se paper.. aur paper time ke baad seedhe yahin aa jana.. main nikal kar de doonga tujhe wapas.. aaram se sara paper karna... aur ye le.. teri parchi... ismein se likh lena tab tak.. main tumhari class mein kahalwa deta hoon.. tujhe koyi nahi rokega ab nakal karne se..." Kahkar usne mere gaal thapthapa diye....

Main khush hokar bahar nikali toh peon mujhe ajeeb si najron se ghoor raha tha.. par maine parwah nahi ki aur apne room mein aa gayi...

"Kya hua?" class mein teacher ne poochha...

"Kuchh nahi sir.. maan gaye wo..." Maine kaha aur apni seat par baith gayi.. ab aadha ghanta hi bacha tha exam khatam hone mein... Maine jaise hi apni sheet kholi.. main chounk gayi...

Maine Sandeep ki taraf dekha.. wo meri taraf hi muskura raha tha...

"Ye.. ye sab tumne kiya hai....?" Main achraj se boli....

"Haan.. mera paper poora hone ke kareeb tha.. tumhari sheet yahin padi thi.. toh maine tumhara paas hone ka jugad kar diya..." Wo ab bhi muskura raha tha....

Maine sheet ke panne palat palat kar dekhe.. jitna paper usne mera hal kar diya tha.. utna toh main nakal se 3 ghante mein bhi na kar pati... Main ajeeb si najron se usko dekhne lagi.. samajh mein hi nahi aaya ki 'thanx' kaise bolun.....


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:21

बाली उमर की प्यास पार्ट--11

गतांक से आगे.......................

एग्ज़ॅमिनेशन रूम से बाहर निकलते ही पिंकी ने मुझे पकड़ लिया," तेरा पेपर तो हो ही नही पाया होगा यार.. तुझे इतनी देर बाद क्यूँ छ्चोड़ा उन्होने?"

मैने उसकी आँखों में देख एक पल सोचा कि संदीप के किए अहसान के बारे में बताउ या नही," ववो.. वो तो मेरा केस बनाने पर आड़े हुए थे.. बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद ही माने.. बस इसीलिए देर हो गयी..."

तभी सर ऑफीस से बाहर निकल आए.. उन्होने इधर उधर देखा.. सभी जा चुके थे.. हमारे अलावा सिर्फ़ पीयान ही ऑफीस के बाहर बैठा था....

सर अंदर गये और थोड़ी देर बाद मेडम बाहर निकली," कृशन! बाकी कमरों को ताला लगाकर तुम चले जाओ.. हमें अभी टाइम लगेगा..."

"ठीक है मेडम!" पीयान ने कहा और चाबी उठा कर कमरे बंद करने लगा....

"हुम्म.. पर पेपर तो मेरा भी अच्च्छा नही हुआ... चल चलते हैं घर.. रास्ते में बात करेंगे...." पिंकी ने मायूस होकर कहा...

"ववो.. ऐसा कर.. तू जा.. मैं थोड़ी बाद में आऊँगी..." मैं लगे हाथों बाकी बचे पेपर को भी निपटा देना चाहती थी...

"पर क्यूँ? यहाँ क्या करेगी तू?" उसने आँखें सिकोड कर पूचछा....

"ववो.. मेरा टाइम खराब हो गया था ना.. इसीलिए सर मुझे अब थोड़ा सा टाइम देंगे.." मैने उसको आधा सच बता दिया," पर तू किसी को बोलना मत.. सर के उपर बात आ जाएगी नही तो...."

"अच्च्छा!" पिंकी खुश होकर बोली," ये तो अच्छि बात है.. कोई बात नही.. मैं तेरा इंतजार कर लेती हूँ यहीं.. तेरे साथ ही चालूंगी...!"

मैं उसको भेजने के लिए बहाना सोच ही रही थी कि सर एक बार फिर बाहर आ गये.. बाहर आकर मेरी ओर मुस्कुरा कर देखा और इशारे से अपनी और बुलाया..

"... तू जा यार.. मैं आ जाउन्गि!... एक मिनिट.... सर बुला रहे हैं..." मैने पिंकी से कहा और बिना उसका जवाब लिए सर के पास चली गयी.... पिंकी वहीं खड़ी रही...

सर ने अपने होंटो पर जीभ फिराई और पिंकी की ओर देख कर धीरे से बोले," इसको तो भेज दिया होता.. अपने साथ क्यूँ चिपका रखा है...!"

"मैने कहा है सर.. पर वो कह रही है कि मेरे साथ ही जाएगी.. अब बाकी बच्चे भी जा चुके हैं... मैं उसको फिर से बोल के देखती हूँ..." मैने नज़रें झुका कर जवाब दिया...

"हुम्म.. कौन है वो? तेरी क्या लगती है?" सर की आवाज़ में बड़ी मिठास थी अब...

"जी.. मेरी सहेली है.. बहुत अच्छि.." मैने उसकी नज़रों में देखा.. वह पिंकी को ही घूर रहा था...

"किसी को कुच्छ बता तो नही देगी ना..." सर ने मेरी चूचियो को घूरते हुए पूचछा....

यहाँ मेरी ग़लती रह गयी.. मैने समझा कि सर का ये सवाल एग्ज़ॅम टाइम के बाद मुझे पेपर करने देने के बारे में है... वैसे भी मैं यही समझ रही थी कि उनको जो कुच्छ करना था.. वो कर चुके हैं," नही सर! वो तो मेरी बेस्ट फ्रेंड है.. किसी को कुच्छ नही बताएगी..."

मैं कहने के बाद सर की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी... वो चुपचाप खड़े पिंकी की और देखते हुए कुच्छ सोचते रहे..

"सर...!" मैने उन्हे टोक दिया....

"हूंम्म?" वो अब भी मेरे पास खड़े लगातार पिंकी की ओर ही देख रहे थे...

"ववो.. मैं.. कह रही थी कि उसका भी पेपर खराब हुआ है... अगर आप...!" मैं बीच में ही रुक गयी.. ये सोच कर कि समझ तो गये ही होंगे...

"चल ठीक है.. बुला लो... पर देख लो.. तुम्हारे भरोसे पर कर रहा हूँ.. कहीं बाद में..." सर की बात को मैने खुश होकर बीच में ही काट दिया...

"जी.. वो किसी को कुच्छ नही बताएगी.. बुला लाउ उसको?" मैं खुश होकर बोली....

"हां.. ऑफीस में लेकर आ जाओ....!" सर ने कहा और अंदर चले गये....

मैं खुश होकर दौड़ी दौड़ी पिंकी के पास गयी," चल आजा... मैने तेरे लिए भी बात कर ली है... तुझे भी सर पेपर दे देंगे..."

"अच्च्छा.. सच! मज़ा आ जाएगा फिर तो" वा भी सुनकर खुशी से उच्छल पड़ी...

अगले ही पल हम दोनो मेडम और सर के सामने खड़े थे...

"मेडम.. प्लीज़.. आप ऑफीस का ताला लगाकर थोड़ी देर बाहर बैठ जाओ.. मेरा फोन भी लेते जाओ.. अगर कोई फोन आए तो कहना कि वो पेपर्स का बंड्ल लेकर निकल चुके हैं और फोन यहीं भूल गये...!" सर ने मेडम की तरफ अपना मोबाइल बढ़ाते हुए कहा....

"मैं तो बैठ जाउन्गि सर... पर देख लो.. ज़िंदगी भर अब आप मुझे और इस सेंटर को भूल मत जाना... अब मेरे स्कूल के किसी बच्चे का पेपर खराब नही होना चाहिए... सबको खुली छ्छूट मिलेगी ना अब तो....?" मेडम ने शिकायती लहजे में सर को कहा....

सर ने हंसते हुए अपना पूरा जबड़ा ही खोल दिया," हा हा हा.. आप भी कमाल करती हैं मेडम.. ये सेंटर और आपको कभी भूल सकता हूँ क्या? यहाँ तो मुझे तोहफे पर तोहफे मिल रहे हैं....आप बेफिकर रहें... कल से सब बच्चों को 15 मिनिट पहले पेपर मिल जाया करेगा.. और नकल की भी मौज करवा दूँगा..."

"थॅंक्स सर.. मुझे बस यही चाहिए.." मेडम ने मुस्कुरा कर कहा और बाहर निकल कर ऑफीस को ताला लगा दिया.....

"सोफे पर बैठ जाओ आराम से.. डरने की कोई ज़रूरत नही है.. अपना अपना रोल. नंबर. बता दो जल्दी... तुम्हे नही पता मैं कितना बड़ा रिस्क लेकर तुम्हारे लिए ये सब कर रहा हूँ..." सर ने हमारे रूम का बंड्ल खोलते हुए कहा....

पिंकी ने मेरी और देखा और मुस्कुरा दी और फिर सर को क्रितग्य नज़रों से देखते हुए बोली," थॅंक्स सर.."

हम दोनो ने अपने अपने रोल नंबर. सर को बताए और उन्होने हमारी शीट निकाल कर हम दोनो को पकड़ा दी...," किसी इंटेलिजेंट बच्चे का भी रोल नंबर. बता दो.. मैं निकाल कर दे देता हूँ.. जल्दी जल्दी उतार लेना उसमें से..."

"दीपाली" पिंकी के मुँह से निकला.. जबकि मेरे मुँह से संदीप का नाम निकलते निकलते रह गया.. पिंकी ने दीपाली का रोल नंबर. सर को बता दिया...

"हूंम्म.. मिल गया!" सर ने कहा और पेपर लेकर हमारे पास आए और हमारे बीच फंसकर बैठ गये..," ये लो.. जल्दी जल्दी करो!"

पिंकी ने शायद सर की मंशा पर ध्यान नही दिया था... हम दोनो ने सिर के सामने दीपाली का पेपर खोल कर रख लिया और जो क्वेस्चन हम दोनो के रहते थे...उतारने लगे...

करीब पाँच मिनिट ही हुए होंगे.. सर ने अपनी बाहें फैलाकर हम दोनो के कंधों पर रख दी," शाबाश.. जल्दी जल्दी करो..."

"तुम्हारा क्या नाम है बेटी?" सिर ने पिंकी की ओर देख कर पूचछा....

"जी..? पिंकी!" पिंकी जल्दी जल्दी लिखते हुए बोली....

"बहुत प्यारा नाम है.. अंजलि को तो सब पता ही है.. तुम भी अब किसी पेपर की चिंता मत करना.. सब ऐसे ही करवा दूँगा.. खुश हो ना?" सर पिंकी की कमर पर हाथ फेरने लगे...

मेरा ध्यान रह रह कर पिंकी पर जा रहा था.. मुझे तरुण की ठुकाई याद आ रही थी... ये सोचकर मैं डरी हुई थी.. कहीं सर पिंकी पर हाथ सॉफ करने के बारे में ना सोचने लगे हों... 'ऐसा होगा तो आज बहुत बुरा होगा..' मैं मंन ही मंन सोच रही थी.. पर कहती भी तो मैं किसको क्या कहती... मेरी एक आँख अपना पेपर करने पर.. और दूसरी पिंकी के चेहरे पर बनी रही....

"तुम अब जवान हो गयी हो बेटी.. चुननी डाला करो ना.. ऐसा अच्च्छा नही लगता ना.. देखो.. बाहर से ही सॉफ दिख रहे हैं...!" सर की इस बात पर पिंकी सहम सी गयी.. पर शायद अपना पेपर पूरा करने का लालच उसके मंन में भी था..

"ववो.. मैने आज अंजलि को दे दी सर..." पिंकी ने हड़बड़ा कर कहा....

"ओह.. हां.. इसकी तो और भी बड़ी बड़ी और मस्त हैं.. पर इसको अपनी लानी चाहिए.. देखो ना.. तुम्हारी भी तो कैसे चौंछ उठाए खड़ी हैं.. तुम ब्रा भी नही पहनती हो.. है ना?"

सर की बात सुनकर पिंकी का चेहरा सच में ही गुलाबी सा हो गया.. अब शायद उसके मंन में भी सर की बातें सुन कर घंटियाँ सी बजने लगी थी... मुझे डर था की ये घंटियाँ घंताल बनकर सर के सिर पर ना बजने लग जायें... अभी तो 5 पेपर बाकी थे....

पिंकी बोली तो कुच्छ नही पर सरक कर 'सर' से थोड़ा दूर हो गयी..

"नही पहनती हो ना ब्रा?" सर ने उस'से फिर पूचछा...," अंजलि भी नही पहनती.. तुम भी नही.. क्या बात है यार!"

अंजलि इस बार थोड़ा सा खिज कर बोली," वो.. मम्मी लाकर ही नही देती.. कहती हैं अभी तुम बच्ची हो...!" और अपना पेपर करती रही...

"मम्मी के लिए तो तुम शादी के बाद भी बच्ची ही रहोगी बेटी.. हे हे हे.." सर अपनी जांघों के बीच तनाव को कम करने के लिए 'वहाँ' खुजाते हुए बोले," पर तुम बताया करो ना.. तुम तो अब पूरी जवान हो गयी हो.. लड़कों का दिल मचल जाता होगा इन्हे यूँ फड़कते देख कर.. पर तुम्हारा भी क्या कुसूर है.. ये उमर ही मज़े लेने और देने की होती है.." सर ने कहने के बाद अचानक अपना हाथ पिंकी की जांघों पर रख दिया..

पिंकी कसमसा उठी," सर.. प्लीज़!"

"करो ना.. तुम आराम से पेपर करो.. मैं तुम्हारे लिए ही तो बैठा हूँ यहाँ.. चिंता की कोई बात नही.." सर ने उसको याद दिलाने की कोशिश की कि वो हम पर कितना 'बड़ा' अहसान कर रहे हैं... उन्होने अपना हाथ पिंकी की जाँघ से नही हटाया...

पिंकी के चेहरे से मुझे सॉफ लग रहा था कि वो पूरी तरह विचलित हो चुकी है.. पर शायद पेपर करने का लालच; या फिर उनकी उमर; या फिर दोनो ही कारण थे कि वह चुप बैठी अब भी लिख रही थी...

सर ने अचानक मेरे हाथ के नीचे से अपना हाथ निकाला और मेरा दायां स्तन अपनी हथेली में ले लिया.. मैने घबराकर पिंकी की ओर देखा.. कि कहीं उसके साथ भी ऐसा ही तो नही कर दिया.. पर अब तक गनीमत था कि उन्होने ऐसा नही किया था... वह हड़बड़ाई हुई जल्दी जल्दी लिखती चली जा रही थी....

सर ने अचानक अपने हाथ से उसकी जांघों के बीच जाने क्या 'छेड़' दिया.. पिंकी उच्छल कर खड़ी हो गयी.. मैने घबराकर उनका हाथ अपनी छाती से हटाने की कोशिश की.. पर उन्होने 'उसको' नही छ्चोड़ा...

"क्या हो गया बेटी? इतनी घबरा क्यूँ रही हो? आराम से पेपर करती रहो ना.. ये देखो.. अंजलि कितने आराम से कर रही है.." सर निसचिंत बैठे हुए थे.. ये सोच कर की मेरी 'सहेली' है.. मेरे ही जैसी होगी...

पिंकी ने मेरी और देखा और शर्म से अपनी आँखें झुका ली.. उसने मेरी छाती को 'सर' के हाथों में देख लिया था.. मैं चाहकर भी उनका हाथ 'वहाँ' से हटा नही पाई...

पिंकी का चेहरा तमतमाया हुआ था..," मुझे नही करना पेपर.. दरवाजा खुलवा दो.. मुझे जाना है...!"

तब तक मेरा भी पेपर पूरा ही हो गया था.. मैने भी अपनी आन्सर शीट बंद करके टेबल पर रख दी...," हो गया सर.. जाने दो हमें...!"

सर गुर्राते हुए बोले," अच्च्छा.. पेपर हो गया तो जाने दो.. हमें नही करना पेपर.. वा! मैं क्या चूतिया हूँ जो इतना बड़ा रिस्क ले रहा हूँ..!"

जैसे ही मैं खड़ी हुई.. सर ने मेरी कमर को पकड़ कर मुझे अपनी गोद में बैठा लिया...

मैने पिंकी के कारण गुस्सा सा होने का दिखावा किया...," ये सब क्या है सर.. छ्चोड़ दो मुझे!" मैं उनकी पकड़ से आज़ाद होने को च्चटपताई...

"अच्च्छा! साली.. दिन में तो तुझे ये भी पता था कि रस कैसे पीते हैं लौदे का.. अब तेरा काम निकल गया तो पूच्छ रही है.. ये सब क्या है...! तुम क्या सोच रही हो? मैं तुम्हे यूँही थोड़े जाने दूँगा.. बाकी के दिन तुम्हारी मर्ज़ी.. पर आज तो अपनी फीस लेकर ही रहूँगा...." मुझे ज़बरदस्ती गोद में ही पकड़े सर मेरी चूचियो को शर्ट के उपर से ही मसल्ने लगे.....

पिंकी बहुत डरी हुई थी.. शायद वो भी घर में ही शेर थी.. सर के सामने वो खड़ी खड़ी काँपने लगी थी...

मैं कुच्छ बोल नही पा रही थी... पर सच में मुझे बिल्कुल भी अच्च्छा नही लग रहा था उस समय.. पिंकी के कारण!

"अभी तो एक ही पेपर हुआ है.. 5 तो बाकी हैं ना.. सेंटर में इतनी सख्तयि कर दूँगा कि एक दूसरे से भी कुच्छ पूच्छ नही सकोगी.. देखता हूँ तुम जैसी लड़कियाँ कैसे पास होती हैं फिर...." सर ने गुर्राते हुए धमकी दी और मेरी कमीज़ के अंदर हाथ डाल कर मेरी चूचियो को मसल्ने लगे...

उनकी इस धमकी का पिंकी पर क्या असर हुआ.. ये तो मैं समझ नही पाई.. पर खुद मैं एकदम ढीली हो गयी.. और उनका विरोध करना छ्चोड़ दिया.. मैं मजबूर होकर पिंकी को देखने लगी... वो खड़ी खड़ी रो रही थी....

"हमें जाने दो सर.. प्लीज़.. मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ... आप कुच्छ भी कर लेना.. पर हमें अभी जाने दो.." पिंकी सुबक्ती हुई बोली....

"चुप चाप खड़ी रह वहाँ.. मैने नही बुलाया था तुम्हे अंदर.. तुम्हारी ये 'छमियिया' लेकर आई थी.. और मैं तुम्हे कुच्छ कह भी नही रहा.. अब ज़्यादा बकवास मत करो और चुपचाप तमाशा देखो..." सर ने कहा और मुझे खड़ा कर दिया... पिंकी की सूरत देख मेरी भी आँखों में आँसू आ गये..

सर आगे हाथ लाकर मेरी स्कर्ट का हुक खोलने लगे.. मैने पिंकी को दिखाने के लिए उनका हाथ पकड़ लिया..," छ्चोड़ दो ना सर! प्लीज़"

"बहुत प्ल्ज़ सुन ली तेरी.. अब चुपचाप मेरी प्लीज़ सुन ले.. ज़्यादा बोली तो पता है ना.." उन्होने कहा और झटके के साथ हुक खोल कर स्कर्ट को नीचे सरका दिया... पिंकी जैसी लड़की के सामने इस तरह खुद को नंगी होते देख मेरी आँखें एक बार फिर डॅब्डबॉ गयी... मैं अब नीचे सिर्फ़ कछी में खड़ी थी... और अगले ही पल कछी भी नीचे सरक गयी.. मेरे नंगे नितंब अब 'सर' की आँखों के सामने थे.. और योनि 'पिंकी' के सामने.. पर पिंकी ने इस हालत में मुझे देखते ही अपनी आँखें झुका ली और सुबक्ती रही.....

"अया.. क्या माल है तू भी लौंडिया!.. चूतड़ तो देखो! कितने मस्त और टाइट हैं.. एक दम गोल गोल... पके हुए खरबूजे की तरह..." सर ने मेरे नितंबों पर थपकी सी मारने के बाद उनको अलग अलग करने की कोशिश करते हुए कहा..," हाए.. बिल्कुल एक नंबर. का माल है...कितनी चिकनी चूत है तेरी... मैने तो सपने में भी नही सोचा था कि इंडिया में भी ऐसी चूते मिल जाएँगी... क्या इंपोर्टेड पीस है यार..."

पिंकी का रो रो कर बुरा हाल हो रहा था.. पर उसकी सुन'ने वाला वहाँ था कौन.. उसने अपना चेहरा दूसरी और घुमा लिया...

"चल.. टेबल पर झुक जा.. पहले तेरा रस पी लूँ..." सिर ने कहते हुए मेरी कमर पर हाथ रख कर आगे को दबा दिया... ना चाहते हुए भी मुझे झुकना पड़ा... मैने अपनी कोहनियाँ टेबल पर टीका ली....

"हां.. ऐसे.. शाबाश.. अब टाँग चौड़ी करके अपने चूतड़ पिछे निकल ले..!" सर ने उत्तेजित स्वर में कहा....

उसकी बात समझने में मुझे ज़्यादा परेशानी नही हुई.. अब पिंकी के सामने मेरी जो मिट्टी पलीत होनी थी.. वह तो हो ही चुकी थी.... मैं अब जल्द से जल्द उसको निपटाने की सोच रही थी.. मैने अपनी कमर को झुकाया और अपनी जांघें खोलते हुए अपने नितंबों को पिछे धकेल सा दिया... मेरी योनि अब लगभग बाहर की ओर निकल चुकी होगी....

"ओये होये.. मा कसम.. क्या चूत है तेरी.. दिल करता है इसको तो मैं काट कर अपने साथ ही ले जाउ!" कहकर उसने सिसकते हुए मेरे नितंबों को अपने दोनो हाथों में पकड़ा और अपनी जीभ निकाल कर एक ही बार में योनि को नीचे से उपर तक चाट गया.. मेरी सिसकी निकल गयी....

"देखा.. कितना मज़ा आया ना? इसको भी समझा.. ये भी थोड़े मज़े लेना सीख ले मुझसे.. जवानी चार दिन की होती है.. फिर पछ्तायेगि नही तो... " सर ने कहने के बाद एक बार और जीभ लपलपते हुए मेरी योनि की फांकों में खलबली मचाई और फिर बोले," कह दे ना इसको.. दो मैं तो अलग ही मज़ा आएगा.. बोल दे इसको.. मौज कर दूँगा ससूरी की.. मेरिट ना आए तो कहना..."

मैं कुच्छ ना बोली... मैं क्या बोलती..? मेरा बुरा हाल हो चुका था.. अब लगातार नागिन की तरह मेरी योनि में लहरा रही उसकी जीभ से मैं बेकाबू हो चुकी थी.. अपने आपको सिसकियाँ भरने से भी नही रोक पा रही थी...,"अया... सर्ररर... आआआः..."

"पगली.. सर की हालत भी तेरी ही तरह हो चुकी है.. कुच्छ मत बोल अब... अब तो मुझे घुसने दे जल्दी से!" बोल कर वह खड़ा हो गया...

मैं आँखें बंद किए सिसकियाँ लेती हुई मस्ती में खड़ी थी.. अचानक मुझे अपनी योनि की फांकों के बीच कुच्छ गड़ता हुआ महसूस हुआ.. समझ में आते ही मैं हड़बड़ा गयी और इसी हड़बड़ाहट में टेबल पर गिर गयी...

"अया.. ऐसे मत तडपा अब... बिल्कुल आराम से अंदर करूँगा.. मा कसम.. पता भी नही लगने दूँगा तुझे... तेरी तो वैसे भी इतनी चिकनी है कि सर्ररर से जाएगा.. आजा अंजू आजाआअ!" पगलाए हुए से सर ने मुझे कमर से पकड़ कर ज़बरदस्ती फिर से वैसे ही करने की कोशिश की... पर इस बार मैं अड़ गयी...

"नही सर.. ये नही!" मैने एक दम से सीधी खड़ी होकर कहा....

"ये क्यूँ नही मेरी जान... ये ही तो लेना है.. एक बार थोड़ा सा दर्द होगा और फिर देखना... चल आजा.. जल्दी से आजा... टाइम वेस्ट मत कर अब!" सर ने अपने लिंग को हाथ में लेकर हिलाते हुए कहा....

"नही सर.. अब बहुत हो गया.. जाने दो हमें.." मैं अकड़ सी गयी...

"ज़्यादा बकबक की तो साली की गांद में घुसेड दूँगा ये.. नौ सौ चूहे खाकर अब बिल्ली हज को जाएगी... चुपचाप मान जा वरना अपनी सहेली को बोल के चूस देगी थोड़ा सा... फिर मैं मान जाउन्गा..." सर ने कहा...

अजीब उलझन में आ फाँसी थी मैं... अगर घुस्वा लेती तो फिर मा बन'ने का डर.. पिंकी को बोलती तो बोलती कैसे? वो पहले ही मुझे कोस रही होगी... अचानक सर मेरी तरफ लपके तो मेरे मुँह से घबराहट में निकल ही गया," पिंकी.. प्लीज़..."

पिंकी ने मेरी तरफ घूर कर घृणा से देखा.. और फिर अपना चेहरा दीवार की तरफ कर लिया...

सर अब ज़्यादा मौके देने के मूड में नही थे.. उन्होने ज़बरदस्ती मुझे पकड़ कर सोफे पर गिरा लिया और मेरी टाँगें पकड़ कर दूर दूर फैला दी.. इसके साथ ही मेरी योनि की फाँकें अलग अलग होकर सर को आक्रमण के लिए आमंत्रित करने लगी...

सर ने जैसे ही घुटने सोफे पर रखे.. मैं दर्दनाक ढंग से बिलख पड़ी," पिनकयययी.. प्लीज़.. बचा ले मुझे...!"

सर ने मेरे आह्वान पर मुड़कर पिंकी को देखा तो मेरी भी नज़र उसी पर चली गयी.. पर वह चुपचाप खड़ी रही....

"ऐसी सहेलियाँ बनाती ही क्यूँ है जो तेरे सामने खड़ी होकर भी तेरी सील टूट'ते देखती रहें... ये किसी काम की नही है.. तुझे चुदना ही पड़ेगा आज..." सर ने कहा और मेरी जांघों को फैलाकर फिर से मुझ पर झुकने लगे.. मैं बिलख रही थी.. पर वो 'कहाँ' सुनते? उन्होने वापस अपना लिंग मेरी योनि पर टीकाया ही था कि अचानक खड़े हो कर पलट गये...

"क्या करना है सर?" पिंकी आँखें बंद किए उनके पास खड़ी थी.. और उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी......

क्रमशः ..................