बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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बाली उमर की प्यास compleet

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:04

बाली उमर की प्यास



हाई, मैं अंजलि...! खैर छ्चोड़ो! नाम में क्या रखा है? छिछोरे लड़कों को वैसे भी नाम से ज़्यादा 'काम' से मतलब रहता है. इसीलिए सिर्फ़ 'काम' की ही बातें करूँगी.

मैं आज 18 की हो गयी हूँ. कुच्छ बरस पहले तक में बिल्कुल 'फ्लॅट' थी.. आगे से भी.. और पिछे से भी. पर स्कूल बस में आते जाते; लड़कों के कंधों की रगड़ खा खा कर मुझे पता ही नही चला की कब मेरे कुल्हों और छातियो पर चर्बी चढ़ गयी.. बाली उमर में ही मेरे नितंब बीच से एक फाँक निकाले हुए गोल तरबूज की तरह उभर गये. मेरी छाती पर भगवान के दिए दो अनमोल 'फल' भी अब 'अमरूदों' से बढ़कर मोटी मोटी 'सेबों' जैसे हो गये थे. मैं कयि बार बाथरूम में नंगी होकर अचरज से उन्हे देखा करती थी.. छ्छू कर.. दबा कर.. मसल कर. मुझे ऐसा करते हुए अजीब सा आनंद आता .. 'वहाँ भी.. और नीचे भी.

मेरे गोरे चिट बदन पर उस छ्होटी सी खास जगह को छ्चोड़कर कहीं बालों का नामो-निशान तक नही था.. हुलके हुलके मेरी बगल में भी थे. उसके अलावा गर्दन से लेकर पैरों तक मैं एकद्ूम चिकनी थी. क्लास के लड़कों को ललचाई नज़रों से अपनी छाती पर झूल रहे 'सेबों' को घूरते देख मेरी जांघों के बीच छिपि बैठी हुल्के हुल्के बालों वाली, मगर चिकनाहट से भरी तितली के पंख फड़फड़ने लगते और चूचियो पर गुलाबी रंगत के 'अनार दाने' तन कर खड़े हो जाते. पर मुझे कोई फरक नही पड़ा. हां, कभी कभार शर्म आ जाती थी. ये भी नही आती अगर मम्मी ने नही बोला होता,"अब तू बड़ी हो गयी है अंजू.. ब्रा डालनी शुरू कर दे और चुन्नी भी लिया कर!"

सच कहूँ तो मुझे अपने उन्मुक्त उरजों को किसी मर्यादा में बाँध कर रखना कभी नही सुहाया और ना ही उनको चुन्नी से पर्दे में रखना. मौका मिलते ही मैं ब्रा को जानबूझ कर बाथरूम की खूँटि पर ही टाँग जाती और क्लास में मनचले लड़कों को अपने इर्द गिर्द मंडराते देख मज़े लेती.. मैं अक्सर जान बूझ अपने हाथ उपर उठा अंगड़ाई सी लेती और मेरी चूचिया तन कर झूलने सी लगती. उस वक़्त मेरे सामने खड़े लड़कों की हालत खराब हो जाती... कुच्छ तो अपने होंटो पर ऐसे जीभ फेरने लगते मानो मौका मिलते ही मुझे नोच डालेंगे. क्लास की सब लड़कियाँ मुझसे जलने लगी.. हालाँकि 'वो' सब उनके पास भी था.. पर मेरे जैसा नही..

मैं पढ़ाई में बिल्कुल भी अच्छि नही थी पर सभी मेल-टीचर्स का 'पूरा प्यार' मुझे मिलता था. ये उनका प्यार ही तो था कि होम-वर्क ना करके ले जाने पर भी वो मुस्कुरकर बिना कुच्छ कहे चुपचाप कॉपी बंद करके मुझे पकड़ा देते.. बाकी सब की पिटाई होती. पर हां, वो मेरे पढ़ाई में ध्यान ना देने का हर्जाना वसूल करना कभी नही भूलते थे. जिस किसी का भी खाली पीरियड निकल आता; किसी ना किसी बहाने से मुझे स्टॅफरुम में बुला ही लेते. मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर मसल्ते हुए मुझे समझाते रहते. कमर से चिपका हुआ उनका दूसरा हाथ धीरे धीरे फिसलता हुआ मेरे नितंबों पर आ टिकता. मुझे पढ़ाई पर 'और ज़्यादा' ध्यान देने को कहते हुए वो मेरे नितंबों पर हल्की हल्की चपत लगते हुए मेरे नितंबों की थिरकन का मज़ा लूट'ते रहते.. मुझे पढ़ाई के फ़ायडे गिनवाते हुए अक्सर वो 'भावुक' हो जाते थे, और चपत लगाना भूल नितंबों पर ही हाथ जमा लेते. कभी कभी तो उनकी उंगलियाँ स्कर्ट के उपर से ही मेरी 'दरार' की गहराई मापने की कोशिश करने लगती...

उनका ध्यान हर वक़्त उनकी थपकीयों के कारण लगातार थिरकति रहती मेरी चूचियो पर ही होता था.. पर किसी ने कभी 'उन्न' पर झपट्टा नही मारा. शायद 'वो' ये सोचते होंगे कि कहीं में बिदक ना जाऊं.. पर मैं उनको कभी चाहकर भी नही बता पाई की मुझे ऐसा करवाते हुए मीठी-मीठी खुजली होती है और बहुत आनंद आता है...

हां! एक बात मैं कभी नही भूल पाउन्गि.. मेरे हिस्टरी वाले सर का हाथ ऐसे ही समझाते हुए एक दिन कमर से नही, मेरे घुटनो से चलना शुरू हुआ.. और धीरे धीरे मेरी स्कर्ट के अंदर घुस गया. अपनी केले के तने जैसी लंबी गोरी और चिकनी जांघों पर उनके 'काँपते' हुए हाथ को महसूस करके मैं मचल उठी थी... खुशी के मारे मैने आँखें बंद करके अपनी जांघें खोल दी और उनके हाथ को मेरी जांघों के बीच में उपर चढ़ता हुआ महसूस करने लगी.. अचानक मेरी फूल जैसी नाज़ुक योनि से पानी सा टपकने लगा..

अचानक उन्होने मेरी जांघों में बुरी तरह फँसी हुई 'निक्कर' के अंदर उंगली घुसा दी.. पर हड़बड़ी और जल्दबाज़ी में ग़लती से उनकी उंगली सीधी मेरी चिकनी होकर टपक रही योनि की मोटी मोटी फांकों के बीच घुस गयी.. मैं दर्द से तिलमिला उठी.. अचानक हुए इस प्रहार को मैं सहन नही कर पाई. छटपटाते हुए मैने अपने आपको उनसे छुड़ाया और दीवार की तरफ मुँह फेर कर खड़ी हो गयी... मेरी आँखें दबदबा गयी थी..

मैं इस सारी प्रक्रिया के 'प्यार से' फिर शुरू होने का इंतजार कर ही रही थी कि 'वो' मास्टर मेरे आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया,"प्लीज़ अंजलि.. मुझसे ग़लती हो गयी.. मैं बहक गया था... किसी से कुच्छ मत कहना.. मेरी नौकरी का सवाल है...!" इस'से पहले मैं कुच्छ बोलने की हिम्मत जुटाती; बिना मतलब की बकबक करता हुआ वो स्टॅफरुम से भाग गया.. मुझे तड़पति छ्चोड़कर..

निगोडी 'उंगली' ने मेरे यौवन को इस कदर भड़काया की मैं अपने जलवों से लड़कों के दिलों में आग लगाना भूल अपनी नन्ही सी फुदकट्ी योनि की प्यास बुझाने की जुगत में रहने लगी. इसके लिए मैने अपने अंग-प्रदर्शन अभियान को और तेज कर दिया. अंजान सी बनकर, खुजली करने के बहाने मैं बेंच पर बैठी हुई स्कर्ट में हाथ डाल उसको जांघों तक उपर खिसका लेती और क्लास में लड़कों की सीटियाँ बजने लगती. अब पूरे दिन लड़कों की बातों का केन्द्र मैं ही रहने लगी. आज अहसास होता है कि योनि में एक बार और मर्दानी उंगली करवाने के चक्कर में मैं कितनी बदनाम हो गयी थी.

खैर; मेरा 'काम' जल्द ही बन जाता अगर 'वो' (जो कोई भी था) मेरे बॅग में निहायत ही अश्लील लेटर डालने से पहले मुझे बता देता. काश लेटर मेरे क्षोटू भैया से पहले मुझे मिल जाता! 'गधे' ने लेटर सीधा मेरे शराबी पापा को पकड़ा दिया और रात को नशे में धुत्त होकर पापा मुझे अपने सामने खड़ी करके लेटर पढ़ने लगे:

" हाई जाने-मन!

क्या खाती हो यार? इतनी मस्त होती जा रही हो कि सारे लड़कों को अपना दीवाना बना के रख दिया. तुम्हारी 'पपीते' जैसे चून्चियो ने हमें पहले ही पागल बना रखा था, अब अपनी गौरी चिकनी जांघें दिखा दिखा कर क्या हमारी जान लेने का इरादा है? ऐसे ही चलता रहा तो तुम अपने साथ 'इस' साल एग्ज़ॅम में सब लड़कों को भी ले डुबगी..

पर मुझे तुमसे कोई गिला नही है. तुम्हारी मस्तानी चून्चिया देखकर मैं धन्य हो जाता था; अब नंगी चिकनी जांघें देखकर तो जैसे अमर ही हो गया हूँ. फिर पास या फेल होने की परवाह किसे है अगर रोज तुम्हारे अंगों के दर्शन होते रहें. एक रिक्वेस्ट है, प्लीज़ मान लेना! स्कर्ट को थोड़ा सा और उपर कर दिया करो ताकि मैं तुम्हारी गीली 'कcचि' का रंग देख सकूँ. स्कूल के बाथरूम में जाकर तुम्हारी कल्पना करते हुए अपने लंड को हिलाता हूँ तो बार बार यही सवाल मंन में उभरता रहता है कि 'कच्च्ची' का रंग क्या होगा.. इस वजह से मेरे लंड का रस निकलने में देरी हो जाती है और क्लास में टीचर्स की सुन'नि पड़ती है... प्लीज़, ये बात आगे से याद रखना!

तुम्हारी कसम जाने-मन, अब तो मेरे सपनो में भी प्रियंका चोपड़ा की जगह नंगी होकर तुम ही आने लगी हो. 'वो' तो अब मुझे तुम्हारे सामने कुच्छ भी नही लगती. सोने से पहले 2 बार ख़यालों में तुम्हे पूरी नंगी करके चोद'ते हुए अपने लंड का रस निकलता हूँ, फिर भी सुबह मेरा 'कच्च्छा' गीला मिलता है. फिर सुबह बिस्तेर से उठने से पहले तुम्हे एक बार ज़रूर याद करता हूँ.

मैने सुना है कि लड़कियों में चुदाई की भूख लड़कों से भी ज़्यादा होती है. तुम्हारे अंदर भी होगी ना? वैसे तो तुम्हारी चुदाई करने के लिए सभी अपने लंड को तेल लगाए फिरते हैं; पर तुम्हारी कसम जानेमन, मैं तुम्हे सबसे ज़्यादा प्यार करता हूँ, असली वाला. किसी और के बहकावे में मत आना, ज़्यादातर लड़के चोद्ते हुए पागल हो जाते हैं. वो तुम्हारी कुँवारी चूत को एकद्ूम फाड़ डालेंगे. पर मैं सब कुच्छ 'प्यार से करूँगा.. तुम्हारी कसम. पहले उंगली से तुम्हारी चूत को थोड़ी सी खोलूँगा और चाट चाट कर अंदर बाहर से पूरी तरह गीली कर दूँगा.. फिर धीरे धीरे लंड अंदर करने की कोशिश करूँगा, तुमने खुशी खुशी ले लिया तो ठीक, वरना छ्चोड़ दूँगा.. तुम्हारी कसम जानेमन.

अगर तुमने अपनी छुदाई करवाने का मूड बना लिया हो तो कल अपना लाल रुमाल लेकर आना और उसको रिसेस में अपने बेंच पर छ्चोड़ देना. फिर मैं बताउन्गा कि कब कहाँ और कैसे मिलना है!

प्लीज़ जान, एक बार सेवा का मौका ज़रूर देना. तुम हमेशा याद रखोगी और रोज रोज चुदाई करवाने की सोचोगी, मेरा दावा है.

तुम्हारा आशिक़!

लेटर में शुद्ध 'कामरस' की बातें पढ़ते पढ़ते पापा का नशा कब काफूर हो गया, शायद उन्हे भी अहसास नही हुआ. सिर्फ़ इसीलिए शायद मैं उस रात कुँवारी रह गयी. वरना वो मेरे साथ भी वैसा ही करते जैसा उन्होने बड़ी दीदी 'निम्मो' के साथ कुच्छ साल पहले किया था.

मैं तो खैर उस वक़्त छ्होटी सी थी. दीदी ने ही बताया था. सुनी सुनाई बता रही हूँ. विस्वास हो तो ठीक वरना मेरा क्या चाट लोगे?

पापा निम्मो को बालों से पकड़कर घसीट'ते हुए उपर लाए थे. शराब पीने के बाद पापा से उलझने की हिम्मत घर में कोई नही करता. मम्मी खड़ी खड़ी तमाशा देखती रही. बॉल पकड़ कर 5-7 करारे झापड़ निम्मों को मारे और उसकी गर्दन को दबोच लिया. फिर जाने उनके मंन में क्या ख़याल आया; बोले," सज़ा भी वैसी ही होनी चाहिए जैसी ग़लती हो!" दीदी के कमीज़ को दोनो हाथों से गले से पकड़ा और एक ही झटके में तार तार कर डाला; कमीज़ को भी और दीदी की 'इज़्ज़त' को भी. दीदी के मेरी तरह मस्ताये हुए गोल गोल कबूतर जो थोड़े बहुत उसके समीज़ ने छुपा रखे थे; अगले झटके के बाद वो भी छुपे नही रहे. दीदी बताती हैं कि पापा के सामने 'उनको' फड़कते देख उन्हे खूब शरम आई थी. उन्होने अपने हाथों से 'उन्हे' छिपाने की कोशिश की तो पापा ने 'टीचर्स' की तरह उसको हाथ उपर करने का आदेश दे दिया.. 'टीचर्स' की बात पर एक और बात याद आ गयी, पर वो बाद में सुनाउन्गि....

हाँ तो मैं बता रही थी.. हां.. तो दीदी के दोनो संतरे हाथ उपर करते ही और भी तन कर खड़े हो गये. जैसे उनको शर्म नही गर्व हो रहा हो. दानो की नोक भी पापा की और ही घूर रही थी. अब भला मेरे पापा ये सब कैसे सहन करते? पापा के सामने तो आज तक कोई भी नही अकड़ा था. फिर वो कैसे अकड़ गये? पापा ने दोनो चूचियों के दानों को कसकर पकड़ा और मसल दिया. दीदी बताती हैं कि उस वक़्त उनकी योनि ने भी रस छ्चोड़ दिया था. पर कम्बख़्त 'कबूतरों' पर इसका कोई असर नही हुआ. वो तो और ज़्यादा अकड़ गये.

फिर तो दीदी की खैर ही नही थी. गुस्से के मारे उन्होने दीदी की सलवार का नाडा पकड़ा और खींच लिया. दीदी ने हाथ नीचे करके सलवार संभालने की कोशिश की तो एक साथ कयि झापड़ पड़े. बेचारी दीदी क्या करती? उनके हाथ उपर हो गये और सलवार नीचे. गुस्से गुस्से में ही उन्होने उनकी 'कछि' भी नीचे खींच दी और गुर्राते हुए बोले," कुतिया! मुर्गी बन जा उधर मुँह करके".. और दीदी बन गयी मुर्गी.

हाए! दीदी को कितनी शर्म आई होगी, सोच कर देखो! पापा दीदी के पिछे चारपाई पर बैठ गये थे. दीदी जांघों और घुटनो तक निकली हुई सलवार के बीच में से सब कुच्छ देख रही थी. पापा उसके गोल मटोल चूतदों के बीच उनके दोनो छेदो को घूर रहे थे. दीदी की योनि की फाँकें डर के मारे कभी खुल रही थी, कभी बंद हो रही थी. पापा ने गुस्से में उसके नितंबों को अपने हाथों में पकड़ा और उन्हे बीच से चीरने की कोशिश करने लगे. शुक्रा है दीदी के चूतड़ सुडौल थे, पापा सफल नही हो पाए!

"किसी से मरवा भी ली है क्या कुतिया?" पापा ने थक हार कर उन्हे छ्चोड़ते हुए कहा था.

दीदी ने बताया कि मना करने के बावजूद उनको विस्वास नही हुआ. मम्मी से मोमबत्ती लाने को बोला. डरी सहमी दरवाजे पर खड़ी सब कुच्छ देख रही मम्मी चुप चाप रसोई में गयी और उनको मोमबत्ती लाकर दे दी.

जैसा 'उस' लड़के ने खत में लिखा था, पापा बड़े निर्दयी निकले. दीदी ने बताया की उनकी योनि का छेद मोटी मोमबत्ती की पतली नोक से ढूँढ कर एक ही झटके में अंदर घुसा दी. दीदी का सिर सीधा ज़मीन से जा टकराया था और पापा के हाथ से छ्छूटने पर भी मोमबत्ती योनि में ही फँसी रह गयी थी. पापा ने मोमबत्ती निकाली तो वो खून से लथपथ थी. तब जाकर पापा को यकीन हुआ कि उनकी बेटी कुँवारी ही है (थी). ऐसा है पापा का गुस्सा!

दीदी ने बताया कि उस दिन और उस 'मोमबत्ती' को वो कभी नही भूल पाई. मोमबत्ती को तो उसने 'निशानी' के तौर पर अपने पास ही रख लिया.. वो बताती हैं कि उसके बाद शादी तक 'वो' मोमबत्ती ही भरी जवानी में उनका सहारा बनी. जैसे अंधे को लकड़ी का सहारा होता है, वैसे ही दीदी को भी मोमबत्ती का सहारा था शायद

खैर, भगवान का शुक्र है मुझे उन्होने ये कहकर ही बखस दिया," कुतिया! मुझे विस्वास था कि तू भी मेरी औलाद नही है. तेरी मम्मी की तरह तू भी रंडी है रंडी! आज के बाद तू स्कूल नही जाएगी" कहकर वो उपर चले गये.. थॅंक गॉड! मैं बच गयी. दीदी की तरह मेरा कुँवारापन देखने के चक्कर में उन्होने मेरी सील नही तोड़ी.

लगे हाथों 'दीदी' की वो छ्होटी सी ग़लती भी सुन लो जिसकी वजह से पापा ने उन्हे इतनी 'सख़्त' सज़ा दी...

दरअसल गली के 'कल्लू' से बड़े दीनो से दीदी की गुटरगू चल रही थी.. बस आँखों और इशारों में ही. धीरे धीरे दोनो एक दूसरे को प्रेमपात्र लिख लिख कर उनका 'जहाज़' बना बना कर एक दूसरे की छतो पर फैंकने लगे. दीदी बताती हैं कि कयि बार 'कल्लू' ने चूत और लंड से भरे प्रेमपात्र हमारी छत पर उड़ाए और अपने पास बुलाने की प्रार्थना की. पर दीदी बेबस थी. कारण ये था की शाम 8:00 बजते ही हमारे 'सरियों' वाले दरवाजे पर ताला लग जाता था और चाबी पापा के पास ही रहती थी. फिर ना कोई अंदर आ पता था और ना कोई बाहर जा पता था. आप खुद ही सोचिए, दीदी बुलाती भी तो बुलाती कैसे?

पर एक दिन कल्लू तैश में आकर सन्नी देओल बन गया. 'जहाज़' में लिख भेजा कि आज रात अगर 12:00 बजे दरवाजा नही खुला तो वो सरिया उखाड़ देगा. दीदी बताती हैं कि एक दिन पहले ही उन्होने छत से उसको अपनी चूत, चूचियाँ और चूतड़ दिखाए थे, इसीलिए वह पागला गया था, पागल!

दीदी को 'प्यार' के जोश और जज़्बे की परख थी. उनको विस्वास था कि 'कल्लू' ने कह दिया तो कह दिया. वो ज़रूर आएगा.. और आया भी. दीदी 12 बजने से पहले ही कल्लू को मनाकर दरवाजे के 'सरिय' बचाने नीचे पहुँच चुकी थी.. मम्मी और पापा की चारपाई के पास डाली अपनी चारपाई से उठकर!

दीदी के लाख समझने के बाद वो एक ही शर्त पर माना "चूस चूस कर निकलवाना पड़ेगा!"

दीदी खुश होकर मान गयी और झट से घुटने टके कर नीचे बैठ गयी. दीदी बताती हैं कि कल्लू ने अपना 'लंड' खड़ा किया और सरियों के बीच से दीदी को पकड़ा दिया.. दीदी बताती हैं कि उसको 'वो' गरम गरम और चूसने में बड़ा खट्टा मीठा लग रहा था. चूसने चूसने के चक्कर में दोनो की आँख बंद हो गयी और तभी खुली जब पापा ने पिछे से आकर दीदी को पिछे खींच लंड मुस्किल से बाहर निकलवाया.

पापा को देखते ही घर के सरिया तक उखाड़ देने का दावा करने वाला 'कल्लू देओल' तो पता ही नही चला कहाँ गायब हुआ. बेचारी दीदी को इतनी बड़ी सज़ा अकेले सहन करनी पड़ी. साला कल्लू भी पकड़ा जाता और उसके च्छेद में भी मोमबत्ती घुसती तो उसको पता तो चलता मोमबत्ती अंदर डलवाने में कितना दर्द होता है.

खैर, हर रोज़ की तरह स्कूल के लिए तैयार होने का टाइम होते ही मेरी कसी हुई चूचिया फड़कने लगी; 'शिकार' की तलाश का टाइम होते ही उनमें अजीब सी गुदगुदी होने लग जाती थी. मैने यही सोचा था कि रोज़ की तरह रात की वो बात तो नशे के साथ ही पापा के सिर से उतर गयी होगी. पर हाए री मेरी किस्मत; इस बार ऐसा नही हुआ," किसलिए इतनी फुदक रही है? चल मेरे साथ खेत में!"

"पर पापा! मेरे एग्ज़ॅम सिर पर हैं!" बेशर्म सी बनते हुए मैने रात वाली बात भूल कर उनसे बहस की.

पापा ने मुझे उपर से नीचे तक घूरते हुए कहा," ये ले उठा टोकरी! हो गया तेरा स्कूल बस! तेरी हाज़िरी लग जाएगी स्कूल में! रॅंफल के लड़के से बात कर ली है. आज से कॉलेज से आने के बाद तुझे यहीं पढ़ा जाया करेगा! तैयारी हो जाए तो पेपर दे देना. अगले साल तुझे गर्ल'स स्कूल में डालूँगा. वहाँ दिखाना तू कछी का रंग!" आख़िरी बात कहते हुए पापा ने मेरी और देखते हुए ज़मीन पर थूक दिया. मेरी कछी की बात करने से शायद उनके मुँह में पानी आ गया होगा.

काम करने की मेरी आदत तो थी नही. पुराना सा लहनगा पहने खेत से लौटी तो बदन की पोरी पोरी दुख रही थी. दिल हो रहा था जैसे कोई मुझे अपने पास लिटाकर आटे की तरह गूँथ डाले. मेरी उपर जाने तक की हिम्मत नही हुई और नीचे के कमरे में चारपाई को सीधा करके उस पर पसरी और सो गयी.

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रॅंफल का लड़के ने घर में घुस कर आवाज़ दी. मुझे पता था कि घर में कोई नही है. फिर भी मैं कुच्छ ना बोली. दर-असल पढ़ने का मेरा मंन था ही नही, इसीलिए सोने का बहाना किए पड़ी रही. मेरे पास आते ही वो फिर बोला,"अंजलि!"

उसने 2-3 बार मुझको आवाज़ दी. पर मुझे नही उठना था सो नही उठी. हाए ऱाअम! वो तो अगले ही पल लड़कों वाली औकात पर आ गया. सीधा नितंबों पर हाथ लगाकर हिलाया,"अंजलि.. उठो ना! पढ़ना नही है क्या?"

इस हरकत ने तो दूसरी ही पढ़ाई करने की ललक मुझमें जगा दी. उसके हाथ का अहसास पाते ही मेरे नितंब सिकुड से गये. पूरा बदन उसके छूने से थिरक उठा था. उसको मेरे जाग जाने की ग़लतफहमी ना हो जाए इसीलिए नींद में ही बड़बड़ाने का नाटक करती हुई मैं उल्टी हो गयी; अपने मांसल नितंबों की कसावट से उसको ललचाने के लिए.

सारा गाँव उस चास्मिष को शरीफ कहता था, पर वो तो बड़ा ही हरामी निकला. एक बार बाहर नज़र मार कर आया और मेरे नितंबों से थोड़ा नीचे मुझसे सटकार चारपाई पर ही बैठ गया. मेरा मुँह दूसरी तरफ था पर मुझे यकीन था कि वो चोरी चोरी मेरे बदन की कामुक बनावट का ही लुत्फ़ उठा रहा होगा!

"अंजलि!" इस बार थोड़ी तेज बोलते हुए उसने मेरे घुटनों तक के लहँगे से नीचे मेरी नंगी गुदज पिंडलियों पर हाथ रखकर मुझे हिलाया और सरकते हुए अपना हाथ मेरे घुटनो तक ले गया. अब उसका हाथ नीचे और लहंगा उपर था.

मुझसे अब सहन करना मुश्किल हो रहा था. पर शिकार हाथ से निकालने का डर था. मैं चुप्पी साधे रही और उसको जल्द से जल्द अपने पिंजरे में लाने के लिए दूसरी टाँग घुटनो से मोडी और अपने पेट से चिपका ली. इसके साथ ही लहंगा उपर सरकता गया और मेरी एक जाँघ काफ़ी उपर तक नंगी हो गयी. मैने देखा नही, पर मेरी कछी तक आ रही बाहर की ठंडी हवा से मुझे लग रहा था कि उसको मेरी कछी का रंग दिखने लगा है.

"आ..आन्न्न्जलि" इस बार उसकी आवाज़ में कंपकपाहट सी थी.. सिसक उठा था वो शायद! एक बार खड़ा हुआ और फिर बैठ गया.. शायद मेरा लहंगा उसके नीचे फँसा हुआ होगा. वापस बैठते ही उसने लहँगे को उपर पलट कर मेरी कमर पर डाल दिया..

उसका क्या हाल हुआ होगा ये तो पता नही. पर मेरी योनि में बुलबुले से उठने शुरू हो चुके थे. जब सहन करने की हद पार हो गयी तो मैं नींद में ही बनी हुई अपना हाथ मूडी हुई टाँग के नीचे से ले जाकर अपनी कछी में उंगलियाँ घुसा 'वहाँ' खुजली करने करने के बहाने उसको कुरेदने लगी. मेरा ये हाल था तो उसका क्या हो रहा होगा? सुलग गया होगा ना?

मैने हाथ वापस खींचा तो अहसास हुआ जैसे मेरी योनि की एक फाँक कछी से बाहर ही रह गयी है. अगले ही पल उसकी एक हरकत से मैं बौखला उठी. उसने झट से लहंगा नीचे सरका दिया. कम्बख़्त ने मेरी सारी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया.

पर मेरा सोचना ग़लत साबित हुआ. वो तो मेरी उम्मीद से भी ज़्यादा शातिर निकला. एक आख़िरी बार मेरा नाम पुकारते हुए उसने मेरी नींद को मापने की कोशिश की और अपना हाथ लहँगे के नीचे सरकते हुए मेरे नितंबों पर ले गया....

कछी के उपर थिरकति हुई उसकी उंगलियों ने तो मेरी जान ही निकल दी. कसे हुए मेरे चिकने चूतदों पर धीरे धीरे मंडराता हुआ उसका हाथ कभी 'इसको' कभी उसको दबा कर देखता रहा. मेरी चूचियाँ चारपाई में दबकर छॅट्पाटेने लगी थी. मैने बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू पाया हुआ था..

अचानक उसने मेरे लहँगे को वापस उपर उठाया और धीरे से अपनी एक उंगली कछी में घुसा दी.. धीरे धीरे वा उंगली सरक्ति हुई पहले नितंबों की दरार में घूमी और फिर नीचे आने लगी.. मैने दम साध रखा था.. पर जैसे ही उंगली मेरी 'फूल्कुन्वरि' की फांकों के बीच आई; मैं उच्छल पड़ी.. और उसी पल उसका हाथ वहाँ से हटा और चारपाई का बोझ कम हो गया..

मेरी छ्होटी सी मछ्लि तड़प उठी. मुझे लगा, मौका हाथ से गया.. पर इतनी आसानी से मैं भी हार मान'ने वालों में से नही हूँ... अपनी सिसकियों को नींद की बड़बड़ाहट में बदल कर मैं सीधी हो गयी और आँखें बंद किए हुए ही मैने अपनी जांघें घुटनों से पूरी तरह मोड़ कर एक दूसरी से विपरीत दिशा में फैला दी. अब लहंगा मेरे घुटनो से उपर था और मुझे विस्वास था कि मेरी भीगी हुई कछी के अंदर बैठी 'छम्मक छल्लो' ठीक उसके सामने होगी.

थोड़ी देर और यूँही बड़बड़ाते हुए मैं चुप हो कर गहरी नींद में होने का नाटक करने लगी. अचानक मुझे कमरे की चित्कनि बंद होने की आवाज़ आई. अगले ही पल वह वापस चारपाई पर ही आकर बैठ गया.. धीरे धीरे फिर से रैंग्ता हुआ उसका हाथ वहीं पहुँच गया. मेरी योनि के उपर से उसने कछी को सरककर एक तरफ कर दिया. मैने हुल्की सी आँखें खोलकर देखा. उसने चस्में नही पहने हुए थे. शायद उतार कर एक तरफ रख दिए होंगे. वह आँखें फेड हुए मेरी फड़कट्ी हुई योनि को ही देख रहा था. उसके चेहरे पर उत्तेजना के भाव अलग ही नज़र आ रहे थे..

अचानक उसने अपना चेहरा उठाया तो मैने अपनी आँखें पूरी तरह बंद कर ली. उसके बाद तो उसने मुझे हवा में ही उड़ा दिया. योनि की दोनो फांकों पर मुझे उसके दोनो हाथ महसूस हुए. बहुत ही आराम से उसने अपने अंगूठे और उंगलियों से पकड़ कर मोटी मोटी फांकों को एक दूसरी से अलग कर दिया. जाने क्या ढूँढ रहा था वह अंदर. पर जो कुच्छ भी कर रहा था, मुझसे सहन नही हुआ और मैने काँपते हुए जांघें भींच कर अपना पानी छ्चोड़ दिया.. पर आसचर्यजनक ढंग से इस बार उसने अपने हाथ नही हटाए...

किसी कपड़े से (शायद मेरे लहँगे से ही) उसने योनि को सॉफ किया और फिर से मेरी योनि को चौड़ा कर लिया. पर अब झाड़ जाने की वजह से मुझे नॉर्मल रहने में कोई खास दिक्कत नही हो रही थी. हाँ, मज़ा अब भी आ रहा था और मैं पूरा मज़ा लेना चाहती थी.

अगले ही पल मुझे गरम साँसें योनि में घुसती हुई महसूस हुई और पागल सी होकर मैने वहाँ से अपने आपको उठा लिया.. मैने अपनी आँखें खोल कर देखा. उसका चेहरा मेरी योनि पर झुका हुआ था.. मैं अंदाज़ा लगा ही रही थी कि मुझे पता चल गया कि वो क्या करना चाहता है. अचानक वो मेरी योनि को अपनी जीभ से चाटने लगा.. मेरे सारे बदन में झुरजुरी सी उठ गयी..इस आनंद को सहन ना कर पाने के कारण मेरी सिसकी निकल गयी और मैं अपने नितंबों को उठा उठा कर पटक'ने लगी...पर अब वो डर नही रहा था... मेरी जांघों को उसने कसकर एक जगह दबोच लिया और मेरी योनि के अंदर जीभ घुसा दी..

"अयाया!" बहुत देर से दबाए रखा था इस सिसकी को.. अब दबी ना रह सकी.. मज़ा इतना आ रहा था की क्या बताउ... सहन ना कर पाने के कारण मैने अपना हाथ वहाँ ले जाकर उसको वहाँ से हटाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया," कुच्छ नही होता अंजलि.. बस दो मिनिट और!" कहकर उसने मेरी जांघों को मेरे चेहरे की तरफ धकेल कर वहीं दबोच लिया और फिर से जीभ के साथ मेरी योनि की गहराई मापने लगा...

हाए राम! इसका मतलब उसको पता था की मैं जाग रही हूँ.. पहले ये बात बोल देता तो मैं क्यूँ घुट घुट कर मज़े लेती, मैं झट से अपनी कोहनी चारपाई पर टके कर उपर उठ गयी और सिसकते हुए बोली," अयाया...जल्दी करो ना.. कोई आ जाएगा नही तो!"

फिर क्या था.. उसने चेहरा उपर करके मुस्कुराते हुए मेरी और देखा.. उसकी नाक पर अपनी योनि का गाढ़ा पानी लगा देखा तो मेरी हँसी छ्छूट गयी.. इस हँसी ने उसकी झिझक और भी खोल दी.. झट से मुझे पकड़ कर नीचे उतारा और घुटने ज़मीन पर टीका मुझे कमर से उपर चारपाई पर लिटा दिया..," ये क्या कर रहे हो?"

"टाइम नही है अभी बताने का.. बाद में सब बता दूँगा.. कितनी रसीली है तू हाए.. अपनी गेंड को थोड़ा उपर कर ले.."

"पर कैसे करूँ?.. मेरे तो घुटने ज़मीन पर टीके हुए हैं..?"

"तू भी ना.. !" उसको गुस्सा सा आया और मेरी एक टाँग चारपाई के उपर चढ़ा दी.. नीचे तकिया रखा और मुझे अपना पेट वहाँ टीका लेने को बोला.. मैने वैसा ही किया..

"अब उठाओ अपने चूतड़ उपर.. जल्दी करो.." बोलते हुए उसने अपना मूसल जैसा लिंग पॅंट में से निकाल लिया..

मैं अपने नितंबों को उपर उठाते हुए अपनी योनि को उसके सामने परोसा ही था कि बाहर पापा की आवाज़ सुनकर मेरा दम निकल गया," पप्प्पा!" मैं चिल्लाई....

"दो काम क्या कर लिए; तेरी तो जान ही निकल गयी.. चल खड़ी हो जा अब! नहा धो ले. 'वो' आने ही वाला होगा... पापा ने कमरे में घुसकर कहा और बाहर निकल गये,"जा क्षोटू! एक 'अद्धा' लेकर आ!"

हाए राम! मेरी तो साँसें ही थम गयी थी. गनीमत रही की सपने में मैने सचमुच अपना लहंगा नही उठाया था. अपनी चूचियो को दबाकर मैने 2-4 लंबी लंबी साँसें ली और लहँगे में हाथ डाल अपनी कछी को चेक किया. योनि के पानी से वो नीचे से तर हो चुकी थी. बच गयी!

रगड़ रगड़ कर नहाते हुए मैने खेत की मिट्टी अपने बदन से उतारी और नयी नवेली कछी पहन ली जो मम्मी 2-4 दिन पहले ही बाजार से लाई थी," पता नही अंजू! तेरी उमर में तो मैं कछी पहनती भी नही थी. तेरी इतनी जल्दी कैसे खराब हो जाती है" मम्मी ने लाकर देते हुए कहा था.

मुझे पूरी उम्मीद थी कि रॅंफल का लड़का मेरा सपना साकार ज़रूर करेगा. इसीलिए मैने स्कूल वाली स्कर्ट डाली और बिना ब्रा के शर्ट पहनकर बाथरूम से बाहर आ गयी.

"जा वो नीचे बैठे तेरा इंतज़ार कर रहे हैं.. कितनी बार कहा है ब्रा डाल लिया कर; निकम्मी! ये हिलते हैं तो तुझे शर्म नही आती?" मम्मी की इस बात को मैने नज़रअंदाज किया और अपना बॅग उठा सीढ़ियों से नीचे उतरती चली गयी.

नीचे जाकर मैने उस चश्मू के साथ बैठी पड़ोस की रिंकी को देखा तो मेरी समझ में आया कि मम्मी ने बैठा है की वजाय बैठे हैं क्यू बोला था

"तुम किसलिए आई हो?" मैने रिंकी से कहा और चश्मू को अभिवादन के रूप में दाँत दिखा दिए.

उल्लू की दूम हंसा भी नही मुझे देखकर," कुर्सी नहीं हैं क्या?"

"मैं भी यहीं पढ़ लिया करूँगी.. भैया ने कहा है कि अब रोज यहीं आना है. पहले मैं भैया के घर जाती थी पढ़ने.. " रिंकी की सुरीली आवाज़ ने भी मुझे डंक सा मारा...

"कौन भैया?" मैने मुँह चढ़ा कर पूचछा!

"ये.. तरुण भैया! और कौन? और क्या इनको सर कहेंगे? 4-5 साल ही तो बड़े हैं.." रिंकी ने मुस्कुराते हुए कहा..

हाए राम! जो थोड़ी देर पहले सपने में 'सैयाँ' बनकर मेरी 'फूल्झड़ी' में जीभ घुमा रहा था; उसको क्या अब भैया कहना पड़ेगा? ना! मैने ना कहा भैया

" मैं तो सर ही कहूँगी! ठीक है ना, तरुण सर?"

बेशर्मी से मैं चारपाई पर उसके सामने पसर गयी और एक टाँग सीधी किए हुए दूसरी घुटने से मोड़ अपनी छाती से लगा ली. सीधी टाँग वाली चिकनी जाँघ तो मुझे उपर से ही दिखाई दे रही थी.. उसको क्या क्या दिख रहा होगा, आप खुद ही सोच लो.

"ठीक से बैठ जाओ! अब पढ़ना शुरू करेंगे.. " हरामी ने मेरी जन्नत की ओर देखा तक नही और खुद एक तरफ हो रिंकी को बीच में बैठने की जगह दे दी.. मैं तो सुलगती रह गयी.. मैने आलथी पालती मार कर अपना घुटना जलन की वजह से रिंकी की कोख में फँसा दिया और आगे झुक कर रॉनी सूरत बनाए कॉपी की और देखने लगी...

एक डेढ़ घंटे में जाने कितने ही सवाल निकाल दिए उसने, मेरी समझ में तो खाक भी नही आया.. कभी उसके चेहरे पर मुस्कुराहट को कभी उसकी पॅंट के मर्दाना उभर को ढूँढती रही, पर कुच्छ नही मिला..

पढ़ते हुए उसका ध्यान एक दो बार मेरी चूचियो की और हुआ तो मुझे लगा कि वो 'दूध' का दीवाना है. मैने झट से उसकी सुनते सुनते अपनी शर्ट का बीच वाला एक बटन खोल दिया. मेरी गड्राई हुई चूचिया, जो शर्ट में घुटन महसूस कर रही थी; रास्ता मिलते ही उस और सरक कर साँस लेने के लिए बाहर झाँकने लगी.. दोनो में बाहर निकलने की मची होड़ का फायडा उनके बीच की गहरी घाटी को हो रहा था, और वह बिल्कुल सामने थी.

तरुण ने जैसे ही इस बार मुझसे पूच्छने के लिए मेरी और देखा तो उसका चेहरा एकदम लाल हो गया.. हड़बड़ते हुए उसने कहा," बस! आज इतना ही.. मुझे कहीं जाना है... कहते हुए उसने नज़रें चुराकर एक बार और मेरी गोरी चूचियो को देखा और खड़ा हो गया....

हद तो तब हो गयी, जब वो मेरे सवाल का जवाब दिए बिना निकल गया.

मैने तो सिर्फ़ इतना ही पूचछा था," मज़ा नही आया क्या, सर?"

raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:05

baali umar ki pyaas paart--1

Hi, Main Anjali...! khair chhodo! Naam mein kya rakha hai? chhichhore ladkon ko vaise bhi naam se jyada 'Kaam' se matlab rahta hai. Isiliye sirf 'Kaam' ki hi baatein karoongi.

Main aaj 18 ki ho gayi hoon. Kuchh baras pahle tak mein bilkul 'flat' thi.. aage se bhi.. aur pichhe se bhi. par School bus mein aate jate; ladkon ke kandhon ki ragad kha kha kar mujhe pata hi nahi chala ki kab mere kulhon aur chhatiyon par charbi chadh gayi.. Baali umar mein hi mere nitamb beech se ek faank nikaale huye gol tarbooj ki tarah ubhar gaye. meri chhati par bhagwan ke diye do anmol 'fal' bhi ab 'amroodon' se badhkar moti moti 'sebon' jaise ho gaye the. Main kayi baar bathroom mein nangi hokar achraj se unhe dekha karti thi.. chhoo kar.. daba kar.. masal kar. mujhe aisa karte huye ajeeb sa anand aata .. 'wahan bhi.. aur neeche bhi.

Mere gore chitte badan par uss chhoti si khas jagah ko chhodkar kahin baalon ka namo-nishan tak nahi tha.. hulke hulke meri bagal mein bhi the. Uske alawa gardan se lekar pairon tak main ekdum chikni thi. Class ke ladkon ko lalchayi najron se apni chhati par jhool rahe 'Sebon' ko ghoorte dekh meri Jaanghon ke beech chhipi baithi hulke hulke baalon wali, magar chiknahat se bhari titli ke pankh fadfadane lagte aur chhatiyon par gulabi rangat ke 'anaar daane' tan kar khade ho jate. par mujhe koyi farak nahi pada. Haan, kabhi kabhar sharm aa jati thi. ye bhi nahi aati agar mummy ne nahi bola hota,"ab tu badi ho gayi hai Anju.. Bra daalni shuru kar de aur chunni bhi liya kar!"

Sach kahoon toh mujhe apne unmukt urojon ko kisi maryada mein bandh kar rakhna kabhi nahi suhaya aur na hi unko chunni se parde mein rakhna. Mouka milte hi main bra ko jaanboojh kar bathroom ki khoonti par hi taang jati aur class mein manchale ladkon ko apne ird gird mandraate dekh maje leti.. Main aksar jaan boojh apne hath upar utha angadayi si leti aur meri chhatiyan tan kar jhoolne si lagti. Uss waqt mere saamne khade ladkon ki halat kharab ho jati... kuchh toh apne honton par aise jeebh ferne lagte mano mouka milte hi mujhe noch daalenge. class ki sab ladkiyan mujhse jalne lagi.. halanki 'wo' sab unke paas bhi tha.. par mere jaisa nahi..

Main padhayi mein bilkul bhi achchhi nahi thi par sabhi male-teachers ka 'poora pyar' mujhe milta tha. ye unka pyar hi toh tha ki home-work na karke le jane par bhi wo muskurakar bina kuchh kahe chupchap copy band karke mujhe pakda dete.. baki sab ki pitayi hoti. Par haan, wo mere padhayi mein dhyan na dene ka harjana wasool karna kabhi nahi bhoolte the. Jis kisi ka bhi khali period nikal aata; kisi na kisi bahane se mujhe staffroom mein bula hi lete. Mere hathon ko apne hath mein lekar masalte huye mujhe samjhate rahte. kamar se chipka hua unka dusra hath dheere dheere fisalta hua mere nitambon par aa tikta. Mujhe padhai par 'aur jyada' dhyan dene ko kahte huye wo mere nitambon par hulki hulki chapat lagate huye mere Nitambon ki thirkan ka maja loot'te rahte.. mujhe padhayi ke faayde ginwate huye aksar wo 'bhawuk' ho jate the, aur chapat lagana bhool nitambon par hi hath jama lete. Kabhi kabhi toh unki ungaliyan skirt ke upar se hi meri 'daraar' ki gahraayi maapne ki koshish karne lagti...

Unka dhyan har waqt unki thapkiyon ke karan lagataar thirakti rahti meri chhatiyon par hi hota tha.. par kisi ne kabhi 'unn' par jhapatta nahi mara. Shayad 'wo' ye sochte honge ki kahin mein bidak na jaaoon.. par main unko kabhi chahkar bhi nahi bata payi ki mujhe aisa karwate huye meethi-meethi khujali hoti hai aur bahut aanand aata hai...

Haan! ek baat main kabhi nahi bhool paaungi.. Mere history wale sir ka hath aise hi samjhate huye ek din kamar se nahi, mere ghutno se chalna shuru hua.. aur dheere dheere meri skirt ke andar ghus gaya. Apni kele ke taney jaisi lambi gori aur chikni jaanghon par unke 'kaampte' huye hath ko mahsoos karke main machal uthi thi... Khushi ke maare maine aankhein band karke apni jaanghein khol di aur unke hath ko meri jaanghon ke beech mein upar chadhta hua mahsoos karne lagi.. Achanak meri phool jaisi najuk yoni se pani sa tapakne laga..

Achanak unhone meri jaanghon mein buri tarah fansi huyi 'kachchhi' ke andar ungali ghusa di.. par hadbadi aur jaldbazi mein galti se unki ungali seedhi meri chikni hokar tapak rahi yoni ki moti moti faankon ke beech ghus gayi.. main dard se tilmila uthi.. achanak huye iss prahar ko main sahan nahi kar payi. Chhatpatate huye maine apne aapko unse chhudaya aur deewar ki taraf munh fer kar khadi ho gayi... meri aankhein dabdaba gayi thi..

Main iss sari prakriya ke 'pyar se' fir shuru hone ka intjaar kar hi rahi thi ki 'wo' master mere aage hath jodkar khada ho gaya,"Pls Anjali.. mujhse galati ho gayi.. main bahak gaya tha... kisi se kuchh mat kahna.. meri noukari ka sawaal hai...!" Iss'se pahle main kuchh bolne ki himmat jutati; bina matlab ki bakbak karta hua wo staffroom se bhag gaya.. mujhe tadapti chhodkar..

Nigodi 'ungali' ne mere youvan ko iss kadar bhadkaya ki main apne jalwon se ladkon ke dilon mein aag lagana bhool apni nanhi si fudakti yoni ki pyas bujhane ki jugat mein rahne lagi. iske liye maine apne ang-pradarshan abhiyan ko aur tej kar diya. Anjaan si bankar, khujali karne ke bahane main bench par baithi huyi skirt mein hath daal usko jaanghon tak upar khiska leti aur class mein ladkon ki seetiyan bajne lagti. Ab poore din ladkon ki baaton ka kendra main hi rahne lagi. Aaj ahsaas hota hai ki yoni mein ek baar aur mardani ungali karwane ke chakkar mein main kitni badnaam ho gayi thi.

Khair; mera 'kaam' jald hi ban jata agar 'wo' (jo koyi bhi tha) mere bag mein nihayat hi ashleel letter daalne se pahle mujhe bata deta. Kash letter mere chhotu bhaiya se pahle mujhe mil jata! 'gadhe' ne letter seedha mere sharabi papa ko pakda diya aur raat ko nashe mein dhutt hokar papa mujhe apne saamne khadi karke letter padhne lage:

" hi jane-man!

kya khati ho yaar? itni mast hoti ja rahi ho ki sare ladkon ko apna deewana bana ke rakh diya. Tumhari 'papite' jaise choonchiyon ne hamein pahle hi pagal bana rakha tha, ab apni gouri chikni jaanghein dikha dikha kar kya hamari jaan lene ka irada hai? aise hi chalta raha toh tum apne sath 'iss' saal Exam mein sab ladkon ko bhi le doobogi..

Par mujhe tumse koyi gila nahi hai. Tumhari mastani choonchiyan dekhkar main dhanya ho jata tha; ab nangi chikni jaanghein dekhkar toh jaise amar hi ho gaya hoon. Fir paas ya fail hone ki parwah kise hai agar roj tumhare angon ke darshan hote rahein. Ek request hai, pls maan lena! Skirt ko thoda sa aur upar kar diya karo taki main tumhari geeli 'kachchhi' ka rang dekh sakoon. School ke bathroom mein jakar tumhari kalpna karte huye apne lund ko hilata hoon toh baar baar yahi sawaal mann mein ubharta rahta hai ki 'kachchhi' ka rang kya hoga.. iss wajah se mere lund ka ras nikalne mein deri ho jati hai aur class mein teachers ki sun'ni padti hai... pls, ye baat aage se yaad rakhna!

Tumhari kasam jaane-man, ab toh mere sapno mein bhi priyanka chopda ki jagah nangi hokar tum hi aane lagi ho. 'wo' toh ab mujhe tumhare saamne kuchh bhi nahi lagti. Sone se pahle 2 baar khayalon mein tumhe poori nangi karke chod'te huye apne lund ka ras nikalta hoon, fir bhi subah mera 'kachchha' geela milta hai. Fir subah bister se uthne se pahle tumhe ek baar jaroor yaad karta hoon.

Maine suna hai ki ladkiyon mein chudayi ki bhookh ladkon se bhi jyada hoti hai. tumhare andar bhi hogi na? Waise toh tumhari chudayi karne ke liye sabhi apne lund ko tel lagaye firte hain; par tumhari kasam janeman, main tumhe sabse jyada pyar karta hoon, asli wala. Kisi aur ke bahkawe mein mat aana, jyadatar ladke chodte huye pagal ho jate hain. wo tumhari kunwari choot ko ekdum faad daalenge. par main sab kuchh 'pyar se karoonga.. tumhari kasam. pahle ungali se tumhari choot ko thodi si kholoonga aur chat chat kar andar bahar se poori tarah geeli kar doonga.. fir dheere dheere lund andar karne ki koshish karunga, tumne khushi khushi le liya toh theek, warna chhod doonga.. tumhari kasam jaaneman.

agar tumne apni chudaai karwane ka mood bana liya ho toh kal apna laal rumaal lekar aana aur usko recess mein apne bench par chhod dena. Fir main bataunga ki kab kahan aur kaise milna hai!

Pls jaan, Ek baar sewa ka mouka jaroor dena. Tum hamesha yaad rakhogi aur roj roj chudayi karwane ki sochogi, Mera dawa hai.

Tumhara Aashiq!

Letter mein shuddh 'kaamras' ki baatein padhte padhte papa ka nasha kab kafur ho gaya, shayad unhe bhi ahsaas nahi hua. Sirf Isiliye shayad main uss raat kunwari rah gayi. Warna wo mere sath bhi waisa hi karte jaisa unhone badi didi 'Nimmo' ke sath kuchh saal pahle kiya tha.

Main toh khair uss waqt chhoti si thi. Didi ne hi bataya tha. Suni sunayi bata rahi hoon. Visvash ho toh theek warna mera kya chaat loge?

Papa Nimmo ko baalon se pakadkar ghaseet'te huye upar laye the. Sharaab pine ke baad papa se ulajhne ki himmat ghar mein koyi nahi karta. Mummy khadi khadi tamasha dekhti rahi. Baal pakad kar 5-7 karaare jhapad Nimmon ko mare aur uski gardan ko daboch liya. fir jaane unke mann mein kya khayal aaya; bole," Saja bhi waisi hi honi chahiye jaisi galati ho!" Didi ke kameej ko dono hathon se gale se pakda aur ek hi jhatke mein taar taar kar dala; kameej ko bhi aur didi ki 'ijjat' ko bhi. Didi ke meri tarah mastaye huye gol gol kabootar jo thode bahut uske sameej ne chhupa rakhe the; agle jhatke ke baad wo bhi chhupe nahi rahe. Didi batati hain ki papa ke saamne 'unko' fadakte dekh unhe khoob sharam aayi thi. unhone apne hathon se 'unhe' chhipane ki koshish ki toh papa ne 'teachers' ki tarah usko hath upar karne ka aadesh de diya.. 'teachers' ki baat par ek aur baat yaad aa gayi, par wo baad mein sunaaungi....

Haan toh main bata rahi thi.. haan.. toh didi ke dono santre hath upar karte hi aur bhi tan kar khade ho gaye. Jaise unko sharm nahi garv ho raha ho. Daano ki nok bhi papa ki aur hi ghoor rahi thi. Ab bhala mere papa ye sab kaise sahan karte? Papa ke saamne toh aaj tak koyi bhi nahi akada tha. fir wo kaise akad gaye? Papa ne dono choochiyon ke daanon ko kaskar pakda aur masal diya. didi batati hain ki uss waqt unki yoni ne bhi ras chhod diya tha. Par kambakht 'kabootaron' par iska koyi asar nahi hua. wo toh aur jyada akad gaye.

Fir toh didi ki khair hi nahi thi. Gusse ke mare Unhone didi ki salwar ka nada pakda aur kheench liya. didi ne hath neeche karke salwar sambhalne ki koshish ki toh ek sath kayi jhapad pade. bechari didi kya karti? unke hath upar ho gaye aur Salwar neeche. Gusse gusse mein hi unhone unki 'kachchhi' bhi neeche kheench di aur gurrate huye bole," kutiya! Murgi ban ja udhar munh karke".. aur didi ban gayi murgi.

haye! didi ko kitni sharm aayi hogi, soch kar dekho! papa didi ke pichhe charpayi par baith gaye the. didi janghon aur ghutno tak nikli huyi salwar ke beech mein se sab kuchh dekh rahi thi. Papa uske gol matol chutadon ke beech unke dono chhedon ko ghoor rahe the. didi ki yoni ki faankein darr ke mare kabhi khul rahi thi, kabhi band ho rahi thi. Papa ne gusse mein uske nitambon ko apne hathon mein pakda aur unhe beech se cheerne ki koshish karne lage. Shukra hai didi ke chutad sudoul the, papa safal nahi ho paye!

"kisi se marwa bhi li hai kya kutiya?" papa ne thak haar kar unhe chhodte huye kaha tha.

Didi ne bataya ki mana karne ke bawjood unko visvash nahi hua. Mummy se mombatti lane ko bola. Dari sahmi darwaje par khadi sab kuchh dekh rahi mummy chup chap rasoyi mein gayi aur unko mombatti lakar de di.

Jaisa 'uss' ladke ne khat mein likha tha, papa bade nirdayi nikle. didi ne bataya ki unki yoni ka chhed moti mombatti ki patli nok se dhoondh kar ek hi jhatke mein andar ghusa di. Didi ka sir seedha jameen se ja takraya tha aur papa ke hath se chhootne par bhi mombatti yoni mein hi fansi rah gayi thi. Papa ne mombatti nikali toh wo khoon se lathpath thi. tab jakar papa ko yakeen hua ki unki beti kunwari hi hai (thi). aisa hai papa ka gussa!

Didi ne bataya ki uss din aur uss 'mombatti' ko wo kabhi nahi bhool payi. Mombatti ko toh usne 'Nishani' ke tour par apne paas hi rakh liya.. Wo batati hain ki uske baad shadi tak 'wo' mombatti hi bhari jawani mein unka sahara bani. jaise andhe ko lakdi ka sahara hota hai, waise hi didi ko bhi mombatti ka sahara tha shayad

Khair, Bhagwan ka shukra hai mujhe unhone ye kahkar hi bakhs diya," Kutiya! Mujhe visvash tha ki tu bhi meri aulad nahi hai. Teri mummy ki tarah tu bhi randi hai randi! Aaj ke baad tu school nahi jayegi" kahkar wo upar chale gaye.. Thank God! Main bach gayi. Didi ki tarah mera kunwarapan dekhne ke chakkar mein unhone meri seal nahi todi.

Lage hathon 'didi' ki wo chhoti si galti bhi sun lo jiski wajah se papa ne unhe itni 'sakht' saza di...

Darasal gali ke 'kallu' se bade dino se didi ki gutargoo chal rahi thi.. bus aankhon aur isharon mein hi. Dheere dheere dono ek dusre ko prempatra likh likh kar unka 'jahaj' bana bana kar ek dusre ki chhaton par fainkne lage. Didi batati hain ki kayi baar 'kallu' ne choot aur lund se bhare prempatra hamari chhat par udaye aur apne paas bulane ki prarthna ki. par didi bebas thi. karan ye tha ki sham 8:00 bajte hi hamare 'sariyon' wale darwaje par tala lag jata tha aur chabi papa ke paas hi rahti thi. fir na koyi andar aa pata tha aur na koyi bahar ja pata tha. Aap khud hi sochiye, didi bulati bhi toh bulati kaise?

Par ek din kallu taish mein aakar Sunny deol ban gaya. 'jahaj' mein likh bheja ki aaj raat agar 12:00 baje darwaja nahi khula toh wo sariye ukhad dega. Didi batati hain ki ek din pahle hi unhone chhat se usko apni choot, choochiyan aur chootad dikhaye the, isiliye wah pagla gaya tha, Pagal!

Didi ko 'pyar' ke josh aur jajbe ki parakh thi. unko visvas tha ki 'kallu' ne kah diya toh kah diya. Wo jaroor aayega.. aur aaya bhi. didi 12 bajne se pahle hi kallu ko manakar darwaje ke 'sariye' bachane neeche pahunch chuki thi.. mummy aur papa ki charpayioyn ke paas dali apni charpayi se uthkar!

Didi ke lakh samjhane ke baad wo ek hi shart par mana "Choos choos kar nikalwana padega!"

Didi khush hokar maan gayi aur jhat se ghutne take kar neeche baith gayi. Didi batati hain ki Kallu ne apna 'lund' khada kiya aur sariyon ke beech se didi ko pakda diya.. Didi batati hain ki usko 'wo' garam garam aur choosne mein bada khatta Meetha lag raha tha. Choosne chusane ke chakkar mein dono ki aankh band ho gayi aur tabhi khuli jab papa ne pichhe se aakar Didi ko pichhe kheench lund muskil se bahar nikalwaya.

Papa ko dekhte hi ghar ke sariye tak ukhad dene ka dawa karne wala 'Kallu Deol' toh pata hi nahi chala kahan gayab hua. Bechari didi ko itni badi saja akele sahan karni padi. Sala Kallu bhi pakda jata aur uske chhed mein bhi mombatti ghusti toh usko pata toh chalta mombatti andar dalwane mein kitna dard hota hai.

Khair, har roz ki tarah School ke liye taiyaar hone ka time hote hi meri kasi huyi chhatiyan fadakne lagi; 'Shikar' ki talash ka time hote hi unmein ajeeb si gudgudi hone lag jati thi. Maine yahi socha tha ki roz ki tarah raat ki wo baat toh nashe ke sath hi papa ke sir se utar gayi hogi. Par haye ri meri kismat; iss baar aisa nahi hua," kisliye itni fudak rahi hai? chal mere sath khet mein!"

"Par papa! mere exam sir par hain!" Besharm si bante huye maine raat wali baat bhool kar unse bahas ki.

Papa ne mujhe upar se neeche tak ghoorte huye kaha," ye le utha tokri! ho gaya tera school bus! Teri hajiri lag jayegi School mein! Ramphal ke ladke se baat kar li hai. Aaj se College se aane ke baad tujhe yahin padha jaya karega! Taiyari ho jaye toh paper de dena. Agle saal tujhe Girl's School mein daalunga. Wahan dikhana tu kachchhi ka rang!" Aakhiri baat kahte huye papa ne meri aur dekhte huye jameen par thook diya. Meri kachchhi ki baat karne se shayad unke munh mein pani aa gaya hoga.

Kaam karne ki meri aadat toh thi nahi. Purana sa lahnga pahne khet se louti toh badan ki pori pori dukh rahi thi. Dil ho raha tha jaise koyi mujhe apne paas litakar aatey ki tarah goonth daale. Meri upar jane tak ki himmat nahi huyi aur neeche ke kamre mein charpayi ko seedha karke us par pasari aur so gayi.

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Ramphal ka ladke ne ghar mein ghus kar aawaj di. Mujhe pata tha ki ghar mein koyi nahi hai. Fir bhi main kuchh na boli. Dar-asal padhne ka mera mann tha hi nahi, Isiliye sone ka bahana kiye padi rahi. Mere pass aate hi wo fir bola,"Anjali!"

Usne 2-3 baar mujhko aawaj di. par mujhe nahi uthna tha so nahi uthi. Haye Raaam! wo toh agle hi pal ladkon wali aukat par aa gaya. Seedha Nitambon par hath lagakar hilaya,"Anjali.. utho na! padhna nahi hai kya?"

Iss harkat ne toh dusri hi padhayi karne ki lalak mujhmein jaga di. Uske hath ka ahsaas pate hi mere nitamb sikud se gaye. Poora badan uske chhoone se thirak utha tha. Usko mere jaag jane ki galatfahmi na ho jaye isiliye neend mein hi badbadane ka natak karti huyi main ulti ho gayi; apne maansal nitambon ki kasawat se usko lalchane ke liye.

Sara gaanv uss chasmish ko shareef kahta tha, par wo toh bada hi harami nikla. Ek baar bahar najar maar kar aaya aur mere Nitambon se thoda neeche mujhse satkar charpayi par hi baith gaya. Mera munh dusri taraf tha par mujhe yakeen tha ki wo chori chori mere badan ki kamuk banawat ka hi lutf utha raha hoga!

"Anjali!" Iss baar thodi tej bolte huye usne mere ghutnon tak ke lahange se neeche meri nangi gudaj pindaliyon par hath rakhkar mujhe hilaya aur sarkate huye apna hath mere ghutno tak le gaya. ab uska hath neeche aur lahanga upar tha.

Mujhse ab sahan karna mushkil ho raha tha. Par shikar hath se nikalne ka darr tha. Main chuppi saadhe rahi aur usko jald se jald apne pinjare mein lane ke liye dusri taang ghutno se modi aur apne pate se chipka li. Iske sath hi lahanga upar sarakta gaya aur meri ek jaangh kafi upar tak nangi ho gayi. Maine dekha nahi, par meri kachchhi tak aa rahi bahar ki thandi hawa se mujhe lag raha tha ki usko meri kachchhi ka rang dikhne laga hai.

"A..Annnjali" Iss baar uski aawaj mein kampkapahat si thi.. Sisak utha tha wo shayad! Ek baar khada hua aur fir baith gaya.. Shayad mera lahanga uske neeche fansa hua hoga. Wapas baithte hi usne lahange ko upar palat kar meri kamar par daal diya..

Uska kya haal hua hoga ye toh pata nahi. par meri yoni mein bulbule se uthne shuru ho chuke the. Jab sahan karne ki had paar ho gayi toh main neend mein hi bani huyi apna hath mudi huyi taang ke neeche se le jakar apni kachchhi mein ungaliyan ghusa 'wahan' khujali karne karne ke bahane usko kuredne lagi. Mera ye haal tha toh uska kya ho raha hoga? Sulag gaya hoga na?

Maine hath wapas kheencha toh ahsaas hua jaise meri yoni ki ek faank kachchhi se bahar hi rah gayi hai. Agle hi pal uski ek harkat se main boukhla uthi. Usne jhat se lahanga neeche sarka diya. Kambakht ne meri sari mehnat ko mitti mein mila diya.

Par mera sochna galat sabit hua. wo toh meri ummeed se bhi jyada shatir nikla. Ek Aakhiri baar mera naam pukarte huye usne meri neend ko maapne ki koshish ki aur apna hath lahange ke neeche sarkate huye mere nitambon par le gaya....

Kachchi ke upar thirakti huyi uski ungaliyon ne toh meri jaan hi nikal di. kase huye mere chikane chutadon par dheere dheere mandrata hua uska hath kabhi 'isko' kabhi usko daba kar dekhta raha. Meri chhatiyan charpayi mein dabkar chhatpatane lagi thi. maine badi mushkil se khud par kabu paya hua tha..

Achanak usne mere lahange ko wapas upar uthaya aur dheere se apni ek ungali kachchhi mein ghusa di.. dheere dheere wah ungali sarakti huyi pahle nitambon ki daraar mein ghoomi aur fir neeche aane lagi.. maine dam sadh rakha tha.. par jaise hi ungali meri 'phoolkunwari' ki faankon ke beech aayi; main uchhal padi.. aur usi pal uska hath wahan se hata aur charpayi ka bojh kam ho gaya..

Meri chhoti si machhli tadap uthi. Mujhe laga, mouka hath se gaya.. par itni aasani se main bhi haar maan'ne walon mein se nahi hoon... Apni siskiyon ko neend ki badbadahat mein badal kar main seedhi ho gayi aur aankhein band kiye huye hi maine apni jaanghein ghutnon se poori tarah mod kar ek dusri se viprit disha mein faila di. ab lahanga mere ghutno se upar tha aur mujhe visvas tha ki meri bheegi huyi kachchhi ke andar baithi 'chhammak chhallo' theek uske saamne hogi.

Thodi der aur yunhi badbadate huye main chup ho kar gahri neend mein hone ka natak karne lagi. Achanak mujhe kamre ki chitkani band hone ki aawaj aayi. Agle hi pal wah wapas charpayi par hi aakar baith gaya.. dheere dheere fir se raingta hua uska hath wahin pahunch gaya. meri yoni ke upar se usne kachchhi ko sarkakar ek taraf kar diya. Maine hulki si aankhein kholkar dekha. Usne chasmein nahi pahne huye the. Shayad utaar kar ek taraf rakh diye honge. Wah aankhein faade huye meri fadakti huyi yoni ko hi dekh raha tha. uske chehre par uttejna ke bhav alag hi najar aa rahe the..

Achanak usne apna chehra uthaya toh maine apni aankhein poori tarah band kar li. Uske baad toh usne mujhe hawa mein hi uda diya. Yoni ki dono faankon par mujhe uske dono hath mahsoos huye. Bahut hi aaram se usne apne angoothe aur ungaliyon se pakad kar moti moti faankon ko ek doosri se alag kar diya. Jane kya dhoondh raha tha wah andar. par jo kuchh bhi kar raha tha, mujhse sahan nahi hua aur maine kaampte huye jaanghein bheench kar apna pani chhod diya.. par aascharyajanak dhang se iss baar usne apne hath nahi hataye...

Kisi kapde se (shayad mere lahange se hi) usne yoni ko saaf kiya aur fir se meri yoni ko chouda kar liya. par ab jhad jane ki wajah se mujhe normal rahne mein koyi khas dikkat nahi ho rahi thi. haan, maja ab bhi aa raha tha aur main poora maja lena chahti thi.

Agle hi pal mujhe garam saansein yoni mein ghusati huyi mahsoos huyi aur pagal si hokar maine wahan se apne aapko utha liya.. maine apni aankhein khol kar dekha. uska chehra meri yoni par jhuka hua tha.. main andaja laga hi rahi thi ki mujhe pata chal gaya ki wo kya karna chahta hai. achanak wo meri yoni ko apni jeebh se chatne laga.. mere sare badan mein jhurjhuri si uth gayi..iss anand ko sahan na kar pane ke karan meri siski nikal gayi aur main apne nitambon ko utha utha kar patak'ne lagi...par ab wo darr nahi raha tha... Meri jaanghon ko usne kaskar ek jagah daboch liya aur meri yoni ke andar jeebh ghusa di..

"aaaah!" Bahut der se dabaye rakha tha iss siski ko.. ab dabi na rah saki.. Maja itna aa raha tha ki kya bataaun... Sahan na kar pane ke karan maine apna hath wahan le jakar usko wahan se hatane ki koshish ki toh usne mera hath pakad liya," Kuchh nahi hota Anjali.. bus do minute aur!" kahkar usne meri jaanghon ko mere chehre ki taraf dhakel kar wahin daboch liya aur fir se jeebh ke sath meri yoni ki gahrayi maapne laga...

Haye Ram! iska matlab usko pata tha ki main jaag rahi hoon.. pahle ye baat bol deta toh main kyun ghut ghut kar maje leti, main jhat se apni kohni charpayi par take kar upar uth gayi aur sisakte huye boli," aaaah...jaldi karo na.. koyi aa jayega nahi toh!"

Fir kya tha.. usne chehra upar karke muskurate huye meri aur dekha.. uski naak par apni yoni ka gadha pani laga dekha toh meri hansi chhoot gayi.. Iss hansi ne uski jhijhak aur bhi khol di.. jhat se mujhe pakad kar neeche utara aur ghutne jameen par tika mujhe kamar se upar charpayi par lita diya..," ye kya kar rahe ho?"

"time nahi hai abhi batane ka.. baad mein sab bata doonga.. kitni rasili hai tu haye.. apni gaand ko thoda upar kar le.."

"par kaise karoon?.. mere toh ghutne jameen par tike huye hain..?"

"tu bhi na.. !" usko gussa sa aaya aur meri ek taang charpayi ke upar chadha di.. neeche takiya rakha aur mujhe apna pate wahan tika lene ko bola.. maine waisa hi kiya..

"Ab uthao apne chutad upar.. jaldi karo.." bolte huye usne apna moosal jaisa ling pant mein se nikal liya..

Main apne nitambon ko upar uthate huye apni yoni ko uske saamne parosa hi tha ki bahar papa ki aawaj sunkar mera dum nikal gaya," Papppa!" Main chillayi....

"Do kaam kya kar liye; teri toh jaan hi nikal gayi.. chal khadi ho ja ab! naha dho le. 'wo' aane hi wala hoga... papa ne kamre mein ghuskar kaha aur bahar nikal gaye,"ja chhotu! ek 'addha' lekar aa!"

Haye raam! Meri toh saansein hi tham gayi thi. Ganimat rahi ki sapne mein maine sachmuch apna lahanga nahi uthaya tha. apni chhatiyon ko dabakar maine 2-4 lambi lambi saansein li aur lahange mein hath daal apni kachchhi ko check kiya. Yoni ke pani se wo neeche se tar ho chuki thi. Bach gayi!

Ragad ragad kar nahate huye maine khet ki mitti apne badan se utari aur nayi naveli kachchhi pahan li jo Mummy 2-4 din pahle hi bajar se layi thi," pata nahi Anju! teri umar mein toh main kachchhi pahanti bhi nahi thi. Teri itni jaldi kaise kharaab ho jati hai" Mummy ne lakar dete huye kaha tha.

Mujhe poori ummeed thi ki Ramphal ka ladka mera sapna sakar jaroor karega. Isiliye maine School wali skirt daali aur bina bra ke shirt pahankar bathroom se bahar aa gayi.

"ja wo neeche baithe tera intzaar kar rahe hain.. Kitni baar kaha hai bra daal liya kar; Nikammi! ye hilte hain toh tujhe sharm nahi aati?" Mummy ki iss baat ko maine najarandaj kiya aur apna bag utha seedhiyon se neeche utarti chali gayi.

Neeche jakar maine uss chashmu ke sath baithi pados ki Rinki ko dekha toh meri samajh mein aaya ki mummy 'baitha hai' ki jagah 'baithe hain' kyun kaha tha. Mera toh mood hi kharaab ho gaya

"Tum kisliye aayi ho?" maine Rinki se kaha aur chashmu ko abhiwadan ke roop mein daant dikha diye.

Ulloo ki dum hansa bhi nahi mujhe dekhkar," Chair nahin hain kya?"

"Main bhi yahin padh liya karoongi.. Bhaiya ne kaha hai ki ab roj yahin aana hai. pahle main bhaiya ke ghar jati thi padhne.. " Rinki ki Surili aawaj ne bhi mujhe dunk sa mara...

"Koun bhaiya?" Maine munh chadha kar poochha!

"Ye.. Tarun bhaiya! aur koun? aur kya inko Sir kahenge? 4-5 saal hi toh bade hain.." Rinki ne muskurate huye kaha..

Haye Raam! Jo thodi der pahle sapne mein 'Saiyan' bankar meri 'phooljhadi' mein jeebh ghuma raha tha; usko kya ab bhaiya kahna padega? Na! Maine na kaha bhaiya

" Main toh Sir hi kahoongi! theek hai na, Tarun Sir?"

Besharmi se main charpayi par uske saamne pasar gayi aur ek taang seedhi kiye huye dusri ghutne se mod apni chhati se laga li. Seedhi taang wali chikni jaangh toh mujhe upar se hi dikhayi de rahi thi.. Usko kya kya dikh raha hoga, aap khud hi soch lo.

"Theek se baith jao! ab padhna shuru karenge.. " Harami ne meri jannat ki aur dekha tak nahi aur khud ek taraf ho Rinki ko beech mein baithne ki jagah de di.. Main toh sulagti rah gayi.. Maine aalthi palthi maar kar apna ghutna jalan ki wajah se Rinki ki kokh mein fansa diya aur aage jhuk kar roni soorat banaye copy ki aur dekhne lagi...

Ek dedh ghante mein jane kitne hi sawaal nikal diye usne, meri samajh mein toh khak bhi nahi aaya.. Kabhi uske chehre par muskurahat ko kabhi uski pant ke mardana ubhar ko dhoondhti rahi, par kuchh nahi mila..

Padhate huye uska dhyan ek do baar meri chhatiyon ki aur hua toh mujhe laga ki wo 'doodh' ka deewana hai. Maine jhat se uski sunte sunte apni shirt ka beech wala ek button khol diya. Meri gadrayi huyi chhatiyan, jo shirt mein ghutan mahsoos kar rahi thi; raasta milte hi uss aur sarak kar saans lene ke liye bahar jhankne lagi.. dono mein bahar nikalne ki machi hod ka fayda unke beech ki gahri ghati ko ho raha tha, aur wah bilkul saamne thi.

Tarun ne jaise hi iss baar mujhse poochhne ke liye meri aur dekha toh uska chehra ekdum laal ho gaya.. hadbadate huye usne kaha," Bus! aaj itna hi.. Mujhe kahin jana hai... kahte huye usne najrein churakar ek baar aur meri gori chhatiyon ko dekha aur khada ho gaya....

Had toh tab ho gayi, jab wo mere sawaal ka jawaab diye bina nikal gaya.

Maine toh sirf itna hi poochha tha," Maja nahi aaya kya, Sir?"

kramshah............................

raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:06

बाली उमर की प्यास पार्ट--2

गतांक से आगे.......................

सपने में ही सही, पर बदन में जो आग लगी थी, उसकी दहक से अगले दिन भी मेरा अंग - अंग सुलग रहा था. जवानी की तड़प सुनाती तो सुनाती किसको! सुबह उठी तो घर पर कोई नही था.. पापा शायद आज मम्मी को खेत में ले गये होंगे.. हफ्ते में 2 दिन तो कम से कम ऐसा होता ही था जब पापा मम्मी के साथ ही खेत में जाते थे..

उन्न दो दीनो में मम्मी इस तरह सजधज कर खाना साथ लेकर जाती थी जैसे खेत में नही, कहीं बुड्ढे बुद्धियों की सौन्दर्य प्रतियोगिता में जा रही हों.. मज़ाक कर रही हूँ... मम्मी तो अब तक बुद्धि नही हुई हैं.. 40 की उमर में भी वो बड़ी दीदी की तरह रसीली हैं.. मेरा तो खैर मुक़ाबला ही क्या है..?

खैर; मैं भी किन बातों को उठा लेती हूँ... हां तो मैं बता रही थी कि अगले दिन सुबह उठी तो कोई घर पर नही था... खाली घर में खुद को अकेली पाकर मेरी जांघों के बीच सुरसुरी सी मचने लगी.. मैने दरवाजा अंदर से बंद किया और चारपाई पर आकर अपनी जांघों को फैलाकर स्कर्ट पूरी तरह उपर उठा लिया..

मैं देखकर हैरत मैं पड़ गयी.. छ्होटी सी मेरी योनि किसी बड़े पाव की तरह फूल कर मेरी कछी से बाहर निकलने को उतावली हो रही थी... मोटी मोटी योनि की पत्तियाँ संतरे की फांकों की तरह उभर कर कछी के बाहर से ही दिखाई दे रही थी... उनके बीच की झिर्री में कछी इस तरह अंदर घुसी हुई थी जैसे योनि का दिल कछी पर ही आ गया हो...

डर तो किसी बात का था ही नही... मैं लेटी और नितंबों को उकसाते हुए कछी को उतार फैंका और वापस बैठकर जांघों को फिर दूर दूर कर दिया... हाए! अपनी ही योनि के रसीलेपान और जांघों तक पसर गयी चिकनाहट को देखते ही मैं मदहोश सी हो गयी..

मैने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी उंगलियों से योनि की संतरिया फांकों को सहला कर देखा.. फांकों पर उगे हुए हलके हलके भूरे रंग के छ्होटे छ्होटे बॉल उत्तेंजाना के मारे खड़े हो गये.. उंनपर हाथ फेरने से मुझे योनि के अंदर तक गुदगुदी और आनंद का अहसास हो रहा था.... योनि पर उपर नीचे उंगलियों से क्रीड़ा सी करती हुई मैं बदहवास सी होती जा रही थी.. फांकों को फैलाकर मैने अंदर झाँकने की कोशिश की; चिकनी चिकनी लाल त्वचा के अलावा मुझे और कुच्छ दिखाई ना दिया... पर मुझे देखना था......

मैं उठी और बेड पर जाकर ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ गयी.. हां.. अब मुझे ठीक ठीक अपनी जन्नत का द्वार दिखाई दे रहा था.. गहरे लाल और गुलाबी रंग में रंगा 'वो' कोई आधा इंच गहरा एक गड्ढा सा था...

मुझे पता था कि जब भी मेरा 'कल्याण' होगा.. यहीं से होगा...! जहाँ से योनि की फाँकें अलग होनी शुरू होती हैं.. वहाँ पर एक छ्होटा सा दाना उभरा हुआ था.. ठीक मेरी चूचियों के दाने की तरह.. उत्तेजना के मारे पागल सी होकर में उसको उंगली से छेड़ने लगी..

हमेशा की तरह वहाँ स्पर्श करते ही मेरी आँखें बंद होने लगी.. जांघों में हल्का हल्का कंपन सा शुरू हो गया... वैसे ये सब मैं पहले भी महसूस कर चुकी थी.. पर सामने शीशे में देखते हुए ऐसा करने में अलग ही रोमांच और आनंद आ रहा था..

धीरे धीरे मेरी उंगलियों की गति बढ़ती गयी.. और मैं निढाल होकर बिस्तेर पर पिछे आ गिरी... उंगलियाँ अब उसको सहला नही रही थी... बुल्की बुरी तरह से पूरी योनि को ही फांकों समेत मसल रही थी... अचानक मेरी अजीब सी सिसकियो से मेरे कानों में मीठी सी धुन गूंजने लगी और ना जाने कब ऐसा करते हुए मैं सब कुच्छ भुला कर दूसरे ही लोक में जा पहुँची....

गहरी साँसें लेते हुए मैं अपने सारे शरीर को ढीला छ्चोड़ बाहों को बिस्तेर पर फैलाए होश में आने ही लगी थी कि दरवाजे पर दस्तक सुनकर मेरे होश ही उड़ गये....

मैने फटाफट उठते हुए स्कर्ट को अच्छि तरह नीचे किया और जाकर दरवाजा खोल दिया....

"कितनी देर से नीचे से आवाज़ लगा रहा हूँ? मैं तो वापस जाने ही वाला था...अच्च्छा हुआ जो उपर आकर देख लिया... " सामने ज़मींदार का लड़का खड़ा था; सुन्दर!

" क्या बात है? आज स्कूल नही गयी क्या?" सुंदर ने मुझे आँखों ही आँखों में ही मेरे गालों से लेकर घुटनो तक नाप दिया..

"घर पर कोई नही है!" मैने सिर्फ़ इतना ही कहा और बाहर निकल कर आ गयी...

कमीना अंदर जाकर ही बैठ गया,"तुम तो हो ना!"

"नही... मुझे भी अभी जाना है.. खेत में..!" मैने बाहर खड़े खड़े ही बोला...

"इतने दीनो में आया हूँ.. चाय वाय तो पूच्छ लिया करो.. इतना भी कंजूस नही होना चाहिए..."

मैने मुड़कर देखा तो वो मेरे मोटे नितंबों की और देखते हुए अपने होंटो पर जीभ फेर रहा था....

"दूध नही है घर में...!" मैं नितंबों का उभार च्छुपाने के लिए जैसे ही उसकी और पलटी.. उसकी नज़रें मेरे सीने पर जम गयी

"कमाल है.. इतनी मोटी ताजी हो और दूध बिल्कुल नही है.." वह दाँत निकाल कर हँसने लगा...

आप शायद समझ गये होंगे की वह किस 'दूध' की बात कर रहा था.. पर मैं बिल्कुल नही समझी थी उस वक़्त.. तुम्हारी कसम

"क्या कह रहे हो? मेरे मोटी ताज़ी होने से दूध होने या ना होने का क्या मतलब"

वह यूँही मेरी साँसों के साथ उपर नीचे हो रही मेरी चूचियो को घूरता रहा," इतनी बच्ची भी नही हो तुम.. समझ जाया करो.. जितनी मोटी ताजी भैंस होगी.. उतना ही तो ज़्यादा दूध देगी" उसकी आँखें मेरे बदन में गढ़ी जा रही थी...

हाए राम! मेरी अब समझ में आया वो क्या कह रहा था.. मैने पूरा ज़ोर लगाकर चेहरे पर गुस्सा लाने की कोशिश की.. पर मैं अपने गालों पर आए गुलबीपन को छुपा ना सकी," क्या बकवास कर रहे हो तुम...? मुझे जाना है.. अब जाओ यहाँ से..!"

"अरे.. इसमें बुरा मान'ने वाली बात कौनसी है..? ज़्यादा दूध पीती होगी तभी तो इतनी मोटी ताज़ी हो.. वरना तो अपनी दीदी की तरह दुबली पतली ना होती....और दूध होगा तभी तो पीती होगी...मैने तो सिर्फ़ उदाहरण दिया था.. मैं तुम्हे भैंस थोड़े ही बोल रहा था... तुम तो कितनी प्यारी हो.. गोरी चित्ति... तुम्हारे जैसी तो और कोई नही देखी मैने... आज तक! कसम झंडे वाले बाबा की..."

आखरी लाइन कहते कहते उसका लहज़ा पूरा कामुक हो गया था.. जब जब उसने दूध का जिकर किया.. मेरे कानो को यही लगा कि वो मेरी मदभरी चूचियो की तारीफ़ कर रहा है....

"हां! पीती हूँ.. तुम्हे क्या? पीती हूँ तभी तो ख़तम हो गया.." मैने चिड़ कर कहा....

"एक आध बार हमें भी पीला दो ना!... .. कभी चख कर देखने दो.. तुम्हारा दूध...!"

उसकी बातों के साथ उसका लहज़ा भी बिल्कुल अश्लील हो गया था.. खड़े खड़े ही मेरी टांगे काँपने लगी.....

"मुझे नही पता...मैने कहा ना.. मुझे जाना है..!" मैं और कुच्छ ना बोल सकी और नज़रें झुकाए खड़ी रही..

"नही पता तभी तो बता रहा हूँ अंजू! सीख लो एक बार.. पहले पहल सभी को सीखना पड़ता है... एक बार सीख लिया तो जिंदगी भर नही भूलॉगी..." उसकी आँखों में वासना के लाल डोरे तेर रहे थे...

मेरा भी बुरा हाल हो चुका था तब तक.. पर कुच्छ भी हो जाता.. उस के नीचे तो मैने ना जाने की कसम खा रखी थी.. मैने गुस्से से कहा,"क्या है? क्या सीख लूँ.. बकवास मत करो!"

"अरे.. इतना उखड़ क्यूँ रही हो बार बार... मैं तो आए गये लोगों की मेहमान-नवाज़ी सिखाने की बात कर रहा हूँ.. आख़िर चाय पानी तो पूच्छना ही चाहिए ना.. एक बार सीख गयी तो हमेशा याद रखोगी.. लोग कितने खुश होकर वापस जाते हैं.. हे हे हे!" वा खीँसे निपोर्ता हुआ बोला... और चारपाई के सामने पड़ी मेरी कछी को उठा लिया...

मुझे झटका सा लगा.. उस और तो मेरा ध्यान अब तक गया ही नही था... मुझे ना चाहते हुए भी उसके पास अंदर जाना पड़ा,"ये मुझे दो...!"

बड़ी बेशर्मी से उसने मेरी गीली कछी को अपनी नाक से लगा लिया,"अब एक मिनिट में क्या हो जाएगा.. अब भी तो बेचारी फर्श पर ही पड़ी थी..." मैने हाथ बढ़ाया तो वो अपना हाथ पिछे ले गया.. शायद इस ग़लतफहमी में था कि उस'से छीन'ने के लिए में उसकी गोद में चढ़ जाउन्गि....

मैं पागल सी हो गयी थी.. उस पल मुझे ये ख़याल भी नही आया की मैं बोल क्या रही हूँ..," दो ना मुझे... मुझे पहन'नि है..." और अगले ही पल ये अहसास होते ही कि मैने क्या बोल दिया.. मैने शरम के मारे अपनी आँखें बंद करके अपने चेहरे को ढक लिया....

"ओह हो हो हो... इसका मतलब तुम नंगी हो...! ज़रा सोचो.. कोई तुम्हे ज़बरदस्ती लिटा कर तुम्हारी 'देख' ले तो!"

उसके बाद तो मुझसे वहाँ खड़ा ही नही रहा गया.. पलट कर मैं नीचे भाग आई और घर के दरवाजे पर खड़ी हो गयी.. मेरा दिल मेरी अकड़ चुकी चूचियो के साथ तेज़ी से धक धक कर रहा था...

कुच्छ ही देर में वह नीचे आया और मेरी बराबर में खड़ा होकर बिना देखे बोला," स्कूल में तुम्हारे करतबों के काफ़ी चर्चे सुने हैं मैने.. वहाँ तो बड़ी फुदक्ति है तू... याद रखना छोरि.. तेरी माँ को भी चोदा है मैने.. पता है ना...? आज नही तो कल.. तुझे भी अपने लंड पर बिठा कर ही रहूँगा..." और वो निकल गया...

डर और उत्तेजना का मिशरण मेरे चेहरे पर सॉफ झलक रहा था... मैने दरवाजा झट से बंद किया और बदहवास सी भागते भागते उपर आ गयी... मुझे मेरी कछी नही मिली.. पर उस वक़्त कछी से ज़्यादा मुझे कछी वाली की फिकर थी.. उपर वाला दरवाजा बंद किया और शीशे के सामने बैठकर मैं जांघें फैलाकर अपनी योनि को हाथ से मसल्ने लगी.......

उसके नाम पर मत जाना... वो कहते हैं ना! आँख का अँधा और नाम नयनसुख... सुंदर बिल्कुल ऐसा ही था.. एक दम काला कलूटा.. और 6 फीट से भी लंबा और तगड़ा सांड़! मुझे उस'से घिन तो थी ही.. डर भी बहुत लगता था.. मुझे तो देखते ही वह ऐसे घूरता था जैसे उसकी आँखों में क्ष-रे लगा हो और मुझको नंगी करके देख रहा हो... उसकी जगह और कोई भी उस समय उपर आया होता तो मैं उसको प्यार से अंदर बिठा कर चाय पिलाती और अपना अंग-प्रदर्शन अभियान चालू कर देती... पर उस'से तो मुझे इस दुनिया में सबसे ज़्यादा नफ़रत थी...

उसका भी एक कारण था..

करीब 10 साल पहले की बात है.. मैं 7-8 साल की ही थी. मम्मी कोई 30 के करीब होगी और वो हरमज़दा सुंदर 20 के आस पास. लंबा तो वो उस वक़्त भी इतना ही था, पर इतना तगड़ा नही....

सर्दियों की बात है... मैं उस वक़्त अपनी दादी के पास नीचे ही सोती थी... नीचे तब तक कोई अलग कमरा नही था... 18 जे 30 की छत के नीचे सिर्फ़ उपर जाने के लिए जीना बना हुआ था...रात को उनसे रोज़ राजा-रानी की कहानियाँ सुनती और फिर उनके साथ ही दुबक जाती... जब भी पापा मार पीट करते थे तो मम्मी नीचे ही आकर सो जाती थी.. उस रात भी मम्मी ने अपनी चारपाई नीचे ही डाल ली थी...

हमारा दरवाजा खुलते समय काफ़ी आवाज़ करता था... दरवाजा खुलने की आवाज़ से ही शायद में उनीदी सी हो गयी ...

"मान भी जा अब.. 15 मिनिट से ज़्यादा नही लगवँगा..." शायद यही आवाज़ आई थी.. मेरी नींद खुल गयी.. मर्दाना आवाज़ के कारण पहले मुझे लगा कि पापा हैं.. पर जैसे ही मैने अपनी रज़ाई में से झाँका; मेरा भ्रम टूट गया.. नीचे अंधेरा था.. पर बाहर स्ट्रीट लाइट होने के कारण धुँधला धुँधला दिखाई दे रहा था...

"पापा तो इतने लंबे हैं ही नही..!" मैने मॅन ही मॅन सोचा...

वो मम्मी को दीवार से चिपकाए उस'से सटकार खड़ा था.. मम्मी अपना मौन विरोध अपने हाथों से उसको पिछे धकेलने की कोशिश करके जाता रही थी...

"देख चाची.. उस दिन भी तूने मुझे ऐसे ही टरका दिया था.. मैं आज बड़ी उम्मीद के साथ आया हूँ... आज तो तुझे देनी ही पड़ेगी..!" वो बोला.....

"तुम पागल हो गये हो क्या सुन्दर? ये भी कोई टाइम है...तेरा चाचा मुझे जान से मार देगा..... तुम जल्दी से 'वो' काम बोलो जिसके लिए तुम्हे इस वक़्त आना ज़रूरी था.. और जाओ यहाँ से...!" मम्मी फुसफुसाई...

"काम बोलने का नही.. करने का है चाची.. इस्शह.." सिसकी सी लेकर वो वापस मम्मी से चिपक गया...

उस वक़्त मेरी समझ में नही आ रहा था कि मम्मी और सुन्दर में ये छीना झपटी क्यूँ हो रही है...मेरा दिल धड़कने लगा... पर मैं डर के मारे साँस रोके सब देखती और सुनती रही...

"नही.. जाओ यहाँ से... अपने साथ मुझे भी मरवाओगे..." मम्मी की खुस्फुसाहट भी उनकी सुरीली आवाज़ के कारण सॉफ समझ में आ रही थी....

"वो लुडरू मेरा क्या बिगाड़ लेगा... तुम तो वैसे भी मरोगी अगर आज मेरा काम नही करवाया तो... मैं कल उसको बता दूँगा की मैने तुम्हे बाजरे वाले खेत में अनिल के साथ पकड़ा था...." सुंदर अपनी घटिया सी हँसी हँसने लगा....

"मैं... मैं मना तो नही कर रही सुंदर... कर लूँगी.. पर यहाँ कैसे करूँ... तेरी दादी लेटी हुई है... उठ गयी तो?" मम्मी ने घिघियाते हुए विरोध करना छ्चोड़ दिया....

"क्या बात कर रही हो चाची? इस बुधिया को तो दिन में भी दिखाई सुनाई नही देता कुच्छ.. अब अंधेरे में इसको क्या पता लगेगा..." सुंदर सच कर रहा था....

"पर छ्होटी भी तो यहीं है... मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ..." मम्मी गिड़गिडाई...

"ये तो बच्ची है.. उठ भी गयी तो इसकी समझ में क्या आएगा? वैसे भी ये तुम्हारी लाडली है... बोल देना किसी को नही बताएगी... अब देर मत करो.. जितनी देर करोगी.. तुम्हारा ही नुकसान होगा... मेरा तो खड़े खड़े ही निकलने वाला है... अगर एक बार निकल गया तो आधे पौने घंटे से पहले नही छूतेगा.. पहले बता रहा हूँ..."

मेरी समझ में नही आ रहा था कि ये 'निकलना' छ्छूटना' क्या होता है.. फिर भी मैं दिलचस्पी से उनकी बातें सुन रही थी.......

"तुम परसों खेत में आ जाना.. तेरे चाचा को शहर जाना है... मैं अकेली ही जाउन्गी.. समझने की कोशिश करो सुन्दर.. मैं कहीं भागी तो नही जा रही....." मम्मी ने फिर उसको समझाने की कोशिश की....

" तुम्हे मैं ही मिला हूँ क्या? चूतिया बनाने के लिए... अनिल बता रहा था कि उसने तुम्हारी उसके बाद भी 2 बार मारी है... और मुझे हर बार टरका देती हो... परसों की परसों देखेंगे.... अब तो मेरे लिए तो एक एक पल काटना मुश्किल हो रहा है.. तुम्हे नही पता चाची.. तुम्हारे गोल गोल पुत्थे (नितंब) देख कर ही जवान हुआ हूँ.. हमेशा से सपना देखता था कि किसी दिन तुम्हारी चिकनी जांघों को सहलाते हुए तुम्हारी रसीली चूत चाटने का मौका मिले.. और तुम्हारे मोटे मोटे चूतदों की कसावट को मसलता हुआ तुम्हारी गांद में उंगली डाल कर देखूं.. सच कहता हूँ, आज अगर तुमने मुझे अपनी मारने से रोका तो या तो मैं नही रहूँगा... या तुम नही रहोगी.. लो पाकड़ो इस्सको..."

अब जाकर मुझे समझ में आया कि सुन्दर मम्मी को 'गंदी' बात करने के लिए कह रहा है... उनकी हरकतें इतनी सॉफ दिखाई नही दे रही थी... पर ये ज़रूर सॉफ दिख रहा था कि दोनो आपस में गुत्थम गुत्था हैं... मैं आँखें फ़ाडे ज़्यादा से ज़्यादा देखने की कोशिश करती रही....

"ये तो बहुत बड़ा है... मैने तो आज तक किसी का ऐसा नही देखा...." मम्मी ने कहा....

"बड़ा है चाची तभी तो तुम्हे ज़्यादा मज़ा आएगा... चिंता ना करो.. मैं इस तरह करूँगा कि तुम्हे सारी उमर याद रहेगा... वैसे चाचा का कितना है?" सुन्दर ने खुश होकर कहा.. वह पलट कर खुद दीवार से लग गया था और मम्मी की कमर मेरी तरफ कर दी थी....मम्मी ने शायद उसका कहना मान लिया था....

"धीरे बोलो......" मम्मी उसके आगे घुटनो के बल बैठ गयी... और कुच्छ देर बाद बोली," उनका तो पूरा खड़ा होने पर भी इस'से आधा रहता है.. सच बताउ? उनका आज तक मेरी चूत के अंदर नही झाड़ा..." मम्मी भी उसकी तरह गंदी गंदी बातें करने लगी.. मैं हैरान थी.. पर मुझे मज़ा आ रहा था.. मैं मज़ा लेती रही.....

"वाह चाची... फिर ये गोरी चिकनी दो फूल्झड़ियाँ और वो लट्तू कहाँ से पैदा कर दिया.." सुंदर ने पूचछा... पर मेरी समझ में कुच्छ नही आया था....

"सब तुम जैसों की दया है... मेरी मजबूरी थी...मैं क्या यूँही बेवफा हो गयी...?" कहने के बाद मम्मी ने कुच्छ ऐसा किया की सुन्दर उच्छल पड़ा....

"आआआअहह... ये क्या कर रही हो चाची... मारने का इरादा है क्या?" सुंदर हल्का सा तेज बोला.....

"क्या करूँ मैं? मुँह में तो आ नही रहा... बाहर से ही खा लूँ थोड़ा सा!" उसके साथ ही मम्मी भद्दे से तरीके से हँसी.....

"अरे तो इतना तेज 'बुड़का' (बीते) क्यूँ भर रही है... जीभ निकाल कर नीचे से उपर तक चाट ले ना...!" सुन्दर ने कहा.....

"ठीक है.. पर अब निकलने मत देना... मुझे तैयार करके कहीं भाग जाओ..." मम्मी ने सिर उपर उठाकर कहा और फिर उसकी जांघों की तरफ मुँह घुमा लिया....

मुझे आधी अधूरी बातें समझ आ रही थी... पर उनमें भी मज़ा इतना आ रहा था कि मैने अपना हाथ अपनी जांघों के बीच दबा लिया.... और अपनी जांघों को एक दूसरी से रगड़ने लगी... उस वक़्त मुझे नही पता था कि मुझे ये क्या हो रहा है.......

अचानक हमारे घर के आगे से एक ट्रॅक्टर गुजरा... उसकी रोशनी कुच्छ पल के लिए घर में फैल गयी.. मम्मी डर कर एक दम अलग हट गयी.. पर मैने जो कुच्छ देखा, मेरा रोम रोम रोमांचित हो गया...

सुंदर का लिंग गधे के 'सूंड' की तरह भारी भरकम, भयानक और उसके चेहरे के रंग से भी ज़्यादा काला कलूटा था...वो साँप की तरह सामने की और अपना फन सा फैलाए सीधा खड़ा था... लिंग का आगे का हिस्सा टमाटर की तरह अलग ही दिख रहा था. एक पल को तो मैं डर ही गयी थी.. मैने उस'से पहले काई बार छ्होटू की 'लुल्ली' देखी थी.. पर वो तो मुश्किल से 2 इंच की थी... वापस अंधेरा होने के बाद भी उसका आकर मेरी आँखों के सामने लहराता रहा...

"क्या हुआ? हट क्यूँ गयी चाची.. कितना मज़ा आ रहा है.. तुम तो कमाल का चाट'ती हो...!" सुन्दर ने मम्मी के बालों को पकड़ कर अपनी और खींच लिया....

"कुच्छ नही.. एक मिनिट.... लाइट ऑन कर लूँ क्या? बिना देखे मुझे उतना मज़ा नही आ रहा... " मम्मी ने खड़ा होकर कहा...

"मुझे तो कोई दिक्कत नही है... तुम अपनी देख लो चाची...!" सनडर ने कहा....

"एक मिनिट...!" कहकर मम्मी मेरी तरफ आई.. मैने घबराकर अपनी आँखें बंद कर ली... मम्मी ने मेरे पास आकर झुक कर देखा और मुझे थपकी सी देकर रज़ाई मेरे मुँह पर डाल दी...

कुच्छ ही देर बाद रज़ाई में से छन छन कर प्रकाश मुझ तक पहुँचने लगा... मैं बेचैन सी हो गयी.. मेरे कानो में 'सपड सपड' और सुन्दर की हल्की हल्की सिसकियाँ सुनाई दे रही थी... मुँह ढक कर सोने की तो मुझे ऐसे भी आदत नही थी... फिर मुझे सारा 'तमाशा' देखने की ललक भी उठ रही थी...

कुच्छ ही देर बाद मैने बिस्तेर और रज़ाई के बीच थोड़ी सी जगह बनाई और सामने देखने लगी... मेरे अचरज का कोई ठिकाना ना रहा.. "ये मम्मी क्या कर रही हैं?" मेरी समझ में नही आया....

घुटनो के बल बैठी हुई मम्मी ने अपने हाथ में पकड़ कर सुन्दर का भयानक लिंग उपर उठा रखा था और सुन्दर के लिंग के नीचे लटक रहे मोटे मोटे गोलों (टेस्टेस)को बारी बारी से अपने मुँह में लेकर चूस रही थी...

मेरी घिघी बँधती जा रही थी... सब कुच्छ मेरे लिए अविश्वसनीय सपने जैसा था.. मैं तो अपनी पलकें तक झपकना भूल चुकी थी.....

सुन्दर खड़ा खड़ा मम्मी का सिर पकड़ें सिसक रहा था.. और मम्मी बार बार उपर देख कर मुश्कुरा रही थी... सुन्दर की आँखें पूरी तरह बंद थी... इसीलिए मैने रज़ाई को थोडा सा और उपर उठा लिया....

कुच्छ देर बाद मम्मी ने गोलों को छ्चोड़ कर अपनी पूरी जीभ बाहर निकाली और सुन्दर के लिंग को नीचे से शुरू करके उपर तक चाट लिया.. मानो वह कोई आइस्क्रीम हो....

"ओहूऊ... इष्ह... मेरा निकल जाएगा...!" सुंदर की टाँगें काँप उठी... पर मम्मी बार बार उपर नीचे नीचे उपर चाट-ती रही.. सुन्दर का पूरा लिंग मम्मी के थूक से गीला होकर चमकने लगा था..

"तुम्हारे पास कितना टाइम है?" मम्मी ने लिंग को हाथ से सहलाते हुए पूचछा....

"मेरे पास तो पूरी रात है चाची... क्या इरादा है?" सुन्दर ने साँस भर कर कहा...

"तो निकल जाने दो..." मम्मी ने कहा और लिंग के सूपदे पर मुँह लगा कर अपने हाथ को लिंग पर...तेज़ी से आगे पिछे करने लगी...

अचानक सुन्दर ने अपने घुटनो को थोड़ा सा मोड़ा और दीवार से सटकार मम्मी के बालों को खींचते हुए लिंग को उसके मुँह में थूस्ने की कोशिश करने लगा... 'टमाटर' तो मम्मी के मुँह में घुस भी गया था.. पर शायद मम्मी का दम घुटने लगा और उन्होने किसी तरह उसको निकाल दिया...

सुंदर का लिंग मम्मी के चेहरे पर गाढ़े वीर्य की पिचकारियाँ सी छ्चोड़ रहा था.. .. मम्मी ने वापस सूपदे के आगे मुँह खोला और सुन्दर के रस को गटाकने लगी... जब खेल ख़तम हो गया तो मम्मी ने हंसते हुए कहा," सारा चेहरा खराब कर दिया.."

"मैं तो अंदर ही छ्चोड़ना चाहता था चाची... तुमने ही मुँह हटा लिया.." सुन्दर के चेहरे से सन्तुस्ति झलक रही थी....

"कमाल का लंड है तुम्हारा... मुझे पहले पता होता तो मैं कभी तुम्हे ना तड़पति..." मम्मी ने सिर्फ़ इतना ही कहा और सुंदर की शर्ट से अपने चेहरे को सॉफ करने लगी.....

मुझे तो तब तक इतना ही पता था कि 'लुल्ली' मूतने के काम आती है... आज पहली बार पता चला कि 'ये' और कुच्छ भी छ्चोड़ता है.. जो बहुत मीठा होता होगा... तभी तो मम्मी चटखारे ले लेकर उसको बाद में भी चाट'ती रही...

"अब मेरी बारी है... कपड़े निकाल दो..." सुंदर ने मम्मी को खड़ा करके उनके नितंब अपने हाथों में पकड़ लिए....

"तुम पागल हो क्या? परसों को में सारे निकाल दूँगी... आज सिर्फ़ सलवार नीचे करके 'चोद' लो..." मम्मी ने नाडा ढीला करते हुए कहा...

मेरा अश्लील शब्दकोष उनकी बातों के कारण बढ़ता ही जा रहा था...

"मॅन तो कर रहा है चाची कि तुम्हे अभी नगी करके खा जाउ! पर अपना वादा याद रखना... परसों खेत वाला..." सुन्दर ने कहा और मम्मी को झुकाने लगा.. पर मम्मी तो जानती थी... हल्का सा इशारा मिलते ही मम्मी ने उल्टी होकर झुकते हुए अपनी कोहानिया फर्श पर टीका ली और घुटनो के बल होकर जांघों को खोलते हुए अपने नितंबों को उपर उठा लिया...