बिन बुलाया मेहमान compleet

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raj..
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Re: बिन बुलाया मेहमान

Unread post by raj.. » 10 Nov 2014 17:00



.......shaam ko maine gagan se kaha ki chacha ko jaldi se yaha se rafa dafa karo. maine ye bhi bol diya ki uski nazar thik nahi hai.


"arey nidhi chacha ji bhale insaan hain. pata hai baal brham chari hain vo. aaj tak unhone shaadi bhi nahi ki jabki bahut rishte aaye the unhe."


"baal brahm chaari kisne kaha tumhe ye."


chacha ji ne hi bataya. office se aakar main unke kamre mein gaya tha to unse baat huyi thi."


"unki diary padho tumhe sab pata chal jaayega ki kitna bada baal brahm chaari hai vo." maine man hi man kaha.


next day:


agle din gagan office chale gaye aur chacha bhi apna check up karaane hospital chala gaya. ghar ke sabhi kaam nipta kar main bedroom mein rest kar rahi thi to achaanak mera dhyaan chacha ki diary par gaya.


"dekhun to sahi aage kya likha hai us dehati ne."magar agle hi pal dusra vichar aaya, "nahi nahi mujhe aisi gandi baate nahi padhni chaahiye."


phir maine nirnay liya ki main baalig hun agar ye sab padh bhi lun to kya farak padega. dekhun to sahi is chacha ne aur kya gul kheelaye hain.


main uth kar chacha ke kamre mein aa gayi. maine har taraf diary dhundi par mujhe kahi nahi mili. tabhi mujhe khyaal aaya ki kahi usne diary toilet mein to nahi rakh chhodi phir se. main toilet mein aayi to mera shak sahi nikla. diary ko vaha dekhte hi mera chehra gusse se laal ho gaya.


"jaan bujh kar mere liye yaha diary chhod gaya vo. bahut beshram hai ye dehati."
diary le kar main bedroom mein aa gayi aur late kar aage ke panne padhne lagi.

diary ke panno se:


kaise mere lund ko pahli gaand mili: hua yu ki ek din dopahri ko main bhaiya se milne khet ja raha tha. raaste mein khet hi khet the dono taraf. achaanak mujhe kuch awaaj sunayi di. awaaj sunte bhi main ruk gaya. mujhe ahsaas hua ki ho na ho kheton mein jaroor koyi raas lila chal rahi hai. main dabe paanv awaaj ki disa mein chal diya. main vaha pahuncha to dang rah gaya.


babban jo ki sarpanch ka naukar tha uski beti koyal ko thok raha tha. koyal kuttiya bani huyi thi aur babban uski choot mein jor jor se dhakke maar raha tha. ye dekhte hi main aag babula ho gaya. koyal ko kayi baar maine pataane ki kosis ki thi. par usne har baar mera majaak udaaya tha. kahti thi sheese mein shakal dekho jaakar. mujhse raha nahi gaya aur aage badhkar babban ko jor se dhakka diya.


"peeche hat ab main lunga iski." main cheellaya.


"raghav ye kya majaak hai."babban ne kaha.


"babban chup rah tu mujhe is se hisaab baraabar karna hai." maine koyal ki gaand ko kash kar thaam liya. koyal ghabrayi huyi thi. vo turant uth kar khadi ho gayi aur boli, "dafa ho ja yaha se."

"haan chala jaata hun aur tere bapu ko yaha ki teri saari kartut bataata hun. babban to marega hi tu bhi nahi bachegi."main kah kar chal diya.


"ruko raghav..."babban ne awaaj di.


main ruk gaya. "bolo kya baat hai."


"sarpanch ko kuch mat bataana."babban gidgidaya.


"theek hai nahi bataaunga. koyal ko bol chupchaap mere aage jhuk jaaye aakar."


"main aisa hargiz nahi karungi"koyal cheellayi.


"theek hai phir main chala tere bapu ke paas."


"ruko" babban aur koyal dono cheellaye.


main ruk gaya aur vaapis koyal ke paas aa gaya, "chal jhuk mere aage."
koyal ne babban ki taraf dekha aur mere aage jhuk gayi. jaise vo babban ke liye kuttiya bani huyi thi vaise hi mere liye bhi ban gayi. maine uski gaand par jor se tamaacha maara.


"oooohhh...babban ise bol do ki dubara aisa na kare."


"araam se kar na raghav." babban gidgidaya.


maine unki baat unsuni karke koyal ki gaand par phir se jor se chaanta maara. uski gaand laal ho gayi.


"tune kabhi maari hai kya iski gaand?"maine babban ki aur dekhte hue kaha.


"nahi..."babban ne jawaab diya.


"aaj main maarunga hehehe iski gaand." maine kaha.


"nahi mujhe vaha se achha nahi lagta." koyal giDgiDaai


"chup kar. teri pasand puchi kya kisi ne"


maine apna lund baahar nikaala aur use koyal ki gaand par ragaDne laga.


"ander mat daalna. mujhe achha nahi lagta."koyal ne peeche mud kar kaha. magar jab uski nazar mere lund par padi to uski aankhe phati ki phati rah gayi.


"hey bhagvaan ye to bahut bada hai. kisi ka itna bada kaise ho sakta hai." koyal ne hairani mein kaha.


babban bhi aankhe phaade mere lund ko dekh raha tha.



maine apne lund par bahut saara thook laga liya aur koyal ki gaand ko faila kar lund uske ched par rakh diya.


"nahi jaayega ye ander. jab babban ka nahi gaya to itna bada kaise jaayega." koyal gidgidayi


maine swaliya nazro se babban ki taraf dekha.

kramashah…………………………………


raj..
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Re: बिन बुलाया मेहमान

Unread post by raj.. » 11 Nov 2014 08:14

बिन बुलाया मेहमान-4

गतान्क से आगे……………………

"एक बार कॉसिश की थी मैने इसकी गान्ड में डालने की पर बहुत कॉसिश करने पर भी नही गया था."बब्बन ने कहा.

"आज जाएगा तू चिंता मत कर. देखता हूँ ये गान्ड मेरे लंड को रास्ता कैसे नही देती." मैने फिर से ज़ोर से चाँटा मारा कोयल की गान्ड पर.

"तू इधर आ और इसकी गान्ड को फैला मेरे लंड के लिए."मैने बब्बन से कहा.

बब्बन ने पास आकर कोयल की गान्ड को मेरे लिए फैला दिया.

"तू इसके छेद पर थूक गिरा दे जितना हो सके. मैं अपने लंड को चिकना करता हूँ." मैने कहा.

बब्बन ने ढेर सारा थूक गिरा दिया कोयल की गान्ड के छेद पर. मैने भी अपने लंड को खूब चिकना कर लिया.

अपने चिकने लंड को मैने कोयल की गान्ड के चिकने छेद पर रख दिया और ज़ोर से धक्का मारा.

"ऊओय्य्यीई माई मर गयी निकालूऊओ बाहर इसे." कोयल चिल्लाई.

"चुप कर अभी तो तुझे पूरा लंड लेना है" मैने एक और धक्का मारते हुए कहा.

कोयल चिल्लाति रही और मैं लंड अंदर घुसाता रहा. जब अंडकोस तक लंड उसकी गान्ड में उतर गया तो मैने कहा, "अरे वाह कोयल. तूने तो पूरा ले लिया गान्ड में हहेहहे."

"ऊओह मुझे ही पता है कैसे लिया है."कोयल ने कहा.

"बब्बन तू फैला कर रख इसकी गान्ड अब मैं इसे मारने जा रहा हूँ हहेहहे." मैने कहा

मैने कोयल की गान्ड मारनी सुरू कर दी. पूरा निकाल कर मैं वापिस अंदर डाल रहा था. कोयल अब मस्ती मे झूम रही थी. उसकी सिसकिया खेत में गूँज रही थी. बहुत देर तक मैं यू ही मारता रहा कोयल की गान्ड.

"अब बस भी कर मेरे हाथ थक गये हैं."बब्बन ने कहा.

"तू हट जा. अब मेरे लंड ने अच्छा रास्ता बना दिया है." मैने कहा और अपने लंड के धक्के लगाता रहा.

मुझे बहुत ज़्यादा मज़ा आ रहा था. ये मज़ा किसी मायने में भी चूत से कम नही था. उस दिन मुझे आश्चर्य हुआ कि गान्ड मारने में भी इतना मज़ा आता है. कोयल की गान्ड बहुत टाइट थी. लंड बहुत मुस्किल से घुसा था उसमे और वो मेरे लंड को बहुत अच्छे से पकड़ रही थी. भीड़े रास्ते में लंड को घुमाने का अपना ही मज़ा है ये मैं जान गया था.

जब मज़ा बर्दस्त से बाहर हो गया तो मैने अपनी स्पीड बहुत तेज कर दी और तेज तेज धक्के लगाते हुए कोयल की गान्ड को अपने पानी से भर दिया. जब मेरा पानी छूटा तो मैने पाया कि बब्बन बड़ी ललचाई नज़रो से कोयल की गान्ड को निहार रहा है. मैने कोयल की गान्ड से लंड बाहर निकाल लिया. मेरे निकालते ही बब्बन ने एक ही झटके में अपना लंड कोयल की गान्ड में डाल दिया. उसने भी थोड़ी देर में अपना पानी कोयल की गान्ड में छ्चोड़ दिया.

इस तरह मुझे पहली बार गान्ड मारने का मोका मिला. पहली गान्ड की चुदाई मुझे हमेशा याद रहेगी.

...............................

मैं डाइयरी पढ़ कर हटी तो मेरी हालत बहुत खराब हो रही थी. कब मेरी योनि गीली हो गयी थी मुझे पता ही नही चला था. मैं शरम और ग्लानि से भर गयी थी.

"वहाँ से सेक्स करता है क्या कोई छी. ये देहाती सच में बहुत गंदा है."

मैं फॉरन बिस्तर से उठी और उठ कर डाइयरी को वापिस टाय्लेट में रख आई.

मैं वापिस कमरे में आई तो अंजाने में ही मेरे हाथ मेरे नितंबो पर चले गये. "क्या इन्हे सेक्स के लिए यूज़ कर सकते हैं. गगन से बात करूँगी इस बारे में. मुझे तो ये बहुत गंदी और भद्दी बात लगती है"

...........चाचा की डाइयरी में अनल सेक्स के बारे में पढ़ कर मन में अजीब सी हलचल हो रही थी. अचानक मन में ख्याल आया कि अगर गगन ने कभी मेरे साथ अनल सेक्स करने की कॉसिश की तो क्या मैं उन्हे करने दूँगी?

मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नही था. गगन सेक्स के दौरान मेरे नितंबो के गुम्बदो से खूब खेलते थे और उन्हे भरपूर मसल्ते थे मगर अभी तक उन्होने कभी भी वहाँ अपना लिंग डालने की कॉसिश नही की थी. मगर जब भी गगन मेरे नितंब के गुम्बदो को मसल्ते थे तो मुझे बहुत अच्छा लगता था.

रात को मैने गगन से बातो बातो में पुछा,"गगन क्या कोई अनल सेक्स भी करता होगा"

"हां मेरा दोस्त राजीव खूब अनल सेक्स करता है अपनी बीवी के साथ उसकी मर्ज़ी के बिना और खुश हो कर बताता भी है इस बारे में.मुझे बिल्कुल पसंद नही अनल सेक्स क्योंकि वो मुझे गंदा लगता है और लड़कियों को पसंद भी नही आता क्योंकि बहुत पेनफुल रहता है. वैसे तुम ये सब क्यों पूछ रही हो."

"यू ही पूछ रही थी." मैने कहा.

"तुम डरो मत तुम्हे वो सब नही सहना पड़ेगा. मुझे अनल सेक्स बिल्कुल पसंद नही है." गगन ने कहा.

आगे मैने इस बारे में कोई बात नही की.

चाचा को 2 हफ्ते हमारे साथ ही रुकना था. डॉक्टर ने उन्हे 2 हफ्ते बाद फिर से बुलाया था. ये खबर मेरे लिए बहुत दुखदायी थी. मैं जल्द से जल्द चाचा को घर से दफ़ा कर देना चाहती थी. गगन के जाने के बाद मुझे उसकी हवस भरी निगाहों का सामना करना पड़ता था.

डाइयरी वो रोज टाय्लेट में ही छोड़ने लगा था. 3 दिन में मैने पूरी डायरी पढ़ ली. डायरी आधी भरी हुई थी. चौथे दिन जब मैने उत्सुकता में डाइयरी उठाई तो मेरे पाँव के नीचे से ज़मीन निकल गयी. मेरा सर घूमने लगा. चाचा ने मेरे बारे में लिख रखा था.

raj..
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Re: बिन बुलाया मेहमान

Unread post by raj.. » 11 Nov 2014 08:14

डाइयरी के पन्नो से:

निधि बहुत सुंदर है. इतनी सुंदर लड़की मैने आज तक नही देखी. भगवान ने बहुत फ़ुर्सत से बनाया लगता है निधि को. मैं तो निधि की सूरत देखते ही उस पर फिदा हो गया था. इतना सुंदर चेहरा हर किसी को नही मिलता.

होन्ट बहुत प्यारे हैं निधि के. हर वक्त कामुक रस टपकता रहता है उसके होंटो से. ख़ुसनसीब है गगन जो कि उसे इतने रसीले होन्ट चूसने को मिलते हैं.

निधि की चुचियों की तो बात ही निराली है. जब वो चलती है तो दोनो चुचियाँ कामुक अंदाज़ में उपर नीचे हिलती हैं. दिल बैठ जाता है मेरा उन्हे यू हिलते देख कर. चुचियों की मोटाई और गोलाई एक दम मस्त है. जो भी उन्हे देखता होगा उसके मूह में पानी आ जाता होगा. जैसे मेरे मूह में आ जाता है.

निधि की गान्ड के बारे में क्या लिखूं कुछ समझ नही आ रहा. कातिल गान्ड है निधि की. मेरे दिल का कतल कर दिया निधि की गान्ड ने. इतनी मस्त गान्ड मैने आज तक नही देखी. जब वो चलती है तो गान्ड के दोनो गोल गोल तरबूज बहुत कामुक अंदाज में हिलते हैं. नपुंसक के लंड को भी खड़ा कर सकती है निधि की गान्ड. मेरा तो निधि की गान्ड के बारे में सोच कर ही बुरा हाल हो जाता है. लंड बिठाए नही बैठता.

मुझे पूरा यकीन है कि इस अप्सरा की चूत भी कम कातिल नही होगी. बल्कि वो तो सबसे ज़्यादा कयामत ढाती होगी.

लेना चाहता हूँ एक बार निधि की पर जानता हूँ कि ये मुमकिन नही है. गगन की बीवी है वो और मेरी बेटी के समान है. इसलिए उसकी लेने का ख्वाब हमेशा ख्वाब ही रहेगा. पर मुझे ख़ुसी है कि ऐसी सुंदर अप्सरा के साथ मुझे एक ही घर की छत के नीचे रहने का मोका मिला.

डाइयरी पढ़ने के बाद मुझे समझ में नही आ रहा था कि कैसे रिक्ट करूँ. मेरे बारे में बहुत गंदी गंदी बाते लिख रखी थी चाचा ने डाइयरी में.

"इसका मतलब ये देहाती हर वक्त मुझे घूरता रहता है. कितना बेशरम है ये." मैने सोचा.

डाइयरी टाय्लेट में ही रख कर मैं बाहर आ गयी. मैं बहुत गुस्से में थी. लेकिन चाह कर भी मैं चाचा को कुछ नही कह सकती थी. मैं अपने बेडरूम में घुस ही रही थी कि चाचा ने पीछे से आवाज़ दी.

"बेटी आज का अख़बार नही मिल रहा. क्या तुम्हारे पास है."

"आप यहाँ अख़बार पढ़ने आए हैं या इलाज कराने. मुझे नही पता की अख़बार कहाँ है."मैने गुस्से में कहा.

"गुस्सा क्यों कर रही हो. तमीज़ से बात करो. घर आए मेहमान से क्या ऐसे बात की जाती है." चाचा ने कहा.

"हे दफ़ा हो जाओ यहाँ से जल्द से जल्द वरना इस से भी बुरा बर्ताव करूँगी मैं. हमारा ही घर मिला था तुम्हे...पूरी देल्ही में." मैं चिल्लाई.

चाचा बिना कुछ कहे मेरी तरफ बढ़ा. उसकी आँखे गुस्से से लाल हो रखी थी.

मैं अपनी जगह खड़ी रही. मैं खुद बहुत गुस्से में थी. जानती थी कि मेहमान के साथ ऐसा बर्ताव नही करना चाहिए पर उसने मुझे मजबूर कर दिया था.

"तुम्हे तमीज़ नही सीखाई क्या तुम्हारे मा बाप ने."चाचा ने कहा.

"उस से तुम्हे कोई मतलब नही है. मेरे मा बाप को बीच में मत लाओ और जल्द से जल्द यहाँ से दफ़ा हो जाओ." मैने गुस्से में कहा.

चाचा ने तुरंत आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया और उसे मरोड़ दिया. मैं दर्द से कराह उठी पर वो नही रुका. जैसे जैसे वो हाथ मरोड़ रहा था मैं घूमती जा रही थी और जब वो रुका तब मेरी पीठ उसकी तरफ हो गयी थी.

"छ्चोड़ो मुझे...ये क्या कर रहे हो?" मैने कहा.

"तुम्हे तमीज़ सीखा रहा हूँ. बोलो दुबारा बोलोगि इस तरह मुझसे." चाचा ने कहा.

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई...छ्चोड़ो मुझे." मैं छटपटा रही थी. मेरे हाथ में बहुत दर्द हो रहा था.

अचानक चाचा का दूसरा हाथ मुझे मेरे नितंबो पर महसूस हुआ. मेरे रोंगटे खड़े हो गये.

"छ्चोड़ो मुझे...क्या कर रहे हो."

"बहुत मुलायम है...रोज देखता था इसे प्यार से आज हाथ लगाने का मोका मिला हहेहहे."

"हाथ हटा लो अपना वरना मुझसे बुरा कोई नही होगा." मैं चिल्लाई.

पर वो नही रुका. वो बारी बारी से मेरे नितंबो की दोनो गोलाइयों को दबोच रहा था. मैं सूट और सलवार पहनी हुई थी जिस कारण वो बहुत अच्छे से मेरे नितंबो को महसूस कर रहा था. अचानक जब मेरे नितंबो की दरार में उसने अपनी उंगली डाली तो मैं सिहर उठी. मैं थर थर काँपने लगी.

क्रमशः………………………