कायाकल्प - Hindi sex novel

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sexy
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Re: कायाकल्प - Hindi sex novel

Unread post by sexy » 03 Oct 2015 03:24

मैं उसकी गर्दन से होते हुए नीचे कि तरफ जाकर उसके सीने के ऊपरी हिस्से चूमने लगा। नीचे बढ़ते हुए मैंने उसके स्तनों के बीच के हिस्से, उनके नीचे और आसपास चूमा और जीभ से छेड़ा। संध्या की सांस अब काफी बढ़ गयीं थीं और उसकी आँखें कास कर बंद हो गयी थीं। उसके दोनों हाथ अभी भी उसके बगल में ही थे, लेकिन उन्माद में उसकी मुट्ठियां बंध गयीं थीं। मैंने एक और बात देखी, और वह यह कि उसने अपनी कामुक अवचेतना में अपनी टाँगे थोड़ी खोल दी थीं जिससे मैंन उसके योनि-क्षेत्र का अन्वेषण कर सकूं, मैंने अभी तक उसके स्तनों पर अपना कार्य समाप्त नहीं किया गया था।

मैंने उसके एक निपल पर अपनी जीभ फिराई – संध्या ने कांपते हुए तेज़ सांस भरी। उसकी छाती एकदम से ऊपर उठ गयी, जिससे उसका स्तन मेरे मुंह में अनायास ही भर गया। मैंने उसके चेहरे को देखा, उसकी आँखें अभी भी कस कर बंद थीं, लेकिन सांस भरने के कारण उसके होंठ थोड़ा जुदा थे। मैंने पुनः उसके निपल को चाटा तो एक बार फिर से उसकी छाती मेरे उठ कर मेरे छेड़ते हुए मुंह में भर गयी। मैंने उस निपल को मुंह में भरा और धीरे से चूसने, चबाने और काटने लगा। उसकी साँसे अब और अधिक तेजी से चलने लगीं साँस ले रहा था और बेचैनी में अपने सर को इधर उधर चलाने लगी। ऐसा करने से उसके बाल बिस्तर पर फ़ैल गए। वाह! क्या गज़ब की सेक्सी लग रही थी वह! कुछ देर उसके स्तन को इसी प्रकार छेड़ने के बाद मैंने दूसरे स्तन पर भी यही क्रिया आरम्भ कर दी, लेकिन पहले वाले स्तन को छोड़ा नहीं – उसको अपने हाथ से लगातार मसलता, दुलारता रहा। संध्या की कामोत्तेजना देखने लायक थी – उसका पूरा शरीर कसमसाने लगा, और उसने अपने दोनों पैर और ऊपर खींच लिए थे। मैंने समय देख कर उसके स्तन को छोड़ा और ऊपर पहुँच कर होंठ पर उसे चूमा। संध्या ने पहले की तुलना में कहीं अधिक शक्ति के साथ मेरे मुंह में अपनी जीभ डाल कर मुझे वापस चूमा। उसने उन्माद में आ कर मुझे पकड़ लिया था।

कुछ देर ऐसे ही चूमने के बाद मैंने पुनः उसके स्तनो का भोग लगाना आरम्भ कर दिया। उसके शरीर पर वह दोनों स्वादिष्ट स्तन जिस तरह से परोसे हुए थे, मैं ही क्या, कोई भी होता तो अपने आपको रोक न पाता। मुझे लगा कि संध्या कुछ कुछ कह रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ मेरे एक तो स्तनपान कि क्रिया के कारण धीरे-धीरे आ रही थी और ऊपर से मेरे स्वयं के उन्माद के कारण मुझे लग रहा था कि बहुत दूर से आ रही है।

“हँ?” मैंने बड़े प्रयास के बाद उसके स्तन से मुंह हटा कर पूछा।

“काश ………. इनमें ….. दूध होता …” संध्या ने दबी हुई आवाज़ में कहा।

‘वाकई! काश इनमे दूध होता!’ मैंने सोचा, तो मुंह में और स्वाद आ गया। मैंने और जोश में आकर उनको चूमना, चूसना और दबाना जारी रखा। मैंने कब तक ऐसा किया मुझे ध्यान नहीं, लेकिन एक समय ऐसा भी आया की संध्या दर्द भरी सिसकी भरने लगी। मुझे समझ आ गया की अब दूसरे स्तन की बारी है, और यही क्रिया उस पर भी आरम्भ कर दी। निश्चित तौर पर अब तक संध्या का संकोच समाप्त हो चला था, और वह कामुक आनंद से पूर्णतया अभिभूत हो गयी थी।

अब आगे बढ़ने का समय हो चला था। मैं उसके पेट को लगातार चूमते हुए उसके गुप्तांग तक पहुँचने लगा। मेरे हर चुम्बन के जवाब में संध्या कसमसाने लगती। इस समय उसके दोनों हाथ मेरे बालों में घुस कर मेरे सर को कभी पकड़ते तो कभी सहलाते। मैं चूमते हुए जल्दी ही उसकी योनि तक पहुँच गया। मैंने उसके जघन क्षेत्र को चूमा तो संध्या ने अपने कूल्हों को मेरे मुंह में ठेल दिया। मैंने अपनी जीभ से कुछ देर चाटा। उसकी योनि के इतने करीब होने के कारण मैं उसकी मंद स्त्रैण-गंध सूंघ सकता था। मेरा लिंग अविश्वसनीय ढंग से कड़ा हो गया था, और मैं चाहता था कि संध्या उसको महसूस कर सके।

ऐसे ही समय के लिए महान ऋषि वात्स्यायन जी ने “कोकिला योग” कि खोज की थी। कोकिला – जिसको आज कल कि भाषा में 69 कहा जाता है। “69” सम्भोग क्रीड़ा के पूर्व का वह कामुक विन्यास है जो आप और आपके साथी को, एक दूसरे को, एक साथ मौखिक सेक्स देने के लिए अनुमति देता है। इस योग में आप और आपका साथी अपने मुंह से एक दूसरे के जननांगों को एक अभूतपूर्व निजता के साथ काम-सुख प्रदान कर सकते हैं। अतः, मैं उठ कर पूरी तरह से संध्या के ऊपर औंधा हो गया – जिससे मेरे दोनों पाँव उसके दोनों तरफ रहे और मेरा मुंह उसकी योनि पर और मेरा लिंग संध्या के मुंह के सामने रहे।

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Re: कायाकल्प - Hindi sex novel

Unread post by sexy » 03 Oct 2015 03:24

“अ … अ … आप क … क … क्या कर रहे ह … हैं?” संध्या के मुख से अस्फुट से स्वर निकले। पता नहीं उसको कैसा लगेगा, जब वह अपने चेहरे के सामने मेरा चूतड़ देखेगी! मेरी एकमात्र उम्मीद यह थी कि संध्या मेरे लिंग पर अपना ध्यान केंद्रित करे, न कि किसी अन्य हिस्से पर।

“जो मैं कर रहा हूँ, आप भी वही करो।” मैंने भी हाँफते हुए कहा, और अपने नितम्ब को नीचे कि तरफ दबाया जिससे मेरा लिंग उसके मुख के पास पहुँच जाए। संध्या पहले भी मेरा लिंग अपने मुंह में ले चुकी थी, अतः उसको दोबारा यह करने में कोई समस्या नहीं हुई। अगले ही छण मुझे अपने लिंग पर एक गर्म, नम और मखमली एहसास हुआ।

संध्या की योनि पहले से ही रसीली हो गयी थी। मैंने अपने अंगूठों से उसकी योनि द्वार को सरकाया और अपनी जीभ को उसकी स्वादिष्ट योनि द्वार में सरका दिया। स्त्रियों के गुप्तांग (मूलाधार, भगशेफ और योनि) बहुत संवेदनशील होते हैं और मामूली उत्तेजन से भी कामुक प्रतिक्रिया दिखाने लगते हैं। अतः मैंने अपनी जीभ को सौम्य और धीमी गति से चलना शुरू किया – ठीक इस प्रकार जैसे कि आइसक्रीम को चाटा जाता है। मैंने धीरे धीरे शुरुआत करके, चाटने की गति बढ़ा दी – और साथ ही साथ चाटने का तरीका और चाटने का दबाव भी बदलता रहा। मैंने धीरे-धीरे, अपनी उँगलियों से उसके भगोष्ठ को फैला कर उसकी स्वादिष्ट योनि के अंदर अपनी जीभ से अन्वेषण किया और ऐसा करने से मैंने उसके समस्त कामुक क्रोड़ के तार झनझना दिए।

हांलाकि संध्या के मुख में मेरा लिंग था लेकिन फिर भी मुझे उसके गले से निकलती संतुष्टि की सिसकारी सुनायी दी। उसने कुछ देर तक तो शिश्नाग्र को चाटा और चूसा, लेकिन जैसे जैसे वह चरम सुख तक पहुँचने लगी, उसकी क्रिया धीमी पड़ गयी। कुछ देर में उसका सर पीछे की तरफ लुढ़क गया। संध्या अपनी कामेन्द्रियों पर होने वाले इस इस भारी भरकम हमले से अभिभूत हो गयी। वह इस समय मुंह से साँसे भर रही थी। उसके लिए यह निश्चित रूप से स्वर्ग की सैर करने जैसा था।

मुझे वैसे भी अपना वीर्य संध्या की योनि के अंदर डालना था – याद है न, उसकी माँ का आदेश था! अपने स्खलन के तुरंत बाद ही संध्या ने मेरा लिंग अपनी कोमल उँगलियों से पकड़ लिया था। मेरे उन्माद की भी यह सीमा ही थी। अगर वह आठ-दस बार मेरे लिंग को दबा ही देती तो मैं स्खलित हो जाता। अतः मैं जल्दी से अपनी अवस्था से हट गया और वापस पहले जैसे ही उसके सामने बैठ गया। मैंने कुछ एक क्षण गहरी साँसे भरी, जिससे की अपने लिंग पर मुझे और व्यापक नियंत्रण मिल सके।

इसी विराम वेला में मैंने संध्या को देखा – एक तरुण, विवाहित, और सम्भोग-तृप्त हिन्दू नारी का सौंदर्य अतुलनीय होता है। संध्या का दोषरहित, सुन्दर और नितांत नग्न शरीर – उसकी छाती पर सजे हुए प्यारे स्तनों का जोड़ा, एकहरा शरीर, सुडौल नितम्ब, और स्वस्थ, नरम जांघें (जो इस समय मेरे दोनों तरफ फैली हुई थीं); हाथों में रची मेहंदी और चूड़ियाँ, गले में मंगलसूत्र, कानो में कर्णफूल, नाक में एक छोटी सी चमकती हुई कील, मांग में नारंगी सिन्दूर और फैले हुए बाल – वह इस समय स्वयं रति देवी का ही रूप लग रही थी।

मैंने उसका चेहरा अपने दोनों हथेलियों में लेकर उसके होंठों पर एक भरपूर चुम्बन दिया और कहा, “वाह! तुम एक बहुत खूबसूरत लड़की हो!” अब तक मेरी साँसे मेरे नियंत्रण में आ गयी थीं और मेरा लिंग भी। उसकी उत्तेजना बरकरार थी लेकिन बेकाबू नहीं। फिर मैंने संध्या कि टाँगे सावधानी से अलग करीं और जगह बनायी और अपने लिंग को हाथ में लेकर उसकी योनि में धीरे धीरे सरका दिया। लिंग का सर अपने गंतव्य में प्रवेश कर चुका था।

“आर यू रेडी?” मैंने संध्या से पूछा। उसने तेजी से सर हिला कर हामी भरी।

योनि बुरी तरह से चिकनी थी, अतः लिंग को कोई भी प्रतिरोध नहीं मिलना था। वैसे भी संध्या अभी अभी संपन्न हुए सम्भोग कि पृष्ठभूमि में लस्त पड़ी हुई थी। उसको जागृत करने के लिए इससे अच्छा तरीका और नहीं हो सकता था। मैंने अपने लिंग को एक तेज़ धक्का दिया – दो बातें एक साथ हुईं – एक तो संध्या के मुख से एक लम्बी सीत्कार निकल गयी और दूसरा, चूंकि मेरा लिंग अभूतपूर्व तरीके से स्तंभित था, इसलिए संध्या के योनि मार्ग ने अत्यंत शानदार तरीके से मेरे लिंग कि पूरी लम्बाई को जकड लिया। मैंने बिना रुके धक्के लगाना आरम्भ कर दिया और नीचे से संध्या ने अपने धक्को से उनका मिलान करना। मैंने संध्या के चेहरे को देखा। उसकी आँखें बंद थीं और उसके होठ कामुकता से पृथक थे। हम दोनों ही इस रति-क्रिया का बराबर आनंद ले रहे थे।

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Re: कायाकल्प - Hindi sex novel

Unread post by sexy » 03 Oct 2015 03:24

संध्या अपने नितम्बो को इस समय न केवल ऊपर नीचे, वरन, एक गोल गति में भी घुमा रही थी – इससे मेरे लिंग का दो-आयामी दोहन होने लगा था। इससे उसके भगनासे का भी बराबर उत्तेजन हो रहा था। उसकी गति भी बढ़ने लगी थी – सम्भवतः वह दूसरी बार स्खलित होने वाली थी। यह तो एकदम अद्भुत घटना थी। लेकिन मैंने सपने हाथों से उसके नितम्बो को पकड़ कर उसकी गति को थोडा नियंत्रण में लाया। मैं चाहता था कि हमारा यह सम्भोग थोडा और देर तक चले। उसकी गति पर तो मैं बस कुछ ही पल ठहर पाता। कुछ देर तक हम नियंत्रित रहे लेकिन पुनः संध्या कि गति तेज हो गयी – इस बार मैंने उसको रोका नहीं, बल्कि मैंने खुद भी अपनी गति बढ़ा दी।

“कम ऑन स्वीटी! कम विद मी!” मुझे मालूम पड़ गया था कि अब हम दोनों ही स्खलन के बेहद करीब हैं। अतः मेरी इच्छा यह थी कि हम दोनों साथ साथ आयें।

“कम ऑन गर्ल! कम फॉर मी!”

मैंने यह बहुत ऊंची आवाज़ में बोला था। भगवान् ही जाने कि बगल के कमरे में बैठे मेरे ससुराल वाले क्या सोच रहे होंगे। मेरी हर ‘कम ऑन’ पर संध्या के धक्के और तीव्र हो जा रहे थे – वह मेरा मंतव्य समझ रही थी। उसके उसके नाखून मेरी पीठ में गड़ने लगे थे – लेकिन मुझे यह पीड़ा भी इस समय मनोहर लग रही थी।

अचानक ही मैंने उसकी योनि में एक बदलाव महसूस किया – उसकी दीवारें तेजी से संकुचित / कम्पित होने लगीं और योनि रस की एक धारा मेरे लिंग को भिगोने लगी। पहले संध्या ने हलकी हलकी सिसकारी भरी और फिर एक बड़ी सांस भरी। उसके बाद एक लम्बी “आँह” जैसी आवाज़ आयी। मुझे अच्छा लगा कि संध्या अब अपने रति-निष्पत्ति के आनंद का निर्लज्ज्ता से आस्वादन करने लगी है। उसके बाद कोई चार पांच धक्कों में मेरे स्खलित वीर्य का पहला माल बड़ी प्रचंडता से मेरे लिंग से निकल कर संध्या की गहराई में चला गया। संध्या ने भी इसको महसूस किया होगा, क्योंकि उसी के साथ उसने भी उच्च स्वर में सांस भरी। संध्या कि रति निष्पत्ति का उन्माद अभी बस शुरू ही हुआ था – उसने अपने दोनों पैर मेरे इर्द-गिर्द कस कर जकड लिए और पूरे जोश से धक्के लगाने लगी। उसके हर धक्के के साथ मैंने वीर्य का कुछ कुछ माल उसकी योनि में छोड़ा। उसकी योनि मेरे लिंग पर कुछ इस तरह संकुचित को रही थी जैसे उसको पूर्णतयः दुह लेगी – और उसने किया भी वही। कुछ देर ऐसे ही करने के बाद हम दोनों पूरी तरह से निढाल पड़ गए।

मैं संध्या के बगल ही गिर गया – उसके शरीर कि तपन को मैं महसूस कर पा रहा था। इस ठंडक में भी हम दोनों का शरीर पसीने से ढक गया था। हम दोनों ही जम कर हांफ रहे थे। मैंने उसको अपनी बाँह के घेरे में लेकर कस के पकड़ लिया। हम न जाने कब तक ऐसे ही पड़े रहे, और जब चेतना लौटी तो हम लोग पुनः एक दूसरे को चूमने लगे – लेकिन इस बार कोमलता से।

अंततः मैंने उसके कोमल होंठो को चूमना छोड़ कर उससे पूछा, “सो गर्ल, डू यू लाइक मेकिंग लव?”

संध्या ने थोड़ी देर सोचकर कहा, “यस, ओह यस!” उसकी आँखें चमक रही थीं। संध्या को इस तरह से खुश देखना बहुत ही सुखदाई था।

आज का पूरा दिन हमारी विदाई की तैयारियों में ही बीत गया।

सुबह सवेरे ही सबसे पहला कार्य हमारी शादी का पंजीकरण करवाने का किया। मैंने नहा-धो कर पैन्ट-शर्ट और शाल पहनी, और संध्या ने साड़ी ब्लाउज और स्वेटर! पंजीकरण का कार्य पड़ोस के बड़े कसबे में होना था, इसलिए दफ़्तर खुलने से पहले ही हम सब वहां पहुँच गए। इतने मामूली काम के लिए भी पूरी मंडली साथ आई – कहने का मतलब यह काम सिर्फ 2 गवाह और मियां-बीवी के रहने मात्र से ही हो जाता है। खैर, हमने दफ़्तर के बगल ही एक ढाबे में नाश्ता किया और सबसे पहले अपना नंबर लगवा दिया। विवाह के अभिलेखी (रजिस्ट्रार) बहुत ही मज़ेदार व्यक्ति थे – उन्होंने हम सबको चाय पिलाई, समोसे खिलाए और अपने अनुभव की कई सारी मज़ेदार बातें बतायीं। उनके साथ बहुत देर तक बात चीत करने के बाद हमने उनकी अनुमति मांगी, जिसके उत्तर में उन्होंने हमको दफ़्तर के दरवाजे तक छोड़ा और एक बार फिर से हम दोनों को हमारी शादी की बहुत बहुत बधाइयाँ दी। करीब दोपहर तक वापस आते हुए हमने संध्या के स्कूल में जा कर उसका पहचान पत्र बनवाया और घर वापस आ गए।