दो भाई दो बहन compleet

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raj..
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Re: दो भाई दो बहन

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 03:37

7

गतान्क से आगे.............

रोमा अब उसके लंड को पूरा अपने गले तक लेकर चूस रही थी, "ऑश

रोमा ऐसी हीईिइ चूऊसो." राज की नसों का तनाव बढ़ने लगा. वो

रोमा के चेहरे को पकड़ जोरों से अपने लंड को उसके मुँह के अंदर

बाहर करने लगा. रोमा के मुँह के थूक से उसकी पूरी जंघे गीली हो

गयी थी.

"रोमा अपनी ज़ुबान को मेरे लंड पर उपर से नीचे तक फिराओ." राज ने

कहा.

रोमा ने उसके लंड को अपने मुँह से बाहर निकाल दिया, "तुम हर वक़्त

क्या लिखते रहते हो." उसने इस तरह पूछा की जैसे उसे कुछ मालूम

ही नही हो.

रोमा ने पहले उसकी गोलियों को मुँह मे लेकर चूसा फिर अपनी ज़ुबान

को उसके लंड के नीचे से उपर तक फिराने लगी. एक अजीब सी गुदगुदी

राज के शरीर और लंड मे पैदा हो गयी. वो सोचने लगा कि रोमा को

क्या कहे, अगर उसे सचाई का पता चल गया तो वो क्या सोचेगी.

"कुछ नही सिर्फ़ मेरे ख़याल जिन्हे में एक कहानी का रूप दे देता

हूँ" उसने सच को छुपाते हुए कहा. कल्पना अपने आप मे ख़याल ही तो

है.

रोमा अपनी ज़ुबान फिराते हुए उपर की ओर आई और उसके सिर्फ़ सूपदे को

अपने मुँह मे ले चूसने लगी. फिर अपनी ज़ुबान नीचे की ओर कर

चाटते हुए उपर को आई और फिर सूपदे को चूसने लगी. गाढ़ा वीर्य

उसके लंड से निकलने लगा. वो उसे चाट गयी स्वाद ज़रूर खारा सा था

लेकिन उसे अच्छा लग रहा था. अपने भाई को खुशी देने मे उसे मज़ा

आ रहा था.

"क्या लड़कियों के बारे मे लिखते हो?" रोमा ने एक बार फिर राज से

पूछा.

"तुम ये सब क्यों जानना चाहती हो?" राज ने पलट कर प्रश्न किया.

"क्या तुम ये लिखते हो कि लड़कियाँ तुम्हारा लंड कैसे चूस्ति है और

तुम उनकी चूत को कैसे चोद्ते हो?" उसने फिर पूछा. ये सब गंदी

गंदी बातें रोमा के शरीर मे और आग लगा रही थी, उसे मज़ा भी

आ रहा था.

रोमा ने फिर उसके लंड को अपने मुँह मे लिया और अपने गले तक ले

लिया. उसका दिल तो कर रहा था कि इतने लंबे लंड को वो पूरा का पूरा

अपने मुँह मे ले किंतु वो ले नही पाई उसकी साँसे रुक गयी. उसने

वापस लंड को बाहर कर उसके सूपदे को चूसने लगी.

"क्या तुम मेरे बारे मे लिखते हो?" वो एक बार फिर उसे पूछने लगी. वो

चाट्ती थी कि भले ही वो झूट बोले लेकिन बोले कि वो उसी के बारे

मे लिखता है कि किस तरह वो उसके शरीर को प्यार करता है और वो

किस तरह उसकी चुदाई करता है.

राज को लगा कि आज तक जो बातें उसने छुपाने की कोशिश की थी अब

वो छुपी नही रह गयी थी इसलिए उसने कहा, "हाँ में हम दोनो के

बारे मे लिखता हूँ. मैं लिखता हूँ जो हम आज कर रहे है,

मुझे तो ऐसा ही था कि हम हज़ारों साल मे भी ये सब नही कर

पाएँगे जो हम कर रहे है."

राज की बातें सुन रोमा मन ही मन उछल पड़ी. इसका मतलब उन

कहानियों मे वो में थी जिनके बारे मे राज लिखता है.उसका उत्तेजित

शरीर खुशी के मारे झूम उठा. वो राज के लंड को और जोरों से

चूसने लगी वो उसके रस की एक एक बूँद पीना चाहती थी.

रोमा के इस बदले व्यवहार को देख राज चौंक उठा, "ऑश रोमा ये क्या

कर रही हो डार्लिंग तुम्हारे दाँत लग रहे है.... थोड़ा धीरे

धीरे चूसो ना ऑश."

पर रोमा थी कि वो सुन ही नही र्है थी, मुट्ठी मे उसके लंड को

मसल्ते हुए जोरों से उसे चूस रही थी. राज ने उसके सिर को पकड़ा

और अपने वीर्य की धार उसके मुँह मे छोड़ दी. रोमा जल्दी जल्दी उसके

वीर्य को निगलने लगी. उसका वीर्य की आखरी बूँद निगलने के बाद भी

वो उसके लंड को चाट्ती रही.

"मुझे तो बहोत मज़ा आया लेकिन ऐसा लगता है कि तुम्हे मेरा

लंड चूसने मे मुझसे ज़्यादा मज़ा आया." राज ने कहा.

रोमा ने अपना चेहरा चादर के नीचे से निकाला और उसके बगल मे

लेटते हुए कहा, "ये तो शैतानी थी पर अब मेरी चूत मे आग लगी

हुई है."

"में भी कभी कभी शैतान हो जाता हूँ." कहकर राज उसकी टाँगो के

बीच आ गया.

रोमा ने अपने प्यारे भाई के लिए अपनी टाँगे फैला दी. जब राज ने

अपना मुँह उसकी चूत पर रखा तो सिसक पड़ी. राज उसकी चूत मे अपनी

उंगली के साथ अपनी जीएब दल उसे चाट रहा था तो कभी उसकी छूट

को मुँह मे भर चूसने लगता.

"हाआँ राअज इसी तरह ऑश कितना अछा लग रहा है.." रोमा मादकता

मे चिल्लाने लगी, "हाआँ राज इसी तरह चूसो ऑश थोडा नीचे को

चॅटो नाअ हाँ भर लो मुँह मे ऑश थोडा काटो ना....."

राज अपनी जीभ को पूरा फैलाते हुए उसकी चूत को उपर से नीचे तक

चाटने लगा साथ ही वो उंगलियों को अंदर बाहर कर रहा हा.

"ऑश ऑश हाआँ आईसीईइ ही." रोमा सिसक रही थी . वो छूटने के

कगार पर पहुँच चुकी थी.

राज की फुदक्ति जीब अजीब सा मज़ा दे रही थी रोमा को. वो और जोरों

से अपनी उंगली अंदर बाहर करने लगा. रोमा का शरीर आकड़ा और उसने

अपनी कमर उठा अपनी चूत को राज के मुँह पर और दबा पानी छोड़

दिया.

राज पूरी चूत को मुँह मे भर उसके रस को पीने लगा. आक्खिर एक एक

बूँद चूसने के बाद वो निढाल हो उसके बगल मे लेट गया.

रोमा ने अपनी एक टांग उठा कर राज के उपर रखते हुए कहा, "राज

मुझे पर एक कहानी लिखो, एक दम गंदी तुम्हारे जो दिल चाहे लिखो,

में तुम्हारा हर सपना हर ख़याल पूरा करूँगी."

"ज़रूर लीखूंगा रोमा....." कहकर राज ने उसे अपनी बाहों मे भर

लिया.

दोनो अंधेरे मे एक दूसरे की उखड़ी सांसो की आवाज़ो को महसूस कर रहे

थे. आज वो खुस था कि अब उसे काग़ज़ पर लिख कर अपने ख़यालों को

तालाब की गहेराइयों मे नही फैंकने पड़ेगा, कोई तो है जिसके साथ वो

उन ख़यालों को बाँट सकता है. तो भाई लोगो कैसी लगी ये कहानी

ज़रूर लिखना आपका दोस्त राज शर्मा

raj..
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Re: दो भाई दो बहन

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 03:38

7

gataank se aage.............

Roma ab uske lund ko pura apne gale tak lekar choos rahi thi, "OHHHH

ROMAAA AISEE HIIII CHOOOOSO." Raj ki nason ka tanav badhne laga. Wo

Roma ke chehre ko pakad joron se apne lund ko uske munh ke andar

bahar karne laga. Roma ke munh ke thook se uski puri janghe geeli ho

gayi thi.

"Roma apni juban ko mere lund par upar se neeche tak firao." Raj ne

kaha.

Roma ne ukse lund ko apne munh se bahar nikal diya, "tum har waqt

kya likhte rehte ho." Usne is tarah pucha ki jaise use kuch maalum

hi nahi ho.

Roma ne pehle uski goliyon ko munh me lekar choosa phir apni juban

ke uske lund ke neeche se upar tak firane lagi. Ek ajeeb si gudgudi

Raj ke sharir aur lund me paida ho gayi. Wo sochne laga ki Roma ko

kya kahe, agar use sachai ka pata chal gaya to wo kya ochegi.

"Kuch nahi sirf mere khayal jinhe mein ek kahani ka roop de deta

hun" usne sach ko chupate hue kaha. Kalpana apne aap me khayal hi to

hai.

Roma apni juban firate hue upar ki aur aayi aur uske sirf supade ko

apne munh me le choosne lagi. Fir apni juban neeche ki aur kar

chaate hue upar ko aay aur fir supade ko choosne lagi. Gadha virya

uske lund se chune laga. Wo use chat gayi swad jarur khara sa tha

lekin use accha lag raha tha. Apne bhai ko khushi dene me use maza

aa raha tha.

"Kya ladkiyon ke bare me likhte ho?" Roma ne ek bar fir Raj se

pucha.

"Tum ye sab kyon janna chahti ho?" Raj ne palat kar prashna kiya.

"Kya tum ye likhte ho ki ladkiyan tumhara lund kaise choosti hai aur

tum unki choot ko kaise chodte ho?" Usne fir pucha. Ye sab gandi

gandi baatein Roma ke sharir me aur aag laga rahi thi, use mazaa bhi

aa raha tha.

Roma ne phir uske lund ko apne munh me liya aur apne gale tak le

liya. Uska dil to kar raha tha ki itne lambe lund ko wo pura ka pura

apne munh me le kintu wo le nahi payi uski sanse ruk gayi. Usne

wapas lund ko bahar kar uske supade ko choosne lagi.

"Kya tum mere bare me likhte ho?" Wo ek bar fir use puchne lagi. Wo

chahtti thi ki bhale hi wo jhoot bole lekin bole ki wo usi ke bare

me likhta hai ki kis tarah wo uske sharir ko pyaar karta hai aur wo

kis tarah uski chudai karta hai.

Raj ko laga ki aaj tak jo baatein usne chupane ki koshish kee thi ab

wo chupi nahi reh gayi thi isliye usne kaha, "haan mein hum dono ke

bare me leekhta hun. Meine leekhta hun jo hum aaj kar rahe hai,

mujhe to aisa hi tha ki hum hazaron saal me bhi ye sab nahi kar

payenge jo hum kar rahe hai."

Raj ki baatein sun Roma man hi man uchal padi. Iska matlab un

kahaniyon me wo mein thi jinke bare me Raj likhta hai.Uska uttejit

sharir khushi ke mare jhoom utha. Wo Raj ke lund ko aur joron se

choosne lagi wo uske ras ki ek ek boond peena chahti thi.

Roma ke is badle vyavhar ko dekh Raj chaunk utha, "OHHH ROMA YE KYA

KAR RAHI HO DARLING TUMHARE DANT LAG RAHE HAI.... THODA DHEERE

DHEERE CHOOSO NA OHHH."

Par Roma thi ki wo sun hi nahi rhai thi, muthi me uske lund ko

masalte hue joron se use choos rahi thi. Raj ne uske sir ko pakda

aur apne virya ki dhar uske munh me chod di. Roma jaldi jaldi uske

virya ko geetne lagi. Uska viyra ki aakhri boond nigalne ke baad bhi

wo uske lund ko chatti rahi.

"Mujhe to bahot mazaaa aya lekin aisa lagta hai ki tumhe mera

lund choosne me mujhse jyada mazaa aya." Raj ne kaha.

Roma ne apna chehra chadar ke neeche se nikala aur uske bagal me

lette hue kaha, "ye to shaitani thi par ab meri choot me aag lagi

hui hai."

"Mein bhi kabhi kabhi shaitan ho jata hun." kehkar Raj uski tango ke

beech aa gaya.

Roma ne apne pyaare bhai ke liye apni tange faila di. Jab Raj ne

apna munh uski choot par rakha to sisak padi. Raj uski choot me apni

ungli ke sath apni jeeeb dal use chaat raha tha to kabhi uski choot

ko munh me bhar choosne lagata.

"HAAAN RAAAJ ISI TARAH OHHHH KITNA ACHA LAG RAHA HAI.." Roma madakta

me chillane lagi, "HAAAN RAJ ISI TARAH CHOOSO OHHH THODA NEEECHE KO

CHAATO NAAA HAN BHAR LO MUNH ME OHHH THODA KAATO NA....."

Raj apni jeebh ko pura fialate hue uski choot ko upar se neeche tak

chaatne laga sath hi wo ungliyon ko andar bahar kar raha ha.

"OHHHH OHHHH HAAAN AISIIII HI." Roma sisak rahi thi . Wo chootne ke

kagar par pahunch chuki thi.

Raj ki fudakti jeeb ajeeb sa maza de rahi thi Roma ko. Wo aur joron

se apni ungli andar bahar akrne laga. Roma ka sharir akda aur usne

apni kamar utha apni choot ko Raj ke munh par aur daba pani chod

diya.

Raj puri choot ko munh me bhar uske ras ko peene laga. Aakkhir ek ek

boond choosne ke baad wo nidhal ho uske bagal me let gaya.

Roma ne apni ek tang utha kar Raj ke upar rakhte hue kaha, "Raj

mujhe par ek kahani likho, ek dam gandi tumhare jo dil chahe likho,

meine tumhara har sapna har khayal pura karungi."

"Jarur leekhunga Roma....." kehkar Raj ne use apni bahon me bhar

liya.

Dono andhere me ek doosre ki ukhdi sanso ki awaaz ko mehsus kar rahe

the. Aaj wo khus tha ki ab use kagaz par likh kar apne khayalon ko

talab ki geheraiyon me nahi fainkne padega, koi to hai jiske sath wo

un khayalon ko bant sakta hai.


raj..
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Re: दो भाई दो बहन

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 03:39

8

रोमा ने अपनी एक टांग उठा कर राज के उपर रखते हुए कहा, "राज

मुझे पर एक कहानी लिखो, एक दम गंदी तुम्हारे जो दिल चाहे लिखो,

मेने तुम्हारा हर सपना हर ख़याल पूरा करूँगी."

"ज़रूर लीखूंगा रोमा....." कहकर राज ने उसे अपनी बाहों मे भर

लिया.

दोनो अंधेरे मे एक दूसरे की उखड़ी सांसो की आवाज़ को महसूस कर रहे

थे. आज वो खुस था कि अब उसे काग़ज़ पर लिख कर अपने ख़यालों को

तलब की गहेराइयों मे नही फैंकना पड़ेगा, कोई तो है जिसके साथ वो

उन ख़यालों को बाँट सकता है.

अब आगे की कहानी.................................

जय अपनी बड़ी बेहन रिया को गाड़ी की ड्राइवर सीट पर बैठते देख

रहा था. रिया आज ब्लॅक जीन्स और टॉप मे काफ़ी सुंदर लग रही थी.

उसके बगल मे पॅसेंजर सीट पर बैठते हुए उसने एक सरसरी निगाह

रिया पर डाली. उसकी स्लीवेलेस्स टॉप के बगल से उसकी चुचियों का

कटाव दिखाई दे रहा था. उसकी भारी भारी चुचियों का उभार देख

उसके दिल मे हलचल होने लगी.

"आज तो मज़ा आ गया." रिया ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा.

"हां मज़ा तो आया," जय ने कहा.

रिया ने गाड़ी राज के घर से बाहर निकाल अपने गहर की ओर बढ़ा दी.

थोड़ी देर गाड़ी मे बिल्कुल शांति छाई रही. कोई किसी से कुछ नही

कह रहा था. जय रिया की चुचियों को घूरे जा रहा था जो उसके

शरीर के साथ साथ हिल रही थी.

रिया जानती थी कि जय उसकी चुचियों को घूर रहा है पर उसने

कुछ कहा नही. उसे ये अहसास था कि आज राज के साथ जाकर उसने जय

को एक दम अकेला छोड़ दिया था शायद वो उसी बात को लेकर नाराज़

था.

"तुम और राज कहाँ गायब हो गये थे?" आख़िर मे जय ने अपनी बेहन

से पूछ ही लिया, वैसे तो वो जानता था लेकिन फिर भी वो रिया के मुँह से

सुनना चाहता था.

"हम दोनो अलाव के लिए लकड़ियाँ ढूँढने गये थे." रिया ने अपने

कंधे उचकाते हुए कहा.

"नही तुमने उससे ज़्यादा कुछ किया था," जय अपनी बात पर ज़ोर देता

हुआ बोला, "क्या हुआ वहाँ पर?"

"तुम मेरे भाई हो और भाई बनकर रहो, बाप बनने की कोशिस मत

करो. तुम्हे इससे कोई मतलब नही होना चाहिए कि मेने क्या

किया.....समझे तुम. हम दोनो एक दूसरे के साथ दो चार बार क्या सो

लिए तुम तो मुझे अपनी जागीर समझने लग गये..... मेरे और भी

कई बॉयफ्रेंड है मालूम है ना तुम्हे." रिया ने उसे डाँटते हुए कहा.

"हां....मुझे मालूम है." जय ने शिकायत करते हुए कहा, "लेकिन

राज मेरा सबसे अच्छा दोस्त है... फिर उसके साथ क्यों?"

"पता नही बस हो गया जैसे तुम्हारे और मेरे बीच पहली बार हुआ

था." रिया इससे ज़्यादा कुछ नही कह पाई. "आख़िर तुम्हारी परेशानी

क्या है?"

"आज की रात से पहले तुम पूरे हफ्ते मुझे नज़र अंदाज़ करती आई

और आज तुम राज के साथ चली गयी." जय ने अपनी परेशानी

बताई, "सुबह तुम फिर कॉलेज के लिए चली जाओगी, तुम्हे मालूम है

में तुम्हे कितना मिस कर रहा हूँ. मैने तो सोचा था कि आज की रात

हम साथ साथ रहेंगे."

रिया की समझ मे आ रहा था कि जय क्या कहना चाहता है, "मैं

माफी चाहती हूँ छोटे भैया, और में भी तुम्हे मिस कर रही थी.

लेकिन जिंदगी हमारी सोच के अनुसार तो नही चलती हमे जिंदगी के

अनुसार चलना पड़ता है."

"अब ये छोटे भैया बुलाना बंद करो समझी में कोई अब भी छोटा

बच्चा नही हूँ." जे गुस्से मे बिफर पड़ा.

"ठीक है जाई. बताओ में क्या करूँ, जिससे तुम्हे खुशी मिल सके."

रिया ने कहा.

"अभी भी मेरे पास कुछ सिग्रेट और बियर के टीन पड़े है, हम फिर

से तालाब किनारे जाकर अपनी अलग पार्टी मना सकते हैं फिर देखो

क्या होता है." जय ने कहा.

"देखो क्या होता है?" रिया ने अपने आप से पूछा. उसे पता है कि क्या

होने वाला है जो होना है वो तो उसकी पॅंटी के अंदर छुपा हुआ है.

"अगर तुम्हारा दिल चलने का है तो गाड़ी यहाँ से दाईं तरफ मोड़

लो." जय ने कहा.

"मुझे पता है कि वहाँ कैसे पहुँचा जाता है, हां एक बात और

आज की रात अच्छी तरह बिहेव करना ये रात हमारे बीच आखरी रात

होगी. दूसरी बात ये बात बात पर जलना छोड़ो और अपने लिए कोई

अछी सी गिर्ल्फ्रेंड ढूंड लो जिसे तुम जब चाहे चोद सको हर बार

अपनी बेहन के भरोसे मत रहो समझे." रिया ने लगभग उसे समझाते

हुए कहा.

रिया की बात सुनकर उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया. उसने रिया के

बालों को पकड़ा और मरोड़ने लगा.

जय की इस हरकत से रिया के हाथो से गाड़ी का बॅलेन्स बिगड़ गया,

बड़ी मुश्किल से उसने गाड़ी को संभाला.

"लगता है तुम्हे फिर से मार खाने का शौक उठा है, जब जब ऐसी

बात करोगी फिर से बेल्ट की फटकार पड़ेगी." जय उसके बालों को

मरोदते हुए बोला.

रिया को अहसास हुआ कि वो कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही जय को बोल गयी

थी. इसलिए उसने कुछ नही कहा और अपने नीचले दांतो को चबाते

हुए गाड़ी तालाब के किनारे रोक दी. उसने एंजिन बंद कर दिया और

लाइट भी बुझा दी. अब गाड़ी मे पूरी तरह अंधेरा था, कुछ था तो

उनकी सांसो की हल्की हल्की आवाज़.

"जय.... चलो सिग्रेट जलाओ जिससे थोड़ा नशा हो जाए..." रिया

बात को संभालने के हिसाब से बोली, किंतु जय तो कुछ और ही चाहता

था... उसने रिया की बात को अनसुना कर दिया.

"नही आज तो पहले तुम्हे तुम्हारी बातों के लिए सज़ा मिलेगी." जय ने

कहा.

जय को अपने पिताजी के बरसों पहले कही हुई बात याद आ गयी. एक

दिन जब वो खाने के टेबल पर बैठे थे तो उसके पिता ने उसके कान

मे फुसफुसाते हुए कहा था, "बेटा कभी भी जिंदगी मे किसी औरत को

अपने पर हावी मत होने देना. ये मर्दों का काम है कि औरत को उसकी

औकात बताए, औरत की जागह हमेशा पैरों मे रहती है और

रहेगी."

वैसे जे बचपन मे बहोत नरम दिल का था लेकिन उसके बाप की इस

बात ने उसे गुस्से वाला बना दिया था. लेकिन उसके पिता भी ज़्यादा दिन

उनके साथ नही रह पाए थे, उसकी मा से झगड़ा कर चले गये

कभी वापस ना आने के लिए.

"आज तुमने अपनी हद की हर सीमा को पार कर दिया है और में तुम्हे

बता के रहूँगा कि तुम्हारी सही जगह क्या है." जय ने फिर गुस्से मे

कहा.

रिया का दिल घबरा गया, उसे जय के शब्दों मे अपने बाप की छवि

नज़र आने लगी. उसे पता था क़ि जय को कैसे रोकना चाहिए पर उसने

किया कुछ नही क्योंकि यही तो उनके खेल का हिस्सा था.

जय ने गाड़ी के स्टर्रिंग व्हील को इस कदर उठा दिया कि वो उनके बीच

से थोड़ा हट जाए. फिर उसने रिया की टाँगो से पकड़ उसे सीट पर पेट

के बल लिटा दिया.

उसने अपना हाथ रिया के नीचे कर उसकी जीन्स के बटन खोले और ज़िप

को नीचे कर उसकी जीन्स के साथ साथ उसकी पॅंटी को भी नीचे

खिसका दिया. जब उसके चूतड़ पूरी तरह नंगे हो गये तो उसे रिया

की दर्द सी भरी कराहें सुनाई देने लगी.

जय ने अपने पॅंट की बेल्ट खोल कर निकाल ली. फिर उसे दोहरा कर रिया

को सज़ा देने के लिए तैयार हो गया.

"प्लीस जय ऐसा मत करो...." रिया गिड़गिदते हुए बोली, "देखो तुम जो

कहोगे में करने को तैयार हूँ, क्यों ना हम पार्टी मनाए और मस्ती

करें."

"हम मस्ती ही तो कर रहे है," जय ने उसे याद दिलाते हुए कहा.

"हां कर तो रहे है," रिया ने धीरे से कहा, वो अपने आप को कोसने

लगी कि क्यों पूरे हफ्ते भर वो जय को नज़र अंदाज़ करती रही अगर

पहले ही उस पर ध्यान दिया होता तो कम से कम आज की रात इस मार

से तो बच जाती.

रिया को अपने आप पर इस तरह गाड़ी के अंदर अपने चूतड़ नंगे किए

लेटने मे शरम आ रही थी. उसे अपने आप पर गुस्सा भी आ रहा था

कि क्यों वो अपने भाई को इस तरह उस पर ज़्यादती करने दे रही थी.

क्यों उसने शुरू से जय को नही रोका जब उसने पहली बार उसे छुआ था.

उसे लग रहा था कि दिन पर दिन जय ठीक उसके बाप की तरह ही होता

जा

रहा है, ठीक वही गुस्सा वही चिड़चिड़ा पन.

तभी जय का दायां हाथ उठा और एक हवा के झोके की तरहा उसके

चूतदों पर आया. बेल्ट के बकल की आवाज़ जोरों से गूँजी और उसके

शरीर मे एक दर्द की लहर सी दौड़ गयी. रिया ने दर्द के मारे अपने

दाँत गाड़ी की सीट मे गढ़ा दिए और दर्द से कराहने लगी. पर जय ने

फिर दूसरा वॉर किया और रिया हल्के से चीख पड़ी. वो रिया को सांस

भी लेने नही दे रहा था.

"बस जय बहोट हो गया...." रिया ने अपने भाई से कहा.

पर जय था की उसे मारता गया, रिया की आँखों से आँसू निकल रहे

थे. आख़िर जय ने तक कर बेल्ट खिड़की के बाहर फैंक दी. गुस्से मे

जय गाड़ी के बाहर आ गया उसकी खुली पंत उसके पैरों मे जेया गिरी.

"तुम बहोत गंदी हो रिया,,,,,,बहोत गंदी...." जय ने गुस्से मे

लगभग चीखते हुए कहा.

"अब क्या हुआ ये तो बताओ?" वो ज़ोर से जवाब देते बोली. वो अपनी जगह

से उठी और गाड़ी के बाहर आते हुए बोली. उसने अपनी जीन्स और पॅंटी

वापस उपर चढ़ ली और अपने सूजे हुए चूतदों को छुपा लिया.

जय फिर से एक बार उसे मारने के लिए दौड़ा, जैसे कि उसे झप्पड़ मार

देगा, रिया ने अपने आपको झुक कर बचा लिया.

"जय तुम पिताजी नही हो जो उनकी जगह लेने की कोशिश कर रहे

हो..... ना जाने तुम ऐसे क्यों बिहेव कर रहे हो मेरी तो कुछ समझ

मे नही आ रहा." रिया ने कहा.

जय ने पलट कर रिया के पीछे देखा. चाँद की रोशनी ठीक उसके

चेहरे पर पड़ रही थी जिससे उसका सुंदर चेहरा जगमगा रहा था.

उसका सुंदर चेहरे को देख उसका गुस्सा ठंडा पड़ता गया. जय उसकी

और बढ़ा तो रिया अपने आपको उससे बचाने के लिए पीछे की ओर

खिसकी लेकिन वो गाड़ी के बॉनेट से टकरा उसपर लगभग लुढ़क सी

गयी.

उसके सूजे हुए चूतड़ गाड़ी की ठंडी बॉडी से टकराए तो दर्द के मारे

उसके मुँह से कराह निकल गयी.

"क्यों कि में तुमसे प्यार करता हूँ." उसने फुसफुसाते हुए कहा और

अपने होंठ रिया के होठों पर रख उन्हे चूसने लगा.

जय ने जो कुछ किया था उससे रिया को जय से नफ़रत होने लगी थी

लेकिन उसके होठों का स्पर्श अपने होठों पर पाकर उसका दिल पिघल

गया. जय ने उसके मुँह को खोल अपनी जीभ उसके मुँह मे घुसाने की

कोशिश की तो रिया ने अपना मुँह खोल दिया और उसकी जीभ से अपनी

जीब मिला दी.

"ओह जय......." रिया जय से लिपट गयी और जोरों से उसकी जीब

और होठों को चूसने लगी. उत्तेजना गुस्से पर हावी हो गयी थी.

जैसे ही जय ने उसकी जीन्स और पॅंटी को खिसका कर नीचे किया रिया

ने पाऔ मे पहनी सॅंडल को पैरों से दूर छितका कर फैंक दिया.

रिय ने गाड़ी के बॉनेट पर लेटे हुए अपने पैर फैला दिए. चूत से

रिस्ते पानी की बूंदे उसकी काली झांतो पर चाँद की रोशनी मे किसी

ऑश की बूँद की तरह चमक रही थी.

"मेरे भाई प्लीज़ मुझे प्यार करो ना....." रिया मादकता की लौ मे

बहती हुई बोली, "मुझे तुम्हारे लंड को अपनी चूत मे महसूस करना

है जे."

"रिया जिस तरह तुम रोमा को देख रही थी ना मेने देखा था," जय

अपनी पॅंट के बटन खोलता हुआ बोला, "में जानता हूँ कि तुम भी

उसकी चूत का स्वाद उतना ही चखना चाहती हो जितना की में."

"हां.... जय बहोत इच्छा है उसकी चूत को चूसने की....बड़ी

प्यारी चूत होगी उसकी..." रिया ने कहा.

"अगली बार हम दोनो उसकी चूत का स्वाद साथ साथ चखेंगे." जय ने

कहा.

जय ने अपने खड़े लंड को अपने अंडरवेर से आज़ाद किया. रिया ने

निगाहें झुका कर अपने भाई के लंड को देखा और गाड़ी के बॉनेट पर

अच्छी तरह लेट गयी और अपनी टाँगो को और फैला दिया. जय अपनी

बेहन की टाँगो के बीच आया और अपने लंड को उसकी चूत पर घिसने

लगा. फिर उसकी चूत को अपनी उंगलियों से थोड़ा फैला उसने अपना लंड

अंदर घुसा दिया.

क्रमशः..................