hindi Novel - Madhurani

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Re: hindi Novel - Madhurani

Unread post by sexy » 17 Mar 2016 10:09

Madhurani - CH-4 वे दिन

The richest man is not he who has the most, but he who needs the least.
nknown Author


गणेशराव कुर्सीपर आरामसे पैर फैलाकर बैठे थे. बिच बिचमें वे दरवाजेसे अंदर बाहर कर रहे लोगोंकी तरफ देख रहे थे. उन्होने एकबार हॉलमे चारो तरफ जमी भिडकी तरफ देखा.

भगवान जाने अब इतने लोगोंमें मेरा नंबर कब आएगा ?...

तभी उन्हे अचानक हॉलमें कही हरकत महसूस हुई. कुछ लोग उठकर खडे हो रहे थे तो कुछ अपनी गर्दन उंची कर एक तरफ देख रहे थे तो कुछ लोग किसीको अभिवादन कर रहे थे.

कौन है ?... सरकार तो नही ?...

उन्हे लोगोंकी भिडसे गुजरता हुवा एक गोरा चिट्टा, उंचा और मजबुत शरीरयष्टीवाला आदमी दिखाई दिया.

अब ये महाशय कौन ?...

वह आदमी दरवाजेसे अंदर चला गया - सरकारसे मिलनेके लिए - बिना झिझक. उसे किसीने नही रोका. वह जानेके बाद भिड फिरसे शांत होकर अपनी जगहपर बैठ स्थिर हो गई.

" कौन था वह ?" गणेशरावने अपनी दाई तरफ बैठे एक आदमीसे पुछा,

उस आदमीने वडी ताज्जुबके साथ गणेशरावकी तरफ देखते हूए पुछा, " क्या इतनाभी नही जानते ?"

गणेशरावने अपनी झेंप छिपानेकी कोशीश करते हूए अपना अज्ञान प्रकट किया.

"अरे वे तो अपने मधूकरराव है ... सरकारका खास आदमी ... या दाया हाथही बोल सकते है "

" अच्छा ... अच्छा"

गणेशरावकी बाई तरफ एक सफेद कुर्ता पैजामा पहने एक आदमी अखबार पढते हूए बैठा था. उन्होने जाम्हाई देते हूए उस आदमी की तरफ देखकर कहा, " अब पता नही कितना टाईम लगता है तो ?"

उस आदमीने अखबार वैसाही सामने रखकर अखबारके उपरसे उसकी तरफ गौरसे देखा . " आप तो अभी अभी आए ना ? "

" जी हां " गणेशरावने जवाब दिया.

" मै पिछले दो दिनसे चक्कर काट रहा हूं ... लेकिन उनसे मिलनेका मौकाही नही मिल रहा है ... '"ऐसा मानो वह गर्वके साथ कहकर फिरसे अपना अखबार पढनेमें व्यस्त हो गया.

गणेशरावके चेहरेपर मायूसी छा गई थी. पलभरके लिए उसका वहांसे उठकर जानेका मन हुवा.

लेकिन नही ... मिलना तो जरुरी है ...

अपने लिए नही तो कमसे कम अपने लडके के लिए ...

कुछ देर बाद कुर्सीपर बैठे बैठे ही उनकी विचारोंकी श्रुंखलाने अपना रुख अतितकी तरफ किया. उन्हे याद आ रहा था की 20-25 साल पहले एकबार उन्हे ऐसेही, इससे मिल - उससे मिल ऐसा करना पडा था. और इतने सारे प्रयास करनेके बादभी उनकी पोस्टींग देहातमेंही हो गई थी.

अबभी तो वैसाही नही होगा ना ? ...

पिछली बारसे इसबार उन्हे अपना तबादला रोकना जादा जरुरी लग रहा था. क्योंकी तब वे जवान थे. सारी मुश्कीले सहन कर सकते थे. सोचते हूए उन्हे अपने जवानी के बिती हुई बाते याद आने लगी थी .....


.... बस घाटीमे दाएं-बाएं मुडती हुई आगे चल रही थी. गणेश बसके खिडकीके पास अपने सिटपर बैठा था. उसकी बगलमें एक देहाती बैठा था. बसकी चलनेकी वजहसे होनेवाली मचलनसे बचनेके लिए गणेश खिडकीसे बाहर घाटीमें दिख रही हिरियालीपर अपना ध्यान केंद्रीत करनेकी कोशीश कर रहा था. उसने बसमें बैठे बाकी यात्रीयोंपरसे अपनी नजरे घुमाई. कोई बैठे बैठेही झपकियां ले रहे थे तो कोई आपसमें बाते हाक रहे थे. गाडीके बिचवाले खाली जगहमेंभी कुछ यात्री खडे हूए थे. कोई बिचमें खडे लोहेके खंबेका सहारा लेकर खडे थे तो कोई बगलके सिटका सहारा लेकर खडे थे. उस भिडसे रास्ता निकालते हूए कंडक्टर अपनी जगहपर चला गया. अपने सिटपर बैठे आदमी की तरफ उसने सिर्फ घूरकर देखा. उस बैठे हूए आदमीने चुपचाप वहांसे उठकर कंडक्टरको बैठनेकी जगह दे दी. कंडक्टरने बैठतेही अपनी टिकटवाली बॅग खोली और उसमेंसे एक कागज और पेन निकाला. पेन कानके पिछे लगाते हूए उसने कचरेके टोकरीमें फेंकनेके लायक एक सिकुडा हुवा कागज खोला. फिर वह एक हाथसे टिकटकी बॅग उलटपुलटकर टिकटके नंबर देखकर दुसरे हाथसे कानके पिछेसे पेन निकालकर कागजपर लिख रहा था. वह यह सब इतनी सफाईके साथ कर रहा था की मानो उसे उसका कोई खास ट्रेनिंग दिया गया हो. नही तो बस चलते वक्त -इतनी हिलनेके बाद किसी कागजपर लिखना मुश्कीलही नही तो लगभग नामुमकीन था.

गणेशने फिरसे अपनी नजर बाहर हरियालीपर जमाई. उसका सोचचक्र फिरसे शुरु हो गया था. कितनी जी तोड कोशिश करनेके बादभी उसपर यह नौबत आ गई थी. पांच सालतक वही तालूकेकी कोर्टमें उसने डेली वेजेसपर कुछ लिखापढीका काम किया था. फिर शादीभी की. अब पांच सालके बाद काफी मशक्कतके बाद गणेशका ग्रामसेवककी हैसीयतसे चयन हुवा था. ग्रॅजूएट होकरभी उसपर ग्रामसेवक के हैसियतसे काम करनेकी नौबत आई थी. वहभी सर्विस इतनी आसानीसे नही मिली थी. सतरा लोगोंको मिलकर, पहचान निकालकर, मन्नते करकर, उनके पैर पकडकर और उपरसे पैसेभी देकर... तब कहा उसे ग्रामसेवककी सर्विस मिली थी. सर्विस मिलनेके बाद सवाल था कहां जॉइन करना पडेगा. गणेशको तहसिलके पास लगभग 4-5 किलोमिटरके दायरेके अंदरही जॉइन करना पडे ऐसी इच्छा थी. फिरसे मिन्नते, हाथपैर जोडना और पैसे देनाभी आगया था. वहभी किया. लेकिन नही. जो नही होना था वही हो गया था. वह अपनी पोस्टींग आसपास कही नजदिक नही कर पाया था. नौकरी लगानेके वक्त लगाए वजनसे इसबार लगाया गया वजन शायद कम पड गया था. और आखिर अपनी इच्छाको मोडकर उसे तहसिलसे 50 किलोमिटर दुर बसे उजनी नामके देहातमें जाकर जॉईन करना था. आज वहां जानेका उसका पहला दिन था.

क्रमश:...

The richest man is not he who has the most, but he who needs the least.
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Re: hindi Novel - Madhurani

Unread post by sexy » 17 Mar 2016 10:10

Madhurani - CH-5 उजनी


Thought of the day -
Imagination wa
s given to man to compensate him for what he is not, and a sense of humor was provided to console him for what he is.
--scar Wilde

कंडक्टरने बजाए बेलसे गणेश होशमें आगया. गाडी रुक गई. उसने बाहर झांककर देखा. उजनी अभीतक नही आई थी.

" उजनी और कितनी दूर है ? " उसने अपने बगलमें बैठे देहातीसे पुछा.

" बहुत दूर है... आरामसे एक झपकी लियो ... आनेके बाद मै जगाये दूंगा जी ... " वह देहाती बोला.

'इतने गढ्ढोसे धक्के देते हूए चल रही बसमें निंद आना कैसे मुमकिन है ? ' उसने मनही मन सोचा.

"धक्कोंका मत सोचियो जी ... मानो की झूला झुलाये रहा ... "

गणेशने चौंककर उस देहातीकी तरफ देखा. उसे इस बातका आश्चर्य हो रहा था की उसने उसके मनकी बात कैसे जान ली थी. उस देहातीने फिरसे अपनी निर्विकार नजर सामने रास्तेपर जमाई. गणेश फिरसे अपने विचारोंके दुनियामें चला गया.

वह तहसिलकी जगह और वहांके मौहोलसे अच्छा खासा घुल मिल गया था. इसी बिच उसकी शादी होकर उसे एक बच्चाभी हो गया था.

विनय - कितना प्यारा बच्चा....

और पहलाही लडका होनेसे मांको कितनी खुशी हो गई थी...

अपने परिवारको अकेला छोडकर यहां नौकरीके लिए आना उसके जानपर आया था. लेकिन कोई चाराभी तो नही था. उसके बिवीको और बच्चेकोभी यहां देहातमें लाना एक रास्ता था. लडकेको उसने इसी साल केजीमें डाला था. और यहां देहातमें केजी वैगेरा तो कुछ नही था उपरसे पढने पढानेके लाले थे.

आखिर अपने परिवारके उत्कर्षके लिए उसे इतना त्याग करना जरुरी अपरिहार्य था....

एक जगह बसकी गति कम हो गई और बस मेन रोडसे दाई तरफसे एक कच्चे रास्तेपर उतर गई. जैसेही बस कच्चे रास्तेसे चलने लगी बसमें बैठनेवाले धक्कोमें वृध्दी हुई थी. गणेश सामनेके सिटके डंडेको पकडकर सहमकर बैठ गया. गणेशने खिडकीके बाहर झांककर देखा. बाहर हरेभरे खेतमें मजूर काम करते हूए दिख रहे थे. बिचमेंही कही कुव्वेके बगलमें पाणीके पाईपसे गिरता हुवा कांचकी तरह निर्मल पाणी दिख रहा था. खेतमें बसी छोटी छोटी झुग्गी झोपडीयां और उपर आसमानमें उड रहे पंछी और उन्हे डरानेके लिए जगह जगह खडे किए मटकेके सरके पुतले. गणेशका मन मानो उस खेतके दृष्योंमें खो गया था. मानो बसमें बैठरहे जानलेवा झटकोंका उसे विस्मरण हो गया . सचमुछ कितना सुंदर जिवन है यहां देहातका. लेकिन फिर रास्तेके एक तरफसे दौडनेसमान चल रहे कृश और पतले लकडीवालोंको देखकर उसका यहांके जिवनके बारेमें फिरसे मतपरिवर्तन होकर पहलेजैसा हो गया .

अचानक बसमें यात्रीयोंकी हरकत बढ गई. और धुलके बादल बसके चारो तरफ मंडराने लगे. बसने गांवकी हदमें प्रवेश किया था.

" अब आवेगी उजनी ", बगलमें बैठा देहाती बोला.

बाहर मंडरा रहा धुलका बादल खिडकीके रास्ते बसके अंदर घुस गया. गणेश जल्दी जल्दी खुले खिडकीकी कांच निचे खिसकाने लगा. लेकिन वह कांच अपनी जगहसे हिलनेको तैयार नही थी. वह अब उठ खडा होकर प्रयास करने लगा. वह जी तोड कोशिश करने लगा. तब तक उसका चेहरा धुलसे मलिन हो गया. उसके बगलमें बैठा देहाती उसे देखकर मुस्कुराया.

"कोई फायदा ना होवे साब ... उसमें धुल घुसकर वहभी पक्का हो गया है जी ... हमारे जैसा ... तुमभी आदत डालियो ... आगे अच्छा होवेगा "

गणेशने उस देहातीकी तरफ सिर्फ देखा और चुपचाप निचे बैठकर खिडकी बंद करनेका प्रयास छोड दिया. अचानक किसी चिजकी बदबु खिडकीके रास्ते गणेशके नाकमें घुस गई. उसने जेबसे रूमाल निकालकर अपने नाकको लगाया. वह देहाती फिरसे मुस्कुराया. गणेशने खिडकीसे बाहर झांककर देखा तो बाहर रास्तेके दोनो तरफ सुबह सुबह लोग लॅटरीनके लिए बैठे थे. और बस आ रही है यह देखकर वे एक एक कर उठ खडे हो रहे थे, मानो बसके सम्मानमें अदबके साथ एक एक करके उठ खडे हो रहे हो. वह गांवके बाहर लोगोंकी शौच के लिए जानेका खुला मैदान था. और उसके बाद एक झरना था, जिसे वहां के लोग नाला कहते थे. नालेपर बिछा टूटनेको आया पुल पार कर बस गांवमें घुस गई.

बस गांवमें घुसतेही चारपांच छोटे छोटे नग्न बच्चोंका कांरवा बसके पिछे दौडने लगा. और बसके दुसरी ओर चारपांच लावारिस कुत्ते बसके पिछे दौडने लगे. मानो बस आनेसे उस मरीयल देहातमें जान आ गई हो.

' आ गई आ गई ...' कहते हूए, एक जगह रास्तेके किनारे खडे लोगोंने बसका स्वागत किया.

उन लोगोंको बसमें बैठकर आगे जाना था. ड्रायव्हरनेभी, शायद उनका मजाक करनेके लिए, बस उन लोगोंसे काफी आगे ले जाकर खडी की. जैसेही बस आगे जाने लगी वे लोगभी बसके पिछे दौडने लगे. पहलेही वे नग्न बच्चे और कुत्ते उस बसकी पिछे दौड रहे थे, और अब वे लोगभी बसके पिछे दौडने लगे थे. दृष्य काफी मजेदार था. .

जैसेही बस रुक गई, अंदर आनेवालोंकी और बाहर जानेवालोंकी दरवाजेमें काफी भिड जमा हो गई. गणेशने सोचा, थोडी देर रुकते है और भिड कम होनेके बादही बाहर निकलते है. ...

लेकिन कोई रुकनेके लिए तैयार नही था. बाहेरके लोगोंको अंदर आनेकी और अंदरके लोगोंको बाहर निकलनेकी मानो बहुत जल्दी हो गई थी. उपरसे बाहरके कुछ लोग बंदर जैसे खिडकीयोंकों लटक लटककर खिडकीके अंदर रूमाल, टोपी या अपनी थैली सिटपर रखकर अपनी जगह आरक्षीत करने लगे. गणेश वह सारा नजारा देख रहा था. भिड कम नही हो रही है यह देखकर वहभी उतरने लगा, उतरते हूए उसका ध्यान एक खिडकीकी तरफ गया. एक बाहरके अंदर आनेके लिए उत्सुक यात्रीने तो हद्द कर दी थी. उसके पास जगह आरक्षीत करनेके लिए शायद कुछ सामान नही रहा हो, तो उसने सिधे खिडकीसे लटकर अपनी जगह आरक्षीत करनेके लिए खिडकीसे अपनी चमडेकी चप्पल अंदर सिटपर रख दी. गणेशको चिढभी आ रही थी, और हंसी भी. भिडसे किसी तरह जगह बनाकर बाहर उतरते हूए गणेशकी सांस चढ गयी थी. किसी तरह लोगोंसे उलझते सुलझते हूए वह बससे निचे उतर गया. जब वह बाहर आया उसके सारे बाल बिखरे हूए, अस्त व्यस्त हो गए थे. और कपडोंपर झुरीया आकर अव्यवस्थित हो गए थे और शर्टकी इनभी बाहर निकल आई थी. उसे क्या मालूम था की शायद उसने की हुई वह शर्टकी आखरी इन होगी. बाहर आए बराबर खुली हवामें सांस लेनेके बाद कहा उसे अच्छा लगा. वह पल दो पल वही रुक गया. अगले पलही वह बस फिरसे रास्तेकी धुल और डिजलका धुंआ उडाती हूई आगे निकल गई.


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Re: hindi Novel - Madhurani

Unread post by sexy » 18 Mar 2016 06:18

Madhurani - CH - 6 सदा


Imagination was given to man to compensate him for what he is not, and a sense of humor was provided to console him for what he is.
—Oscar Wilde


बससे उडा धूल और धुंआ स्थिर होकर निचे बैठनेके बाद गणेशने अपने आसपास देखा, जेबसे रुमाल निकालकर अपना चेहरा साफ किया, और बिखरे हूए बाल व्यवस्थित करनेका प्रयास किया, और कपडोंपर जमी धुल झटकनेका प्रयास किया. जानवरके तबेलेके सामने पेढ की छांवमें, पुराने लकडीके लट्ठेपर कुछ लोग बैठे हुए थे। कोई बिडी फुंक रहा था तो कोई चिलम फुंक रहा था. सारे लोग गणेशकी तरफ ऐसे देख रहे थे मानो वह किसी दुसरी दुनियासे वहां आया हो. ऐसा पँट शर्ट पहना हुवा साफ सुथरा आदमी यहाँ बहुत ही कम आता होगा. गणेश उनकी तरफ बढने लगा. अपने हथेलीपर तंबाकू मसल रहे एक आदमीके पास जाकर वह खडा हो गया. उस आदमीने बाएं हथेलीपर मसले हुए तंबाकुके आसपास दाएं हाथसे थपथपाकर तबांकूकी धूल फुंककर उडा दी. और फिर उस बचे हुए मसले हूए तंबाकूकी चूटकी बनाकर अपना गालका जबडा एक हाथसे खिंचते हूए, दांत और गालके बिचमें रख दी.

" सरपंचका घर किधर है ? " गणेशने उस देहातीसे पुछा.

वह देहाती लकडीके लट्ठेसे उठकर गणेशके सामने आकर खडा हो गया. गणेश अब उसके जवाबकी राह देखते हूए उसकी तरफ देखने लगा. लेकिन वह आदमी किसी गुंगेकी तरह हाथसे इशारे कर कुछ बतानेकी कोशीश करने लगा. आखिर उसने गणेशको बाजु हटाकर उसके मुंहमें जमा हुई तंबाकूकी लार एक तरफ मुंह करते हूए थूंक दी और फिर बोला,

" सरपंचजीका मेहमान जी ? "

' हां ' गणेशने सर हिलाकर जवाब दिया.

उस देहातीने झटसे गणेशके हाथमें थमी बॅग अपने हाथमें ली और वहाँसे आगे चल पडते हूए बोला, " पिछे पिछे आवो जी "

कितना अच्छा आदमी है ...

मैनेतो सिर्फ पता पुछा और यह तो अपनी बॅग लेकर मुझे वहां लेकरभी जा रहा है ...

गणेशने सोचा. गणेश चुपचाप उसके पिछे पिछे चलने लगा.

" तहसिलसे आए हो का ? " उसने दुसरे हाथसे अपनी धोती ठिक करते हूए पुछा.

" हां " गणेशने जवाब दिया.

शायद सरपंचने उसे यहां मुझे लेनेके लिएही तो भेजा नही ?...गणेशने सोचा.

" मुझे लेनेके लिए संरपंचजीने भेजा है आपको ?" गणेशने पुछा.

' ना जी ... वो क्या है ना जी .. सरपंचजीका मेहमान माने ... गांवका मेहमान " वह गणेशके सवालका रुख समझते हूए बोला.

" सरपंचजी मतलब हमरे गांवकी श्यान है ... गांवकी जोभी तरक्की होवे है ... सब सरपंचजीके किरपासे ... पहले तो यहां भूर्मलभी नही आवत रही ... "

" भूर्मल ?" गणेशने प्रश्नार्थक मुद्रामें पुछा.

" माने ... एस्टी... वो तुम बड़े लोगन का कहत रहे .... बस... बस" वह खिलखिलाकर हसते हूए बोला.
वह आगे बोलने लगा " साहेब एक दफा क्या हुवा ... हमरी चाचीके भाईके लडकेने शहरसे लडकी ब्याहके लाई ... साहेब वे बडे अच्छे लोगन रहे ... शादीका क्या ठाठ रहा .. के वे लोगन भी चाट हुयी गवा ... हमको भी न्यौता रहा शादीका .... एकबार घरमें सारे लोगन साथ साथ खाना खाने बैठे रहत ... बेचारी नई दुल्हन सबको परोस रही .... वह अपने आदमीको शार परोस रहत ... वह बोला बस... बेचारी इधर उधर देखन रही ... बर्तनसे शारकी धार चलती रहत ... हमरे चाचाका लडका बडा गुसैल .... चिल्लाया ना जी वो उसपर ... जोरसे चिल्लाया ... '' बस...बस...'' क्या करेगी वो बेचारी... डर की मारी.... फटाक से निचे वही उसके सामने बैठ गई."
गणेश खिलखिलाकर हसने लगा. वह देहातीभी हंसने लगा.

" अब उसकी तरफ देखयो ... पहचानो भी नही ... की उसने घरवाली शहरसे लाई है करके... बहूत टरेन किया है हमारे चाची के भाईने ... अब मस्त जाती है खेतमें.... " उसने पिछे गणेशकी तरफ मुडकर देखते हूए कहा.

गणेश उसकी तरफ देखकर मंद मंद मुस्कुराया.

" आप तो बडी मजेदार बाते करते हो भाई .... अरे हां आपका नाम पुछना तो मै भूलही गया.

" सदा ... सदा है हमरा नाम""

" मतलब आप सदा ऐसीही मजेदार बाते करते होंगे इसलिए आपका नाम सदा रखा गया होगा " गणेशने मजाकमें कहा.

" क्या साब आपबी मस्करी करते हो गरीब आदमीकी " वह शरमाकर बोला.

चलते हूए वे एक बडे मैदानसे गुजरने लगे.

" यहां हमरे गांवका बाजार होता है ... बस्तरवारको " सदाने कहा.

"बस्तरवारको ?"

"माने गुरवार साब " वह हसते हूए बोला. .

" अच्छा " गणेशने उस खुले मैदानपर अपनी दृष्टी फेरते हूए कहा.

बस्तरवार ... यानीकी बृहस्पतीवारका वह भ्रष्ट अविश्कार होगा शायद ... गणेशने सोचा.

फिर सदा गणेशको दो तिन छोटी छोटी गलियोंमें लेकर गया. सामने एक जगह वे बजरंग बलीके मंदिरके सामनसे गुजर गए. मंदिर एक बडे उंचे चौपाहे पर, जिसे वे लोग पार कहते थे, बसा हुवा था. बगलमें एक बडासा बरगदका पेढ था. और पेढके बगलमें, वॉटर सप्लाय डिपार्टमेंटने बंधी हूई एक बडी पाणीकी टंकी थी.

" ये हमरे गांवका पार सायेब, ईहां इस बरगदकी पेढकी वजहसे बहुत बरकत है...."

"बरकत?"

" माने मतलब इहां इस पेढकी वजहसे मस्त ठंडी ठंडी छाव होवे है.. लोग बाग तो बैठतेही है ... साथमें थके हारे कुत्ते बिल्ली, गाय भैस जैसे जानवरभी बैठते है ... ईहां पेढकी छांवमें "

" आप लोगोंके गांवमें पाणीका नलभी आया हुवा दिख रहा है " पाणीकी टंकीकी तरफ देखते हूए गणेशने पुछा.
पाणीके टंकीके उपर दो चार नटखट बच्चे चढकर खेल रहे थे.

" नल कायका सायेब ... बांधकर रख दी है सिरफ पाणीकी टंकी ... कभी कभी धुपकालेमें छोडते है पाणी ... तब बहुत भिड होती है लोगोंकी ईहां "

तभी एक लाल लाल अंजिरजैसा बरगदका फल पेढसे निचे गिर गया. वहां खडे तिनचार बच्चे उधर दौड पडे. उनमेसे एकने बडी सफाईसे वह फल उठाया और बाकि लडकोकों मुंह बिचकाकर चिढाने लगा. उस लडकेने फिर वह फल हल्केसे खोलकर उसमेंके छोटे छोटे किडे सांफ कर, बाकी लडके उससे वह हथीयानेसे पहले झटसे अपने मुंहमें डाल दिया. गणेशने वह किडे देखकर बुरासा मुंह किया था. और आश्चर्यसे वह उस लडकेको देख रहा था.

" अरे सायेब बहुत मस्त लगता है .. तुमभी कभी खाकर देखना... " सदा गणेशका बुरासा हुवा मुंह देखकर बोला.

मंदीरके बगलसे मुडकर सदा गणेशको लेकर आगे जाने लगा. सामने रास्ता पहले गलीसे थोडा चौडा था. रस्तेके दोनो तरफ मट्टीसे बने, गोबरसे सने हूए मकान थे. वही दाई तरफ सामने एक किराने की दुकान थी. किराना दुकानके दोनो तरफ पत्थरसे बने हुए दो चबुतरे थे. वही चबुतरेपर काफी लोग भिड बनाकार बैठे हुए थे. कोई बिडी फूंक रहा था तो कोई चिलम फूंक रहा था. कोई चिलम में तंबाकू भर रहा था को कोई बाते हांक रहे थे. सदा गणेशको वहांसे ले जाने लगा था तो सारी नजरे उसकी तरफ मुड मुडकर देखने लगी. गणेशभी उनकी तरफ देख रहा था. देखते हूए उसकी नजर दुकानके कॅश काऊन्टरपर चली गई. आश्चर्यसे वह उधर देखताही रहा. क्योंकी काऊंन्टरपर एक सुंदर जवान औरत बैठी हूई थी. एक दुकानके काऊंन्टरपर, वहभी इतने पिछडे हूए देहातमें, एक औरतने बैठना इसका उसे आश्चर्य लग रहा था. अब कहा उसके खयालमें आया था की वहां दुकानके दोनो तरफ लोग मधू मख्खीयोंकी तरह इतनी भिड बनाकर क्यों बैठे हूए है. वहां काऊंन्टरपर बैठे औरत का रहन सहन किसी शहरकी औरतसे कम नही था. वह उसकी मुलायम गोरी त्वचा. बाल लंबे. होठोंपर लिपस्टीक लगाए जैसी नैसर्गीक लाली. चेहरा मानो मेकअप किया हो ऐसा साफ सुथरा. सिर्फ वह उसके ठोडीपर गुदे हूए तिन टीके उसके रहन सहनसे मेल नही खाते थे. उसने गुलाबी रंगकी पतली और मुलायम साडी पहनी हुई थी. और मामुली गहरे गुलाबी रंगकाही छोटी छोटी आस्तिनवाला ब्लाऊज पहना हूवा था. उन छोटी छोटी आस्तिनकी वजहसे उसकी वह गोरी, और भरी हूई बाहें औरही मादक दिख रही थी. गणेश पलभर रुककर उसकी तरफ देखनेके अपने मनके लालच को रोक नही सका. उस औरत की तरफ देखकर उसे किसी रेगिस्तानमे गलतीसे कोई गुलाब का फुल उगा हो ऐसा लग रहा था. लेकिन एक बात उसके बिना ध्यानमे आए नही रह सकी, की अगलबगलके लोग जिस तरहसे उसकी तरफ देख रहे थे, कमसे कम उसकी वजहसेतो उस औरतका ध्यान उसकी तरफ जाना चाहिए था. लेकिन वह काऊंटरपर बैठकर अपने दुकानमें आए ग्राहक अटेंड करनेमें और दुकानमें काम कर रहे नौकरको सुचना देनेमे व्यस्त थी. या कमसे कम वैसा जतानेकी चेष्टा कर रही थी. उसकी हर अदा और अंदाज एकदम बिनदास लग रहा था. आदमी होनेके नाते एक स्त्रीने, और वहभी जब वह उसकी तरफ घूरके देख रहा हो, उसने ऐसी उसकी उपेक्षा करना उसे अच्छा नही लगा. उसके मर्दाना अहंको चोट पहूंची थी. वैसे गणेशभी दिखनेके मामलेमे कुछ कम नही था. एकसे बढकर एक सुंदर युवतीया अबभी, उसके शादीको पांच सालके उपर हो जानेके बादभी, उसपर मरती थी. झटसे उसने अपने आपको संभाला और वह सदाके पिछे पिछे जाने लगा. चलते हूए वह अपने दिमागसे वे विचार झटकर निकालने की कोशीश कर रहा था. लेकिन उसे अपमानीत लग रहा था और दिलमे न जाने क्यूं एक कसकसी जाग उठी थी.

क्रमश:...


Imagination was given to man to compensate him for what he is not, and a sense of humor was provided to console him for what he is.
—Oscar Wilde